Wednesday, April 6, 2022

Surah/सूरह 6: Al-Ana'm/अल-अना'म [चौपाये/ Livestock]

 


सूरह 6: अल-अना'म 
[चौपाये/ Livestock]


यह एक मक्की सूरह है जिसका शीर्षक आयत 136-139 में आए मवेशियों के वर्णन से लिया गया है। इस सूरह में अल्लाह की ताक़त और उसके बेहिसाब ज्ञान को दर्शाया गया है, और बुतपरस्तों की कई रीतियों और ख़ासकर मवेशियों के बारे में उनके झूठे दावों का यहाँ विस्तार से जवाब दिया गया है। हलाल [वैध] और हराम [अवैध] खानों को पिछली सूरह से अधिक विस्तार से यहाँ बताया गया है। कुल मिलाकर इस सूरह में साफ़ किया गया है कि वह अल्लाह ही है जो हर चीज़ को पैदा करता है, उसे नियंत्रित करता है, और उसकी देखरेख करता है, और जब हम किसी मुश्किल में फँस जाते हैं, तो उसी के सामने झुकते हैं। इसके साथ-साथ नबी का रोल भी साफ़-साफ़ बताया गया है कि जब तक अल्लाह की मर्ज़ी न हो, नबी अपने मन से कोई काम नहीं कर सकता है। इस तरह, इस सूरह में बहुदेववादियों के दावों को बड़े विस्तार से रद्द किया गया है। अंत में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि हर एक को अपने कर्मों का हिसाब देना होगा। 


विषय:

01-05: अल्लाह ही हर चीज़ का पैदा करने वाला है 

06-11: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी 

12-18: अल्लाह की क़ुदरत 

19-24: अल्लाह गवाह है 

25-32: विश्वास न करने वालों की कड़ी निंदा 

33-36: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

37-41: कोई निशानी [चमत्कार] दिखाने की माँग 

42-45: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी

46-55: विश्वास न करने वालों को चेतावनी 

56-58: रसूल केवल अल्लाह की ही बंदगी करता है 

59-67: अल्लाह सबसे ताक़तवर है

68-70: मूर्खता की बातों पर चर्चा करने से बचें 

71-73: अल्लाह ही सही रास्ता दिखानेवाला है 

74-90: इबराहीम (अलै) और उनके उत्तराधिकारियों की कहानी 

91   : किसी आम आदमी पर अल्लाह का संदेश [वही] आना?

92-93:  किताब [क़ुरआन] रसूल पर उतारी जा रही है?

93-94:  अंतिम फ़ैसले का दृश्य 

95-99:  अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

100-108: मूर्तिपूजा करना मूर्खता है 

109-111: कोई निशानी (चमत्कार) दिखाने की माँग 

112-117: रसूल का विरोध 

118-122: खाने से जुड़े हुए नियम-क़ायदे 

123-127: अपराधियों के सरदार 

128-135: हिसाब-किताब का दृश्य : जिन्न और इंसान 

136-140: मूर्तिपूजा और बच्चियों को मार डालने की कड़ी निंदा 

141-150: खाने-पीने से जुड़े नियम-क़ायदे 

151-153: धार्मिक ज़िम्मेदारियों का निष्कर्ष 

154-158: जो किताबें मूसा(अलै) और रसूलों को दी गईं

159-161: इबराहीम का दीन ही रसूल (सल्ल) का दीन है 

162-165: अल्लाह के सामने पूरी भक्ति से झुकना 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया और अँधेरा और उजाला बनाया; फिर भी विश्वास न करनेवाले लोग (ख़ुदायी में) दूसरों को अपने रब के बराबर ठहराते हैं! (1)
वही है जिसने तुम्हें गीली मिट्टी से पैदा किया, फिर (तुम्हारे जीवन की) एक अवधि तय कर दी और साथ में एक और समय (क़यामत का) तय कर दिया, जिसकी जानकारी केवल उसी [अल्लाह] को है; फिर भी तुम संदेह करते हो! (2)
वही अल्लाह है, आसमानों में भी और ज़मीन पर भी, वह तुम्हारे छिपे राज़ भी जानता है और उसे भी जो तुम ज़ाहिर करते हो, और जो कुछ भी तुम करते हो, वह सब जानता है; (3)

मगर (इंकार पर अड़े लोगों का हाल यह है कि) जब भी उनके रब की कोई निशानी उनके पास आती है, हर बार वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं। (4)

इस तरह, जब सच्चाई (का संदेश) उनके पास पहुँचा, तो उन्होंने उसे मानने से इंकार कर दिया, मगर जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाया करते थे, जल्द ही वह चीज़ (हक़ीक़त बनकर) उनके सामने आ जाएगी। (5)
 
क्या वे इस बात को नहीं मानते, कि हम उनसे पहले कितनी पीढ़ियों को बर्बाद कर चुके हैं? हमने उन्हें ज़मीन पर तुम से ज़्यादा मज़बूती से जमा रखा था, उनके ऊपर आसमान से काफ़ी पानी बरसाया और उनके क़दमों तले नदियाँ बहा दीं, इसके बावजूद हमने उन्हें उनके बुरे कर्मों के चलते बर्बाद कर दिया और उनके बाद दूसरी पीढ़ियों को ला खड़ा किया। (6)

[ऐ रसूल!] यहाँ तक कि अगर हमने आप पर चमड़े के काग़ज़ पर लिखी-लिखाई किताब उतार दी होती, और उसे उन्होंने अपने हाथों से छूकर देखा भी होता, तब भी, विश्वास न करने वालों ने यही कहा होता, "यह कुछ और नहीं, बल्कि साफ़ जादूगरी है।" (7)

वे कहते हैं, "इस (रसूल का साथ देने के लिए) कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं उतारा गया?" लेकिन अगर हमने फ़रिश्तों को उतारा होता, तो फिर उनकी तरफ़ से तुरंत ही फ़ैसला हो गया होता, वह भी बिना कोई मुहलत दिए हुए। (8)

सचमुच अगर हम फ़रिश्तों को (नबी के रूप में) भेजते, तब भी हमने फ़रिश्ते को आदमी के ही रूप में भेजा होता, और इस तरह, उनका संदेह और बढ़ गया होता। (9)
 

[ऐ मुहम्मद!] आपसे पहले भी रसूलों की हँसी उड़ायी जा चुकी है, लेकिन हँसी उड़ानेवाले लोग जिस (धमकी-भरी) बात की हँसी उड़ाते थे (कि बुरे कर्म का नतीजा बुरा होगा), उसी बात ने उन्हें आ घेरा। (10)

आप (उन लोगों से) कहें, "धरती पर घूम-फिरकर (पुरानी पीढ़ियों के खंडहरों को) देखो कि सच्चाई को ठुकराने वालों का क्या अंजाम हुआ!" (11)

आप पूछें,  "आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, वह किसका है?", आप बता दें, "अल्लाह का ही है। उसने अपने ऊपर यह बात ज़रूरी ठहरा ली है कि वह दया [रहम] का भाव रखेगा। इस बात में कोई शक नहीं है कि वह तुम्हें क़यामत के दिन इकट्ठा करेगा। जिन लोगों ने अपने-आपको धोखे में डाल रखा है, वे विश्वास नहीं करेंगे।  (12)

वह सारी चीज़ें जो रात के समय और दिन में ठहर जाती हैं, उसी के क़ब्ज़े में है, और वह हर बात सुनता है, सब कुछ जानता है।" (13

कह दें, "क्या मैं अल्लाह को छोड़कर किसी और को अपना रखवाला [Protector] बना लूँ?, उस अल्लाह को जो आसमानों और ज़मीन का पैदा करनेवाला है, जो सबको खिलाता है, मगर किसी का नहीं खाता।" कह दें, "मुझे यही आदेश हुआ है कि (तुममें) सबसे पहले मैं पूरी भक्ति के साथ उसके आगे झुक जाऊँ। अल्लाह के साथ किसी और को उसकी (ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] ठहराने वालों में से न हो जाना।" (14)

कह दें, "अगर मैं अपने रब की आज्ञा न मानूँ, तो मुझे एक बड़े (भयानक) दिन की यातना का डर है।" (15)

उस दिन जिसके सिर से यातना टल गयी, तो उस पर अल्लाह ने सचमुच दया की: (आदमी के लिए) यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (16)
 

[ऐ रसूल] अगर अल्लाह आपको कोई तकलीफ़ देनी चाहे, तो सिवाय उसके, कोई नहीं है जो इसे टाल सके, और अगर वह आपको कोई भलाई पहुँचाना चाहे, तो उसे हर चीज़ करने की ताक़त है: (17)

वह अपने सभी बन्दों का सबसे बड़ा व असली मालिक है, वह बेहद समझ-बूझवाला, व हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (18)

आप पूछें, "एक गवाह के लिए सबसे बड़ी बात क्या होती है?", कहें, "अल्लाह मेरे और तुम्हारे बीच गवाह है। इस क़ुरआन को मेरी तरफ़ उतारा गया है, ताकि मैं इसके द्वारा तुम (लोगों) को और जहाँ तक यह (संदेश) पहुँचे, उनमें से हर एक को (सच्चाई का इंकार करने और बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दूँ। क्या सचमुच तुम इस बात की गवाही देते हो कि अल्लाह के साथ दूसरे देवता भी हैं?" कहें, "मैं ख़ुद तो (ऐसी किसी चीज़ की) गवाही नहीं देता।" कह दें, "वह तो बस एक अकेला अल्लाह है, और तुम जिस किसी को भी (उसकी ख़ुदायी के साथ) जोड़ते हो, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं।" (19)

जिन (यहूदी व ईसाई) लोगों को हमने (आसमानी) किताब दी है, वे उन [मुहम्मद] को इतनी अच्छी तरह पहचानते हैं, जैसे वे अपने बेटों को पहचानते हैं। जिन लोगों ने (अपने हाथों) अपने को तबाह कर लिया, वे कभी विश्वास नहीं करेंगे। (20)
अब इससे ज़्यादा ग़लत काम और क्या हो सकता है, कि कोई अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़े या उसकी आयतों को मानने से इंकार कर दे? जो लोग ऐसे ग़लत काम करते हैं, वे कभी फल-फूल नहीं सकेंगे। (21)
जब हम उन सबको एक साथ इकट्ठा करेंगे और फिर एक से ज़्यादा देवताओं के माननेवालों [Polytheists] से पूछेंगे, "कहाँ है वे लोग जिनके बारे में तुम दावा करते थे कि वे (ख़ुदायी में) अल्लाह के साझेदार [Partner] हैं?" वे घोर निराशा में होंगे, (22)

वे केवल इतना ही कहेंगे, "अपने रब, अल्लाह की क़सम! हमने उस (अल्लाह) के साथ किसी और को उसका साझेदार नहीं ठहराया था!" (23)

देखो, कि किस तरह वे अपने ही ख़िलाफ़ झूठ बोलने लगे, और कैसे उन लोगों ने जिन (देवताओं को) गढ़ा था, वे उन्हें छोड़कर गुम हो गए। (24)
 
उनमें कुछ लोग ऐसे हैं जो (ऐसा लगता है कि) आपकी बातें सुनते हैं, मगर (उनकी हठधर्मी के कारण) हमने उनके दिलों पर परदे डाल रखे हैं----इसीलिए वे क़ुरआन को समझते नहीं हैं‌‌----- और उनके कानों में बहरेपन का बोझ है। यहाँ तक कि अगर वे हर एक निशानी भी देख लेते, तब भी उनमें विश्वास नहीं करते। अत: जब वे आपके पास आते हैं, तो आपसे बहस करते हैं: विश्वास न करनेवाले कहते हैं, "यह और कुछ नहीं, बस पुराने ज़माने के लोगों की कहानियाँ हैं।" (25)

