Tuesday, April 5, 2022

Surah/सूरह 17: Al-Isra/अल-इसरा /बनी इसराईल [रात की यात्रा, The Night Journey]

 सूरह 17: अल-इसरा /बनी इसराईल

[रात की यात्रा, The Night Journey]

यह एक मक्की सूरह है, जिसमें शुरुआत में इसराईल की संतानों का ज़िक्र आया है और अंत में फ़िरऔन का। सूरह के बड़े हिस्से में बताया गया है कि क़ुरआन को इंसानों के मार्गदर्शन के लिए और (इंकार के नतीजे से) सावधान करने के लिए उतारा गया है।  मुहम्मद (सल्ल) और उनके रसूल होने की विशेषताओं में ख़ासकर इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि एक इंसान होने के नाते उन्हें अपनी मर्ज़ी से कोई चमत्कार [मोजज़ा] दिखाने की ताक़त नहीं दी गई है जब तक कि अल्लाह ऐसा चाहे। किस तरह इबलीस [शैतान] इंसानों को बहकाने के लिए झूठे वादे करता है, उसके साथ-साथ विश्वास करने वालों का अंजाम कैसा होगा, दोनों हालात के लिए इस सूरह में चेतावनी दी गई है, और आयत 22-39 में बहुत से आदेश दिए गए हैं। "रात का सफ़र" जिस पर इस सूरह का नाम पड़ा, उसका ज़िक्र आयत 1 में और फिर से आयत 60 में आया है। मक्का काल के आख़िरी सालों में अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) की इज़्ज़त बढ़ाते हुए एक ही रात में मक्का से येरुशलम और वहाँ से आसमानों का सफ़र कराया और फिर वापस मक्का पहुँचा दिया, फ़ैसले के दिन भी उनके दर्जे बुलंद किए गए: वह अपनी क़ौम के लोगों की अल्लाह के सामने सिफ़ारिश करेंगे (आयत 79), जिसका इस सूरह में ज़िक्र आया है। इस दुनिया में और आनेवाली दुनिया में कामयाबी पाने के कुछ नियम-क़ायदे बताए गए हैं (22-39), साथ में शैतान और उसके धोखेबाज़ियों से सावधान किया गया है (61-65). दोबारा ज़िंदा उठाए जाने के विरोध में बुतपरस्तों द्वारा दिए जाने वाले तर्क, और उनके द्वारा की जाने वाली हास्यास्पद मांगों (89-93) की निंदा की गई है। 



विषय:
01   :  रात में दूरवाली मस्जिद [अक़्सा] की यात्रा 

02-08:  इसराईल की संतानें 

09-11:  क़ुरआन सही रास्ता दिखानेवाली (किताब) है 

12   :  अल्लाह की क़ुदरत की दो निशानियाँ 

13-21:  सज़ा और इनाम का औचित्य 

22-39:  भलाई के आदेश और बुरे कर्मों पर रोक 

39-44:  मूर्तिपूजा के ख़िलाफ तर्क 

45-48:  विश्वास न करने वालों ने क़ुरआन को ठुकरा दिया 

49-52:  विश्वास न करने वाले दोबारा ज़िंदा उठाए जाने को नहीं मानते 

53-55: ईमानवालों का (धर्म के मामले में) बहस के समय मेल-मिलाप का रवैया होना चाहिए 

56-57:  फ़रिश्तों और जिन्नों में भी कोई ताक़त नहीं 

58   :  सज़ा मिलना तय है 

59-60:  क्यों रसूल (सल्ल) कोई चमत्कार नहीं दिखाते

61-65:  इबलीस की कहानी 

66-69:  अल्लाह के एहसानों का इंसान शुक्र अदा नहीं करता 

70   :  पैदा किए गए प्राणियों में आदम की संतानों को वरीयता 

71-72:  हर आदमी से उसके कर्मों का हिसाब होगा 

73-77:  रसूल को नियमों में समझौता करने के लिए बहकाना 

78-81:  रसूल को पाबंदी से और सही समय पर नमाज़ पढ़ने का हुक्म 

82-84:  क़ुरआन: (आत्माओं के) दर्द का मरहम और रहमत है 

85   :  रूह [आत्मा] 

86-87:  जो संदेश "वही" द्वारा भेजा गया, अल्लाह चाहे तो उन्हें वापस ले ले 

88-89:  क़ुरआन की नक़ल नहीं हो सकती

90-93:  रसूल को लोगों की तरफ़ से चुनौती 

94-99:  एक आदमी को रसूल बनाने पर आपत्ति 

100  :  इंसान बड़ा तंगदिल होता है 

101-104: मूसा (अलै) की नौ निशानियाँ 

105-109: क़ुरआन में आई बातें सच्ची हैं 

110-111: "अल्लाह" के नाम से पुकारो या "रहमान" [रहम करनेवाले] से, दोनों एक ही है

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

महानता है उस [अल्लाह] की, जिसने अपने बन्दे [मुहम्मद] को रात के समय पवित्र मस्जिद [काबा] से उस दूरवाली मस्जिद [अक़्सा] तक की यात्रा करायी, जिसके चारों तरफ़ की जगह को हमने बरकत [blessing] दी है, (और यह यात्रा इसलिए करायी) ताकि हम उन्हें अपनी कुछ निशानियाँ दिखा दें: सचमुच वही है जो सब कुछ सुनता, सब कुछ देखता है। (1)

(इससे पहले) हमने मूसा [Moses] को भी किताब [तोरात,Torah] दी थी, और उसे इसराईल की सन्तानों के लिए रास्ता दिखाने का ज़रिया बनाया था (और कहा था) कि "तुम मेरे सिवा किसी और को अपना रखवाला न बना लेना, (2)

ऐ नूह [Noah] के साथ (नौका में सुरक्षित) बैठनेवालों की संतानों: सचमुच वह बड़ा ही शुक्र अदा करनेवाला बंदा था।” (3)


और (देखो!) हमने किताब [तोरात] में इसराईल की सन्तानों के सामने यह घोषणा कर दी थी कि, "दो बार तुम धरती पर ज़रूर फ़साद मचाओगे और बेहद घमंडी बन जाओगे।" (4)

फिर जब उन दोनों में से पहली चेतावनी के पूरा हो जाने का समय आ गया, तो [ऐ इसराईल की संतानों] हमने तुम्हारे ख़िलाफ़ अपने ऐसे (बेबोलीनिया के) बन्दों को भेज दिया जो लड़ाई लड़ने में बड़े सख़्त थे, और उन लोगों ने तुम्हारे घरों को तबाह कर डाला। (इस तरह) वह चेतावनी पूरी होकर रही, (5)

मगर फिर, हमने तुम्हें मौक़ा दिया कि तुम अपने दुश्मन के मुक़ाबले में जीत सको। फिर हमने तुम्हारे धन-दौलत और औलाद में बढ़ोत्तरी कर दी, और तुम्हें बड़ी-संख्यावाले लोगों का एक जत्था बना दिया---- (6)

