Tuesday, April 5, 2022

Surah/सूरह 9: At-Tauba/अत-तौबा [गुनाहों पर पछतावा/ Repentance]

 सूरह 9: अत-तौबा 

[गुनाहों पर पछतावा/ Repentance]


क़ुरआन में यही ऐसी सूरह है जो "अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है" से नहीं शुरू हुई है; कुछ विद्वानों की राय है कि सूरह 8 और सूरह 9 अलग-अलग नहीं, बल्कि असल में एक ही सूरह है जिसमें बात आगे बढ़ायी गई है। यह एक मदनी सूरह है जिसका नाम आयत 104 से लिया गया है। यह एक घोषणा के साथ शुरू होती है जिसमें मक्का के बुतपरस्तों के साथ की गई संधि को तोड़ देने की नोटिस दी गई है, क्योंकि उन लोगों ने संधि की शर्तों को तोड़ दिया था। लेकिन इसका बड़ा हिस्सा "तबूक के अभियान" में जाने की तैयारी और उसमें जाने वाले लोगों के चुनाव से संबंधित है, जो 631 ई./ 9 हिजरी में सख़्त गर्मी के मौसम में हुआ था। मदीना के पाखंडी लोग, और जो लोग युद्ध में किसी न किसी कारण से नहीं जा सके, और जिन लोगों ने रसूल के इस अभियान में उनको सहयोग नहीं दिया, ऐसे सभी लोगों की कड़ी निंदा की गई है। मुसलमानों को याद दिलाया गया है कि "हुनैन की जंग" में कैसे शुरुआती हार के बाद अल्लाह ने ईमानवालों को जीत दिलायी और किस तरह अल्लाह ने मक्का से मदीना जाते समय अपने रसूल की बुतपरस्तों से रक्षा की। पूरी सूरह में अल्लाह के तौबा क़बूल करने की बात सामने आती है जिसके कारण इसका नाम "अत-तौबा" है। 


विषय:

01-02: शांति-समझौते से मुक्ति 

03-12: एक घोषणा 

13-24: ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने का आहवान 

25-27: हुनैन की जंग में अल्लाह की मदद 

28  : घोषणा का नतीजा 

29-35: किताबवाले [यहूदी, ईसाई] लोगों के ख़िलाफ़ भी लड़ो 

36-37: आदर के महीनों के दौरान लड़ाई 

38-49: लड़ाई लड़ने के लिए बहाने बनाना 

50-57: पाखंडियों के ख़िलाफ़ ज़ोरदार हमला 

58-60: ग़रीबों को दिए जाने वाला माल [ज़कात/सदक़ा]

61-70: पाखंडियों की कड़ी निंदा (जारी) 

71-72: ईमानवालों को इनाम 

73-80: पाखंडियों [मुनाफिक़] की कड़ी निंदा (जारी) 

81-96: युद्ध में जाने से हिचकिचाने की निंदा 

97-99: अरब के देहाती लोगों का रवैया 

101-106: अरब के लोगों का रवैया (जारी) 

107-110: पाखंडियों ने फितना फैलाने के लिए एक मस्जिद बनाई 

111-112: ईमानवालों के साथ अल्लाह का सौदा 

113-116: बहुदेववादियों की माफ़ी के लिए कोई दुआ नहीं 

117-118: ईमानवालों की ग़लतियों को माफ़ करके अल्लाह ने रहम किया 

119-129: ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ाई करना ईमानवालों का कर्तव्य है




[मुसलमानो!] तुमने जिन बहुदेववादियों [मुशरिकों/Idolaters] के साथ शांति-समझौता कर रखा था, अब अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ से तुम उन (समझौतों) से मुक्त (किए जाते) हो ------ (1)

[ऐ बहुदेववादियो!] तुम (अरब की) इस धरती पर (अगले) चार महीने तक बिना रोक-टोक चल-फिर सकते हो (उसके बाद युद्ध की हालत शुरू हो जाएगी), मगर तुम्हें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि तुम अल्लाह की पकड़ से बच नहीं सकोगे, और यह भी कि जो लोग उसका आदेश मानने से इंकार करेंगे, अल्लाह उन्हें अपमानित करके रहेगा। (2)

बड़े हज के दिन, अल्लाह और उसके रसूल की ओर से सभी लोगों के लिए (एक घोषणा की जाएगी): "अल्लाह और उसके रसूल बहुदेववादियों (के साथ हुए समझौते की शर्तों को मानने) से अब आज़ाद हैं। [ऐ मुशरिको!], तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम (अपने ज़ुल्म से) तौबा कर लो; अगर तुम (अब भी) नहीं मानोगे, तो जान लो कि तुम अल्लाह की पकड़ से भाग नहीं सकते।" जिन लोगों ने (सच्चाई से) इंकार का रास्ता अपना लिया है, [ऐ रसूल!], आप उन्हें दर्दनाक यातना की ख़ुशख़बरी सुना दें।  (3)

हाँ, मुशरिकों में से वे लोग जिन्होंने तुम्हारे साथ किए गए शांति-समझौते की शर्तों को सही ढंग से माना, और तुम्हारे विरुद्ध (लड़ाई में) किसी की सहायता नहीं की: तो उनके साथ हुए क़रार [Agreement] को निर्धारित अवधि ख़त्म होने तक पूरा करो। अल्लाह उन लोगों को पसंद करता है जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।  (4


जब वह (चार) महीने बीत जाएँ जिसमें जंग करने से रोका गया है, तो फिर उन मुशरिकों के साथ (जिन्होंने समझौते की शर्तों को तोड़ा है) जहाँ कहीं सामना हो (मक्का के पवित्र परिसर के अंदर या बाहर), उनका क़त्ल करो, उन्हें गिरफ़्तार कर लो, उनकी घेराबंदी कर दो, और हर निगरानी-चौकी पर उनकी ताक में बैठो; फिर अगर ऐसा हो कि वे (बुराइयों से) तौबा कर लें, पाबंदी से नमाज़ पढ़ें, और निर्धारित की हुई ज़कात दें, तो उन्हें उनके रास्ते जाने दो, कि सचमुच अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (5)

अगर मुशरिकों में से कोई भी आपसे शरण [पनाह /protection] माँगे, तो [ऐ रसूल!], आप उसे शरण दे दें, ताकि वह (अच्छी तरह) अल्लाह की वाणी सुन सके, फिर उसे ऐसी जगह पहुँचा दें जो उसके लिए सुरक्षित हो, क्योंकि ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें (अल्लाह के संदेश की सच्चाई का) ज्ञान नहीं है। (6)