और वे दूसरों को भी (क़ुरआन सुनने से) रोकते हैं, और वे स्वयं भी उससे दूर रहते हैं। मगर वे किसी और को नहीं बल्कि ख़ुद को ही बर्बाद करते हैं, हालाँकि वे इस बात को नहीं समझते। (26)
काश कि तुम देख पाते, जब उन्हें (जहन्नम की) आग के सामने खड़ा किया जाएगा, तो किस तरह वे कहेंगे, "क्या ही अच्छा होता कि हमें (दुनिया में) वापस भेज दिया जाता, तो (इस बार) हम अपने रब की आयतों को मानने से इंकार नहीं करते, बल्कि विश्वास करनेवालों में शामिल हो जाते।" (27)
नहीं! बल्कि जिस सच्चाई को वे छिपाया करते थे, वह उनके सामने और भी स्पष्ट हो जाएगी। अगर उन्हें (दुनिया में) वापस लाया भी जाता, तो फिर से ये उन्हीं कामों में लग जाते, जिससे उन्हें रोका गया था---- वे कितने बड़े झूठे हैं! (28)
वे कहते हैं, "इस दुनिया की ज़िंदगी के बाद (परलोक की ज़िंदगी) कुछ भी नहीं है: हम लोगों को मरने के बाद दोबारा नहीं उठाया जाएगा।" (29)
काश कि आप देख पाते, जब उन्हें अपने रब के सामने खड़ा किया जाएगा, तो किस तरह अल्लाह कहेगा, "क्या यह हक़ीक़त नहीं है?" वे कहेंगे, "हाँ, सचमुच है, हमारे रब की क़सम!", वह कहेगा, "ठीक है, तो विश्वास न करने के नतीजे में अब हमारी यातना का मज़ा चखो।" (30)
बड़े घाटे में पड़ गए वे लोग, जिन्होंने अल्लाह से होने वाली मुलाक़ात को मानने से इंकार किया, यहाँ तक कि जब अचानक (क़यामत की) वह घड़ी आ जाएगी, तो वे कहेंगे, "अफ़सोस हम पर कि हमने यह बात नहीं मानी!" उनका हाल यह होगा कि वे अपने बोझ अपनी पीठों पर लादे हुए होंगे। कितना बुरा होगा वह बोझ! (31)
इस दुनिया की ज़िंदगी तो बस एक खेल और भटकाव के सिवा कुछ भी नहीं है; जबकि आख़िरत [परलोक] का घर उन लोगों के लिए सबसे अच्छा है, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं। तो क्या तुम समझ से काम नहीं लोगे? (32)

[ऐ रसूल!] हम अच्छी तरह जानते हैं कि जो कुछ वे कहते हैं, उससे आपको दुख पहुँचता है। मगर असल में ऐसा नहीं है कि वे आप पर विश्वास नहीं करते: ये शैतानियाँ करनेवाले तो अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार करते हैं। (33)
आपसे पहले दूसरे रसूलों पर भी विश्वास नहीं किया गया था, और उन्होंने बड़े धीरज [सब्र] के साथ अपने ठुकराए जाने को और कष्ट पहुँचाए जाने को उस वक़्त तक सहन किया जब तक कि उन्हें हमारी सहायता न पहुँच गई---- कोई नहीं है जो अल्लाह के किए हुए वादे को बदल सके। आपके पास तो उन रसूलों के क़िस्से पहले ही पहुँच चुके हैं। (34)
अगर आपको इन विश्वास न करनेवालों द्वारा ठुकराया जाना इतना असहनीय लगता है, तो अगर आपसे हो सके, तो धरती में कोई सुरंग बना लें, या आसमान में सीढ़ी लगा लें, और उनके लिए कोई निशानी ले आएं: अगर अल्लाह ऐसा चाहता तो उन सबको सीधे मार्ग पर ला सकता था। अतः आप जाहिलों के साथ शामिल न हो जाएं। (35)
आपकी पुकार का केवल वही लोग जवाब देंगे, जो सुन सकते हैं; रहे मुर्दा लोग, तो अल्लाह उन्हें (क़यामत के दिन) उठा खड़ा करेगा, और उसी के पास उन सबको लौटकर जाना होगा। (36)

वे यह भी कहते हैं, "इस (रसूल) पर उसके रब की तरफ़ से कोई निशानी क्यों नहीं उतारी गयी?" कह दें, "अल्लाह को तो निश्चय ही इस बात की ताक़त है कि कोई निशानी उतार दे", हालाँकि उनमें ज़्यादातर लोग समझते नहीं हैं":  (37)
ज़मीन पर रेंगनेवाले सभी जीव और वे सारे पक्षी जो अपने परों के सहारे उड़ते हैं, ये सब भी तुम्हारी ही तरह के समुदाय हैं। हमने (हिसाब रखनेवाली) किताब में कोई भी चीज़ छोड़ी नहीं है---- अंत में तो वे सब अपने रब के सामने इकट्ठे किए जाएँगे। (38)
जिन लोगों ने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया, वे बहरे, गूँगे और घटाटोप अँधेरों में पड़े हुए हैं। अल्लाह जिसे चाहता है, (उसकी हठधर्मी के चलते) उसे भटकता छोड़ देता है, और जिसे चाहता है, उसे सीधे मार्ग पर लगा देता है। (39)
कहें, "ज़रा सोचो: अगर अल्लाह की यातना, या (क़यामत की) घड़ी तुम्हारे सामने आ जाए, तो बताओ, क्या अल्लाह को छोड़कर (मदद के लिए) किसी और को पुकारोगे, बोलो अगर तुम सच्चे हो? (40)
"बिल्कुल नहीं, बल्कि तुम उसी (अल्लाह) को पुकारोगे। फिर जिस परेशानी में पड़कर तुमने उसे पुकारा था, अगर वह [अल्लाह] चाहता, तो उसे दूर कर देता, और तब तुम उन्हें भूल जाते जिन (देवताओं) को अभी (अल्लाह) का साझेदार [Partner] ठहराते हो।" (41)

[ऐ रसूल!] आपसे पहले हमने बहुत सी क़ौमों के पास रसूल भेजे और (अपने क़ानून के मुताबिक़) उनके लोगों को मुसीबत और तंगी [hardship] में डाला, ताकि वे (अपनी अकड़ छोड़कर) झुकना सीख सकें। (42)
जब हमारी तरफ़ से उन पर सख़्त मुसीबत आयी, तब भी काश कि उन्होंने झुकना सीखा होता! मगर नहीं, उनके दिल तो और कड़े हो गए, और शैतान ने उनके बुरे कर्मों को उनके लिए बड़ा मनमोहक बना दिया था। (43)
इस तरह, जो कुछ चेतावनियाँ उन्हें दी गयी थीं, वे उन्हें पूरी तरह भुला बैठे थे, फिर हमने उन पर हर तरह (की ख़ुशहालियों) के दरवाज़े खोल दिए फिर, जो कुछ उन्हें मिला था, वे उसकी ख़ुशियाँ मनाने में मगन ही थे कि अचानक हमारी यातना ने उन्हें आ पकड़ा और वे निराशा में चुपचाप देखते रह गए। (44)
इस तरह, शैतानियाँ करनेवाले लोगों की जड़ काट दी गयी: सारी प्रशंसा अल्लाह की ही हैं, जो सारे संसारों का रब है। (45)
 
[ऐ रसूल!] आप कहें, "ज़रा सोचो: अगर अल्लाह तुम्हारे सुनने की और तुम्हारी देखने की शक्ति छीन ले और तुम्हारे दिलों पर ठप्पा लगा दे (कि कुछ सोच-समझ न सको), तो अल्लाह को छोड़कर कौन है जो तुम्हें ये नेमतें वापस दिला सकता है?" देखिए, कैसे हम अपनी आयतों को समझाने के लिए तरह-तरह से बताते हैं, फिर भी ये लोग मुँह फेर लेते हैं। (46)

आप कहें, "ज़रा सोचो: अगर तुम पर अल्लाह की यातना एकदम से अचानक आ जाए या बताकर आए, तो क्या शैतानियाँ करनेवाले लोगों के सिवा कोई और गिरोह होगा जिसे बर्बाद किया जाएगा?" (47)

हम रसूलों को केवल इसीलिए भेजते हैं कि वे (ईमान व नेक कर्मों की) ख़ुशख़बरी सुना दें और (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दें। सो जिस किसी ने विश्वास कर लिया और अपने आपको सुधारते हुए नेक कर्म किए, तो ऐसे लोगों को न कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे। (48)

रहे वे लोग, जिन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया, तो हमारी आज्ञा का खुले आम विरोध करने के नतीजे में, वे निश्चय ही हमारी यातना की लपेट में आ जाएंगे। (49)

आप कह दें, "मेरे पास न तो अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, न मैं नज़रों से ओझल चीज़ों की (पूरी) जानकारी रखता हूँ, और न ही मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। मैं तो बस उसी बात पर चलता हूँ जो मुझे 'वही' [Revelation] द्वारा बतायी जाती है।"  कहें, "क्या कोई अंधा और वह जो देख सकता हो, दोनों एक जैसे हो सकते हैं? क्या तुम सोच-विचार से काम नहीं लेते?" (50)
 
आप इस क़ुरआन के द्वारा उन लोगों को सावधान कर देंजो इस बात का डर रखते हैं कि उन्हें अपने रब के सामने इकट्ठा किया जाएगा-----उस (अल्लाह) के सिवा कोई न होगा जो उन्हें बचा सके और न कोई सिफ़ारिश करने वाला होगा ---- शायद कि ये बुराइयों से बचने वाले हो जाएं। (51)

[ऐ रसूल!] आप (अपनी मजलिस से) उन लोगों को बाहर न निकाल दें, जो लोग केवल अपने रब की ख़ुशी व मंज़ूरी के लिए सुबह और शाम उसे पुकारते रहते हैं। आप किसी भी तरह उनके कामों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं, और न आपके कामों के लिए वे ज़िम्मेदार हैं; अगर आपने (अमीर सरदारों के कहने पर) उन ईमानवालों को (मजलिस से) बाहर निकाल दिया, तो आप भी ज़्यादती करने वालों में से हो जाएंगे।  (52)

हमने उनमें से कुछ लोगों को, दूसरे लोगों की परीक्षा के लिए बनाया है, ताकि विश्वास न करनेवाले कहें, "क्या हममें से यही लोग मिले थे, जिन पर अल्लाह ने अपना ख़ास करम किया?" क्या अल्लाह उन्हें अच्छी तरह नहीं जानता जो शुक्र अदा करने वाले हैं? (53)
 
[ऐ रसूल!] जब आपके पास ऐसे लोग आएँ, जो हमारी आयतों पर विश्वास [ईमान] रखते हैं, तो कहें, "सलामती हो तुमपर! तुम्हारे रब ने रहम [दया] करने को अपने ऊपर ज़रूरी ठहरा लिया है: तुममें से कोई नासमझी में अगर कोई बुरा काम कर बैठे, और फिर उसके बाद (ग़लती पर) पछताए और अपना सुधार कर ले, तो अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, और बेहद दयावान है।" (54)

इसी तरह हम अपनी आयतें अच्छी तरह समझाकर बता देते हैं, ताकि (नेकी का रास्ता भी स्पष्ट हो जाए, और) गुनाहगारों का रास्ता भी खुलकर सामने आ जाए। (55