"अगर तुम अच्छा काम करते हो, तो अपने ही भलाई के लिए करते हो, और अगर तुम बुरे काम करते हो, तो वह भी तुम्हारी ही (जान के) लिए बुरा होगा"---- और फिर, जब दूसरी चेतावनी के पूरा होने का समय आ गया (तो हमने तुम्हारे पास ऐसे दुश्मनों को भेज दिया ताकि) वे तुम्हारे चेहरे बिगाड़ डालें और मस्जिद [बैतुल मक़दिस] में जा घुसें जैसाकि पहली बार भी घुसे थे, और जिस चीज़ पर भी उनकी नज़र पड़ी उसे तोड़-फोड़कर बर्बाद कर डालें।  (7)

तुम्हारा रब अब भी तुम पर दया कर सकता है, लेकिन अगर तुम फिर उसी गुनाह की तरफ़ लौटे, तो हम भी (तुम्हारी सज़ा के साथ) लौट आएंगे: हमने उन लोगों के लिए जहन्नम को क़ैदख़ाना बना रखा है जो (हमारी चेतावनियों को) नहीं मानते। (8)
 
सचमुच यह क़ुरआन उस रास्ते की तरफ़ ले जाना चाहती है जो सबसे सीधा है। यह उन ईमान रखनेवालों को जो अच्छे कर्म करते रहते हैं, ख़ुशख़बरी सुनाती है कि उन्हें बहुत बड़ा इनाम मिलने वाला है, और (9)

चेतावनी देती है कि जो लोग आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक] में विश्वास नहीं रखते, उनके लिए हमने दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है। (10)

तब भी, इंसान जिस तरह (अपने लिए) भलाई की दुआ माँगता है, (कभी-कभी अनजाने में) वह बुराई की भी दुआ माँगने लगता है: सचमुच इंसान बड़ा ही उतावला है! (11)

और (देखो!) हमने रात और दिन को दो निशानियों के रूप में बनाया, फिर रात को (आराम करने के लिए) अँधेरा कर दिया, और दिन के उजाले को देखने के लिए बनाया, ताकि तुम अपने रब की दी हुई रोज़ी ढूँढ सको, और यह भी जान सको कि कैसे वर्षों की गिनती की जाती है और उसका हिसाब रखा जाता है। हमने हर चीज़ को विस्तार से साफ़-साफ़ बता दिया है। (12)

हमने हर आदमी की क़िस्मत उसकी गर्दन से बाँध दी है। क़यामत के दिन, उनमें हर एक लिए, हम उनके (कर्मों का) लेखा-जोखा निकाल लाएंगे, जिसको वे अपने सामने खुला हुआ देख लेंगे, (13)

(उनसे कहा जाएगा), "अपने (कर्मों का) लेखा-जोखा पढ़ ले! आज तू स्वयं ही अपना हिसाब लेने के लिए काफ़ी है।" (14)


जो कोई सीधा मार्ग अपनाता है, तो वह अपने ही भले के लिए अपनाता है; और जो कोई सीधे रास्ते से भटक गया, तो भटकने का नतीजा भी उसे ही भुगतना होगा। कोई भी आदमी किसी दूसरे (के कर्मों) का बोझ नहीं उठाएगा, और न ही हम (किसी क़ौम के) लोगों को उस वक़्त तक सज़ा देते हैं, जब तक कि उनके पास कोई रसूल नहीं भेज देते हैं। (15)

जब हम किसी बस्ती को बर्बाद करने का इरादा कर लेते हैं, तो वहाँ के बिगड़े हुए अमीर लोगों को (सुधर जाने का) आदेश देते हैं, मगर वे इसे मानने के बजाय इंकार करने में और भी जम जाते है, तब हमारा फ़ैसला पक्का हो जाता है, फिर हम उन्हें पूरी तरह से बर्बाद कर देते हैं। (16)

और (देखो!) हम नूह के बाद कितनी नस्लों को बर्बाद कर चुके हैं! तुम्हारा रब अपने बन्दों के गुनाहों को ख़ूब अच्छी तरह से जानता भी है और उन पर नज़र भी रखता है। (17)

अगर कोई (केवल) इसी दुनिया की छोटी सी ज़िंदगी (में भलाई) चाहता है, तो हम जिस किसी के लिए चाहते हैं, और जितना चाहते हैं, उसे इसी दुनिया में जल्दी से जल्दी कुछ दे देते हैं; मगर अंत में, उसके लिए हमने जहन्नम तैयार कर रखी है जिसमें जलने के लिए वह बदहाल और ठुकराया हुआ प्रवेश करेगा। (18)

लेकिन अगर कोई आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की ज़िंदगी चाहता है, और उसको पाने की कोशिश भी करता है, जैसाकि उसे करना चाहिए, तो एक सच्चे ईमानवाले के रूप में, उसकी कोशिशें क़बूल की जाएंगी। (19)

(ऊपर ज़िक्र किए गए) बादवाले [आख़िरत चाहनेवाले] और पहलेवाले [दुनिया चाहनेवाले], दोनों को ही आपके रब की तरफ़ से रोज़ी दी जाती है। [ऐ रसूल] आपके रब की तरफ़ से किसी को रोज़ी देने में कोई रोक-टोक नहीं होती है----  (20)

देखिए, कैसे (इस दुनिया में) हमने उनके कुछ लोगों को कुछ दूसरे लोगों से ज़्यादा दे रखा है---- मगर आख़िरत [Hereafter] के दर्जे सबसे बढ़कर हैं और सबसे बेहतर हैं। (21)


अल्लाह के साथ कोई दूसरा प्रभु न बनाओ, वरना बेइज़्ज़त और बेसहारा होकर रह जाओगे। (22)

आपके रब ने आदेश दिया है कि तुम उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो, और यह कि माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। अगर उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ, तो (अपना धीरज खोते हुए) उन्हें 'उफ़'! तक न कहो और न उनके साथ कठोरता से पेश आओ, बल्कि उनसे आदर के साथ बात किया करो, (23)

और नर्मी के साथ बर्ताव करते हुए उनके सामने विनम्रता से अपने आपको झुकाओ और कहो, "मेरे रब! जिस तरह उन्होंने बचपन में मुझे पाला-पोसा और बड़ा किया था, तू भी उन पर दया कर।" (24)

जो कुछ तुम्हारे दिल में है, उसे तुम्हारा रब अच्छी तरह से जानता है। अगर तुम अच्छे व नेक हुए, तो वह उन लोगों को (जिनसे अनजाने में छोटे-मोटे गुनाह हो जाते हैं) बहुत माफ़ करनेवाला है जो उसके सामने (गुनाहों से तौबा करते हुए) झुकते हैं। (25)

और (देखो!) अपने रिश्तेदारों को दो, जो उनका हक़ है, ज़रूरतमंदों और (बेसहारा) मुसाफ़िरों को भी दो--- और अपने माल को बेहूदा कामों में न उड़ाओ: (26)

जो फ़ु़ज़ूलख़र्ची करते हैं, वह शैतान के भाई हैं, और शैतान अपने रब की नेमतों का कभी भी शुक्र अदा नहीं करता--- (27)