ऐसे मुशरिकों [बहुदेववादियों] के साथ अल्लाह और उसके रसूल की कोई संधि कैसे हो सकती थी? हाँ, मगर जिन लोगों के साथ आपने पवित्र मस्जिद [काबा] के पास (हुदैबिया में) संधि की थी, जब तक वे उस (संधि की शर्तों) पर क़ायम रहते हैं, आप भी उन (शर्तों) पर क़ायम रहें; अल्लाह उन लोगों को पसंद करता है जो उससे डरते हुए ग़लत कामों से बचते हैं।  (7)

(कैसे), जबकि उनका हाल यह है कि अगर वे तुम्हारे ऊपर हावी हो जाएं, तो वे तुम्हारे साथ न तो किसी तरह के बंधन का मान रखेंगे, न किसी रिश्ते-नाते का, न किसी संधि का? वे अपनी ज़बान से तुम्हें ख़ुश करना चाहते हैं, मगर उनके दिल तुम्हारा विरोध करते रहते हैं और उनमें ज़्यादातर लोग (अच्छाई के) नियमों को तोड़ने वाले हैं।  (8)

उन लोगों ने मामूली से फ़ायदे के लिए अल्लाह के संदेश को बेच डाला है, और दूसरों को उसके मार्ग (पर चलने) से रोका है। कितने बुरे हैं काम उनके! (9)

ईमान रखनेवालों के साथ, न तो वे रिश्ते-नाते का, और न किसी संधि का कोई मान रखते हैं। यही वे लोग हैं जो (ज़ुल्म करते हुए) आक्रामक क़दम उठा रहे हैं। (10)

अगर वे अल्लाह के सामने (तौबा के लिए) झुक जाएं, पाबंदी से नमाज़ पढ़ें, और निर्धारित की हुई ज़कात दें, तो फिर वे तुम्हारे धर्म के भाई हैं: जो लोग जानना चाहते हैं, उन लोगों के लिए हम अपने संदेश (आयतें) स्पष्ट व खोलकर बता देते हैं। (11

लेकिन अगर वे तुम्हारे साथ समझौता होने के बाद अपनी प्रतिज्ञा तोड़ डालॆं और तुम्हारॆ दीन [धर्म] को बुरा-भला कहने लगॆं, तॊ फिर अधर्म (disbelief) कॆ सरदारों सॆ युद्ध करॊ ----- उन्हें प्रतिज्ञा से कोई मतलब नहीं है ---- ताकि वॆ (ज़ुल्म करने और प्रतिज्ञा तोड़ने) जैसे काम से रुक जाऐं। (12)

[मुसलमानो!], ऐसॆ लॊगॊं सॆ तुम क्यों नहीं लड़ॊगॆ जिन्हॊंनॆ अपनी ली हुई प्रतिज्ञाएं तोड़ डालीं, जिन्होंने अल्लाह के रसूल को निकाल बाहर करने की कोशिश की, पहले जिन्होंने तुम पर हमला किया? क्या तुम उनसे डरते हो? अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो असल में तो अल्लाह है जिसका डर तुम्हारे दिलों में होना चाहिए। (13)

उनसे (बेझिझक) लड़ो: अल्लाह तुम्हारे हाथों से उन्हें सज़ा देगा, वह उन्हें अपमानित कर देगा, और उन पर जीत हासिल करने में वह तुम्हारी मदद करेगा, वह ईमानवालों की (आहत) भावनाओं पर मरहम का काम करेगा, (14)

और उनके दिलों के अंदर के गु़स्से को मिटा देगा। फिर अल्लाह जिस पर चाहेगा, उस पर अपनी दया-दृष्टि डालेगा; अल्लाह सब जाननेवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (15

[मुसलमानो!], क्या तुम्हें लगता है कि तुम बिना परखे ही छोड़ दिए जाओगे, बिना अल्लाह द्वारा इस बात की पहचान किए हुए कि तुममें से कौन है जो उसके रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करेगा, और अल्लाह, उसके रसूल और दूसरे ईमानवालों को छोड़कर किसी और को अपना मददगार नहीं बनाएगा? तुम्हारे हर काम की अल्लाह पूरी ख़बर रखता है। (16)


यह मुशरिकों के लिए ठीक नहीं है कि (दिखावे के लिए) उनका झुकाव अल्लाह की इबादत की जगहों की ओर हो, जबकि वे स्वयं विश्वास न करने की गवाही दे रहे हैं: ऐसे लोगों के सारे कर्म बेकार हो जाएंगे और वे जहन्नम (की आग) में रहने वाले हैं। (17)

असल में अल्लाह की इबादत की जगहों को आबाद करने का हक़ तो केवल उन्हीं लोगों को होना चाहिए जो अल्लाह और अंतिम दिन पर विश्वास रखते हों, जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हों, निर्धारित ज़कात देते हों और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते हों: ऐसे ही लोग सीधा मार्ग पाने वालों में शामिल होने की उम्मीद कर सकते हैं।  (18)

क्या तुमने हाजियों को पानी पिलाने और पवित्र मस्जिद [काबा] के इंतिजा़म करने को उस आदमी के कर्मों के बराबर ठहरा लिया है, जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखता है और अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करता है? अल्लाह की नज़र में वे बराबर नहीं हैं। अल्लाह (ज़ुल्म करनेवाले) ऐसे जाहिलों को सही रास्ता नहीं दिखाता है। (19)

जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया, (मक्का से घर-बार छोड़कर) हिजरत करके (मदीना) चले गए, और अल्लाह के रास्ते में अपने मालों और अपनी जानों से कड़ा संघर्ष [जिहाद] किया, उनका दर्जा अल्लाह की नज़र में कहीं ऊँचा है; यही लोग हैं जो कामयाब होंगे; (20)

उनका रब उन्हें अपनी रहमत और प्रसन्नता की ख़ुशख़बरी सुनाता है, उनके लिए (जन्नत के) बाग़ों में कभी न ख़त्म होने वाला आनंद होगा (21)

और जहां वे हमेशा-हमेशा रहेंगे: सचमुच अल्लाह के पास (उनके लिए) बड़ा भारी इनाम है। (22)


