सूरह 17: अल-इसरा /बनी इसराईल
यह एक मक्की सूरह है, जिसमें शुरुआत में इसराईल की संतानों का ज़िक्र आया है और अंत में फ़िरऔन का। सूरह के बड़े हिस्से में बताया गया है कि क़ुरआन को इंसानों के मार्गदर्शन के लिए और (इंकार के नतीजे से) सावधान करने के लिए उतारा गया है। मुहम्मद (सल्ल) और उनके रसूल होने की विशेषताओं में ख़ासकर इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि एक इंसान होने के नाते उन्हें अपनी मर्ज़ी से कोई चमत्कार [मोजज़ा] दिखाने की ताक़त नहीं दी गई है जब तक कि अल्लाह ऐसा न चाहे। किस तरह इबलीस [शैतान] इंसानों को बहकाने के लिए झूठे वादे करता है, उसके साथ-साथ विश्वास न करने वालों का अंजाम कैसा होगा, दोनों हालात के लिए इस सूरह में चेतावनी दी गई है, और आयत 22-39 में बहुत से आदेश दिए गए हैं। "रात का सफ़र" जिस पर इस सूरह का नाम पड़ा, उसका ज़िक्र आयत 1 में और फिर से आयत 60 में आया है। मक्का काल के आख़िरी सालों में अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) की इज़्ज़त बढ़ाते हुए एक ही रात में मक्का से येरुशलम और वहाँ से आसमानों का सफ़र कराया और फिर वापस मक्का पहुँचा दिया, फ़ैसले के दिन भी उनके दर्जे बुलंद किए गए: वह अपनी क़ौम के लोगों की अल्लाह के सामने सिफ़ारिश करेंगे (आयत 79), जिसका इस सूरह में ज़िक्र आया है। इस दुनिया में और आनेवाली दुनिया में कामयाबी पाने के कुछ नियम-क़ायदे बताए गए हैं (22-39), साथ में शैतान और उसके धोखेबाज़ियों से सावधान किया गया है (61-65). दोबारा ज़िंदा उठाए जाने के विरोध में बुतपरस्तों द्वारा दिए जाने वाले तर्क, और उनके द्वारा की जाने वाली हास्यास्पद मांगों (89-93) की निंदा की गई है।
02-08: इसराईल की संतानें
09-11: क़ुरआन सही रास्ता दिखानेवाली (किताब) है
12 : अल्लाह की क़ुदरत की दो निशानियाँ
13-21: सज़ा और इनाम का औचित्य
22-39: भलाई के आदेश और बुरे कर्मों पर रोक
39-44: मूर्तिपूजा के ख़िलाफ तर्क
45-48: विश्वास न करने वालों ने क़ुरआन को ठुकरा दिया
49-52: विश्वास न करने वाले दोबारा ज़िंदा उठाए जाने को नहीं मानते
53-55: ईमानवालों का (धर्म के मामले में) बहस के समय मेल-मिलाप का रवैया होना चाहिए
56-57: फ़रिश्तों और जिन्नों में भी कोई ताक़त नहीं
58 : सज़ा मिलना तय है
59-60: क्यों रसूल (सल्ल) कोई चमत्कार नहीं दिखाते
61-65: इबलीस की कहानी
66-69: अल्लाह के एहसानों का इंसान शुक्र अदा नहीं करता
70 : पैदा किए गए प्राणियों में आदम की संतानों को वरीयता
71-72: हर आदमी से उसके कर्मों का हिसाब होगा
73-77: रसूल को नियमों में समझौता करने के लिए बहकाना
78-81: रसूल को पाबंदी से और सही समय पर नमाज़ पढ़ने का हुक्म
82-84: क़ुरआन: (आत्माओं के) दर्द का मरहम और रहमत है
85 : रूह [आत्मा]
86-87: जो संदेश "वही" द्वारा भेजा गया, अल्लाह चाहे तो उन्हें वापस ले ले
88-89: क़ुरआन की नक़ल नहीं हो सकती
90-93: रसूल को लोगों की तरफ़ से चुनौती
94-99: एक आदमी को रसूल बनाने पर आपत्ति
100 : इंसान बड़ा तंगदिल होता है
101-104: मूसा (अलै) की नौ निशानियाँ
105-109: क़ुरआन में आई बातें सच्ची हैं
110-111: "अल्लाह" के नाम से पुकारो या "रहमान" [रहम करनेवाले] से, दोनों एक ही है
1: "दूर वाली मस्जिद" [मस्जिद अक़्सा] येरुसेलम (फ़िलिस्तीन) में स्थित है, यह माना जाता है कि हज़रत सुलैमान (अलै.) ने उसी जगह पहली इबादतगाह बनाई थी। जब ख़लीफ़ा हज़रत उमर ने 639 ई. में यहाँ जीत हासिल की तब इस जगह पर कचरे का ढेर जमा था, उन्होंने इसे साफ़ कराकर वहाँ एक मस्जिद बनवाई जिसका नाम "अक़्सा मस्जिद" रखा गया था। .......