लेकिन अगर कभी ऐसा हो कि तुम ख़ुद अपनी रोज़ी की खोज में अपने रब से उम्मीद लगाए बैठे हो, (तुम्हारे पास कुछ नहीं है) और इस हालत में तुम्हें इन ज़रूरतमंदों से मुँह फेरना पड़े, तो उनसे कम से कम नर्मी से बात कर लिया करो। (28)

और (देखो!) अपना हाथ न तो इतना सिकोड़ लो कि गर्दन में बँध जाए (कि किसी को कुछ न दो) और न उसे बिल्कुल खुला छोड़ दो (कि सब कुछ लुटा बैठो), कि फिर तुम्हारी निंदा हो और तुम दुख में घिर जाओ। (29)

तुम्हारा रब जिसे चाहता है उसकी रोज़ी को बहुत बढ़ा देता है और जिसे चाहता है उसकी रोज़ी को घटा देता है: निस्संदेह वह अपने बन्दों को अच्छी तरह से जानता है और उन पर पूरी नज़र रखता है। (30)


और (देखो!) ग़रीबी के डर से अपने बच्चों की हत्या न करो----  हम उन्हें भी रोज़ी देंगे और तुम्हें भी---- उनकी हत्या करना बहुत ही बड़ा गुनाह है। (31)

और किसी शादीशुदा मर्द या औरत को (सेक्स के इरादे से) किसी दूसरी औरत या मर्द के नज़दीक तक भी नहीं जाना चाहिए: यह एक अश्लील कर्म और बड़ी बुराई का चलन है। (32)

किसी जीव की हत्या न करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहरा दिया है, सिवाय इसके कि जब (क़ानून ने हत्या करने का) अधिकार दिया हो: अगर किसी बेगुनाह की अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो, तो उसके वारिस को हमने अधिकार दे दिया है (कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है), मगर उसे जान लेते समय ज़्यादती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि (अल्लाह ने) पहले ही उसकी मदद कर दी है। (33)

और (ख़र्च करने के इरादे से) अनाथों के माल के नज़दीक भी मत जाओ, सिवाय उसकी भलाई के इरादे से, जब तक कि वह अपनी जवानी को न पहुँच जाएं (और तुम उनकी अमानत उन्हें लौटा दो)। और अपनी प्रतिज्ञा [Pledge] पूरी किया करो: प्रतिज्ञा के विषय में तुमसे अवश्य ही पूछा जाएगा। (34)

जब किसी पैमाने से नापकर दो, तो (कमी न करो और) पूरा नापा करो, और तौलते समय सटीक तराज़ू से सही तौलो: यह बेहतर और ईमानदार तरीक़ा है और इसका नतीजा भी अच्छा होगा। (35)

और (देखो!) जिस चीज़ के सच होने की तुम्हें जानकारी न हो, आँख बंद करके उसकी पैरवी मत करने लगो: कान, आँख और दिल (बुद्धि), इन सब चीज़ों के बारे में तुम से पूछताछ की जाएगी। (36)

और ज़मीन पर अकड़कर मत चलो: न तो तुम ज़मीन को फाड़ सकते हो और न लम्बाई में पहाड़ों की बराबरी कर सकते हो। (37)

यह सारे बुरे काम ऐसे हैं जो तुम्हारे रब को बेहद अप्रिय हैं। (38)


[ऐ रसूल] ये कुछ ज्ञान की बातें हैं जो आपके रब की तरफ़ से आप पर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजी गयी हैं: (लोगो! असल बात यह है कि) अल्लाह के साथ किसी और को (पूजने के लिए) प्रभु न बना लो, वरना निंदा झेलते हुए और ठुकराए हुए, जहन्नम में फेंक दिए जाओगे! (39)

क्या! क्या तुम्हारे रब ने तुम लोगों को तो अपने फ़ज़ल से बेटे दिए हैं, और ख़ुद अपने लिए फ़रिश्तों को बेटियाँ बना लिया है? (अफ़सोस तुम्हारी सोच पर!) कितनी गम्भीर बात है जो तुम कह रहे हो! (40)


और (देखो!) हमने इस क़ुरआन में चीज़ों को तरह-तरह से स्पष्ट करके बता दिया है, ताकि लोग सचेत हों, और इस पर ध्यान दे सकें, मगर इन पर कोई असर न हुआ, उल्टा (सच्चाई से) उनकी नफ़रत में और भी बढ़ोत्तरी हो गयी। (41)

[ऐ रसूल] कह दें, "अगर अल्लाह के साथ दूसरे और भी ख़ुदा होते, जैसा कि ये कहते हैं, तब तो उन ख़ुदाओं ने (मुक़ाबले के लिए) सिंहासनवाले रब [अल्लाह] तक पहुँचने का मार्ग खोज लिया होता।" (42)

महिमावान है अल्लाह! वह कहीं बड़ा और बहुत ऊँचा है उन बातों से, जो ये कहते हैं! (43)

सातों आसमान और ज़मीन और जो कोई भी उनमें है, सब उसकी बड़ाई का बयान करते हैं। और कोई चीज़ भी ऐसी नहीं जो उसकी तारीफ़ों के साथ उसका गुणगान न करती हो, हालाँकि तुम उनकी तारीफ़ व गुणगान को समझ नहीं पाते: बेशक वह अत्यन्त सहनशील, और क्षमा करनेवाला है। (44)


[ऐ रसूल] जब आप क़ुरआन पढ़कर सुनाते हैं, तो हम आपके और उन लोगों के बीच जो आख़िरत [परलोक/ Hereafter] को नहीं मानते, एक अनदेखे पर्दे की आड़ कर देते हैं।  (45)

हमने उनके दिलों पर भी पर्दे डाल दिए हैं जो उन्हें (क़ुरआन को) समझने से रोक देता है, और उनके कानों में बोझ डाल दिया है (कि वे कुछ सुन न सकें)। जब आप क़ुरआन में केवल अपने रब का ही ज़िक्र करते हैं, (और वे जब अपने बनाए हुए प्रभुओं का इसमें उल्लेख नहीं पाते), तो वे नफ़रत से अपनी पीठ फेरकर भाग खड़े होते हैं। (46)

जब वे आपकी बातें ध्यान से सुनते हैं, तो उनके सुनने का तरीक़ा क्या है, इसे हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं, और जब वे आपस में गुप्त बातें करते हैं (हम वह भी जानते हैं), और ये ज़ालिम (मुसलमानों से) कहते हैं, "तुम तो बस एक ऐसे आदमी के पीछे चल पड़े हो, जिस पर जादू कर दिया गया है।" (47)

[ऐ रसूल] देखिए, वे आपके बारे में कैसी कैसी बातें बनाते हैं! नतीजा यह हुआ कि वे भटक चुके हैं, और अब सीधा रास्ता नहीं पा सकते! (48)

वे यह भी कहते हैं, "क्या? जब हम (मरकर) सड़-गल जाएंगे व हड्डियाँ और धूल होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें नए सिरे से पैदा करके फिर से उठाया जाएगा?" (49)