आप कह दें, "तुम लोग अल्लाह को छोड़कर जिन (देवताओं) को पुकारते हो, उनकी पूजा करने से मुझे मना किया गया है।" कहें, "मैं तुम्हारी बेकार ख़्वाहिशों के पीछे नहीं चलूँगा, क्योंकि अगर मैंने ऐसा किया, तब तो मैं मार्ग से भटक जाऊंगा और उन लोगों में नहीं रह जाऊंगा जिन्हें सही मार्ग दिखाया गया है।" (56)

कह दें, "मैं अपने रब की तरफ़ से एक स्पष्ट प्रमाण पर क़ायम हूँ, हालाँकि तुम उसे मानने से इंकार करते हो। जिस (यातना) को जल्दी लाने की तुम माँग कर रहे होउसकी ताक़त मेरे हाथ में नहीं है। फ़ैसला करना तो बस अल्लाह के हाथ में है: वह सच बोलता है, और फ़ैसला करने वालों में वह सबसे बेहतर है।" (57)

कह दें, "जिस चीज़ [यातना] को ले आने की तुम्हें जल्दी पड़ी हुई है, वह अगर मेरे हाथ में होती, तो मेरे और तुम्हारे बीच फ़ैसला हो चुका होता, मगर अल्लाह ग़लत काम करने वालों को ख़ूब अच्छी तरह जानता है।" (58

अनदेखी चीज़ों की कुंजियाँ उसी के पास हैं: उसके सिवा कोई नहीं जो उन्हें जानता हो। जल और थल में जो कुछ है, वह सब जानता है। बिना उसकी जानकारी के एक पत्ता तक नहीं गिरता, और धरती के अँधेरों में पड़ा हुआ कोई दाना हो, या कोई भी चीज़, ताज़ी (गीली) हो या मुरझायी (सूखी) हुई, ऐसी नहीं जो एक स्पष्ट किताब में न लिखी हुई हो। (59)

वही (अल्लाह) है जो रात के समय (नींद में) तुम्हारी रूह को वापस बुला लेता है, यह जानते हुए कि दिन भर तुमने क्या क्या किया है, फिर वह (एक नये) दिन में तुम्हें दोबारा (ज़िंदा) उठा देता है, ताकि (अपनी उम्र की) निश्चित अवधि पूरी कर सको। उसी के पास अंत में, तुम्हें लौटना होगा, और तब वह तुम्हें बता देगा कि तुम क्या क्या किया करते थे। (60)

वह अपने बन्दों का सबसे बड़ा मालिक है (जिसे हर चीज़ पर पूरा नियंत्रण है), वह तुम पर निगरानी रखने के लिए लिखनेवाले (फ़रिश्तों) को उस समय तक भेजता है, जब तक कि तुममें से किसी की मौत न आ जाती हो, फिर हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उसकी रूह ले लेते हैं------ वे अपने काम में कभी कोई चूक नहीं करते। (61)

उसके बाद उन सबको अल्लाह के पास लौटकर जाना होगा, जो उनका असली रब है। असली फ़ैसला तो उसी का होता है, और वह हिसाब लेने में सबसे तेज़ है।  (62)

[ऐ रसूल!] आप कहें, "कौन है जो तुम्हें थल और जल की अँधेरी गहराइयों से बचा लेता है, जब तुम गिड़गिड़ाते हुए और चुपके-चुपके (यह कहते हुए) उसे पुकारने लगते हो, "अगर वह हमें इस (मुसीबत) से बचा ले, तो हम सचमुच ही शुक्र अदा करने वालों में हो जाएंगे?" (63)

कहें, "अल्लाह तुम्हें इस (मुसीबत) से और हर तकलीफ़ से बचाता है; इसके बावजूद तुम उस (अल्लाह) के अलावा दूसरों की भी पूजा करते हो।" (64)

कह दें, "वह इस बात की पूरी ताक़त रखता है कि तुम पर तुम्हारे ऊपर से या तुम्हारे पैरों के नीचे से कोई यातना भेज दे, या तुम्हें अलग-अलग गुटों में बाँटकर एक दूसरे से भिड़ा दे और किसी एक को दूसरे की मारपीट का मज़ा चखाए।" देखिए, किस तरह हम अपनी आयतों को तरह-तरह से समझाते हैं, ताकि वे समझ सकें, (65)

[ऐ रसूल!] इसके बावजूद आपकी क़ौम के लोग अब भी इस [क़ुरआन] को मानने से इंकार करते हैं, हालाँकि यह सच्ची (किताब) है। कह दें, "मुझे कोई तुम्हारी देखरेख करने के लिए नहीं बैठाया गया है। (66)

हर रसूल द्वारा दी गयी (चेतावनियों की) ख़बरों के पूरा होने का समय तय है: जल्द ही तुम्हें मालूम हो जाएगा।" (67)

जब तुम ऐसे लोगों को देखो, जो हमारी आयतों को बुरा-भला कह रहे हों, तो (बजाय बहस करने के) वहाँ से उस वक़्त तक के लिए किनारे हट जाओ, जब तक कि वे किसी दूसरी बात में न लग जाएँ। और अगर कभी शैतान तुम्हें (उनसे दूर हटने की बात से) भुलावे में डाल देतो याद आ जाने के बाद, ऐसे लोगों के साथ न बैठो जो ग़लत काम कर रहे हों। (68)

नेकी की राह चलने वालों को किसी भी तरह से, ग़लत काम करने वालों के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा; उनके ज़िम्मे तो बस इतना है कि उन्हें नसीहत [Remind] करते रहें, ताकि वे (बुराइयों से) बच सकें। (69)

छोड़ दें ऐसे लोगों को उनके हाल पर, जिन्होंने अपने धर्म को खेल-तमाशा और भटकाव की चीज़ बना लिया है और उन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल रखा है, मगर उन्हें (क़ुरआन द्वारा) नसीहत करते रहें, कि कहीं ऐसा न हो कि कोई इंसान अपने (बुरे) कर्मों के कारण तबाही में पड़ जाए----- कोई न होगा जो उसे अल्लाह से बचा सके, और न ही कोई सिफ़ारिश करनेवाला होगा; वह अपने छुटकारे के बदले में जो कुछ भी [ransom] देना चाहेउसे क़बूल नहीं किया जाएगा। ऐसे ही लोग हैं जो अपने (बुरे) कर्मों के कारण तबाही में छोड़ दिए गए: उनके पीने के लिए खौलता हुआ पानी होगा और दर्दनाक यातना होगी, क्योंकि वे (सच्चाई का) इंकार करते रहे थे। (70)

आप कहें, "क्या हम अल्लाह को छोड़कर उसे पुकारने लग जाएँ जो न तो हमें कोई फ़ायदा पहुँचा सकता हो, और न कोई नुक़सान? जबकि अल्लाह हमें सीधा रास्ता दिखा चुका है, तब भी हम (गुमराही की तरफ़) उलटे पाँव फिर जाएँ, और उस आदमी की तरह हो जाएं जिसे शैतानों ने रेगिस्तानी खड्डों [Desert ravine] में भटका दिया हो, और वह हैरान-परेशान होकर फिरता हो, हालाँकि उसके कुछ साथी उसे सही मार्ग की ओर बुला रहे हों (और कहते हों), 'हमारे पास चला आ!'?" आप कह दें, "अल्लाह का दिखाया हुआ मार्ग ही असल में सच्चा मार्गदर्शन है, और हमें आदेश हुआ है कि हम सारे संसार के रब के आगे पूरी भक्ति से अपना सिर झुका दें,  (71)

पाबंदी से नमाज़ क़ायम करें और अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहें।" वही है, जिसके पास तुम सब इकट्ठे ले जाए जाओगे। (72)

वही है जिसने आसमानों और ज़मीन को एक सही मक़सद के साथ पैदा किया। और उस दिन जब वह कहेगा, 'हो जा', तो बस वह हो जाएगा: उसकी कही बात बिल्कुल सच है। जिस (क़यामत के) दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगाउस दिन सारा नियंत्रण [Control] उसी का होगा। वह हर चीज़ जो दिखायी न देती हो और जो दिखायी देती हो, सब का जाननेवाला है: वह बड़ा ज्ञानी, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है।" (73)

(देखो!) जब ऐसा हुआ था कि इबराहीम [Abraham] ने अपने बाप, आज़र से कहा था, "तुम पत्थर की मूर्तियों को अपना ख़ुदा कैसे मान सकते हो? मैं तो तुम्हें और तुम्हारी क़ौम के लोगों को पूरी तरह गुमराही में पड़ा देख रहा हूँ।" (74

और इसी तरह हम इबराहीम को आसमानों और ज़मीन में अपनी ताक़तवर हुकूमत के जलवे दिखाते थे, ताकि उसका विश्वास पक्का हो जाए। (75)

फिर जब ऐसा हुआ कि उस पर रात का अंधेरा छा गया, तो उसने एक तारा देखा और कहा, "यह मेरा रब है", फिर जब वह डूब गया, तो उसने कहा, "मैं डूब जाने वाली चीज़ पसंद नहीं करता।" (76)

और जब उसने चाँद को निकलता हुआ देखा, तो कहा, "यह मेरा रब है", मगर जब वह भी डूब गया, तो उसने कहा, "अगर मेरे रब ने मुझे रास्ता न दिखाया होता, तो मैं भी उन लोगों में शामिल हो जाता जो सीधे रास्ते से भटक जाते हैं।" (77)

उसके बाद जब उसने सूरज को उगते हुए देखा, तो पुकार उठा, "यह मेरा रब है! यह तो ज़्यादा बड़ा है", मगर जब वह भी डूब गया, तो उसने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अल्लाह के साथ जिस किसी को तुम पूजते हो, मैं उन सबसे अपना संबंध तोड़ता हूँ। (78

मैंने (हर तरफ़ से अपना मुँह मोड़कर) एक पक्के ईमानवाले के रूप में, अपना चेहरा उसी की ओर कर लिया है, जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है। मैं उनमें से नहीं हूँ जो (अल्लाह के साथ) दूसरे देवताओं को पूजते हैं।" (79)

उसकी क़ौम के लोग उससे झगड़ने लगे, और उसने कहा, "तुम मुझ से अल्लाह के बारे में क्यों झगड़ते हो, जबकि उसने मुझे (सीधा) मार्ग दिखा दिया है? मैं ऐसी किसी चीज़ से नहीं डरता, जिन्हें तुम उस (अल्लाह) के साथ (साझेदार के रूप में) जोड़ते हो: जब तक कि मेरा रब न चाहे (कोई नुक़सान नहीं हो सकता)। मेरे रब ने हर चीज़ को अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। फिर क्यों तुम इस पर ध्यान नहीं देते? (80)

"मैं उन हस्तियों से क्यों डरूँ, जिन्हें तुमने उस (अल्लाह) का साझेदार [Partner] ठहरा लिया है? मगर तुम इस बात से क्यों नहीं डरते कि तुमने उन चीज़ों को अल्लाह के साथ जोड़ रखा है, जिसके लिए उसने तुम पर कोई सनद नहीं उतारी? अब बताओ, अगर तुम्हें जवाब पता हो, कि दोनों में से किस गुट को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करना चाहिए? (81)

"असल में जो लोग ईमान रखते हैं, और अपने ईमान के साथ (अल्लाह को छोड़कर) किसी दूसरी हस्तियों की मिलावट नहीं करते, तो वे सुरक्षित होंगे, और यही वे लोग हैं जो सीधे मार्ग पर हैं।" (82)

तो (देखो!) ऐसा था हमारा वह तर्क जो हमने इबराहीम को उसकी क़ौम के मुक़ाबले में दिया था----- हम जिसे चाहते हैं उसका दर्जो ऊँचा कर देते हैं---- तुम्हारा रब हर चीज़ की गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है, सब कुछ जानता है। (83)