इस आयत में मेराज की घटना की तरफ़ इशारा है, जो मुहम्मद (सल्ल) के साथ मक्का से (मदीना को) हिजरत करने के क़रीब एक या दो साल पहले हुई थी। बताया जाता है कि एक रात फ़रिश्ता जिबरईल (अलै.) मक्का में आए और मुहम्मद साहब को एक घोड़े जैसे जानवर [बुराक़] पर बैठाकर बिजली की सी रफ़्तार से काबा से येरुशलम में स्थित "बैतुल मक़दिस" ले गए, इस सफ़र को "इसरा" कहते हैं। फिर मेराज का आसमानी सफ़र वहाँ से शुरू हुआ, जिबरईल आपको सातों आसमानों पर ले गए, हर आसमान पर आपकी मुलाक़ात पिछले पैग़म्बरों में से किसी पैग़म्बर से हुई, उसके बाद जन्नत में स्थित एक बड़े से बेर के पेड़ [सद्र्तुल मुंतहा] के पास ले गए, वहाँ आपको अल्लाह से सीधे-सीधे बातचीत करने का मौक़ा मिला, इसी अवसर पर अल्लाह ने आपके मानने वालों पर पाँच वक़्त की नमाज़ें फ़र्ज़ कीं, फिर रात ही रात में आप वापस मक्का चले आए। इस मेराज के सफ़र का ज़िक्र सूरह नज्म (53: 13-18) में आया है। यह अल्लाह की तरफ़ से एक चमत्कारिक निशानी थी। ज़्यादातर विद्वान मानते हैं कि यह सफ़र मुहम्मद (सल्ल) ने जागती हालत में किया था, और यह Physical अनुभव था, जबकि कुछ विद्वान मानते हैं कि यह अनुभव उनको ख़्वाब में दिखाया गया था और पूरा अनुभव असल में Spiritual था।
5: असल मेंं इतिहास में कई बार येरूशलम तहस-नहस हो चुका है, और क़ुरआन ने जो दो घटनाओं का उल्लेख किया है, उसे पूरे यक़ीन से बता पाना मुश्किल है। ज़्यादातर विद्वानों ने बताया है कि जब इसराइलियों ने तोरात के आदेशों से हटकर मनमानी शुरू कर दी और नाफ़रमानी करने लगे, यहाँ तक कि कुछ नबियों का क़त्ल कर दिया, तब बाबिल [Babylon] के बादशाह बख़्त नसर [Nebudchadnezzar] ने इसराइलियों पर सन 586 ई.पू. में हमला करके शहर की ईंट से ईंट बजा दी थी, और बैतुल मक़दिस को भी तोड़ डाला, हज़ारों लोगों का सार्वजनिक क़त्ल किया और जो ज़िंदा रह गए थे, उन्हें गिरफ़्तार करके फिलिस्तीन से बाबिल ले गया था जहाँ लम्बी अवधि तक वे ग़ुलाम बनाकर रखे गए थे।
6: काफ़ी साल बख़्त नसर की ग़ुलामी में रहने के बाद अल्लाह ने उन पर इस तरह रहम किया कि ईरान के बादशाह साइरस ने सन 539 ई.पू. बाबिल पर हमला करके उसे जीत लिया, इस मौक़े पर उसे यहूदियों की हालत पर तरस आया और उसने उनको आज़ाद करके दोबारा फ़िलिस्तीन में बसने की अनुमति दे दी, इस तरह वे दोबारा ख़ुशहाल हो गए। मगर फिर धीरे-धीरे जब बुरे कर्मों में डूब गए तो दूसरी घटना घटी।
7: कुछ विद्वान दूसरी चेतावनी को यहूदी राजा हेरोड [Herod] द्वारा हज़रत यह्या [John, the Baptist] के क़त्ल से जोड़ते हैं, उस समय यह इलाक़ा रोमन साम्राज्य के क़ब्ज़े में था। उस ज़माने में (सन 70 ई.) रोम के शाह तयतूस [Titus] का हमला हुआ था, जिसमें यहूदियों को बड़ा भारी नुक़सान उठाना पड़ा था, और उसने बैतुल मक़दिस को भी तोड़-फोड़ दिया था।
11: इंसान ग़ुस्से और झुंझलाहट में अक्सर ऐसा करता है।
13: इंसान को इस दुनिया में अपनी मर्ज़ी से कर्म करने की पूरी आज़ादी दी गयी है, मगर इंसान अपनी मर्ज़ी से वही काम करता है जो उसकी क़िस्मत में पहले से लिख दिया गया है, इस तरह, अल्लाह को लोगों के कर्मों की जानकारी पहले से ही होती है।
31: देखें 81: 8-9.