कह दें, "(हाँ), यहाँ तक कि तुम (मरने के बाद) पत्थर या लोहे (जैसे ठोस) हो जाओ, (50)

या कोई और पदार्थ जिसे तुम समझते हो कि उसे जीवित करना बहुत मुश्किल होगा।" तब वे कहेंगे, "कौन हमें (ज़िंदा करके) वापस लाएगा?" कह दें, "वही, जिसने तुम्हें पहली बार पैदा किया था।" तब वे आपके सामने अपने सिर मटकाने लगेंगे और कहेंगे, "अच्छा तो वह कब होगा?" कह दें, "हो सकता है कि बहुत जल्द ही हो: (51)

एक दिन आएगा जिस दिन अल्लाह तुम्हें बुलाएगा, और तुम उसकी तारीफ़ें करते हुए उसकी पुकार का जवाब भी दोगे, और समझोगे कि (दुनिया में) तुम बस थोड़ी ही देर ठहरे थे।  (52)


[ऐ रसूल!] मेरे बन्दों से कह दें कि "(धर्म पर होने वाली बहस में) जो बात कहो, ऐसी कहो जो बहुत अच्छी हो। शैतान उनके बीच झगड़े का बीज बोता है: सचमुच शैतान तो आदमी का खुला दुश्मन है।" (53)

तुम्हारा रब, तुम सब के बारे में सबसे अधिक जानता है: अगर वह चाहे तो तुम पर दया कर दे, और अगर वह चाहे तो तुम्हें दंड दे दे। और [ऐ रसूल] हमने आपको उनकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए नहीं भेजा है। (54)

आसमानों और ज़मीन में हर एक के बारे में तुम्हारा रब ख़ूब अच्छी तरह से जानता है। हमने कुछ पैग़म्बरों [Prophets] को दूसरे पैग़म्बरों से ज़्यादा दिया: हम ने दाऊद [David] को किताब [ज़बूर/ Psalms] दी थी। (55)

कह दें, "(संकट में) पुकारकर देखो उन सबको, जिनको तुमने अल्लाह के सिवा अपना प्रभु बना रखा है: उनके पास कोई ताक़त नहीं है कि वे तुम्हारे कष्ट दूर कर सकें या तुम्हारी हालत बदल सकें।" (56)

वे लोग जिन [फ़रिश्तों और जिन्नों] को पूजते हैं, वे तो ख़ुद अपने रब तक पहुँचने का रास्ता ढूँढते रहते हैं, यहाँ तक कि वे (फ़रिश्ते) भी जो अल्लाह से सबसे निकट हैं। वे उसकी दया-दृष्टि की उम्मीद लगाए रखते हैं और उसकी सज़ा से डरते रहते हैं। तुम्हारे रब की सज़ा सचमुच बड़े डरने की चीज़ है: (57)

क़यामत के दिन से पहले ऐसा अवश्य होगा कि (शैतानियाँ करने वालों की) जितनी बस्तियाँ होंगी, हम उन्हें तबाह कर देंगे या उसे कठोर दंड देंगे---  यह बात (अल्लाह की) किताब में लिखी जा चुकी है। (58)


हम अगर चाहें तो चमत्कारिक निशानियाँ (देकर) भेजने से हमें कोई नहीं रोक सकता, मगर हमें इस बात ने रोक रखा है कि पहले गुज़र चुके लोगों ने भी इन (निशानियों) को मानने से इंकार कर दिया था। हमने समूद के लोगों को स्पष्ट निशानी के रूप में एक ऊँटनी दी थी, इसके बावजूद उन लोगों ने (क़त्ल करके) उसके साथ कितना बुरा सलूक किया। हम निशानियाँ तो केवल इसलिए भेजते हैं ताकि लोग उसके नतीजे से डरें। (59) 

[ऐ रसूल!] हम आपको बता चुके हैं कि मनुष्य जाति के बारे में आपके रब को हर एक चीज़ की जानकारी है। (मेराज के मौक़े पर रात की यात्रा के दौरान) वह झलक जो हमने आपको दिखायी, वह तो लोगों के लिए केवल एक आज़माइश थी, इसी तरह (जहन्नम का) वह मन्हूस पेड़ [ज़क़ूम] था जिसका ज़िक्र क़ुरआन में किया गया है। हम उन्हें (तरह तरह से) सावधान करते रहते हैं, मगर उन पर कोई असर नहीं पड़ता, बल्कि इससे तो उनकी बदतमीज़ी और बढ़ती जाती है।" (60)


और जब ऐसा हुआ था कि हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ, तो वे सब सज्दे में झुक गए, मगर इबलीस नहीं झुका।" उसने कहा, "क्या मैं उसके सामने झुकूँ, जिसे तूने मिट्टी से बनाया है?" (61)

और (फिर) कहने लगा, "ज़रा इस तुच्छ (इंसान) को देखो, कि तूने इस हस्ती को मुझ पर बड़ाई दी है! अगर तू मुझे क़यामत के दिन तक मुहलत दे दे, तो मैं बहुत थोड़े लोगों को छोड़कर उसकी सारी सन्तानों को बहकाकर मार्ग से भटका दूँगा।" (62)

अल्लाह ने कहा, "चला जा यहाँ से! तेरा बदला [reward] तो जहन्नम होगा, और जो कोई भी तेरे पीछे चलेगा उन लोगों की सज़ा भी जहन्नम ही होगी ---- पूरी पूरी सज़ा! (63)

जिस किसी पर तेरा बस चले, जा उसे अपनी आवाज़ से बहका ले, उनपर हमला करने के लिए अपने सवार और अपने प्यादे तैयार कर ले, उनके माल और औलाद में भी उनके साथ हिस्सेदार बन जा, और उनसे (झूठे) वादे कर---मगर शैतान के वादे धोखे के सिवा कुछ नहीं होते---- (64)

मगर तुम्हारा कोई ज़ोर हमारे (असल) बंदों पर नहीं चल सकता: तेरा रब उनकी अच्छी तरह से देखभाल के लिए काफ़ी है।" (65)


(ऐ लोगो) यह तुम्हारा रब है जो तुम्हारे लिए समंदर में बड़े आराम से जहाज़ों को चलाता है, ताकि तुम उसके फ़ज़ल से रोज़ी तलाश कर सको: वह तुम्हारे हाल पर बेहद दयावान है। (66)

जब समंदर में तुम पर कोई मुसीबत आ जाती है, तो वे सब हस्तियाँ जिन्हें तुम पुकारते हो, बिना मदद के छोड़ जाती हैं, केवल एक अल्लाह की याद ही बाक़ी रह जाती है। मगर जब अल्लाह तुम्हें बचाकर सूखे में ले आता है तो फिर तुम उससे मुँह मोड़ लेते हो: सच्चाई यह है कि आदमी शुक्र अदा नहीं करता! (67)

क्या तुम इस बात से बेफ़िक्र हो कि एक बार थल पर आ जाने के बाद वह तुम्हें धरती के अंदर धँसा नहीं सकता या यह कि तुम पर पथराव करनेवाली आँधी नहीं भेज सकता है? और तब तो तुम्हें बचानेवाला कोई नहीं मिलेगा। (68)