और हमने उसे [इबराहीम को] इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] दिए, उनमें से हर एक को सीधा मार्ग दिखाया, जैसे इससे पहले हमने नूह [Noah] को सीधा रास्ता दिखाया था, और उसके वंशजों में दाऊद [David],  सुलैमान [Solomon],  अय्यूब [Job],  यूसुफ़ [Joseph],  मूसा [Moses] और हारून [Aaron] थे------- इसी तरह अच्छा कर्म करने वालों को हम बदले में इनाम दिया करते हैं----- (84)

ज़करिया [Zachariah],  यह्या [John],  ईसा [Jesus] और इलयास [Elijah] ------- इनमें से हर एक बहुत नेक था------ (85)

इसमाईल [Ishmael],  अल यसा' [Elisha],  यूनुस [Jonah] और लूत [Lot]। इनमें से हर एक को हमने संसार के दूसरे लोगों के मुक़ाबले में श्रेष्ठता दी थी, (86)

और साथ में, उनमें से कुछ के बाप-दादा, उनकी सन्तानों और उनके भाई-बन्धुओं को भी: हमने उन्हें चुना और उन्हें सीधा मार्ग दिखाया था। (87)

यह है अल्लाह का मार्गदर्शन, जिसके द्वारा वह अपने बन्दों में से जिसको चाहता है सीधा मार्ग दिखा देता है अगर उन लोगों ने कहीं अल्लाह के साथ दूसरे ख़ुदाओं को जोड़ा होता, तो उनका सब किया-धरा बेकार हो जाता। (88)

ये वह लोग हैं जिन्हें हमने (आसमानी) किताब, फ़ैसला करने की समझ-बूझ, और पैग़म्बरी [Prophethood] प्रदान की थी। भले ही अब (अरब के) ये लोग इनमें [मुहम्मद में] विश्वास करने से इंकार करें, मगर हमने इसकी ज़िम्मेदारी ऐसे लोगों को सौंपी है जो (सच्चाई से) इंकार नहीं करते। (89)

वे [पिछले पैग़म्बर] ऐसे लोग थे, जिन्हें अल्लाह ने सच्चाई का मार्ग दिखाया था,  तो '[ऐ रसूल], उन्हें जो ज्ञान की रौशनी मिली थी, आप उन्हीं के पीछे चलें।' आप कहें, "मैं तुमसे इसके लिए कोई मज़दूरी [reward] नहीं माँगता: यह [क़ुरआन] तो सारी दुनिया के लोगों के लिए सीखने का एक सबक़ [Lesson] है।" (90)

और (देखो!) जब उन लोगों ने कहा, "अल्लाह ने किसी (मर-खप जानेवाले) इंसान पर कोई ऐसी चीज़ [किताब] नहीं उतारी है", तो उन्हें अल्लाह की ख़ुदायी का जो अंदाज़ा करना चाहिए था, वह उन्होंने नहीं किया। [ऐ रसूल] आप कहें, "फिर कौन था जिसने वह किताब [तौरात] उतारी थीजो मूसा लेकर आया था, जो लोगों के लिए रौशनी और रास्ता दिखानेवाली थी, जिसे तुम अलग-अलग पन्नों में रखते हो, जिसमें से कुछ को दिखाते होमगर बहुत-सा छिपा जाते हो? तुम्हें वह चीज़ें पढ़ायी गयीं, जिसे न तुम और न तुम्हारे बाप-दादा ही जानते थे।" कह दें, "अल्लाह (ने उतारी है यह किताब)," फिर छोड़ दो उन्हें, कि वे बेकार की बातों में उलझे रहें। (91)

यह [क़ुरआन] बहुत बरकतवाली [Blessed] किताब है जो हमने उतारी है, ताकि इससे पहले जो किताबें उतर चुकी हैं, उनकी (सच्चाई की) पुष्टि हो जाए, ताकि तुम इसके द्वारा शहर के केंद्र [मक्का] और उसके आसपास बसने वाले लोगों को सावधान कर दो जो लोग आने वाली दुनिया [परलोक/आख़िरत] में विश्वास करते हैं, वह इस किताब पर भी विश्वास करते हैं। और जो लोग आख़िरत पर ईमान रखते हैं, वे इस पर भी ईमान रखते हैं, और वे अपनी नमाज़ों से लापरवाही नहीं करते हैं।  (92)

उस आदमी से बढ़कर बदमाश कौन हो सकता हैजो अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, या यह दावा करता हो कि, "मुझ पर 'वही' [Revelations] उतरी है, जबकि असल में उसके पास कोई 'वही' नहीं भेजी गयी हो, या यह कहता हो, "मैं भी अल्लाह की 'वही' के बराबरी में कुछ उसी तरह की 'वही' उतार सकता हूँ। और अगर आप देख पाते, कि मौत की सख़्ती में घिरे हुए अत्याचारियों का क्या हाल होता है, जब फ़रिश्ते उनकी तरफ़ अपने हाथ, यह कहते हुए बढ़ाते हैं, "अपनी रूहों को त्याग दो! अल्लाह के बारे में झूठी बातें बोलने और अपनी अकड़ में उसकी आयतों को ठुकरा देने के नतीजे में आज तुम्हें अपमानित करने वाली यातना दी जाएगी।" (93)

[क़यामत के दिन अल्लाह कहेगा], "आख़िर तुम लौटकर हमारे पास आ ही गए, वह भी एकदम अकेले, जिस तरह हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था: हमने तुम्हें जो कुछ दे रखा थातुम सब कुछ पीछे छोड़ आए हो, और तुम्हारे वे सिफ़ारिश करने वाले भी कहीं दिखायी नहीं पड़ते हैं जिनके बारे में तुम दावा करते थे कि वे (ख़ुदायी में) अल्लाह के साझेदार [Partner] हैं।" तुम्हारे बीच के सारे बंधन टूट चुके हैं, और जिन (देवताओं) के बारे में तुम ऐसे दावे किया करते थे, वे सब तुम्हें छोड़ चुके हैं। (94)

यह अल्लाह है जो दाने और गुठली को फाड़कर निकालता है: वह सजीव [जानदार] चीज़ों को निर्जीव [बेजान] चीज़ों से निकाल लाता है और बेजान चीज़ को जानदार चीज़ों से निकालने वाला है---- वही अल्लाह है ----- तो फिर तुम सच्चाई से कैसे मुँह मोड़कर जा सकते हो?  (95)
उसी के हुक्म से सुबह को पौ फटती है; उसी ने रात बनायी है आराम के लिए; और उसी ने सूरज और चाँद को एक नपे-तुले अंदाज़े से बनाया है। यह सब उस हस्ती की बनायी हुई योजना है, जो बहुत ताक़तवाला, और सब कुछ जाननेवाला है। (96)
वही है जिसने सितारों को बनायाताकि धरती और समंदर में अँधेरे के समय वे तुम्हें रास्ता दिखा सकें: हमने अपनी निशानियाँ उन लोगों के लिए स्पष्ट कर दी हैं, जो जानकारी रखते हैं। (97)
वही है, जिसने तुम्हें पहली बार एक अकेली जान से पैदा किया, फिर (इस दुनिया) में ठहरने के लिए एक जगह दी, और (मरने के बाद) आराम की एक जगह दी। हमने अपनी आयतें उन लोगों के लिए स्पष्ट कर दी हैंजो समझ-बूझ रखते हैं। (98)
वही (अल्लाह) है जो आसमान से पानी बरसाता है। फिर उसी के द्वारा हम हर एक पौधे की कोंपल उगाते हैं, फिर उससे हरी-भरी टहनियाँ निकल आती हैं, फिर उससे दाने निकल आते हैं, एक दाने से दूसरा दाना मिला हुआ।

और (इसी तरह) खजूर के पेड़ों पर खजूरों के गुच्छे लदे होते हैं, जो (उसके बोझ से) झुके पड़ते हैं। और अंगूर, ज़ैतून और अनार के बाग़ पैदा किए, जो देखने में एक जैसे भी लगते हैं, और एक-दूसरे से अलग भी। उनके फलों को बढ़ते और पकते हुए देखो! निस्संदेह ईमान रखनेवाले लोगों के लिए इनमें बड़ी निशानियाँ हैं। (99)
इसके बावजूद, लोगों ने जिन्नों को (ताक़त में) अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहरा रखा है, हालाँकि उसी ने उनको भी पैदा किया है, और बिना सही जानकारी के, उस [अल्लाह] के लिए बेटे और बेटियाँ भी बना लेते हैं! वह इन चीज़ों से कहीं महान है जो ये उसके बारे में बयान करते हैं! (100)
वह आसमानों और ज़मीन का पैदा करनेवाला है! उसकी कोई औलाद कैसे हो सकती है, जबकि उसका कोई जोड़ा (spouse) है ही नहीं? उसी ने सारी चीज़ों को पैदा किया है, और उसे सारी चीज़ों की पूरी जानकारी है। (101)
यह अल्लाह है, तुम्हारा रब, उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं, हर चीज़ का पैदा करनेवाला, अतः उसी की बन्दगी करो; वह हर चीज़ की देखरेख करनेवाला है। (102)
(आदमी की) निगाहें उसे नहीं देख सकतींमगर वह (हमारी) निगाहों से दिखने वाली हर चीज़ को देखता है। वह छोटी से छोटी चीज़ की भी पूरी ख़बर रखनेवाला है। (103)

(देखो!) अब तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से स्पष्ट प्रमाण आ चुका है: अगर कोई उसे देखता है, तो वह उसके ही फ़ायदे के लिए होगा; और अगर कोई इससे अंधा बना रहातो उससे नुक़सान भी उसी का होगा-----(कह दें) “मैं तुम्हारी देखरेख करने वाला नहीं हूँ। (104)
इस तरह हम अपनी आयतें तरह-तरह से समझाकर बयान करते हैं-----(कि वे सुनें), हालांकि वे यही कहेंगे, "तुम [मुहम्मद] कहीं से पढ़-पढ़ा लेते हो" --- ताकि उनके लिए यह स्पष्ट हो जाए, जो समझ रखते हैं। (105)
 (ऐ रसूल) आपके रब की तरफ़ से 'वही’ [Revelation] द्वारा आप पर जो (क़ुरआन) उतारी गयी है, आप उसी के पीछे चलें, उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है। उन लोगों से आप मुंह मोड़ लें जो अल्लाह के साथ दूसरों को (उसकी ख़ुदायी में) जोड़ देते हैं। (106)
अगर अल्लाह की यही मर्ज़ी होती, तो उन लोगों ने ऐसा न किया होता, मगर हमने आपको उनकी देखरेख के लिए नहीं बनाया, और न ही आप उनके रखवाले हैं। (107)

(ईमानवालो!) भले ही वे अपनी दुश्मनी और जिहालत में अल्लाह को बुरा-भला कहें, मगर वे जिन्हें अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, तुम उन्हें बुरा-भला न कहो। इसी प्रकार हमने हर गिरोह के लिए उसके कर्म को सुहावना बना दिया है, मगर अंत में उन्हें अपने रब के पास ही लौटना है और फिर वह उन्हें बता देगा, जो कुछ वे करते रहे होंगे। (108)
उन लोगों ने अल्लाह की क़सम खाते हुए कड़ी प्रतिज्ञाएं ली हैं कि अगर उनके पास कोई चमत्कारिक निशानी आ जाए, तो उसपर वे ज़रूर विश्वास कर लेंगे। [ऐ रसूल] आप कह दें, "निशानियों (को दिखाने) की ताक़त तो केवल अल्लाह के ही पास है।" और (मुसलमानो!) तुम्हें क्या पता कि अगर (चमत्कार वाली) निशानी आ भी जाए, तब भी वे विश्वास नहीं करेंगे। (109)