ऐ ईमानवालो! अपने बाप और अपने भाइयों के साथ कोई गठबंधन न करो, अगर वे (सच्चाई पर) ईमान रखने के बजाए इंकार पर अड़े रहना पसंद करते हैं: तुममें से जो कोई ऐसा करता है, वह ग़लत काम कर रहा है। (23

(ऐ रसूल!) आप (मुसलमानों से) कह दें, "तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी बीवियाँ, तुम्हारे रिश्ते-नातेवाले, तुम्हारी धन-दौलत जो तुमने कमायी हैं, वह कारोबार जिसके मंदा पड़ जाने का तुम्हें डर लगा रहता है, और रहने के घर जिन्हें तुम पसन्द करते हो, अगर ये सब तुम्हें अल्लाह और उसके रसूल, और उसके रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करने से ज़्यादा प्यारे हैं, तो फिर इंतजा़र करो, यहाँ तक कि अल्लाह की भेजी हुई यातना तुम्हारे सामने आ जाए।” अल्लाह ऐसे लोगों को रास्ता नहीं दिखाता जो हर बंधन तोड़ डालते हैं।" (24)

(ऐ ईमानवालो!), अल्लाह कई बार युद्ध के मैदान में तुम्हारी मदद कर चुका है, (मक्का और तायफ़ की घाटी़ के बीच) हुनैन की लड़ाई के दिन भी, जब तुम अपनी बड़ी संख्या पर फूले हुए थे, मगर वह तुम्हारे कुछ काम न आयी: ज़मीन अपने फैलाव के बावजूद तुम पर तंग होती हुई महसूस हुई, और फिर तुम मैदान से पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए थे। (25)

तब अल्लाह ने अपने रसूल पर और ईमानवालों पर अपनी तरफ़ से दिल का सुकून [calm] उतारा, और ऐसी सेनाएँ उतारी जो दिखाई नहीं देती थीं। अल्लाह ने (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों को सज़ा दी ---- इंकार करनेवाले तो इसी लायक़ हैं ---- (26)

मगर अल्लाह जिस किसी पर चाहता है, (उसकी तौबा क़बूल करते हुए) अपनी रहमत से लौट आता है। अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (27)

ऐ ईमानवालो!, जो लोग अल्लाह के साथ दूसरों को उसका साझेदार [Partner] ठहराते हैं, सचमुच वे (अपनी सोच में) अपवित्र हैं: इस साल के बाद उन्हें पवित्र मस्जिद [काबा] के नज़दीक मत आने दो। [मुसलमानो], अगर तुम्हें इस बात का डर है कि (उनके न आने से) तुम ग़रीब हो जाओगे, तो (याद रखो!), कि अगर अल्लाह ने चाहा, तो तुम्हें अपने फ़ज़ल [bounty] से मालामाल कर देगा: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझवाला है। (28)


ऐसे किताबवाले (यहूदी व ईसाई), जो अल्लाह और आख़िरी दिन [क़यामत] पर (सच्चे दिल से) विश्वास [ईमान] नहीं रखते, जो उन चीज़ों से (लोगों को) नहीं रोकते, जिनसे अल्लाह और उसके रसूल ने (उनकी किताब में) रोका है, जो इंसाफ़ के नियमों का पालन नहीं करते, उनसे भी उस समय तक लड़ो जब तक कि वे (अपनी सुरक्षा के बदले में) टैक्स [जज़िया] अदा न कर दें, और (आगे से देने के लिए) तैयार न हो जाएं। (29

यहूदी कहते थे, "उज़ैर (Ezra) अल्लाह का बेटा है," और ईसाई कहते थे, "मसीह (Messiah) अल्लाह का बेटा है": ये सब उनके अपने मुँह की बातें थीं, ये वही बातें दोहराते थे जो उनसे पहले के विश्वास न करनेवाले कहा करते थे। अल्लाह की मार हो इन पर! ये सीधे रास्ते से कितनी दूर जा पड़े हैं! (30)

उन्होंने अपने धर्म-गुरुओं [rabbis] और संत-महात्माओं [monks] को और साथ में मरयम के बेटे ईसा को भी अपना रब बना रखा है। मगर उन्हें तो केवल एक अल्लाह की बंदगी करने का आदेश दिया गया था: उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है; जिस किसी को वे अल्लाह का साझेदार [partner] ठहराते हैं, उनसे अल्लाह कहीं ज़्यादा ऊँचा है!  (31)

वे इस कोशिश में लगे हैं कि अल्लाह की रौशनी को अपने मुँह से (फूँक मारकर) बुझा दें, मगर अल्लाह अपनी रौशनी को पूरी तरह फैलाये बिना नहीं रहेगा, चाहे विश्वास न करनेवालों को यह बात कितनी ही बुरी लगे। (32)

वही (अल्लाह) है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सच्चे दीन के साथ भेजा, यह दिखाने के लिए कि यह दीन सभी (दूसरे) धर्मों से बढ़कर है, चाहे बहुदेववादी इससे कितनी ही नफ़रत करें। (33)

ईमानवालो, बहुत-से धर्मगुरु और संत-महात्मा ऐसे हैं जो ग़लत तरीक़े से लोगों के माल हड़प लेते हैं और लोगों को अल्लाह के मार्ग से दूर हटा देते हैं। (ऐ रसूल), जो लोग अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने के बजाए, सोना और चाँदी की जमाख़ोरी में लगे रहते हैं, आप उनसे कह दें कि उन्हें बड़ी दर्दनाक सज़ा होगी:  (34)

उस (क़यामत के) दिन जब (ज़ेवरों को) जहन्नम की आग में तपाया जाएगा, फिर उससे उनके माथों, पहलुओं और उनकी पीठों को दाग़ा जाएगा, फिर उनसे कहा जाएगा, "यही है वह जिसे तुमने अपने लिए जमा कर रखा था! जो कुछ तुम जमा करते रहे हो, अब उसका दर्द महसूस करो!" (35)


अल्लाह का ठहराया हुआ क़ानून है कि (साल में) बारह महीने होते हैं----यह तो अल्लाह की किताब में उसी दिन से तय किया हुआ है, जिस दिन उसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया था ----- उसमें से चार महीने आदर के हैं: यही सही हिसाब है। इन महीनों में (मारपीट करके) अपनी जानों पर अत्याचार न करो ----- हालाँकि मुशरिकों से तुम किसी भी समय लड़ सकते हो, अगर वे तुम पर पहले हमला कर दें ---- याद रखो, अल्लाह उनके साथ होता है जो उससे डरते हुए बुराइयों से (हर हाल में) बचते रहते हैं।  (36)