या तुम कैसे इस बात का यक़ीन कर सकते हो कि वह [अल्लाह] तुम्हें समंदर में दोबारा नहीं ले जाएगा, और (यात्रा के दौरान अगर) फिर तुम पर समंदरी तूफ़ान भेज दे, और तुम्हारी नाशुक्री के कारण तुम्हें डूबो दे? वहाँ कोई न होगा जो हमारे ख़िलाफ़ तुम्हारी मदद कर सके।  (69)

हमने आदम की सन्तान को इज़्ज़त दी है और उनके लिए थल औऱ जल में सवारी की व्यवस्था की है; हमने उनके लिए अच्छी रोज़ी का इंतज़ाम किया है, और अपने पैदा किए हुए बहुत-से प्राणियों के मुक़ाबले उन्हें बड़ाई दी है। (70)


उस दिन जब हम लोगों के हर एक गिरोह को उनके लीडरों के साथ बुलाएँगे, फिर जिन्हें उनके कर्मो का लेखा-जोखा उनके दाहिने हाथ में दिया जाएगा, वे इसे (ख़ुशी-ख़ुशी) पढ़ेंगे। और किसी के साथ तनिक भी अन्याय न होगा: (71)

जो लोग इस दुनिया में (बुद्धि से काम न लेते हुए) अंधे होकर रहे, वे आख़िरत [परलोक] में भी अंधे ही रहेंगे, बल्कि वे मार्ग से और भी अधिक भटके हुए होंगे। (72)

[ऐ रसूल!] विश्वास न करनेवाले इस कोशिश में लगे थे कि जो कुछ हमने आपकी ओर 'वही' [revelation] द्वारा भेजा है, उससे आपको बहकाकर दूर कर दें, ताकि आप कोई अलग ही 'वही' अपनी तरफ़ से गढ़कर हमारे नाम के साथ जोड़ दें, और तब वे ख़ुश होकर आपको अपना दोस्त बना लें। (73)

अगर हमने आपके क़दम मज़बूती से जमा न दिए होते, तो बहुत संभव था कि उनकी तरफ़ आपका झुकाव थोड़ा बहुत तो हो ही जाता। (74)

और अगर ऐसा हुआ होता, तो हम आपको इस दुनिया में भी दुगनी सज़ा देते, और मरने के बाद भी दुगनी सज़ा होती और तब आपको हमारे मुक़ाबले कोई भी मदद करने वाला न मिलता। (75)

उन्होंने चाल चली कि इस भूभाग से आपके क़दम उखाड़ दें, ताकि आप यहाँ से निकल जाएं, (अगर ऐसा हो जाता तो) आपके बाद ये भी थोड़ी देर से ज़्यादा टिक नहीं पाते। (76)

हमारा तरीक़ा तो उन रसूलों के लिए भी ऐसा ही था, जिन्हें हमने आपसे पहले भेजा था, और आप हमारे तरीक़े में कभी कोई बदलाव नहीं पाएंगे। (77)


अत: [ऐ रसूल] पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करें -- दोपहर सूरज के ढलने से लेकर रात के अंधेरे तक, और सुबह सवेरे क़ुरआन (सुबह की नमाज़) पढ़ा करें--- सुबह-सवेरे क़ुरआन के पढ़ने को (फ़रिश्तों द्वारा) हमेशा ख़ास तौर से देखा जाता है---  (78)

और रात के कुछ हिस्से में (पिछ्ले पहर) नींद से उठकर नमाज़ पढ़ा करें, यह आपके लिए अतिरिक्त इबादत होगी, ताकि आपका रब आपका दर्जा ऊँचा करते हुए आपको ‘पसंदीदा दर्जे ’[मक़ाम ए महमूद] तक पहुँचा दे। (79)

और दुआ में कहें, "मेरे रब! तू मुझे (जहाँ कहीं पहुँचा, तो) सच्चाई के साथ पहुँचा, और (जहाँ कहीं से निकाल, तो) सच्चाई के साथ बाहर निकाल, और अपनी ओर से मुझे ऐसी ताक़त दे जिसमें तेरी मदद हो।" (80)

कह दें, "(देखो!) सच्चाई सामने आ चुकी है और झूठ मिट गया है: और झूठ को एक दिन मिटना ही था।" (81)


हम क़ुरआन में जो (संदेश) भेजते हैं, वह ईमान रखनेवालों (की आत्मा के सभी दर्द) का मरहम (healing) और रहमत है, मगर जो लोग विश्वास नहीं करते, उनकेे लिए तो यह बस उनके घाटे को और बढ़ाने वाली चीज़ हैै।  (82)

और आदमी पर जब हम अपनी ख़ास कृपा करते हैं तो वह घमंड में आकर मुँह फेर लेता है, किन्तु जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है, तो (देखो!) एकदम निराश होेकर बैठ रहता है। (83)

कह दें, "हर एक आदमी चीज़ों को अपने ही ढंग से करता है, मगर तुम्हारा रब भली-भांति जानता है कि कौन सबसे सही बताए हुए मार्ग पर चल रहा है।" (84)


[ऐ रसूल], वे आपसे रूह [आत्मा] के बारे में पूछते हैं। कह दें, "रूह तो मेरे रब के अधिकार-क्षेत्र का हिस्सा है।" आपको तो (सृष्टि के राज़ की) बहुत थोड़ी ही जानकारी दी गयी है। (85)

अगर हम चाहें, तो जो कुछ भी आपकी ओर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजा गया है, उसे वापस ले लें-----तो फिर आपको कोई भी न मिलेगा जो हमारे ख़िलाफ़ आपकी वकालत कर सके। (86)

लेकिन यह तो बस आपके रब की दयालुता है (कि वह ऐसा नहीं करता): सच तो यह है कि उसका आप पर बड़ा करम है। (87)

कह दें, "अगर सारे इंसान और जिन्न साथ मिलकर भी चाहें कि इस क़ुरआन जैसी कोई चीज़ बना लाएँ, तो वे इस जैसी चीज़ नहीं बना सकते, चाहे वे एक-दूसरे की कितनी ही मदद कर लें।" (88)

हमने इस क़ुरआन में लोगों (को समझाने) के लिए हर तरह की मिसालें बार-बार बयान कर दी हैं, फिर भी अधिकतर लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने पर अड़े रहते हैं। (89)

वे कहते हैं, "[ऐ मुहम्मद] हम तब तक तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि तुम हमारे लिए धरती के अंदर से पानी का एक सोता [spring] न निकाल दो;  (90)

या फिर तुम्हारा खजूरों और अंगूरों का एक बाग़ हो, और तुम उसके बीच से नहरें निकाल दो; (91)

या जैसा कि तुम्हारा दावा है, आसमान टुकड़े-टुकड़े होकर हम पर गिर पड़े, या अल्लाह और फ़रिश्तों को हमारे आमने-सामने ला खड़ा करो; (92)