और हम उनके दिलों और निगाहों को फेर देंगे, जिस तरह वे पहली बार ईमान नहीं लाए थे। और हम उन्हें छोड़ देंगे कि वे अपनी ज़िद व हठधर्मी में भटकते रहें, (110)

यहाँ तक कि अगर हम उनके पास फ़रिश्ते भी उतार भेजते, और मुर्दें भी उनसे बातें करने लगते, और हम सारी चीज़ों को उनके बिल्कुल सामने लाकर खड़ा कर देतेतो भी वे विश्वास नहीं करते, जब तक कि अल्लाह न चाहे, मगर अधिकतर लोग (इस बात से) अनजान हैं। (111)
इसी तरह से, हर एक रसूल के साथ हमने एक दुश्मन लगा दिया था, शैतान आदमियों और शैतान जिन्नों के रूप में। वे धोखा देने के लिए एक दूसरे के मन में चिकनी-चुपड़ी बातें डाला करते थे----- [ऐ रसूल!], अगर आपके रब ने न चाहा होता, तो वे ऐसा नहीं कर पाते: छोड़ दें उन्हें (झूठ) गढ़ने के लिए----(112)
ताकि जो लोग परलोक [आख़िरत] में विश्वास नहीं करतेउनके दिल उसके छल व धोखे से भरी बातों की ओर झुक सकें, वे उसी में मगन रहें, और जो भी (ग़लत) काम करना चाहें, कर गुज़रें। (113)

(आप कहें), "क्या मैं अल्लाह के सिवा किसी और को (अपने बीच) फ़ैसला करने वाला बना लूँ, जबकि वही है जिसने तुम (लोगों) के लिए एक किताब [क़ुरआन] उतार भेजी है, जिसमें बातें समझा-समझाकर बता दी गयी हैं?" जिन [यहूदी व ईसाई] लोगों को हमने किताब दी थी, वे भी जानते हैं कि यह [क़ुरआन] आपके रब की तरफ़ से सच्चाई के साथ उतारी गयी है, तो आप उन लोगों में से न हो जाएं जो (अल्लाह के फ़ैसले पर) सन्देह करते हैं। (114)

आपके रब की बात सच्चाई और इंसाफ़ में बिल्कुल पक्की है, कोई नहीं जो उसकी बातों (व नियमों) को बदल सके: वह सब कुछ सुननेवाला, और सब कुछ जाननेवाला है। (115)

इस धरती पर ज़्यादातर लोग ऐसे हैं कि अगर आप उनके कहने पर चले, तो वे अल्लाह के मार्ग से आपको दूर ले जाएंगे। वे किसी और चीज़ के नहीं, केवल अटकल के पीछे चलते हैं; और बस (ख़्याली) अंदाज़े [Guess] ही लगाते रहते हैं। (116)

तुम्हारा रब अच्छी तरह से जानता है, कि कौन उसके मार्ग से भटक रहा है, और कौन है जो सीधे मार्ग पर है। (117)

अतः [ऐ ईमानवालो!], जिस (जानवर को काटते समय) अल्लाह का नाम लिया गया होउसे बे-हिचक खाओ, अगर तुम उसकी आयतों में विश्वास रखते हो। (118)

तुम ऐसे जानवरों को क्यों नहीं खाते हो, हालाँकि जो कुछ उसने तुम्हें खाने से मना किया है, वह तो अल्लाह ने पहले ही विस्तार से बता दिया है, हाँ, अगर भूख से मजबूर हो जाओ, तो बात अलग है? लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं जो बिना पूरी जानकारी के, केवल अपनी इच्छाओं [ग़लत विचारों] के चलते दूसरों को सीधे रास्ते से भटका देते हैं। [ऐ रसूल!] आपका रब उन लोगों को भली-भाँति जानता है, जो मर्यादा तोड़ डालते हैं। (119)

गुनाह करने से बचो, चाहे खुले-आम किया जाए या छिप-छिपकर, क्योंकि गुनाह करने वालों को उसका बदला दिया जाएगाजो कुछ वे करते हैं, (120)
ऐसा कोई (जानवर) न खाओ, जिसपर (काटते समय) अल्लाह का नाम न लिया गया हो, क्योंकि यह तो क़ानून तोड़ना होगा।

शैतानों का यह काम है कि वे अपने मानने वालों को भड़काते रहते हैं कि वे तुम से बहस करें: अगर तुम उनकी बातें सुनने लग जाओगे, तो तुम भी मूर्तियों को पूजनेवाले हो जाओगे। (121)
क्या एक मरा हुआ आदमी जिसको हमने दोबारा ज़िंदगी दी हो, और उसके साथ एक रौशनी दी हो जिसके सहारे वह लोगों के बीच चलता-फिरता हो, उस आदमी के बराबर हो जाएगा, जो गहरे अंधकार में फँसा हुआ हो, और उसके बाहर निकलने का कोई रास्ता न हो? इस तरह से, विश्वास न करनेवालों की नज़रों में वही बातें बहुत लुभावनी मालूम पड़ती हैं, जो कुछ कुकर्म वे करते रहते हैं। (122)
और इसी तरह हमने हर बस्ती में वहाँ के अपराधियों के सरदारों को लगा दिया है कि वहाँ वे अपनी चालें (ईमानवालों के ख़िलाफ़) चला करें----मगर वे जितनी भी चालें चलते हैं, वह दरअसल अपने ही ख़िलाफ़ चलते हैं, मगर इस बात को समझ नहीं पाते। (123)
जब उनके सामने कोई आयत [निशानी] लायी जाती है, तो वे कहते हैं, "हम उस वक़्त तक इस पर विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि हमारे ऊपर भी वैसी ही (आयत व निशानी) न उतारी जाए, जैसी कि अल्लाह के रसूलों पर उतारी गयी हैं।" मगर अल्लाह ही बेहतर जानता है कि वह अपने संदेशों को पहुँचाने के लिए किसे अपना पैग़म्बर [Prophet] चुनता है: जिन अपराधियों ने ऐसी बातें कही हैं, उनकी गंदी चालों के बदले में उन्हें, अल्लाह के यहाँ भारी अपमान और कठोर यातना का सामना करना पड़ेगा। (124)

जब अल्लाह किसी को सीधा मार्ग दिखाना चाहता है, तो उसका सीना केवल अपनी भक्ति [इस्लाम] के लिए खोल देता है; और जिसे (उसकी ज़िद्द के कारण) गुमराही में पड़ा रहने देता चाहता हैउसके सीने को इतना तंग और सिकुड़ा हुआ कर देता है (कि उनके लिए विश्वास करना इतना मुश्किल होता है कि) मानो वे आसमानों पर चढ़ रहे हों। इस तरह जो लोग (सच्चाई पर) ईमान नहीं रखते, अल्लाह उन लोगों की बुराइयों को उन्हीं पर मार देता है,  (125)

[ऐ रसूल!], यह आपके रब का रास्ता है, जो बिल्कुल सीधा बनाया गया है। हमने (सच्चाई के रास्ते की) निशानियाँ, ध्यान देने वालों के लिए विस्तार से समझा दी हैं।  (126

उन लोगों के लिए उनके रब के यहाँ सलामती व शांति का घर होगा, और उनके अच्छे कर्मों के बदले वह उनकी ख़ूब देखभाल करेगा। (127)

एक दिन आएगा जब अल्लाह उन सब (जिन्नों) को घेरकर इकट्ठा करेगा, (और कहेगा), "ऐ जिन्नों के गिरोह! तुमने तो इंसानों की बहुत बड़ी संख्या को बहका डाला।" और इंसानों में से जो उनके माननेवाले साथी होंगेवे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमने एक-दूसरे से बहुत फ़ायदा उठाया है, मगर अब हमारे लिए तय किया हुआ समय पूरा हो गया है, जो तूने हमारे लिए ठहराया था।" अल्लाह कहेगा, "अब तुम्हारा ठिकाना आग [नरक/जहन्नम] है, और उसी में तुम्हें रहना होगा"----सिवाय इसके, कि अल्लाह अगर कुछ और चाहे: [ऐ रसूल!] आपका रब बहुत समझ-बूझ रखनेवाला, और हर चीज़ की जानकारी रखता है। (128)

इस तरीक़े से, हम कुछ शैतानियाँ करने वालों को उनके कुकर्मों के कारण, एक दूसरे पर ताक़त व अधिकार दे देते हैं। (129)

"ऐ जिन्नों और इंसानों के गिरोह! क्या तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल नहीं आए थे, जो तुम्हें मेरी आयतें पढ़कर सुनाते थे, और तुम्हें इसी दिन का सामना करने से सावधान करते थे?" वे कहेंगे, "(हाँ! रसूल तो आए थे) आज हम स्वयं अपने ख़िलाफ़ गवाही देते हैं।" इस दुनिया की ज़िंदगी ने उन्हें धोखे में रखा, मगर वे ख़ुद अपने विरुद्ध गवाही देंगे कि उन्होंने सच्चाई को मानने से इंकार किया था: (130

तुम्हारा रब कभी बस्तियों को उनके गुनाहों के कारण बर्बाद नहीं करता, अगर उनमें रहनेवाले लोगों को (किसी रसूल द्वारा) पहले से सावधान न कर दिया गया हो। (131)

कर्मों के अनुसार हर एक का (अलग-अलग) दर्जा ठहरा दिया गया है; और जो कुछ वे करते हैं, तुम्हारा रब उससे अनजान नहीं है। (132)

तुम्हारा रब किसी भी चीज़ के लिए, किसी पर भी निर्भर नहीं है, और वह बेहद दयावान है। अगर वह चाहे तो तुम्हें (दुनिया से) हटा दे, और तुम्हारी जगह जिस (गिरोह) को चाहे तुम्हारे बाद ले आएठीक वैसे ही, जैसे उसने दूसरों की नस्ल से तुम्हें उठा खड़ा किया है। (133)

जिस चीज़ का तुमसे वादा किया जाता हैउसे तो आना ही है, और तुम उसे टाल नहीं सकते। (134

[ऐ रसूल!] कह दें, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम अपनी जगह (अपने तरीक़े से) काम करते रहो, मैं अपना काम कर रहा हूँ। जल्द ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि आख़िरत [परलोक] में किस का अंजाम अच्छा रहा।" शैतानियाँ करनेवाले कभी फलते-फूलते नहीं। (135)


जो कुछ अल्लाह ने खेतियों और चौपायों में से पैदा किया है, उनमें से एक हिस्सा [share], ये अल्लाह के लिए तय कर देते हैं, और कहते हैं, "यह अल्लाह के लिए है"---- या ऐसा दावा करते हैं!------ "और यह (हिस्सा) हमारे देवताओं [अल्लाह के साझेदारों] के लिए है।" उनके देवताओं का हिस्सा तो अल्लाह तक नहीं पहुँचता (यानी अल्लाह के लिए ख़र्च नहीं होता), मगर अल्लाह का हिस्सा ज़रूर उनके देवताओं तक पहुँच जाता है: कितना बुरा फ़ैसला करते हैं ये लोग! (136)

इसी तरह से, उनके देवताओं (या शैतानों) ने अपने कई माननेवालों [बहुदेववादी] के दिल में यह बात सुझायी कि अपने बच्चों की हत्या करना बड़ा अच्छा काम है, इससे उनके बीच तबाही आयी और उनके धर्म में भ्रम व उलझन की स्थिति बनी: अगर अल्लाह ने ऐसा न चाहा होता, तो उन लोगों ने यह न किया होता, अत: [ऐ रसूल] आप उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें। (137)