आदर के (चार) महीनों को उसकी जगह से आगे-पीछे हटा देना, आज्ञा न मानने की एक और निशानी है जिसके चलते वे लोग जो (अल्लाह के) आदेश पर ध्यान नहीं देते, वे सही रास्ते से भटका दिए जाते हैं: (अपनी इच्छा से) किसी साल तो उन (महीनों) का आदर करते हुए उसे अवैध [हराम] ठहरा लेते हैं (और युद्ध नहीं करते), और अगले साल उसको वैध [हलाल] करके (मारपीट को सही) ठहरा लेते हैं, ताकि ऊपर से यह दिखा सकें कि वे अल्लाह के द्वारा ठहराए हुए पवित्र महीनों की गिनती का सही तरीक़े से पालन करते हैं, मगर ऐसा करने में होता यह है कि जिस चीज़ को अल्लाह ने अवैध [Forbidden] ठहरा दिया है, वे उसे वैध [Permit] कर देते हैं। उनके द्वारा किए गए शैतानी कर्म, उनके लिए सुहावने बना दिए गए हैं: अल्लाह उसे सीधा रास्ता नहीं दिखाता जो उसके आदेशों पर कोई ध्यान नहीं देता।  (37


ईमानवालो!, जब तुमसे कहा जाता है, "अल्लाह के रास्ते में लड़ाई के लिए निकलो", तो क्यों तुम्हारे पाँव बोझल होकर ज़मीन पकड़ लेते हैं? क्या तुम आनेवाली दुनिया [आख़िरत] के मुक़ाबले इस दुनिया की ज़िंदगी पर रीझ गए हो? आनेवाली दुनिया के मुक़ाबले इस दुनिया की खुशियाँ कितनी कम हैं! (38)

अगर तुम बाहर निकलकर लड़ाई नहीं लड़ोगे, तो अल्लाह तुम्हें कठोर सज़ा देगा और वह तुम्हारी जगह दूसरे लोगों को ला खड़ा करेगा, और तुम उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकोगे: अल्लाह की ताक़त हर चीज़ पर छायी हुई है। (39)

अगर तुम अपने रसूल की मदद न भी करो, तो यह जान लो कि अल्लाह ने उस समय भी उनकी मदद की थी जब इंकार करनेवालों [काफ़िरों] ने उन्हेंं (घर से) निकाल बाहर किया था: जब उनमें से दो लोग (सौर की) गुफ़ा में (छिपे हुए) थे, उनमें एक तो रसूल [मुहम्मद सल्ल.] थे, जिन्होंने अपने साथी से कहा था, “चिंता न करो, अल्लाह हमारे साथ है", और फिर अल्लाह ने उन पर चैन व सुकून उतार भेजा था, उनकी मदद ऐसी सेनाओं से की थी जो तुम्हें दिखायी नहीं देती थी, और इस तरह विश्वास न करनेवालों की योजना को चौपट कर दिया था। अल्लाह की योजना तो बहुत ऊँची है: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (40)

अत: निकल खड़े हो, और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ संघर्ष [जिहाद] करो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता चाहे तुम्हारे पास हल्के हथियार हों या भारी: यही तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानते। (41

(ऐ रसूल), वे [पाखंडी] आपके पीछे ज़रूर हो लेते, अगर उन्हें (युद्ध से) मिलने वाला फ़ायदा सामने दिखाई देता और सफ़र छोटा होता, मगर यात्रा उनके लिए कुछ ज़्यादा ही लम्बी (व कठिन) महसूस हुई। अब (देखो!) वे अल्लाह की (झूठी) क़समें खाएँगे, "अगर हम जा सकते, तो ज़रूर आपके साथ (युद्ध के लिए) निकल गए होते," मगर वे अपने आपको तबाही में डाल रहे हैं, क्योंकि अल्लाह जानता है कि वे झूठ बोल रहे हैं।  (42


[ऐ रसूल!] अल्लाह आपको माफ़ करता है! (मगर) इससे पहले कि आप जान पाते कि उनमें से कौन लोग हैं जो सच बोल रहे हैं, और कौन लोग हैं जो झूठे हैं, आपने उन्हें पहले ही (युद्ध में जाने के बजाए) घर पर रुके रहने की अनुमति क्यों दे दी? (43)

जो लोग अल्लाह और आख़िरी दिन [क़यामत] पर ईमान रखते हैं, वे कभी आपसे यह नहीं चाहेंगे कि उन्हें अपने मालों और अपनी जानों के साथ संघर्ष [जिहाद] करने से छूट दे दी जाए ----- अल्लाह जानता है कि कौन है जो सचमुच उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचता है ------ (44)

केवल वही लोग आपसे घर पर रुके रहने की अनुमति माँगते हैं, जो अल्लाह पर और आख़िरी दिन पर ईमान नहीं रखते: उनके दिलों में सन्देह है, और इसीलिए वे डाँवाडोल हो रहे हैं। (45

अगर वे सचमुच आपके साथ (युद्ध में) निकलना चाहते, तो इसके लिए उन्होंने कुछ तैयारियाँ की होतीं, मगर अल्लाह ने उनके उठ खड़े होने को पसन्द नहीं किया, और उन्हें (अपनी जगह) पड़े रहने दिया। उनसे कहा गया, "बैठे रहने वाले (अपाहिज) लोगों के साथ तुम भी (घरों में) बैठे रहो।" (46)

अगर वे (लड़ने के लिए) आपके साथ निकले भी होते, तो उन लोगों ने आपको परेशानी के सिवा कुछ न दिया होता: वे तुम लोगों के बीच फूट डालने की कोशिश करते, यहाँ वहाँ उपद्रव मचाते फिरते, और तुममें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने उनकी बातें बड़े चाव से सुनी भी होतीं ------- अल्लाह अच्छी तरह जानता है कि कौन लोग ज़ुल्म करने वाले हैं। (47)

यक़ीनन, उन्होंने इससे पहले भी कुछ मुद्दे उठाकर झमेला बढ़ाने की कोशिश की थी: वे आपके ख़िलाफ़ हर तरह की चालें चलने में लगे रहे, यहाँ तक कि सच्चाई जग ज़ाहिर हो गयी और उन लोगों के कुढ़ते रहने के बावजूद अल्लाह की इच्छा पूरी होकर रही।  (48)

