सूरह 22: अल-हज्ज
यह एक मदनी सूरह है, इसका नाम आयत 27 में ज़िक्र की गई हज की पवित्र रीतियों के बारे में है, जिसे पहली बार इबराहीम (अलै) ने निभाया था। इस विषय से परिचय इस तरह कराया गया है कि उन लोगों की निंदा की गई है जो ईमानवालों को मक्का की पवित्र मस्जिद में जाने से रोकते हैं, और इसके बाद क़रीब 15 साल तक ज़ुल्म सहने के बाद मुसलमानों को इजाज़त दे दी गई कि अगर उन पर हमला हो, तो वे अपने बचाव में मुक़ाबला कर सकते हैं (आयत 39). यह सूरह शुरू होती है फ़ैसले के दिन से, और अंत में ईमानवालों से कहा गया है कि वे नमाज़ और अच्छे कर्म के द्वारा कामयाबी पा सकते हैं। यह भी बताया गया है कि लोग जिन बुतों की पूजा करते रहते हैं, वे इतने शक्तिहीन हैं कि सब मिलकर एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते (आयत 73).
05-07: दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है
08-13: कुछ लोगों के ईमान में स्थिरता नहीं होती
14-16: विश्वास करने वाले और विश्वास से इंकार करने वाले की तुलना
17-18: धार्मिक समुदायों के बीच अल्लाह फ़ैसला कर देगा
19-24: विश्वास रखनेवालों और इंकार करने वालों के अंजाम की तुलना
25 : पवित्र मस्जिद [काबा] से रोकने वालों को दंड
26-29: इबराहीम (अलै) ने हज की घोषणा
30-33: हज से जुड़े नियम-क़ायदे
34-38: जानवरों की क़ुर्बानी
39-41: विश्वास न करने वालों के ख़िलाफ़ लड़ने की अनुमति
42-51: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी
52-54: रसूलों के काम में शैतान की फ़ितना डालने की कोशिश
55-57: फ़ैसले का दिन
58-60: घर छोड़कर मदीना आने वाले [मुहाजिर]
61-66: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
67-70: हर मज़हब में इबादत [पूजा] करने का तरीक़ा अलग-अलग
71-72: विश्वास करने से इंकार करने वालों का अंजाम
73-74: झूठे ख़ुदाओं में कोई ताक़त नहीं
75-76: अल्लाह अपने संदेश भेजने के लिए रसूलों को चुनता है
77-78: ईमानवालों का उत्साह बढ़ाया गया
6: अल्लाह का ही वजूद ऐसा है जो किसी का मुहताज नहीं, बाक़ी सारी चीज़ें उसी की क़ुदरत से वजूद [अस्तित्व] में आती हैं, चाहे एक बच्चे का पैदा होना हो या ज़मीन से पौधा उगाना हो। अत: वह मुर्दों को भी दोबारा ज़िंदा करने की ताक़त रखता है।
7: मरे हुए आदमियों को दोबारा ज़िंदा उठाने का मक़सद यही है कि दुनिया में जिस किसी ने अच्छे और भलाई के काम किए, उन्हें इसका इनाम दिया जाए और जिस किसी ने बुरे कर्म किए, उसे सज़ा दी जाए। अगर ऐसा न किया गया तो लोगों के साथ सही इंसाफ़ नहीं होगा।
11: अरब के कुछ देहाती लोग [बद्दू] और मदीना के पाखंडी लोग ऐसे थे कि उन्होंने इस्लाम तो अपना लिया था, मगर उनका ईमान पक्का नहीं था और यह अभी तक उनके दिल में ठीक से उतरा नहीं था। वे हमेशा एक संदेह की हालत में रहते थे, जब तक उन्हें कुछ आर्थिक फ़ायदा पहुँचता रहता, वे संतुष्ट रहते, मगर जैसे ही किसी संकट में डाले जाते जहाँ उन्हें कोई नुक़सान होता, वे फिर से अपने पुराने धर्म में वापस चले जाते, जबकि ईमानवालों का तरीक़ा यह होता है कि जब ख़ुशहाली हो, तो अल्लाह का शुक्र अदा करे और जब कोई नुक़सान हो, तो सब्र और धीरज से काम ले।