वे कहते हैं, "इन चौपायों और फ़सलों (के आम इस्तेमाल) पर पाबंदी है, और इन्हें केवल वही खा सकता है, जिसे हम अनुमति दें" ---- वे ऐसा कहते हैं! कुछ जानवर ऐसे हैं, जिनकी पीठों को (सवारी या सामान लादने के लिए) हराम ठहरा लिया है, और कुछ जानवर ऐसे हैं कि (काटते समय) उन पर अल्लाह का नाम नहीं लेते, इन सारी रस्मों को झूठे तरीक़े से अल्लाह के नाम से जोड़ रखा है: जैसा झूठ वे गढ़ते रहते हैं, जल्द ही वह उन्हें इसका बदला देगा। (138)

वे यह भी कहते हैं, "इन जानवरों के पेट में से जो बच्चा ज़िंदा निकले, तो वह केवल मर्दों के लिए हलाल होगा, और हमारी औरतों के लिए वर्जित [हराम] है। अगर बच्चा मरा हुआ निकला, तो फिर उसे सब (मर्द-औरत) मिलकर खा सकते हैं।" जो झूठी बातें वे अल्लाह के नाम से जोड़ते हैं, उसके लिए वह उन्हें जल्द ही सज़ा देगा: (सचमुच) वह बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है, सब कुछ जानता है। (139)

सचमुच बर्बाद हो गए वे लोग जिन्होंने बिना किसी जानकारी के, अपनी मूर्खता के कारण अपने बच्चों को (अपने ही हाथों) मार डाला, और जो कुछ अल्लाह ने उनके लिए रोज़ी दी थी, उसे (अल्लाह के नाम से झूठ गढ़कर) अपने ऊपर हराम ठहरा लिया: वे रास्ते से बहुत दूर भटक चुके हैं, और वे सीधे रास्ते पर चलने वाले न थे। (140)

(वही अल्लाह) है जिसने तरह-तरह के बाग़ पैदा किए; कुछ जालियों पर चढ़ाए जाते हैं (जैसे अंगूर की बेलें) और कुछ बिना सहारे के बढ़ते हैं, और खजूरों के पेड़ और खेतियाँ, जिनके फल स्वाद में अलग-अलग तरह के होते हैं, और इसी तरह ज़ैतून और अनार जो देखने में एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं, फिर भी अलग हैं। तो जब उसमें फल लग जाएं, तो उसका कुछ फल शौक़ से खाओ, और उस (फ़सल) की कटाई के दिन, उस पर जो (ग़रीबों का) हक़ बनता है, दे दिया करो, और (देखो) फ़ज़ूलख़र्ची न किया करो: अल्लाह फ़ज़ूलख़र्च [wasteful] करने वालों को पसंद नहीं करता। (141)

 उसी ने चौपाया जानवर दिए, उनमें से कुछ जो बड़े हैं, वह बोझ उठाने के काम आते हैं, और कुछ ज़मीन से लगे हुए छोटे जानवर हैं जो खाने के काम भी आते हैं। अत: अल्लाह ने जो कुछ तुम्हें दिया है, उसमें से खाओ और शैतान के पीछे न चलो: वह तुम्हारा बड़ा पक्का दुश्मन है। (142)

(अल्लाह ने तुम्हें) आठ मवेशी दिए हैं, चार जोड़े [Pairs], एक जोड़ा भेड़ों का और एक जोड़ा बकरियों का----[ऐ रसूल!], आप पूछें उनसे, "क्या अल्लाह ने दोनों नर हराम किए हैं या दोनों मादा को? या उसको जो इन दोनों मादा के पेट में हो? अपने ज्ञान के आधार पर मुझे बताओ, अगर तुम सच बोल रहे हो।" (143

और एक जोड़ा ऊँट का, और एक जोड़ा गाय का----- [ऐ रसूल!], उनसे पूछें, "क्या उसने हराम किए हैं दोनों नरों को या दोनों मादाओं को? या उस बच्चे को जो इन दोनों मादाओं के पेट में हो? क्या तुम मौजूद थे, जब अल्लाह ने तुम्हें ये आदेश दिए थे? (नहीं), तो फिर उस आदमी से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ता है, वह भी बिना किसी जानकारी के, ताकि लोगों को सीधे रास्ते से भटका सके? शैतानियाँ करनेवालों को अल्लाह सीधा रास्ता नहीं दिखाता। (144)

[ऐ रसूल!] उनसे कह दें, "जो कुछ मुझ पर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजा गया है, उसमें तो मैंने कोई चीज़ ऐसी नहीं पायी जो लोगों के खाने के लिए मना [हराम] हो, सिवाय इसके कि वह मरे हुए जानवर का सड़ा-गला मांस हो, या बहता हुआ ख़ून हो या सुअर का मांस हो ----कि ये गंदी (नापाक) चीज़ें हैं---- या वह (बलि चढ़ा हुआ) गुनाह का जानवर हो, जिसपर अल्लाह के बदले किसी और का नाम लिया गया हो।" "लेकिन अगर कोई भूख के मारे (इन चीज़ों को खाने पर) मजबूर हो जाए, और वह ऐसा जान-बूझकर न करे और न ही भूख मिटाने से ज़्यादा खाए, तो फिर अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (145)

यहूदियों के लिए हमने हर नाख़ुनवाला [Claws] जानवर खाने से मना कर दिया था, और गाय और भेड़-बकरियों में से इनकी चरबियाँ [fat] उनके लिए हराम कर दी थीं, सिवाय उस चरबी के जो उनकी पीठ और आँतों से लगी हुई हों, या जो किसी हड़्डी के साथ मिली हुई हो। इस तरह से हमने उन्हें आज्ञा न मानने के कारण सज़ा दी थी: हम अपनी बात में बिल्कुल सच्चे हैं। (146)

[ऐ रसूल!], अगर वे [विश्वास न करनेवाले] आप पर झूठ बोलने का आरोप लगाएं, तो आप कह दें, "तुम्हारे रब की रहमत [दया] ने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है, मगर शैतानियाँ करनेवालों से उसकी यातना टाली नहीं जा सकती।" (147

(अरब के) मूर्तिपूजा करनेवाले [Idolaters] कहेंगे, "अगर अल्लाह चाहता, तो हमने (ख़ुदायी में) उसका साझेदार [Partner] न ठहराया होता---और न हमारे बाप-दादा ने---  और न ही हमने किसी चीज़ को (बिना आदेश के) हराम ठहराया होता।" ठीक इसी तरह, इनसे पहले गुज़र चुके लोग भी (सच्चाई को) मानने से लगातार इंकार करते रहे थे, यहाँ तक कि उन्हें हमारी सज़ा का मज़ा चखना पड़ा। कहें, "क्या तुम्हारे पास कोई ऐसा ज्ञान है जिसे तुम हमारे सामने दिखा सकते हो? तुम (लोग) केवल अपनी (झूठी) मान्यताओं के पीछे चलते हो और सिर्फ़ झूठ बोलते हो।" (148

आप कह दें, "फ़ैसला कर देने वाला तर्क तो केवल अल्लाह के पास है। अगर वह ऐसा चाहता, तो तुम सबको सीधा मार्ग दिखा देता।" (149

कह दें, "अपने उन गवाहों को बुलाओ, जो इसकी गवाही दें कि अल्लाह ने सचमुच इन (जानवरों) को हराम कर दिया है।" फिर अगर उनके (झूठे गवाह) गवाही दे भी दें, तो आप उनके साथ गवाही देने वालों में शामिल न हो जाएं। उन लोगों की इच्छाओं के पीछे हरगिज़ न चलें जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार कर दिया, जो आख़िरत [परलोक / Hereafter] पर विश्वास नहीं रखते, और जो दूसरों को (ख़ुदायी में) अपने रब के बराबर ठहराते हैं। (150)


[ऐ रसूल!] उनसे कहें, "आओ! मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम्हारे रब ने तुम्हें क्या क्या करने से मना किया है। किसी भी चीज़ को अल्लाह का साझेदार [Partner] न ठहराओ; अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करो; ग़रीबी की डर से अपने बच्चों को न मार डालो----  हम तुम्हें भी रोज़ी देंगे और उन्हें भी----- अश्लील कामों [Indecencies] से अपने आपको बिल्कुल दूर रखो, चाहे वे खुल्लम-खुल्ला हों या छिप-छिपकर हों; बे-वजह किसी की जान न मार डालो, जिसे अल्लाह ने हराम ठहरा दिया है सिवाय इसके, कि अपने (क़ानूनी) हक़ के लिए ऐसा करना पड़े। ये वह बातें है, जिन्हें करने का अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है: शायद कि तुम समझ-बूझ से काम लो। (151)

(इसी तरह) अनाथों के माल से दूर ही रहो, सिवाय (उनको फ़ायदा पहुँचाने की) अच्छी नीयत के, मगर यह भी उसी वक़्त तक जब तक कि वह अपनी युवावस्था को न पहुँच जाएं; जब (सामान) दो, तो इंसाफ़ के मुताबिक़, नाप और तौल में पूरा-पूरा दो----- हम किसी जान पर उतना ही बोझ डालते हैं जितना कि वह उठा सकने की ताक़त रखता हो------जब बात कहो, तो न्याय की कहो, चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो; और अल्लाह के नाम से जो प्रतिज्ञा करो, उसे पूरी करो। ये वह बातें हैं, जिन्हें करने का अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है, ताकि तुम ध्यान दे सको"----- (152

यही है मेरा रास्ता, सीधा ले जाने वाला, तो तुम इसी पर चलो और दूसरे रास्तों पर न चलो: वे तुम्हें इस सीधे रास्ते से हटा देंगे----- ये हैं वह बातें जिन्हें करने का अल्लाह ने तुम्हें हुक्म दिया है, ताकि तुम ग़लत कामों से बच सको। (153)

एक बार फिर (बता दें), हमने मूसा को किताब [तौरात] दी, ताकि नेक कर्म करने वालों पर हम अपनी नेमतें पूरी कर दें, और (किताब में) हर चीज़ को स्पष्ट‍ रूप से समझा दें, जो लोगों के लिए रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] हो, ताकि वे लोग (मरने के बाद) अपने रब से होने वाली मुलाक़ात पर विश्वास कर सकें। (154)

यह [क़ुरआन] भी एक बरकतवाली [Blessed] किताब है, जिसे हमने उतारा है----- तो तुम इसके बताए हुए रास्ते पर चलो और अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहो, ताकि तुम पर दया की जाए-----  (155)

[ऐ अरब के लोगो!] (यह किताब इसलिए भेजी गयी), कि कहीं तुम यह न कहने लगो कि, "हमसे पहले आसमानी किताबें तो केवल दो समुदायों [यहूदी व ईसाई] पर ही उतारी गयी थीं: उन्होंने क्या कुछ पढ़ा, हमें तो इसकी कोई जानकारी न थी।" (156)

या यह कि, "अगर हम पर भी किताब उतारी गयी होती, तो हम उन (यहूदियों व ईसाइयों) से ज़्यादा सीधे मार्ग पर होते।" तो अब तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से (क़ुरआन के रूप में) एक स्पष्ट प्रमाण, मार्गदर्शन और रहमत आ चुकी है। अब उससे बड़ा ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार कर दे और उनसे मुँह मोड़े? (याद रहे!) जो लोग (हमारी निशानियों से) मुँह मोड़ते हैं, बदले में उन्हें हम दर्दनाक सज़ा देंगे। (157)