उन (पाखंडियों) में से कुछ लोगों ने कहा, "मुझे घर पर ही रुके रहने की इजाज़त दे दीजिए: मुझे बहकने से रोक लीजिए।" मगर वे तो पहले ही बहक चुके हैं: जहन्नम विश्वास न करनेवालों को अपने घेरे में ले लेगी। (49)

(ऐ रसूल), अगर आपकी क़िस्मत से कुछ अच्छा हो, तो वह उन्हें दुखी कर देगा, लेकिन अगर आप पर कोई मुसीबत आ जाए, तो वे अपने आपसे कहेंगे, "इसीलिए तो हमने इस काम में सावधानी बरती थी", और वे ख़ुश होते हुए वहां से चल देंगे।  (50

कह दें, "हमारे साथ तो बस वही होना है जो अल्लाह ने हमारे बारे में फ़ैसला कर रखा है। वही हमारा मालिक है: ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।" (51

कह दें, "तुम हमारे साथ जिस घटना [यानी, क़त्ल हो जाने] की उम्मीद लगाए बैठे हो, वह हमारे लिए दो सबसे अच्छी चीज़ों (लड़ाई में जीत या शहीद होकर परलोक में मिलने वाले इनाम) को छोड़कर और क्या है? वैसे हम अल्लाह से यह उम्मीद रखते हैं कि वह तुम्हारे ऊपर कोई यातना उतार दे, ऐसा वह चाहे ख़ुद ही करे या फिर हमारे हाथों कराए। अत: अब (नतीजे का) इंतज़ार करो; हम भी (तुम्हारे साथ) इंतज़ार करते हैं।" (52)

कह दें, "(सच्चाई के रास्ते में) तुम चाहे ख़ुशी से दो या मन मारकर दो, तुम जो कुछ भी दोगे, वह स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि तुम आज्ञा माननेवाले लोग नहीं हो।" (53)

जो कुछ भी वे देते हैं, उसे स्वीकार कर लेने में बस एक ही रुकावट है, और वह यह कि वे अल्लाह और उसके रसूल के आदेश को मानने से इंकार करते हैं, नमाज़ पढ़ने आते हैं, तो बड़ी सुस्ती से, और कुछ देते भी हैं, तो बड़े बेमन से।  (54)

अतः (ऐ रसूल!), आप उनके माल और उनके बाल-बच्चों को देखकर प्रभावित न हो जाएं: अल्लाह का इरादा तो यह है कि इन्हीं (माल व औलाद) के द्वारा उन्हें इस दुनिया में सज़ा दे, और (सच्चाई पर) विश्वास न करने [कुफ्र] की हालत में ही उनकी जान निकले। (55)


वे अल्लाह की क़समें खाते हैं कि वे तुम्हीं [ईमानवालों] में से हैं, मगर (असल में) वे तुममें से नहीं हैं। वे बड़े डरपोक व बुज़दिल लोग हैं: (56)

अगर उन्हें कोई छिपने की जगह मिल जाए, या कोई गुफा या कोई ऐसी जगह जहाँ रेंगकर भी घुसा जा सके, तो वे उसकी ओर ऐसे दौड़ पड़ेंगे मानो रस्सी तोड़कर भागे जा रहे हों।  (57)

[ऐ रसूल], उनमें से कुछ लोग, ग़रीबों को दिए जाने वाले माल [ज़कात] के बँटवारे को लेकर आप पर सवाल उठाते हैं: अगर इसमें से उन्हें हिस्सा दे दिया जाता है, तो वे संतुष्ट हो जाते हैं, और अगर न दिया जाए तो भड़क जाते हैं।   (58)

काश कि वे उतने पर ही संतोष कर लेते जितना कि अल्लाह और उसके रसूल ने उन्हें दिया था, औऱ कहते कि "हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है ----- हमें अल्लाह अपने फ़ज़ल से (बहुत कुछ) देगा, और उसका रसूल भी------ (माफ़ी पाने की) उम्मीद में हम तो केवल अल्लाह के ही सामने झुकते हैं।" (तो यह उनके लिए अच्छा होता!) (59)

यह माल (सदक़ा) तो बस ग़रीबों, ज़रूरतमंदों, ऐसे लोग जो इसके वसूली के काम में लगे हों, ऐसे लोग जिनके दिलों को (सच्चाई से) जीतने की ज़रूरत है, ग़ुलामों को आज़ाद करने के लिए और ऐसे लोगों की मदद के लिए जो क़र्ज़ में डूबे हों, अल्लाह के रास्ते में ख़र्च के लिए और ज़रूरतमंद मुसाफ़िरों की मदद के लिए है (जो अपने घर न पहुँच पा रहे हों)। यह अल्लाह का ठहराया हुआ क़ानून है; अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (60)


कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो नबी का यह कहकर अपमान करते हैं, "वह तो (कान के कच्चे हैं) कुछ भी सुन लेंगे।" आप कह दें, "वह तो तुम्हारी ही भलाई के लिए सुनता है: वह अल्लाह पर विश्वास रखता है, ईमानवालों पर भरोसा करता है, और तुममें से जो लोग ईमान रखते हैं, उनके लिए तो वह रहमत है।” जो लोग अल्लाह के रसूल का अपमान करते हैं, उनके लिए दर्दनाक यातना होगी। (61)

(ईमानवालो), वे तुम्हें ख़ुश करने के लिए अल्लाह की क़समें खाते हैं: अगर वे सच्चे ईमानवाले होते, तो उनके लिए ज़्यादा उपयुक्त तो यह होता कि वे अल्लाह और उसके रसूल को मनाने व ख़ुश करने की कोशिश करते। (62)

क्या वे जानते नहीं कि जो कोई अल्लाह औऱ उसके रसूल का विरोध करेगा, वह जहन्नम की आग में जाएगा और वहीं हमेशा रहेगा? यही सबसे बड़ी बेइज़्ज़ती है। (63)


मुनाफ़िक़ों [पाखंडियों] को डर है कि कहीं कोई ऐसी सूरह न उतर जाए जो उनके दिलों के अंदर की छिपी हुई बात को सबके सामने ज़ाहिर कर दे ------ कह दें, "तुम मज़ाक़ उड़ाते रहो: जिस चीज़ का तुम्हें डर है, अल्लाह उसे सामने लाकर रहेगा!"------ (64)