33: किसी बेगुनाह का अगर क़त्ल हुआ है तो उसके वारिस यानी नज़दीकी रिश्तेदार को हक़ होगा कि वह बदले में अदालती कार्र्वाई के बाद क़ातिल को क़त्ल करे या करवाए [क़सास] ....... जान लेते समय ज़्यादती का मतलब यह भी है कि क़ातिल को छोड़कर किसी और का क़त्ल किया जाए, या क़ातिल के साथ दूसरों का भी क़त्ल किया जाए। उसके हाथ-पाँव या किसी दूसरे अंगों को काटना या क़त्ल करने के लिए कोई ज़्यादा तकलीफ़ पहुँचानेवाला तरीक़ा अपनाना भी ग़लत है।
34: यह किसी यतीम [अनाथ] के रिश्तेदारों और ख़ास करके उसकी देख-रेख करनेवालों को कहा जा रहा है कि उनके माल का कोई ऐसा उपयोग़ न करें जिससे कि उस अनाथ को कोई घाटा पहुँचे। देखें 4: 2.
40: अरब के लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ समझते थे, उनके यहाँ बेटियों का पैदा होना बड़ी शर्म की बात मानी जाती थी, और वे अपने लिए बेटे की ही तमन्ना करते थे, बल्कि कुछ क़बीले में बेटी को ज़िंदा गाड़ देते थे। देखें 16:57-62.
45: ऐसे लोग इस दुनिया की ज़िंदगी और उसके फ़ायदे में इतने मगन होते हैं कि सच्चाई पाने की उनके अंदर कोई तलब भी नहीं होती, बल्कि वे केवल अपनी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते सच्चाई के विरोधी हो जाते हैं, और इस तरह वे सच्चाई को देखने-सुनने से वंचित हो जाते हैं।
48: यानी कभी शायर, कभी बातें गढ़नेवाला, कभी दीवाना और कभी जादूगर कहते हैं।
53: देखें 16: 125; 29: 46.
55: देखें 4: 163-166.
59: जिन लोगों को कोई जानकारी नहीं है, उनकी तरफ़ से निशानियों की माँग के लिए देखें 2:118
60: मेराज के मौक़े पर (17:1) जो क़ुदरत की निशानियाँ दिखायी गयीं, उस पर विश्वास करना तो दूर मक्का के लोगों ने मज़ाक़ उड़ाते हुए हर बात को रद्द कर दिया, उनलोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से बैतुल-मक़दिस के बारे में बहुत से सवाल पूछे जिसका उन्होंने ठीक-ठीक जवाब भी दे दिया, इसके बावजूद वे ज़िद्द और हठधर्मी पर अड़े रहे।..... .. इसी तरह जहन्नम के पेड़ ज़क़्क़ूम के पेड़ के बारे में (37: 62-65) भी मज़ाक़ उड़ाते रहे कि जहन्नम की आग से भला यह पेड़ कैसे पैदा हो सकता है। ज़क़्क़ूम के पेड़ के लिए देखें सूरह वाक़िया (56: 52), सूरह दुख़ान (44: 43-46).
64: आवाज़ से बहकाने का मतलब यह हो सकता है कि आदमी के दिलों में गुनाह करने का विचार बैठा देता है। कुछ विद्वान कहते हैं कि इसका मतलब गाने-बजाने की आवाज़ से है जिससे शैतान लोगों को बहका देता है। ....... जब आदमी अपने माल व औलाद का ग़लत इस्तेमाल करता है, तो वह एक तरह से शैतान को अपना हिस्सेदार बना लेता है।
71: लीडरों को अपनी उम्मत की गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा, देखें सूरह नह्ल (16: 89) ....... दाएं हाथ में कर्मों का लेखा-जोखा दिए जाने के बारे में देखें सूरह हाक़्क़ा (69: 19-24)
73: मक्का के बुतपरस्तों ने मुहम्मद (सल्ल) को उपदेश देने से रोकने के लिए कई तरह के तरीक़े अपनाए थे, जैसे ये कहा कि हम आपके अल्लाह के सामने सिर झुका देंगे अगर आप भी हमारे देवी-देवता के आगे झुक जाएं, या कुछ लोगों ने उन्हें काफ़ी धन-दौलत देने, उनको अपना सरदार मान लेने आदि का भी प्रलोभन दिया।
76: क़ुरैश के लोगों ने मुसलमानों को मक्का से ज़बरद्स्ती नहीं निकाला था, बल्कि उन लोगों ने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि उनके अत्याचार से तंग आकर मुसलमान धीरे-धीरे ख़ुद ही वहाँ से निकल गए थे। अगर उन लोगों ने ताक़त के ज़ोर पर मुसलमानों को निकाला होता, तो अल्लाह की तरफ़ से यातना आ जाती और सब बर्बाद हो गए होते, जैसा कि पहले रसूलों की क़ौम के साथ होता रहा था। इस तरह वे बर्बाद तो हुए, मगर कुछ समय के बाद।
