01-03: अल्लाह एक है
04-06: (सच्चाई पर) विश्वास न करने वालों ने क़ुरआन को मानने से इंकार करते हैं
07-10: विश्वास न करने वालों ने रसूल को मानने से इंकार कर दिया
11-16: विश्वास करने से इंकार करने वालों को दर्दनाक सज़ा होगी
17-19: क़यामत के दिन फ़ैसले का एक दृश्य
20-21: विश्वास न करने वालों की माँग कि फ़रिश्ते या अल्लाह को देखते
22-29: फ़ैसला के दिन का दृश्य
30-34: विश्वास करने से इंकार करने वालों ने क़ुरआन को ठुकरा दिया
35-40: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी
41-44: विश्वास न करने वाले रसूल का मज़ाक़ उड़ाते हैं
45-62: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
63-76: रहम करने वाले रब के बंदे
77: आख़िरी चेतावनी
4: मक्का के लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) पर यह इल्ज़ाम लगाया था कि उन्होंने किसी यहूदी और ईसाई से पुराने नबियों के क़िस्से सीख लिए हैं, और वह इन्हीं को क़ुरआन में लिखवा देते हैं। हालाँकि तोरात का ज्ञान रखने वाले जिन यहूदियों का वे ज़िक्र करते थे, वे ख़ुद ही मुसलमान बन गए थे, लेकिन अगर ऐसी बात होती तो वह मुस्लिम क्यों बनते!
9: कभी वे उन्हें 'जादूगर' कहते, कभी 'शायर', कभी 'कहानियाँ गढ़नेवाला' और कभी 'दीवाना'।
11: असल में उन लोगों को क़यामत और आख़िरत [परलोक] पर विश्वास नहीं था, इसलिए उन्हें सच्चाई पर तरह-तरह की आपत्तियाँ करने और मज़ाक़ उड़ाने में कोई डर नहीं था।
14: वहाँ मौत नहीं आएगी, बल्कि नित नई यातनाओं से पाला पड़ेगा जो कई मौतों जैसा होगा।
18: अल्लाह को छोड़कर लोगों ने फ़रिश्तों को, जिन्नों को या मूर्तियों को ख़ुदा बना रखा था। यह भी संभव है कि उस दिन मूर्तियों को भी बोलने की क्षमता दे दी जाए।
23: अच्छे कर्मों का बदला उन्हें दुनिया में भले ही मिल जाए, मगर उनके किए हुए अच्छे कर्म (जैसे दान देना) आख़िरत में बेकार हो जाएंगे, क्योंकि वहाँ अच्छे कर्मों को तभी क़बूल किया जाएगा अगर आदमी ने अल्लाह, रसूल और क़यामत पर ईमान रखा होगा।
38: "अर-रस्स वाले" का मतलब 'कुएं वाले', इनके बारे में कोई भी बात ठीक से नहीं मालूम, बस इतना ही पता चलता है कि इनकी क़ौम के लोग किसी कुएं के किनारे आबाद थे, उनके पास भी एक रसूल भेजे गए थे, मगर उन लोगों ने भी सच्चाई पर विश्वास नहीं किया, और नतीजे में तबाह हो गए। कुछ लोग इनकी पहचान मदयन में रहने वाले बुतपरस्त लोगों से की है जिनके पास शुऐब (अलै) भेजे गए थे।
39: चेतावनियों में पुराने लोगों की बर्बादी की मिसालें दी गईं, मगर वे नहीं माने।
40: यहाँ इशारा लूत (अलै) की क़ौम के खंडहरों से है जो सीरिया जाने के व्यापारिक मार्ग पर था। इन पर पत्थरों की बारिश हुई थी, देखें सूरह हूद (11: 77-83) .
44: मक्का के बुतपरस्त लोग न तो किसी बात पर ध्यान देते हैं और न सही बात ख़ुद से सोचते हैं, बल्कि बस दूसरों के पीछे आँख बंद करके चल पड़ते हैं, इसीलिए उनकी मिसाल मवेशियों से दी गई है, मगर जानवर आम तौर से आज्ञाकारी होते हैं और अपने मालिक के प्रति वफ़ादार होते हैं, जबकि मक्का के लोग न तो अल्लाह का हुक्म मानते हैं और न उसका शुक्र अदा करते हैं, इसलिए वे जानवरों से भी बदतर हैं।
53: जहाँ एक बड़ी नदी समंदर से मिलती है, उस मुहाने पर Estuaries बन जाती है जहाँ दो तरह की जल-धारा साफ़ देखी जा सकती है जो कि मीठी और नमकीन होती हैं।
68: जैसे अगर किसी ने जान-बूझकर किसी को क़त्ल किया तो उसके घर वाले उसका बदला क़ानूनी तरीक़े से अदालत के द्वारा ले सकते हैं।
72: "झूठी गवाही" का एक अनुवाद "ग़लत और नाजायज़ काम" भी किया गया है।
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