फिर भी अगर आप उनसे पूछते, तो उनका जवाब ज़रूर यही होता, "हम तो बस ऐसे ही बातें कर रहे थे और आपस में हँसी-मज़ाक़ कर रहे थे।" कह दें, "क्या तुम अल्लाह, उसकी उतारी गयी आयतों, और उसके रसूल के बारे में हँसी-मज़ाक़ करते हो? (65

"तुम अपनी तरफ़ से सफ़ाई देने की कोशिश न करो; तुम (सच्चाई पर) विश्वास कर लेने के बाद अब विश्वास करने से इंकार करते हो।" तुममें से कुछ को तो हम माफ़ कर सकते हैं, मगर बाक़ी बचे लोगों को तो हम ज़रूर सज़ा देंगे: वे मुजरिम लोग हैं।" (66

पाखंडी लोग [Hypocrites], चाहे मर्द हों या औरत, सब एक ही तरह के हैं: वे बुरे काम करने का हुक्म देते हैं, और भलाई के काम से रोकते हैं; उन्होंने (सच्चाई के रास्ते में ख़र्च करने से) अपने हाथों की मुठ्ठियाँ बन्द कर रखी हैं। वे अल्लाह को भुला बैठे हैं, सो अल्लाह ने भी उन पर ध्यान देना छोड़ दिया है। मुनाफ़िक़ लोग बड़े ही नाफ़रमान [Disobedient] लोग हैं। (67)

पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग चाहे मर्द हों या औरत, और (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार करने वालों के लिए अल्लाह ने जहन्नम की आग का वादा कर रखा है, जिसमें वे हमेशा के लिए रहेंगे: ये उनके लिए काफ़ी है। अल्लाह ने उन्हें ठुकरा दिया है, और एक कभी न ख़त्म होने वाली यातना उनके इंतज़ार में है।  (68)

"तुम भी उन्हीं की तरह हो, जो तुमसे पहले (यहाँ) रहते थे: वे (ताक़त में) तुमसे कहीं ज़्यादा मज़बूत थे, और धन-दौलत और औलाद में भी तुम से बढ़े हुए थे; उन्होंने भी इस दुनिया में अपने हिस्से की ज़िंदगी का मज़ा उठाया, जैसा कि तुम अभी उठा रहे हो; उनकी ही तरह, तुम भी बेकार बातों में उलझे हुए हो।" उनके किए गए कर्म बेकार चले गए, इस दुनिया में भी और आनेवाली दुनिया में भी; ये वही लोग हैं जो आनेवाली ज़िंदगी में सब कुछ गँवा बैठेंगे।  (69)

क्या उन लोगों ने कभी अपने पूर्वजों की कहानियाँ नहीं सुनीं ---  नूह [Noah] के लोगो की, आद और समूद की, इबराहीम [Abraham] की, मदयनवालों [Midians] की और उन खंडहर बनी बस्तियों की? उनके रसूल उनके पास सच्चाई के स्पष्ट प्रमाण लेकर आए थे: अल्लाह ने उन्हें धोखे में नहीं डाला था, उन्होंने तो ख़ुद अपने आपको धोखा दिया था।  (70)

ईमान रखनेवाले, मर्द और औरत दोनों ही एक दूसरे की मदद करते हैं; वे भलाई के काम करने का हुक्म देते हैं, और बुरे कामों से रोकते हैं; वे पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और निर्धारित ज़कात अदा करते हैं; और वे अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा को मानते हैं। अल्लाह ऐसे लोगों को अपनी रहमत से माफ़ कर देगा: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, बेहद समझ-बूझवाला है।  (71

ईमान रखनेवाले मर्द और औरतों, दोनों से अल्लाह ने (जन्नत के) ऐसे बाग़ों का वादा कर रखा है जिनके नीचे नहरें बहती हैं और जहाँ उन्हें हमेशा के लिए रहना है, सदाबहार आनंद के बाग़ों के बीच अच्छे, सुकून के घरों में; और --- सबसे बढ़कर बात--- अल्लाह की ख़ुशी और रज़ामन्दी के साथ रहेंगे; यही सबसे बड़ी कामयाबी है।  (72)


ऐ नबी! विश्वास करने से इंकार करनेवालों और मुनाफ़िक़ों [पाखंडियों] के ख़िलाफ़ संघर्ष [जिहाद] करें और उनके साथ सख़्ती से पेश आएं। जहन्नम उनका आख़िरी ठिकाना है ----- और क्या ही बुरा ठिकाना है यह! (73)

वे अल्लाह की क़समें खाते हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा, मगर असल में, उन्होंने बेधड़क हुक्म न मानने की बात कही थी, और ईमान लाने व अल्लाह के सामने झुकने के बाद, वे इसके खुले विरोधी बन गए; उन्होंने (रसूल को नुक़सान पहुँचाने की) कोशिश की, हालाँकि वे ऐसा कर नहीं पाए, ----- उनकी ईर्ष्या व बदले का कारण तो बस यह है कि अल्लाह और उसके रसूल ने अपने फ़ज़ल से उन्हें ख़ुशहाल कर दिया। उनके लिए बेहतर यही होगा कि फिर से (अल्लाह के आगे) झुककर तौबा कर लें: अगर वे मुँह मोड़ते हैं, तो अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत [Hereafter] में सज़ा देगा, और धरती पर कोई न होगा जो उन्हें बचा सके या उनकी मदद कर सके।  (74)


उनमें से कुछ लोगों ने अल्लाह के सामने यह कहते हुए वचन दिया था कि, "अगर अल्लाह अपने फ़ज़ल से कुछ हमें देगा, तो हम ज़रूर दान करेंगे, और नेक व अच्छे बनकर रहेंगे",  (75)

मगर जब अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़ल से सचमुच दे दिया, तो वे उसमें कंजूसी करने लगे और अपने वचन से फिर गए।  (76)

क्योंकि उन लोगों ने अल्लाह से किए गए वादे को तोड़ डाला, वह सारे झूठ जो वे बोलते रहे, इन सबके नतीजे में अल्लाह ने उनके दिलों में 'पाखंड' [Hypocrisy] को उस दिन तक के लिए बैठा दिया, जिस दिन कि वे अल्लाह से मिलेंगे।  (77)

क्या वे नहीं समझते कि अल्लाह उनके सारे राज़ और उनकी अकेले में की गयी कानाफूसियों को अच्छी तरह जानता है? और यह कि अल्लाह नज़रों से छिपी हुई [ग़ैब की] सारी बातों को जानता है? (78