या फिर तुम्हारे लिए सोने का एक महल पैदा हो जाए; या तुम आसमान में चढ़ जाओ--- तब भी, हम तुम्हारे चढ़ने पर विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि तुम एक सचमुच की (लिखी-लिखाई) किताब न उतार लाओ, जिसे हम पढ़कर जाँच सकें।" कह दें, "महिमावान है मेरा रब! मैं एक (सच्चा) संदेश पहुंचानेवाले मामूली आदमी के सिवा और क्या हूँ?" (93)

जब लोगों के पास मार्ग दिखानेवाली चीज पहुँच गयी, तो उस पर विश्वास कर लेने से बस एक ही बात ने उन्हें रोके रखा था, कि वे कहते थे कि, "ऐसा कैसे हो सकता है कि अल्लाह ने एक आदमी को रसूल बनाकर भेज दिया?" (94)

कह दें, "अगर फ़रिश्ते ज़मीन पर (यहाँ के लोगों की तरह) बसे होते और आराम से चल फिर रहे होते, तो हमने उनके पास आसमान से किसी फ़रिश्ते को ही रसूल बनाकर भेज दिया होता।" (95)

कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह ही गवाह के रूप में काफ़ी है। निश्चय ही वह अपने बन्दों को अच्छी तरह से जानता भी है, और उन पर नज़र भी रखता है।" (96)


जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए तो असल में वही सही रास्ता पानेवाला होता है, और वह जिसे भटकता छोड़ दे, तो उस (अल्लाह) के सिवा ऐसे लोगों को बचानेवाला कोई नहीं पाओगे। और क़यामत के दिन हम ऐसे लोगों को इकट्ठा करेंगे, औंधे मुँह पड़े हुए, इस हाल में कि वे अंधे, गूँगे और बहरे होंगे। जहन्नम उनके रहने का ठिकाना होगा। जब कभी (वहाँ की) आग धीमी पड़ने लगेगी, तो हम उसे और भी भड़का देंगे। (97)

यही बदला है जो उन्हें हमारी निशानियों को मानने से इंकार करने और ऐसा कहने के नतीजे में मिलेगा कि, "क्या! जब हम मरके (सड़-गलकर) हड्डी और चूरा हो जाएँगे, तो क्या हमें नए सिरे से पैदा करके उठाया जाएगा?" (98)

क्या वे नहीं समझते कि जिस अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, वह उस जैसी चीज़ दोबारा भी पैदा कर सकता है? उसने उनके लिए एक समय तय कर रखा है--- इस बात में कोई सन्देह नहीं है--- मगर इस पर भी शैतानी करनेवाले लोग हर चीज़ का इंकार करते हैं, सिवाय अविश्वास करने के। (99)

[ऐ रसूल] कह दें, "अगर कहीं मेरे रब की रहमत [दयालुता] के ख़ज़ाने तुम्हारे अधिकार में होते, तो ख़र्च हो जाने के भय से तुम उसे रोके ही रखते: वास्तव में इंसान है ही बड़ा तंग दिल!  (100)


(बहुत पहले) हमने मूसा को नौ खुली निशानियाँ दी थीं---  इसराईल की सन्तान से पूछ लो। जब मूसा [Moses] (मिस्र के लोगों के पास) आया, तो फ़िरऔन [Pharaoh] ने उससे कहा, "ऐ मूसा! मुझे लगता है कि किसी ने तुम पर जादू कर दिया है।" (101)

मूसा ने कहा, "तुम अच्छी तरह से जानते हो कि स्पष्ट सबूत के तौर पर ऐसी निशानियाँ तो केवल आसमानों और ज़मीन का रब ही भेज सकता है। और ऐ फ़िरऔन! मुझे लगता है कि तुम्हारी बर्बादी बस आने ही वाली है।" (102)

अत: फ़िरऔन यह चाहता था कि उन (इसराईल की संतानों) को उस ज़मीन से उखाड़ फेंके, मगर हमने उसे और जो उसके साथ थे, सभी को (समंदर में) डुबा दिया,  (103)

उसके मरने के बाद, हमने इसराईल की सन्तान से कहा था, "तुम इस ज़मीन पर बस जाओ, और जब आख़िरत [परलोक/ Hereafter] का वादा पूरा हो जाने का समय आ जाएगा, तो हम तुम सबको इकट्ठा हाज़िर कर देंगे।" (104)


हमने क़ुरआन को सच्चाई के साथ उतार भेजा, और सच्चाई के साथ ही वह आयी है--- और [ऐ रसूल] हमने आपको केवल इसलिए भेजा ताकि आप (ईमान व अच्छे कर्मों के नतीजे की) ख़ुशखबरी सुना दें और (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे दें----  (105)

यह (क़ुरआन) एक पढ़कर सुनाने की चीज़ है, जिसे हमने अलग अलग हिस्सों में उतारा है, ताकि आप ठहर-ठहरकर इसे लोगों को पढ़कर सुना सकें; (यही वजह है कि) हमने इसे थोड़ा-थोड़ा करके उतारा है।  (106)

[ऐ रसूल] कह दें, "तुम इस (क़ुरआन) पर विश्वास करो या न करो, मगर जिन लोगों को पिछली किताबों का ज्ञान दिया गया था, उनके सामने जब इसे पढ़कर सुनाया जाता है, तो वे मुँह के बल सज्दे में गिर पड़ते हैं,  (107)

और पुकार उठते हैं, "महान है हमारा रब! हमारे रब का वादा इसीलिए था कि पूरा हो जाए।" (108)

वे रोते हुए चेहरों के बल गिर जाते हैं, और सच्चाई की बातें [क़ुरआन] उनकी विनम्रता [humility] को और बढ़ा देती है। (109)

(उनसे) कह दें, "तुम उसे 'अल्लाह' के नाम से पुकारो या 'रहम करनेवाले रब' [रहमान] के नाम से--- चाहे किसी भी नाम से उसे पुकारो, उसके सारे नाम अच्छे और ख़ूबीवाले हैं।" और [ऐ रसूल] अपनी नमाज़ न बहुत ऊँची आवाज़ में पढ़ें, और न बहुत धीमी आवाज़ में, बल्कि इन दोनों के बीच की आवाज़ को अपनाएं (110)

और कहें, "तारीफ़ें तो अल्लाह के लिए हैं, जिसकी न तो कोई औलाद है और न उसकी हुकूमत में कोई उसका सहभागी [partner] है। वह इतना कमज़ोर नहींं कि उसे अपने बचाव के लिए किसी सहारे की ज़रूरत हो। उसकी बेहिसाब महानता का बखान बुलंद आवाज़ में करें!” (111)
 
 
 
 
नोट: 

1: "दूर वाली मस्जिद" [मस्जिद अक़्सा] येरुसेलम (फ़िलिस्तीन) में स्थित है, यह माना जाता है कि हज़रत सुलैमान (अलै.) ने उसी जगह पहली इबादतगाह बनाई थी। जब ख़लीफ़ा हज़रत उमर ने 639 ई. में यहाँ जीत हासिल की तब इस जगह पर कचरे का ढेर जमा था, उन्होंने इसे साफ़ कराकर वहाँ एक मस्जिद बनवाई जिसका नाम "अक़्सा मस्जिद" रखा गया था। ....... 