15: "अल्लाह 'उसकी' कोई मदद करने वाला नहीं है", यहाँ "उसकी" का मतलब कुछ विद्वानों ने मुहम्मद (सल्ल) से लिया है, इस तरह पूरे वाक्य का मतलब यह होगा कि कुछ लोग सोचते थे कि अल्लाह मुहम्मद (सल्ल) की कोई मदद नहीं करेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, अब वे सख़्त ग़ुस्से और झुंझलाहट में या तो अपना गला घोंट लें या आसमान तक रस्सी तानकर ऊपर जाएं और वहाँ से मुहम्मद साहब का संपर्क तोड़ दें, जहाँ से संदेश आते हैं।
17: साबी [Sabeans] कौन थे, इनकी पहचान कई लोगों से की गई है। ये एक अल्लाह को मानने वाले [monotheistic] लोग थे, मगर इन लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का रसूल नहीं माना। कुछ लोग कहते हैं कि इनके पास अलग से कोई किताब या रसूल नहीं था, कुछ कहते हैं कि ये नूह (अलै) या यह्या अलै [John, the Baptist] के बताए हुए तरीक़े पर चलते थे, कुछ लोग कहते हैं कि ये तारों और ग्रहों को मानते थे। ये लोग सीरिया या ईरान व इराक़ के दक्षिणी हिस्से में बसे हुए थे।
मजूसी [Magians] एक ख़ुदा पर विश्वास रखने वाले प्राचीन फ़ारसी धर्म [Persian and Median religion] को मानने वाले थे जिनकी पहचान आम तौर से पारसी धर्म [ Zoroastrianism] से की जाती है।
25: पवित्र मस्जिद [काबा] और उसके आसपास की वे जगहें जो हज की रीतियों से जुड़ी हुई हैं, जैसे सफ़ा व मर्वा की पहाड़ियों के बीच दौड़ने की जगह, मिना, अरफ़ात, मुज़दलिफ़ा आदि पर दुनिया भर के मुसलमानों का समान अधिकार है। ..... जो कोई अल्लाह को छोड़कर किसी और को अपना ख़ुदा बना बैठा या इस पवित्र मस्जिद के अहाते में धन का लेनदेन करने लगा, तो वह ज़ुल्म करेगा और वहाँ के नियमों को तोड़ेने वाला होगा।
26: जैसा कि सूरह बक़रा (2: 127) में आया है कि जहाँ अल्लाह के घर [काबा] के अवशेष बचे थे, वह जगह अल्लाह ने हज़रत इबराहीम (अलै) को दिखायी और वहाँ इसे नये सिरे से बनाने का हुक्म दिया। काबा के गिर्द सात (7) बार चक्कर लगाने [तवाफ़] को हज और उमरा [छोटा हज] की ज़रूरी रीतियों में माना जाता है।
28: हज सभी मुसलमान मर्द व औरत पर फ़र्ज़ है बशर्ते कि वह शारीरिक और आर्थिक सलाहियत रखता हो। हज के लिए "निर्धारित दिन" इस्लामी कैलेंडर के बारहवें महीने [ज़ुल-हिज्जा] की दस तारीख़ से तेरह तारीख़ तक माना जाता है। हज की रीतियों में जानवरों की क़ुर्बानी भी एक ज़रूरी काम है।...... यहाँ आने का फ़ायदा जैसे नमाज़ें, हज, गुनाहों की माफ़ी माँगना आदि के साथ-साथ हर जगह के मुसलमानों से मिलना और उनसे संभावित व्यापार बढ़ाना।
29: हज के दौरान बाल या नाख़ुन काटना मना होता है, जब हज की रीतियाँ पूरी करके जानवर की क़ुर्बानी कर दी जाती है, उसके बाद ही सिर के बाल मुंडवाना /काटना, नाख़ुन काटना, नहाना आदि कर सकते हैं, इसे ही "साफ़-सुथरे" होना कहा गया है। इसके बाद काबा का सात बार चक्कर [तवाफ़ ए ज़ियारत] लगाया जाता है। लोगों के इबादत करने के लिए बनाया गया सबसे पहला घर "काबा" को माना जाता है (3: 96), इसलिए इसे "पुराना घर" [बैत ए अतीक़] कहा गया है।
30: सभी जानवरों को क़ुर्बानी के लिए और खाने के लिए हलाल [वैध/lawful] कर दिया गया है, सिवाय मुर्दा जानवर (का सड़ा गोश्त), ख़ून, सूअर का गोश्त और वह जानवर जिसको काटते समय अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो, इसके अलावा इस बारे में विस्तार से देखें सूरह मायदा (5: 3).