ये (मुनाफ़िक़) वही लोग हैं, जो दिल खोलकर दान [सदक़ा] देनेवाले ईमानवालों को भी बुरा-भला कहते हैं, और उनको भी जो बड़ी मुश्किल से (अपनी आमदनी से) थोड़ा दान दे पाते हैं: वे ऐसे लोगों की हँसी उड़ाते हैं, मगर अल्लाह (की तरफ़ से) उनकी हँसी उड़ायी जाती है ------ उनके लिए दर्दनाक यातना तैयार है। (79)

[ऐ रसूल], आप ऐसे लोगों की माफ़ी के लिए दुआ करें या न करें, इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा: अगर आप उनके लिए सत्तर बार भी दुआ करेंगे, तब भी अल्लाह उन्हें माफ़ नहीं करेगा, यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल को मानने से इंकार कर दिया। अल्लाह ऐसे लोगों को सीधा रास्ता नहीं दिखाता जो उससे बग़ावत [rebel] कर बैठते हैं। (80)


अल्लाह के रसूल जब (तबूक की लड़ाई के लिए) निकल पड़े, तो जिन लोगों को (अपने घरों में) रुके रहने के लिए छोड़ दिया गया था, वे वहाँ अपने बैठे रहने पर बड़े ख़ुश थे; वे अल्लाह के रास्ते में अपने माल और जान के साथ संघर्ष [जिहाद] करने के विचार से ही चिढ़ते थे। वे एक दूसरे से कहते थे, "इतनी गर्मी में (युद्ध के लिए) न निकलो।" कह दें, "जहन्नम की आग इससे कहीं अधिक गर्म होगी," काश, कि वे समझ पाते (तो ऐसा न कहते)! (81

उन्हें अभी थोड़ा सा हँसने दो; जो कुछ उन्होंने किया है, उसके बदले में उन्हें बहुत रोना पड़ेगा।  (82)

अत: [ऐ रसूल], अगर अल्लाह आपको ऐसे लोगों के एक समूह के पास फिर से ले आए, जो आपके साथ (युद्ध में) जाने की अनुमति माँगते हों, तो कह देना, "तुम मेरे साथ कभी भी दुश्मनों से लड़ने के लिए नहीं जा सकते हो: तुमने पहली बार (जिस तरह) घर पर बैठे रहने को पसंद किया, तो अब उन्हीं के साथ (घरों में) बैठे रहो जो पीछे रह जाते हैं।" (83)

इन (पाखंडियों) में से अगर कोई मर जाए, तो (ऐ रसूल), इनमें से किसी के लिए आप (जनाज़े की) नमाज़ न पढ़ाएं, और न कभी उसकी क़ब्र पर (दुआ के लिए) खड़े हों: इन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास करने से इंकार कर दिया और मरे इस हाल में कि बाग़ी बने रहे।  (84)

और (देखो), उनके माल और उनकी औलाद तुम्हें मोहित न कर दे: अल्लाह तो यह चाहता है कि इन्हीं चीज़ों के द्वारा उन्हें इस संसार में सज़ा दे और यह कि उनकी जान निकलते समय भी वे (सच्चाई पर) विश्वास करनेवाले न हों।  (85)

जब (क़ुरआन की) कोई सूरह उतरती है (जिसमें कहा जाता है), "अल्लाह पर विश्वास करो और उसके रसूल के साथ मिलकर कड़ा संघर्ष [जिहाद] करो", तो उनके अमीर लोग यह कहते हुए आपसे (जिहाद में न जाने की) अनुमति माँगने लगते हैं कि, "दूसरे लोगों के साथ हमें भी यहीं रुके रहने के लिए छोड़ दिया जाए": (86)

वे इस बात को ज़्यादा पसंद करते हैं कि वे पीछे रुके रह जाने वालों [औरतों व अपाहिजों] के साथ रह जाएँ। (असल में) उनके दिलों को बंद करके ठप्पा लगा दिया गया है: इसलिए वे समझते नहीं हैं।  (87)

मगर, अल्लाह के रसूल और उनके साथ वे जो ईमान रखते हैं, अपने मालों और अपनी जानों के साथ जमकर संघर्ष [जिहाद] करते हैं, तो उन्हीं के लिए सबसे बेहतर चीज़ें होंगी; यही वे लोग हैं जो कामयाब होंगे। (88)

अल्लाह ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं, जिनमें बहती हुई नहरें होंगी और वे हमेशा वहीं रहेंगे। यही सबसे बड़ी जीत है।  (89)


अरब के कुछ देहाती लोग [बद्दू] भी बहाने बनाते हुए आए, कि उन्हें भी (युद्ध में) जाने से छूट मिल जाए। जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल से झूठी बातें बनायीं, वे घरों में ठहरे रहे। उनमें से जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने पर अड़े रहे, उन्हें दर्दनाक सज़ा होगी,  (90)

मगर, जो लोग कमज़ोर हैं, बीमार हैं, या जिनके पास ख़र्च करने का कोई साधन नहीं है, ऐसे लोगों पर कोई दोष न होगा, शर्त यह है कि वे अल्लाह और उसके रसूल के लिए निष्ठा रखते हों ------ जो अच्छा व नेक कर्म करते हैं, तो कोई कारण नहीं कि उन पर दोष लगाया जाए: अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (91)

और उन लोगों पर भी कोई दोष न होगा जो [ऐ रसूल] आपके पास आए थे कि आप उनके (युद्ध में जाने के) लिए कोई सवारी का प्रबन्ध कर देते, जिन्हें आपने कहा था, "तुम्हारी सवारी के लिए अभी मेरे पास कुछ नहीं है": वे दुखी मन से रोते हुए वहाँ से चले गए कि उनके पास देने के लिए कुछ भी न था।  (92)

इल्ज़ाम तो बस उन पर है जो धन-दौलत के होते हुए भी आपसे (युद्ध में जाने से) छुटकारा पाना चाहते थे, और वे पीछे ठहरे हुए लोगों के साथ रुके रहने को प्राथमिकता देते थे। अल्लाह ने उनके दिलों को बंद करके मुहर [seal] लगा दी है: इसलिए वे समझते-बूझते नहीं। (93)