इस आयत में मेराज की घटना की तरफ़ इशारा हैजो मुहम्मद (सल्ल) के साथ मक्का से (मदीना को) हिजरत करने के क़रीब एक या दो साल पहले हुई थी। बताया जाता है कि एक रात फ़रिश्ता जिबरईल (अलै.) मक्का में आए और मुहम्मद साहब को एक घोड़े जैसे जानवर [बुराक़] पर बैठाकर बिजली की सी रफ़्तार से काबा से येरुशलम में स्थित "बैतुल मक़दिसले गएइस सफ़र को "इसराकहते हैं। फिर मेराज का आसमानी सफ़र वहाँ से शुरू हुआजिबरईल आपको सातों आसमानों पर ले गएहर आसमान पर आपकी मुलाक़ात पिछले पैग़म्बरों में से किसी पैग़म्बर से हुईउसके बाद जन्नत में स्थित एक बड़े से बेर के पेड़ [सद्र्तुल मुंतहा] के पास ले गएवहाँ आपको अल्लाह से सीधे-सीधे बातचीत करने का मौक़ा मिलाइसी अवसर पर अल्लाह ने आपके मानने वालों पर पाँच वक़्त की नमाज़ें फ़र्ज़ कींफिर रात ही रात में आप वापस मक्का चले आए। इस मेराज के सफ़र का ज़िक्र सूरह नज्म (53: 13-18) में आया है। यह अल्लाह की तरफ़ से एक चमत्कारिक निशानी थी। ज़्यादातर विद्वान मानते हैं कि यह सफ़र मुहम्मद (सल्ल) ने जागती हालत में किया थाऔर यह Physical अनुभव थाजबकि कुछ विद्वान मानते हैं कि यह अनुभव उनको ख़्वाब में दिखाया गया था और पूरा अनुभव असल में Spiritual था। 

5: असल मेंं इतिहास में कई बार येरूशलम तहस-नहस हो चुका है, और क़ुरआन ने जो दो घटनाओं का उल्लेख किया है, उसे पूरे यक़ीन से बता पाना मुश्किल है। ज़्यादातर विद्वानों ने बताया है कि जब इसराइलियों ने तोरात के आदेशों से हटकर मनमानी शुरू कर दी और नाफ़रमानी करने लगे, यहाँ तक कि कुछ नबियों का क़त्ल कर दिया, तब बाबिल [Babylon] के बादशाह बख़्त नसर [Nebudchadnezzar] ने इसराइलियों पर सन 586 ई.पू. में हमला करके शहर की ईंट से ईंट बजा दी थी, और बैतुल मक़दिस को भी तोड़ डाला, हज़ारों लोगों का सार्वजनिक क़त्ल किया और जो ज़िंदा रह गए थेउन्हें गिरफ़्तार करके फिलिस्तीन से बाबिल ले गया था जहाँ लम्बी अवधि तक वे ग़ुलाम बनाकर रखे गए थे। 

6: काफ़ी साल बख़्त नसर की ग़ुलामी में रहने के बाद अल्लाह ने उन पर इस तरह रहम किया कि ईरान के बादशाह साइरस ने सन 539 ई.पू. बाबिल पर हमला करके उसे जीत लियाइस मौक़े पर उसे यहूदियों की हालत पर तरस आया और उसने उनको आज़ाद करके दोबारा फ़िलिस्तीन में बसने की अनुमति दे दीइस तरह वे दोबारा ख़ुशहाल हो गए। मगर फिर धीरे-धीरे जब बुरे कर्मों में डूब गए तो दूसरी घटना घटी। 

7: कुछ विद्वान दूसरी चेतावनी को यहूदी राजा हेरोड [Herod] द्वारा हज़रत यह्या [John, the Baptist] के क़त्ल से जोड़ते हैं, उस समय यह इलाक़ा रोमन साम्राज्य के क़ब्ज़े में था। उस ज़माने में (सन 70 ई.) रोम के शाह तयतूस [Titus] का हमला हुआ थाजिसमें यहूदियों को बड़ा भारी नुक़सान उठाना पड़ा था, और उसने बैतुल मक़दिस को भी तोड़-फोड़ दिया था। 

11: इंसान ग़ुस्से और झुंझलाहट में अक्सर ऐसा करता है। 

13: इंसान को इस दुनिया में अपनी मर्ज़ी से कर्म करने की पूरी आज़ादी दी गयी है, मगर इंसान अपनी मर्ज़ी से वही काम करता है जो उसकी क़िस्मत में पहले से लिख दिया गया है, इस तरह, अल्लाह को लोगों के कर्मों की जानकारी पहले से ही होती है।  

31: देखें 81: 8-9.  

33: किसी बेगुनाह का अगर क़त्ल हुआ है तो उसके वारिस यानी नज़दीकी रिश्तेदार को हक़ होगा कि वह बदले में अदालती कार्र्वाई के बाद क़ातिल को क़त्ल करे या करवाए [क़सास] ....... जान लेते समय ज़्यादती का मतलब यह भी है कि क़ातिल को छोड़कर किसी और का क़त्ल किया जाए, या क़ातिल के साथ दूसरों का भी क़त्ल किया जाए। उसके हाथ-पाँव या किसी दूसरे अंगों को काटना या क़त्ल करने के लिए कोई ज़्यादा तकलीफ़ पहुँचानेवाला तरीक़ा अपनाना भी ग़लत है। 

34: यह किसी यतीम [अनाथ] के रिश्तेदारों और ख़ास करके उसकी देख-रेख करनेवालों को कहा जा रहा है कि उनके माल का कोई ऐसा उपयोग़ न करें जिससे कि उस अनाथ को कोई घाटा पहुँचे। देखें 4: 2.

40: अरब के लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ समझते थेउनके यहाँ बेटियों का पैदा होना बड़ी शर्म की बात मानी जाती थीऔर वे अपने लिए बेटे की ही तमन्ना करते थेबल्कि कुछ क़बीले में बेटी को ज़िंदा गाड़ देते थे। देखें 16:57-62.

45: ऐसे लोग इस दुनिया की ज़िंदगी और उसके फ़ायदे में इतने मगन होते हैं कि सच्चाई पाने की उनके अंदर कोई तलब भी नहीं होतीबल्कि वे केवल अपनी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते सच्चाई के विरोधी हो जाते हैंऔर इस तरह वे सच्चाई को देखने-सुनने से वंचित हो जाते हैं।

48: यानी कभी शायर, कभी बातें गढ़नेवाला, कभी दीवाना और कभी जादूगर कहते हैं।  

53: देखें 16: 125; 29: 46.

55: देखें 4: 163-166.