31: अल्लाह की ख़ुदायी में किसी को साझेदार [Partner] बनाना ऐसा है जैसे कि उसे आसमान से नीचे गिरा दिया गया हो यानी उसके ईमान में बहुत गिरावट आ गई हो, नतीजा यह होता है कि वह अपने मन की इच्छाओं के चलते इधर-उधर भटकता फिरता है जैसे कि उसे किसी पक्षी ने हवा में उचक लिया हो और यहाँ-वहाँ लिए फिरता हो, फिर वह शैतान के बहकावे में आकर सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़ता है जैसे कि हवा ने उसे किसी दूर जगह फेंक दिया हो।
32: रीतियों [शुआएर] का मतलब वह निशानियाँ जिनको देखकर कोई दूसरी चीज़ें याद आए। हज के दौरान की जाने वाली रीतियाँ [rituals/rites] और जिन जिन जगहों पर इन रीतियों को करना है, जैसे अराफ़ात जाना, मुज़दलिफ़ा में रुकना, मिना में शैतान को मारना, काबा का तवाफ़ करना, सफ़ा व मर्वा की पहाड़ियों के बीच तेज़ी से चलना [सई] और जानवर की क़ुर्बानी करना आदि सब पवित्र और आदर की चीज़ें हैं।
33: जब तक किसी चौपाए जानवर को हज की क़ुर्बानी के लिए मान न लिया हो, तब तक उससे हर क़िस्म का फ़ायदा उठाया जा सकता है, जैसे सवारी करना, दूध निकालना, ऊन निकालना आदि, लेकिन एक बार इसे क़ुर्बानी करने के लिए मान लिया, तब उससे कोई फ़ायदा उठाना सही नहीं होगा।
36: अनुवाद में ऊँट लिखा गया है, मगर असल शब्द "बुद्न" है जो गाय के लिए भी बोला जाता है।
38: मक्का में विश्वास न करनेवालों ने मुसलमानों पर क़रीब 13 साल ज़ुल्म किया और उन्हें घर-बार छोड़कर जाने को मजबूर किया, मगर मक्का की ज़िंदगी के दौरान क़ुरआन में मुसलमानों को सब्र व धीरज से काम लेने के लिए कहा गया था। यहाँ अल्लाह ने वादा किया है कि वह मुसलमानों को ज़ालिमों से बचा लेगा, इसलिए अगली आयत 39 में अब अपनी रक्षा के लिए उन ज़ालिमों के ख़िलाफ़ पहली बार हथियार उठाने की इजाज़त दी जा रही है।
40: हथियार उठाने की अनुमति क्यों दी गई? यहाँ बताया गया है कि ईमानवालों पर केवल इस बात के लिए इतना ज़ुल्म किया गया और घरों से निकाला गया कि उन्होंने अपना रब अल्लाह को मान लिया था। जितने भी नबी [Prophets] दुनिया में आए, सब ने अल्लाह की इबादत करने का संदेश दिया, और इबादतगाहें बनायीं जहाँ अल्लाह को बराबर याद किया जाता है, मगर हर दौर में विश्वास न करनेवालों ने उन इबादतगाहों को मिटाना चाहा, इसीलिए ज़रूरी है कि अगर वह हमला करें तो उनसे लड़ा जाए और उन्हें बुरे काम से रोका जाए।
41: यहाँ बताया गया है कि जब ईमानवालों की अल्लाह की मदद से जीत हो जाए और उनकी हुकूमत क़ायम हो जाए तो उन्हें क्या करना चाहिए। नमाज़ पढ़ने और ज़कात देने के अलावा अहम काम यह है कि भलाई व नेकी के काम करने का हुक्म देना है और बुराई से रोकना है।