क्या ये लोग इसी इंतज़ार में हैं कि उनके पास (आसमान से उतरकर) फ़रिश्ते आ जाएँ या स्वयं तुम्हारा रब उनके सामने आ खड़ा हो, या उसकी कुछ निशानियाँ ज़ाहिर हो जाएं? मगर जिस दिन तुम्हारे रब की तरफ़ से (क़यामत की) कुछ निशानियाँ प्रकट हो गयीं, तो फिर (उस दिन निशानियाँ देखकर) विश्वास करने का किसी को कोई फ़ायदा न होगा अगर वह पहले से विश्वास [ईमान] न रखता हो, या जिसने अपने ईमान (की हालत में) कुछ नेकी न कमा रखी हो। कह दें, "अगर तुम इंतज़ार ही करना चाहते हो तो करो, हम भी इंतज़ार कर रहे हैं।" (158)

[ऐ रसूल!] जिन लोगों ने अपने धर्म में मतभेद फैलाया और अलग-अलग गिरोहों में बँट गए, तो उनसे आपका कोई लेना-देना नहीं है। उनका मामला अल्लाह के हवाले है: समय आने पर वह उन्हें बता देगा कि जो कुछ वे करते रहे हैं, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (159)

(याद रखो!) जिस किसी ने एक अच्छा काम किया, तो (क़यामत के दिन, फ़ैसले के वक़्त) उसे उसका दस गुना बदला मिलेगा, लेकिन जिस किसी ने एक बुरा काम किया, तो उसे बदले में उतनी ही सज़ा दी जाएगी जितनी बुराई की होगी---- उनके साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (160)

कह दें, "मेरे रब ने तो मुझे सीधा रास्ता दिखा दिया है, वही सही व बिल्कुल ठीक दीन हैयानी इबराहीम [Abraham] का तरीक़ा, कि वह (ईमान का पक्का था,) पूरी भक्ति से बस एक (अल्लाह) का हो गया था वह कई देवताओं को मानने वालों [Polytheist] में से न था।" (161)

कह दें, "मेरी नमाज़ और क़ुर्बानी, मेरा जीना और मरना, सब कुछ अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का रब है; (162)

"(ख़ुदायी में) उसका कोई साझेदार [Partner] नहीं है। इसी बात का मुझे आदेश मिला है, और मैं आज्ञा मानते हुए, (तुममें) सबसे पहले उसके सामने सिर झुकानेवाला हूँ।" (163)

आप पूछें, "क्या (तुम चाहते हो कि) मैं अल्लाह को छोड़कर कोई दूसरा रब ढूँढ लूँ, जबकि वही हर चीज़ का पालनहार है?" और (देखो!) हर एक आदमी अपने कर्मों के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार है; कोई आदमी किसी दूसरे (के कर्मों) का बोझ नहीं उठाएगा। फिर तुम सब को अंत में, अपने रब के पास लौटकर जाना है, और तब वह तुम्हें बता देगा कि जिन बातों में तुम मतभेद रखते थे, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (164)

वही है जिसने तुम्हें ज़मीन पर (एक दूसरे का) ख़लीफ़ा [उत्तराधिकारी/Successors] बनाया, और तुममें से कुछ लोगों के दर्जे दूसरों से ऊँचे रखे, ताकि जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उनमें वह तम्हारी परख कर सके। [ऐ रसूल!] आपका रब सज़ा देने में बहुत तेज़ है, मगर इसके साथ, वह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है। (165)



नोट:

1: क़ुरआन में जब कभी "रौशनी"[नूर] शब्द का प्रयोग हुआ है, हमेशा उसे एक वचन में लिखा गया है जबकि "अंधेरा"[ज़ुलमात] हमेशा बहुवचन में आया है। रौशनी को आम तौर पर सही मार्गदर्शन के लिए और अंधेरे को तरह-तरह की गुमराही के अर्थ में प्रयोग किया गया है।

8: इस दुनिया में सच्चाई पर विश्वास करने की शर्त यही है कि बिना अल्लाह या उसके फ़रिश्ते को देखे हुए रसूल की बातों पर विश्वास कर लिया जाए। अगर आदमी मौत के फ़रिश्ते को देखकर विश्वास कर भी ले, तो उसका कोई फ़ायदा नहीं। फ़रिश्ते अगर सचमुच आ गए, तो वे बिना मुहलत दिए हुए विश्वास न करने वालों को हलाक कर देंगे। 

11: अरब के लोग अपने व्यापारिक कारवाँ के साथ जब सीरिया का सफ़र करते थे तो रास्ते में समूद की क़ौम और लूत (अलै) की क़ौम के खंडहरों के पास से गुज़रते थे, अत: उन्हें उन पुराने लोगों की तबाही से सबक़ सीखने के लिए कहा गया है।

12: अल्लाह बहुत रहम करनेवाला है, वह बंदों की ग़लतियों पर जल्दी सज़ा नहीं देता, बल्कि उनके द्वारा ग़लतियों पर पछताने और तौबा करने को तुरंत क़बूल कर लेता है। 

23: शुरू में तो वे साफ़ झूठ बोल देंगे, लेकिन फिर ख़ुद उनके हाथ-पाँव उनके ही ख़िलाफ़ गवाही देंगे और उनका सारा झूठ खुल जाएगा, देखें 36: 65; और 41: 21.

35: मक्का के विश्वास न करने वाले लोग अक्सर मुहम्मद साहब से नित नए चमत्कार या निशानियाँ दिखाने की माँग करते रहते थे, कभी कभी मुहम्मद (सल्ल) को भी लगता कि अगर कोई निशानी दिखा दी जाए, तो शायद यह लोग सच्चाई पर विश्वास कर लें और गुनाहों से बच जाएं। मगर जैसा कि अल्लाह ने बताया है कि ये लोग अपनी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते विश्वास नहीं करते और चाहे आप कोई भी निशानी ले आएं, तब भी ये लोग विश्वास नहीं करेंगे। अल्लाह ने फिर से मुहम्मद (सल्ल) को समझाया है कि अगर अल्लाह चाहता तो सब लोग एक ही दीन को अपना लेते, लेकिन असल मक़सद दुनिया में लोगों की परीक्षा है कि वह ख़ुद अपनी मर्ज़ी से सोच-समझकर सही रास्ता चुनें, सच्चाई की निशानियाँ चारों तरफ़ बिखरी पड़ी हैं, इसके साथ पैग़म्बरों और आसमानी किताबों का मार्गदर्शन भी है, मगर सही रास्ता चुनना आदमी का काम है। इसके लिए उसे बताया जा सकता है, मगर उसे मान लेने पर मजबूर नहीं किया जा सकता।

37: अल्लाह तो कभी भी कोई ऐसी निशानी उतार सकता है जिसकी मांग मक्का के लोग करते रहते थे, मगर उस निशानी को दिखा देने के बाद भी अगर लोगों ने विश्वास नहीं किया तो इसके नतीजे में हमेशा यही हुआ है कि सच्चाई न मानने वाले लोगों को हलाक कर दिया गया है। 

38: हिसाब रखने वाली किताब का मतलब वह "सुरक्षित पट्टिका" [लौह ए महफ़ूज़] है जिसमें अल्लाह ने अपने पैदा किए हुए हर एक प्राणी की तक़दीर लिख रखी है।

39: यानी ग़लत रास्ते को चुनने के कारण भटकते-भटकते सच्चाई को सुनने और कहने की सलाहियत खो बैठे हैं। 

41: अरब के बहुदेववादी भी यह मानते थे कि इस कायनात की रचना अल्लाह ने ही की है, मगर साथ में वे यह भी मानते थे कि उसकी ख़ुदायी में बहुत से दूसरे देवता भी इस तरह शामिल हैं कि ख़ुदा की बहुत सी शक्तियाँ उनको मिली हुई हैं। इसीलिए वे उन देवताओं को ख़ुश करने के लिए उनकी पूजा करते थे, मगर जब कोई बहुत बड़ी मुसीबत पड़ जाती तो अल्लाह को ही मदद के लिए पुकारते थे। 

51: अल्लाह के सामने कोई किसी के लिए सिफ़ारिश नहीं कर पाएगा, अलबत्ता अगर अल्लाह ही इसकी इजाज़त दे तो सिफ़ारिश हो सकती है, देखें सूरह बक़रा (2: 255) 

52: मक्का में क़ुरैश के कुछ सरदारों ने कहा था कि मुहम्मद साहब के आसपास ग़रीब, ग़ुलामों और निचले दर्जे के लोगों की भीड़ होती है जो अपनी इज़्ज़त बढाने या धन की लालच में आते हैं, और ऐसे लोगों के साथ उनकी मजलिस में बैठने को वे अपनी तौहीन समझते थे।

59: अनदेखी चीज़ों की पाँच कुंजियों का ज़िक्र 31:34 में आया है।

61: निगरानी रखने वाले फ़रिश्ते वह भी हो सकते हैं जो इंसान के कर्मों को लिखने वाले होते हैं, और वह भी जो हर इंसान की शारीरिक हिफ़ाज़त के काम में लगे रहते हैं, देखें सूरह रा'द (11: 13) 

73: आसमान और ज़मीन को बनाने का असल मक़सद क्या है? यही कि जो लोग यहाँ अच्छा काम करें उन्हें इनाम दिया जाए, और जो लोग बुरे काम और अत्याचार करें, उन्हें सज़ा दी जाए, मगर यह इनाम और सज़ा देने के लिए एक अलग ही दुनिया होगी [आख़िरत/परलोक], जहाँ लोगों को अपने कर्मों का हिसाब देने के लिए दोबारा ज़िंदा किया जाएगा, और यह करना अल्लाह के लिए बहुत आसान है। फ़ैसले के दिन एक फ़रिश्ता नरसिंघा बजा देगा---और सब लोग मर जाएंगे, फिर दोबारा नरसिंघा बजेगा, और सब लोग हिसाब देने के लिए ज़िंदा होकर उठ खड़े होंगे, (देखें 39:68).

यूँ तो दुनिया में  भी असली बादशाही व नियंत्रण तो अल्लाह का ही है, मगर ऊपर से हम देखते हैं कि हर देश का अलग-अलग राजा या राष्ट्र अध्यक्ष है, लेकिन क़यामत आते ही ऐसे सारे नियंत्रण भी ख़त्म हो जाएंगे, और तब पूरा नियंत्रण अल्लाह का ही होगा, देखें 3:26.  