59: जिन लोगों को कोई जानकारी नहीं है, उनकी तरफ़ से निशानियों की माँग के लिए देखें 2:118 

60: मेराज के मौक़े पर (17:1) जो क़ुदरत की निशानियाँ दिखायी गयींउस पर विश्वास करना तो दूर मक्का के लोगों ने मज़ाक़ उड़ाते हुए हर बात को रद्द कर दियाउनलोगों ने मुहम्मद (सल्ल) से बैतुल-मक़दिस के बारे में बहुत से सवाल पूछे जिसका उन्होंने ठीक-ठीक जवाब भी दे दियाइसके बावजूद वे ज़िद्द और हठधर्मी पर अड़े रहे।..... .. इसी तरह जहन्नम के पेड़ ज़क़्क़ूम के पेड़ के बारे में (37: 62-65) भी मज़ाक़ उड़ाते रहे कि जहन्नम की आग से भला यह पेड़ कैसे पैदा हो सकता है। ज़क़्क़ूम के पेड़ के लिए देखें सूरह वाक़िया (56: 52), सूरह दुख़ान (44: 43-46).  

64: आवाज़ से बहकाने का मतलब यह हो सकता है कि आदमी के दिलों में गुनाह करने का विचार बैठा देता है। कुछ विद्वान कहते हैं कि इसका मतलब गाने-बजाने की आवाज़ से है जिससे शैतान लोगों को बहका देता है। ....... जब आदमी अपने माल व औलाद का ग़लत इस्तेमाल करता हैतो वह एक तरह से शैतान को अपना हिस्सेदार बना लेता है।

71: लीडरों को अपनी उम्मत की गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा, देखें सूरह नह्ल (16: 89) ....... दाएं हाथ में कर्मों का लेखा-जोखा दिए जाने के बारे में देखें सूरह हाक़्क़ा (69: 19-24)

73: मक्का के बुतपरस्तों ने मुहम्मद (सल्ल) को उपदेश देने से रोकने के लिए कई तरह के तरीक़े अपनाए थे, जैसे ये कहा कि हम आपके अल्लाह के सामने सिर झुका देंगे अगर आप भी हमारे देवी-देवता के आगे झुक जाएं, या कुछ लोगों ने उन्हें काफ़ी धन-दौलत देने, उनको अपना सरदार मान लेने आदि का भी प्रलोभन दिया। 

76: क़ुरैश के लोगों ने मुसलमानों को मक्का से ज़बरद्स्ती नहीं निकाला थाबल्कि उन लोगों ने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि उनके अत्याचार से तंग आकर मुसलमान धीरे-धीरे ख़ुद ही वहाँ से निकल गए थे। अगर उन लोगों ने ताक़त के ज़ोर पर मुसलमानों को निकाला होतातो अल्लाह की तरफ़ से यातना आ जाती और सब बर्बाद हो गए होतेजैसा कि पहले रसूलों की क़ौम के साथ होता रहा था। इस तरह वे बर्बाद तो हुएमगर कुछ समय के बाद। 

78: सूरज के ढलने से लेकर रात तक चार नमाज़ें हुईं और सुबह की नमाज़ का अलग से बयान है। सुबह की नमाज़ में क़ुरआन का पढ़ा जाना फ़रिश्तों द्वारा ख़ास करके देखा जाता है। 

79: यहाँ "तहज्जुदकी नमाज़ का ज़िक्र है जो मुहम्मद (सल्ल) पर फ़र्ज़ थीजबकि आम मुसलमानों को इसे पढ़ना ज़रूरी नहीं था। ...... "पसंदीदा  दर्जेसे मतलब मुहम्मद (सल्ल) का वह ख़ास दर्जा जिसके मुताबिक़ क़यामत के दिन उन्हें अपने समुदाय [उम्मत] के लोगों के लिए अल्लाह के सामने सिफ़ारिश करने की अनुमति होगी।

80: यह एक दुआ है जो उस समय उतरी जब अल्लाह का आदेश हुआ कि मुसलमानों को अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के कारण मक्का से बाहर निकल जाना चाहिए और हिजरत करके मदीना पहुंच कर वहाँ अपना ठिकाना बनाना चाहिएऔर यह क़दम सच्चाई को बचाने की ख़ातिर किया जाए। 

81: मक्का छोड़कर जाते समय यह ख़ुशख़बरी दी गयी है कि बहुत जल्द सच की जीत होगी और झूठ मिट जाएगासो उसके आठ (8) साल बाद यानी सन 630 ई. में मक्का पर मुसलमानों की जीत हुई और झूठ को पूरी तरह मिटा दिया गया। 

85: असल में  यहूदियों ने मुहम्मद (सल्ल) से रूह के बारे में पूछा था। 

94: इससे पहले भी अल्लाह ने हमेशा किसी आदमी को ही अपना संदेश पहुँचाने के लिए चुना था जो कि लोगों के हालात समझते हुए उनको सही रास्ता दिखा सके। 

101:  ये निशानियाँ फ़िरऔन और मिस्रवालों के लिए थी जिसका वर्णन सूरह अ'राफ़ (7: 130-33) और सूरह नम्ल (27: 12) में भी आया है। दो निशानियाँ तो मूसा (अलै.) की लाठीऔर उनका चमकता हुआ हाथ हुएफिर एक के बाद एक सात (7)  निशानियाँ आयीं---- अकालपैदावार में कमीतूफ़ानटिड्डी दलघुन के कीड़ेमेंढकों की भरमारऔर पानी में ख़ून।  

कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ निशानियों से मतलब आदेश से है जो एक हदीस में बयान हए हैं: अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) किसी को साझेदार न ठहरानाचोरी न करनाअशलील काम (बलात्कार) न करनानाहक़ किसी को क़त्ल न करनाकिसी पर झूठा इल्ज़ाम लगाकर उसे सज़ा के लिए पेश  करनाजादू न करनासूद न खानाशरीफ़ औरतों पर झूठे लांछन न लगानाऔर सच की लड़ाई में पीठ दिखाकर न भाग जाना।

104: कुछ विद्वान "फिर से इकट्ठा किए जाने को" आयत 17:7 में ज़िक्र हुई दूसरी चेतावनी से जोड़कर देखते हैं। उनके हिसाब से इसका मतलब यह होगा कि इसराईल की संतानों को शरणार्थी की हालत में दुनिया भर में रहने-बसने के लिए कहा गया है, और एक बार जब वे अपनी पूरी कोशिश लगाएंगे तो उन्हें इकट्ठा जमा कर दिया जाएगा। 

 107: जिन (यहूदी और ईसाई) लोगों को पिछली किताबों यानी तोरात और इंजील का ज्ञान दिया गया थाउनमें से कुछ तो क़ुरआन सुनकर तुरंत विश्वास कर लेते थेक्योंकि उनकी किताबों में जिस नबी के आने की ख़बर दी गयी थीउन्हें वे पहचान लेते थे। 

110: अरब के लोग "अल्लाहके नाम से तो अच्छी तरह परिचित थेमगर अल्लाह के "रहमाननाम को नहीं जानते थे। जब मुसलमान "या अल्लाहया रहमान"  कहकर दुआ करतेतो मक्का के लोग मुसलमानों का मज़ाक़ उड़ाते थे कि एक तरफ़ तो ये लोग एक ही ख़ुदा को मानते हैं और दूसरी तरफ़ दो दो ख़ुदाओं को पुकार रहे हैं। 






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