47: अल्लाह के यहाँ का एक दिन दुनिया के एक हज़ार साल जैसा है, इस बात के कई मतलब बताए जाते हैं। अल्लाह ने छ: दिनों में आसमान, ज़मीन और पूरी कायनात बनायी थी (25:59; 32:4; 50:38). वहाँ का एक दिन उसी छ: दिनों में से एक दिन के बराबर है। दूसरा मतलब यह भी बताया जाता है कि काफ़िरों के लिए क़यामत का दिन डर और बदहवासी के कारण एक हज़ार साल जैसा लगेगा।
52: चूँकि नबी/रसूल कोई फ़रिश्ते नहीं थे, बल्कि इंसान थे, इसलिए उनके भी जज़्बात थे, उन पर भी शैतानों द्वारा डाले गए शक व संदेह का कुछ समय के लिए थोड़ा असर हो सकता था, मगर चूँकि उनकी हिफ़ाज़त अल्लाह करता था, इसलिए उन पर ऐसे फ़ितनों का कोई असर नहीं पड़ता था।
55: फ़ैसले के दिन को "अक़ीम" [उजाड़] कहा गया है क्योंकि इसके बाद ज़मीन पर से हर तरह का जीवन ख़त्म हो जाएगा और इसके बाद फिर कोई नया दिन नहीं होगा।
56: इस दुनिया में अल्लाह ने अपने कुछ बंदों को कुछ अधिकार दे रखे हैं, मगर फ़ैसले के दिन अल्लाह को छोड़कर किसी को कोई अधिकार न होगा।
60: यहाँ इशारा उन मुसलमानों की तरफ़ है जिनके साथ मक्का में ज़ुल्म किया गया, उन्हें उनके घरों से निकाला गया, तो जितना ज़ुल्म उन मक्का वालों ने किया, ठीक उतना ही बदला उनसे लिया जा सकता है। ध्यान रहे कि मक्का में उतरी हुई सूरतों में हमेशा ज़ुल्म के जवाब में सब्र और धीरज रखने का हुक्म दिया गया था, मगर जैसा आयत 39 में है, उन्हें अपनी रक्षा में ज़ुल्म के ख़िलाफ हथियार उठाने की अनुमति दे दी गई।
61: जिस तरह मौसम बदलने पर दिन और रात के समय में बदलाव आता रहता है, उसी तरह कभी अल्लाह जिन लोगों पर ज़ुल्म हो रहा हो, उन्हें जीत दिला देता है, और जो ज़ालिम और ताक़तवाले हैं उन्हें नीचा दिखा देता है।
67: दुनिया में जितने भी पैग़म्बर आए, सब यही संदेश लेकर आए कि एक ख़ुदा पर विश्वास रखो और अच्छे कर्म करो। लेकिन हर धार्मिक समुदाय का अपना-अपना क़ानून था। मुसलमानों को ज़िंदगी जीने के जो नियम-क़ायदे बताए गए हैं, उसे "शरीअत" यानी "रास्ता" कहते हैं।
78: अल्लाह के रास्ते में जान लड़ा देने [जिहाद] का मतलब संघर्ष करना और कोशिश करना होता है। अल्लाह के रास्ते में हर तरह का संघर्ष चाहे हथियारों से लड़ना हो, या शांतिपूर्ण तरीक़े से कोशिश करना हो या अपने आपको सुघारने के लिए की गई कोशिश हो, सभी शामिल है।
मुहम्मद (सल्ल) अपनी उम्मत के लोगों के लिए गवाही देंगे कि ये लोग ईमानवाले थे, देखें 2: 147.
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