76: हज़रत इबराहीम (अलै) इराक़ के जिस इलाक़े नैनवा के रहनेवाले थे, वहाँ के लोग बुतों के साथ सूरज, चाँद, तारे आदि की पूजा करते थे। इबराहीम (अलै) की ज़बानी इनकी मान्यताओं को रद्द किया गया है। 

80: ऐसा लगता है कि लोगों ने इबराहीम (अलै) को इस बात से डराया था कि वह उनके देवताओं और चाँद, तारों आदि के बारे में अगर बुरा-भला कहेंगे तो वे उन्हें सज़ा देंगे। 

82: सर्वशक्तिमान अल्लाह की इबादत में झूठे ख़ुदाओं को शामिल नहीं करते यानी शिर्क [Idolatory] नहीं करते जो कि ज़ुल्म या शैतानी करने जैसा है। 

91: यहूदियों के एक सरदार ने एक बार मुहम्मद (सल्ल) से बहस करते हुए कहा था कि अल्लाह ने इंसानों पर कोई किताब नहीं उतारी। 

92: "मक्का" को 'शहरों की माँ' [उम्मुल क़ुरा] कहा गया है, ऐसा उसकी धार्मिक विशेषता के चलते कहा गया है क्योंकि ज़मीन पर अल्लाह की इबादत के लिए बनाया गया यह सबसे पहला घर है, और शायद इसलिए भी कि यह केंद्र में स्थित है।

93: कहा जाता है कि यहाँ 'मुसैलमा' नामक एक झूठे आदमी की बात कही गई है जिसने अपने को रसूल होने का दावा किया था।

95: जानदार चीज़ से बेजान चीज़ निकालना, जैसे मुर्ग़ी से अंडा निकालना, और बेजान चीज़ से जानदार निकालना, जैसे अंडे से मुर्ग़ी का निकालना। 

100: यहाँ जिन्नों से मतलब शैतानों से है, जो कि बिना धुएं की आग से पैदा किए गए हैं, और इंसानों की तरह इनकी भी अलग ज़िंदगी है, और उन्हें भी इंसानों की तरह आज़ादी दी गई है कि वे अपनी मर्ज़ी से सही या ग़लत रास्ता चुन लें, देखें 38: 76; 55: 15. ........... ईसाइयों ने हज़रत ईसा (अलै) को अल्लाह का बेटा कहना शुरू किया, कुछ यहूदी उज़ैर [Ezra] (अलै) को अल्लाह का बेटा मानते थे, और अरब के बहुदेववादी फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ मानते थे। 

103: इस दुनिया में तो अल्लाह को कोई नहीं देख सकता है, लेकिन क़ुरआन और मुहम्म्द (सल्ल) की शिक्षाओं [हदीस] से यह पता चलता है कि फ़ैसले के दिन ईमानवाले अपने रब को देख सकेंगे।

104: यानी रसूल पर यह ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी गई है कि सच्चाई पर विश्वास नहीं करने वालों को ज़बरदस्ती विश्वास कर लेने पर मजबूर किया जाए और उनको इंकार करने के नुक़सान से बचा लिया जाए। रसूल का काम केवल समझा देना है, मानना न मानना तो उन लोगों का काम है।

105: मक्का के लोग अच्छी तरह से जानते थे कि मुहम्मद (सल्ल) पढ़े-लिखे आदमी नहीं, सो क़ुरआन जैसा कलाम वह लिख नहीं सकते, इसलिए कहते थे कि कोई उन्हें सिखा-पढ़ा देता है, कभी-कभी वे एक लोहार का नाम भी लेते थे कि वह उन्हें सिखा देता है, देखें 16: 103. 

कुछ लोग हमेशा यह भी आरोप लगाते थे कि क़ुरआन में पुरानी आसमानी किताबों, जैसे बाइबल, तौरात आदि से नक़ल कर लिया गया है, क्योंकि पुराने नबियों की बहुत सी बातें मिलती-जुलती थीं। हालाँकि उस ज़माने तक बाइबल या तौरात के अरबी अनुवाद का कोई सबूत नहीं मिलता। इस्लामी मान्यता के अनुसार क़ुरआन की बातें दूसरी आसमानी किताबों से मिलती-जुलती इसलिए हैं कि ये सभी किताबें अल्लाह की तरफ़ से ही उतारी गई हैं।

107: अगर अल्लाह चाहता तो सारे लोगों को एक ही धर्म [दीन] का मानने वाला बना देता, मगर यह बात बार-बार स्पष्ट की गयी है कि यह दुनिया परीक्षा देने की जगह है, चारों तरफ़ अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ मौजूद हैं, पैग़म्बरों को भेजा गया कि वे उन निशानियों की तरफ़ लोगों का ध्यान खींच सकें, आसमानी किताबें भेजी गयीं जिससे उनका सही मार्गदर्शन हो सके और परीक्षा देना आसान हो सके। यहाँ हर आदमी को अपने मन से रास्ता चुनने का अधिकार है, और वह ख़ुद ही अपने कर्मों के लिए ज़िम्मेदार होगा। 

108: यहाँ साफ़ तौर से मुसलमानों को इस बात से मना किया गया है कि वे उन लोगों के देवी-देवताओं को बुरा-भला न कहें, भले ही वे अल्लाह के बारे में बुरी बातें कह दें। 

111: ये वही चमत्कार दिखाने की बातें थीं जिनकी माँग मक्का के लोग करते रहते थे, देखें 25: 21. 

113: शैतान और उसकी चिकनी-चुपड़ी बातें सब लोगों की आज़माइश और परीक्षा के लिए हैं, जिसके अंदर सच्चाई को पाने की चाह होगी, वह इसमें से अपने लिए सही राह निकाल लेगा। 

119: जो जानवर अपनी मौत मर जाता है, तो उसके (सड़े-गले) गोश्त को खाना हराम है, क्योंकि उसके मरने के समय उस पर अल्लाह का नाम नहीं लिया गया और दूसरा कि पता नहीं वह कब से मरा हुआ था। जिन जानवरों को खाने से मना किया गया है, उनका वर्णन सूरह नहल (16: 115) में आ चुका है। 

120: छिपे हुए गुनाह में ईर्ष्या, जलन, पीठ पीछे बुराई, झूठ, दिखावा करना, घमंड आदि भी शामिल हैं। 

121: मुसलमानों को ऐसे ही जानवरों के गोश्त खाने की इजाज़त है जिसको सही तरीक़े से ज़बह किया गया हो, और वह मरा या सड़ा-गला न हो। इस बारे में मक्का के बुतपरस्त लोग मुसलमानों से अक्सर बहस करते थे कि वे ख़ुद से काटकर मारे गए गोश्त को तो खाते हैं, लेकिन उसे नहीं खाते जो अपनी मौत मर गया हो, या उनके देवताओं के नाम से काटकर बलि चढ़ाया हुआ हो। 

122: क़ुरआन में अक्सर सच्चाई पर विश्वास न करने को "मौत और अंधेपन" से उपमा दी गई है, जबकि विश्वास करने को "ज़िंदगी और देख पाने की सलाहियत" से उपमा दी गई है। जब तक आदमी को सही मार्गदर्शन नहीं मिलता, वह मरे हुए आदमी जैसा है। फिर उसे ज़िंदा कर देना और उसे रौशनी देने का मतलब है, उसे क़ुरआन द्वारा सही मार्गदर्शन मिल जाना जिससे वह लोगों के बीच भलाई के काम करता हो, उसके विपरीत जिन लोगों ने सच्चाई पर विश्वास नहीं किया, वे अँधेरों में भटकते फिरते हैं, और सारे बुरे कर्म उन्हें बहुत लुभावने लगते हैं। 

125: "इस्लाम" का मतलब अल्लाह की मर्ज़ी के आगे पूरी तरह झुक जाना।

128: जिन्नों के पीछे चलने वाले इंसानों ने उनके बहकावे में आकर अपने मन की इच्छाओं के पीछे चलते हुए गुनाह किए और उनसे मज़ा उठाया (जैसे जिन्नों ने इंसानों को जादू करने के काम में मदद की), और इस झूठी उम्मीद में रहे कि ये जिन्न उन्हें हर तरह के नुक़सान से बचा लेंगे। दूसरी तरफ़ जिन्नों ने भी अपने मानने वालों की बड़ी संख्या को देखते हुए अपने आपको बहुत ताक़तवर महसूस किया। 

136: अरब के बहुदेववादियों में अजीब-अजीब सी रस्में थीं। वे अपनी पैदावार और जानवरों के गोश्त या दूध का एक हिस्सा "अल्लाह के लिएनिकालते थे (जो दोस्तों और मेहमानों के लिए था), और एक हिस्सा अपने देवताओं के लिए था जो मंदिरों पर चढ़ाते थे (जो मंदिर की देखरेख करने वालों के लिए था)। अगर देवताओं का हिस्सा कम पड़ जाता, तो वे अल्लाह के हिस्से में से ले लेते थे, मगर अल्लाह के हिस्से की भरपाई नहीं करते थे। 

137: देवताओं के सेवकों ने या जिन्नों ने उन्हें बच्चों को मार देने की बात सुझाई थी। 

138: यहाँ अरब में प्रचलित कुछ और रस्मों के बारे में बताया गया है। अपने देवी-देवताओं को ख़ुश करने के लिए कुछ मनगढ़ंत मान्यताएं बना ली गयी थीं और उसे अल्लाह के नाम से जोड़ दिया गया था। 

140: "बिना किसी जानकारी के", यानी बिना किसी आसमानी किताब के प्रमाण के।

141: मक्का की ज़िंदगी में आम नियम यह था कि फ़सल की कटाई के समय जो भी ग़रीब आ जाए, उसे कुछ दे दिया जाए। बाद में मदीना में जाकर यह पक्का नियम बना कि जहाँ सिंचाई की व्यवस्था न हो [dry farming], वहाँ फ़सल में से पैदावार का 10% गरीबों का हिस्सा होगा, और अगर सिंचाई वाली ज़मीन हो, तो पैदावार का 5% ग़रीबों का हिस्सा होगा। 

145: इन जानवरों के अलावा मुहम्मद (सल्ल) ने हर तरह के दरिंदे जानवरों का माँस [Carnivorous beasts & birds] खाना भी हराम [अवैध] बताया है।  

148: अल्लाह किसी को ज़बरद्स्ती सच्चाई पर विश्वास कर लेने पर मजबूर नहीं करता, क्योंकि दुनिया लोगों की परीक्षा लेने के लिए बनाई गई है कि कौन अपनी समझ और अपनी मर्ज़ी से सही रास्ता चुनता है, जिसके मार्गदर्शन के लिए इतने सारे पैग़म्बर समय-समय पर भेजे गए। 

149: दुनिया में आए पैग़म्बरों ने हर तरह से लोगों को सच्चाई पर विश्वास कर लेने की शिक्षा दी, अब यह आदमी की मर्ज़ी है कि वह उनकी बात मानते हुए उसे क़बूल कर ले या उसे मानने से इंकार कर दे। अल्लाह नहीं चाहता कि वह हर किसी को ज़बरदस्ती सही रास्ता दिखा दे। 

151: किसी भी चीज़ को यानी चाहे मूर्तियों को, न सूरज-चाँद-सितारों को, और न ही जिन्नों को अल्लाह का साझेदार ठहराना। .....जान-बूझकर किए गए क़त्ल का बदला लेने का हक़ तो है, मगर उसे क़ानूनी तरीक़ों से लिया जाना चाहिए।

154: एक बार फिर.. आयत 91-93 में कही गई बात को दोबारा ज़ोर देकर कहा गया है जो कि इस ग़लत बात के जवाब में है कि अल्लाह ने कोई "वही" [आसमाने किताब] कभी उतारी ही नहीं है। 

158: कहा जाता है कि यह आयत उन ईमानवालों के बारे में है जिन्होंने न कोई अच्छा काम किया और न ही अपनी मौत से पहले या क़यामत आने से पहले अपने गुनाहोंं से तौबा की।

 164: मक्का के वे लोग जो सच्चाई पर विश्वास न करने पर अड़े हुए थे, वे कभी-कभी मुसलमानों से कहते थे कि तुम लोग हमारे दीन को अपना लो, अगर किसी अपराध की सज़ा तुम्हें मिलनी होगी तो तुम्हारे हिस्से का अपराध हम अपने सिर ले लेंगे [29: 12], हालाँकि हर आदमी को अपने अंत की फ़िक्र ख़ुद ही करनी चाहिए क्योंकि कोई भी आदमी किसी दूसरे को मिलने वाली सज़ा से नहीं बचा सकता। ऐसी ही बात कई जगह आयी है, देखें 17: 15; 35: 18; 39: 7; और 53: 38.




 


No comments:

Post a Comment

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...