78: सूरज के ढलने से लेकर रात तक चार नमाज़ें हुईं और सुबह की नमाज़ का अलग से बयान है। सुबह की नमाज़ में क़ुरआन का पढ़ा जाना फ़रिश्तों द्वारा ख़ास करके देखा जाता है।
79: यहाँ "तहज्जुद" की नमाज़ का ज़िक्र है जो मुहम्मद (सल्ल) पर फ़र्ज़ थी, जबकि आम मुसलमानों को इसे पढ़ना ज़रूरी नहीं था। ...... "पसंदीदा दर्जे" से मतलब मुहम्मद (सल्ल) का वह ख़ास दर्जा जिसके मुताबिक़ क़यामत के दिन उन्हें अपने समुदाय [उम्मत] के लोगों के लिए अल्लाह के सामने सिफ़ारिश करने की अनुमति होगी।
80: यह एक दुआ है जो उस समय उतरी जब अल्लाह का आदेश हुआ कि मुसलमानों को अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के कारण मक्का से बाहर निकल जाना चाहिए और हिजरत करके मदीना पहुंच कर वहाँ अपना ठिकाना बनाना चाहिए, और यह क़दम सच्चाई को बचाने की ख़ातिर किया जाए।
81: मक्का छोड़कर जाते समय यह ख़ुशख़बरी दी गयी है कि बहुत जल्द सच की जीत होगी और झूठ मिट जाएगा, सो उसके आठ (8) साल बाद यानी सन 630 ई. में मक्का पर मुसलमानों की जीत हुई और झूठ को पूरी तरह मिटा दिया गया।
85: असल में यहूदियों ने मुहम्मद (सल्ल) से रूह के बारे में पूछा था।
94: इससे पहले भी अल्लाह ने हमेशा किसी आदमी को ही अपना संदेश पहुँचाने के लिए चुना था जो कि लोगों के हालात समझते हुए उनको सही रास्ता दिखा सके।
101: ये निशानियाँ फ़िरऔन और मिस्रवालों के लिए थी जिसका वर्णन सूरह अ'राफ़ (7: 130-33) और सूरह नम्ल (27: 12) में भी आया है। दो निशानियाँ तो मूसा (अलै.) की लाठी, और उनका चमकता हुआ हाथ हुए, फिर एक के बाद एक सात (7) निशानियाँ आयीं---- अकाल, पैदावार में कमी, तूफ़ान, टिड्डी दल, घुन के कीड़े, मेंढकों की भरमार, और पानी में ख़ून।
कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ निशानियों से मतलब आदेश से है जो एक हदीस में बयान हए हैं: अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) किसी को साझेदार न ठहराना, चोरी न करना, अशलील काम (बलात्कार) न करना, नाहक़ किसी को क़त्ल न करना, किसी पर झूठा इल्ज़ाम लगाकर उसे सज़ा के लिए पेश करना, जादू न करना, सूद न खाना, शरीफ़ औरतों पर झूठे लांछन न लगाना, और सच की लड़ाई में पीठ दिखाकर न भाग जाना।
104: कुछ विद्वान "फिर से इकट्ठा किए जाने को" आयत 17:7 में ज़िक्र हुई दूसरी चेतावनी से जोड़कर देखते हैं। उनके हिसाब से इसका मतलब यह होगा कि इसराईल की संतानों को शरणार्थी की हालत में दुनिया भर में रहने-बसने के लिए कहा गया है, और एक बार जब वे अपनी पूरी कोशिश लगाएंगे तो उन्हें इकट्ठा जमा कर दिया जाएगा।
107: जिन (यहूदी और ईसाई) लोगों को पिछली किताबों यानी तोरात और इंजील का ज्ञान दिया गया था, उनमें से कुछ तो क़ुरआन सुनकर तुरंत विश्वास कर लेते थे, क्योंकि उनकी किताबों में जिस नबी के आने की ख़बर दी गयी थी, उन्हें वे पहचान लेते थे।
110: अरब के लोग "अल्लाह" के नाम से तो अच्छी तरह परिचित थे, मगर अल्लाह के "रहमान" नाम को नहीं जानते थे। जब मुसलमान "या अल्लाह, या रहमान" कहकर दुआ करते, तो मक्का के लोग मुसलमानों का मज़ाक़ उड़ाते थे कि एक तरफ़ तो ये लोग एक ही ख़ुदा को मानते हैं और दूसरी तरफ़ दो दो ख़ुदाओं को पुकार रहे हैं।
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