जब तुम (तबूक से युद्ध करके) अपने अभियान से वापस आओगे, तो [ऐ ईमानवालो], वे तुम्हारे पास बार-बार अपने बहानों के साथ आएंगे। तुम कह देना, "बहाने न बनाओ। हम तु्म पर विश्वास नहीं करते: अल्लाह ने हमें तुम्हारे बारे में बता दिया है। अल्लाह और उसके रसूल अब तुम्हारे काम पर नज़र रखेंगे, और अंत में तुम्हें उस हस्ती के पास लौटना होगा, जो हर दिखायी देनेवाली और छिपी चीज़ को जानता है। फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुमने किया होगा।" (94

जब तुम उनके पास वापस आओगे, तो वे तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाएँगे, ताकि तुम उन्हें उनकी हालत पर छोड़ दो ----- सो तुम उन्हें अकेला छोड़ दो: वे घृणा के पात्र हैं, और उनका ठिकाना जहन्नम होगा, जो उनके कर्मों का बदला है -------- (95)

वे तुम्हारे सामने क़समें खाएँगे ताकि तुम उन्हें स्वीकार कर लो, लेकिन (याद रखो!), अगर तुमने उन्हें स्वीकार कर भी लिया, तब भी अल्लाह ऐसे लोगों को नहीं अपनाता जो उससे बग़ावत कर देते हैं। (96)


अरब के देहाती लोग [बद्दू], विश्वास न करने [कुफ़्र] और पाखंड में सबसे ज़्यादा कट्टर हैं। इस बात की संभावना बहुत ही कम है कि अल्लाह ने अपने रसूल पर जो आदेश उतारे हैं, उनकी सीमाओं को वे ठीक ढंग से पहचान पाएंगे। अल्लाह सब (का हाल) जाननेवाला और सब कुछ समझनेवाला है। (97)

उनमें से कुछ अरब के देहाती ऐसे हैं कि वे जो कुछ ख़र्च करते हैं, उसे थोपी हुई चीज़ समझते हैं; वे इस इंतज़ार में हैं कि कब तुम्हारी क़िस्मत ख़राब होती है, मगर क़िस्मत तो असल में उनकी ख़राब होने वाली है। अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ जाननेवाला है।  (98)

मगर अरब के देहातियों में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अल्लाह और अन्तिम दिन [क़यामत] पर विश्वास रखते हैं और जो कुछ (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च करते है, उसे अल्लाह से और नज़दीक होने का, और रसूल की दुआएं हासिल करने का ज़रिया मानते हैं: ये सचमुच उन्हें अल्लाह के और नज़दीक कर देगा, और अल्लाह उन्हें अपनी रहमत में शामिल कर लेगा। अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है। (99)


अल्लाह उन लोगों से बहुत ख़ुश होगा जो (मक्का से मदीना) हिजरत करके सबसे पहले गए [मुहाजिर], और (मदीना के वे लोग) जो उनके मददगार हुए [अंसार], और जो लोग अच्छाई के रास्ते में उनके पीछे-पीछे चले, और (उसी तरह) वे लोग भी अल्लाह से उतने ही ख़ुश होंगे: उसने उनके लिए बहती हुई नहरों के साथ बाग़ [Gardens] तैयार कर रखे हैं, जिसमें उन्हें हमेशा रहना है। यही सबसे बड़ी कामयाबी है।  (100)


तुम्हारे आस-पास बसनेवाले कुछ देहाती लोग पाखंडी [मुनाफ़िक़] हैं, इसी तरह मदीना के भी कुछ लोग हैं ------ वे अपने पाखंड में अड़ियल हैं। [ऐ रसूल], आप उन्हें नहीं जानते, मगर हम उन्हें अच्छी तरह जानते हैं: हम उन्हें दो बार यातना देंगे, और उसके बाद (आख़िरत में) उन्हें दर्दनाक सज़ा का सामना करने के लिए लौटकर आना होगा।  (101)

और कुछ दूसरे लोग हैं जिन्होंने अपने गुनाह करने को क़बूल किया है, उन्होंने कुछ अच्छे कर्म किए हैं और कुछ बुरे कर्म : अल्लाह उनकी तौबा [Repentance] क़बूल कर सकता है, क्योंकि अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और दयावान है।  (102)

[ऐ रसूल], इन लोगों के मन की सफ़ाई और शुद्धि के लिए आप उनकी संपत्तियों में से कुछ तोहफ़े [सदक़ा] स्वीकार कर लें (कि उनमें सुधार हो), और उनके लिए दुआ करें ----- आपकी दुआ उनके दिल को बड़ा सुकून पहुँचाएगी। अल्लाह (दुआएं) सुननेवाला, और सब कुछ जाननेवाला है। (103)

क्या वे जानते नहीं कि वह अल्लाह है जो ख़ुद अपने बंदों की तौबा क़बूल करता है और उसके रास्ते में जो कुछ खुले दिल से दिया जाता है, उसे स्वीकार करता है? वह हमेशा (दिल से की गयी) तौबा को क़बूल करने के लिए तैयार रहता है, वह बेहद दयावान है।  (104)

[ऐ रसूल!] कह दें, "कर्म किए जाओ! अल्लाह तुम्हारे कर्मों को देखेगा ------  उसका रसूल और ईमानवाले भी तुम्हारे कर्मों को देखेंगे------ फिर तुम लौटकर उसके पास जाओगे, जो हर दिखनेवाली और छिपी चीज़ को जानता है, और वह सब बता देगा जो कुछ तुम करते रहे हो।" (105)

और कुछ दूसरे लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह के फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे हैं, चाहे वह उन्हें सज़ा दे या उन पर दया कर दे। अल्लाह सब जाननेवाला, बहुत समझ-बूझवाला रखनेवाला है। (106)


और (मुनाफ़िक़ों में) कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने एक मस्जिद बनायी थी ------ इस विचार से कि नुक़सान पहुँचाएं, अविश्वास बढ़ाएं, और ईमानवालों के बीच फूट डालें -----वह उन लोगों के लिए एक 'निगरानी-चौकी' के रूप में हो, जो पहले अल्लाह और उसके रसूल से लड़ाइयाँ लड़ चुके हों: वे इस तरह क़समें खाएँगे कि "हमने तो बस अच्छा ही चाहा था," मगर अल्लाह गवाही देता है कि वे बिल्कुल झूठे हैं।  (107)

[ऐ रसूल!] आप कभी भी उस मस्जिद में (नमाज़ पढ़ने के लिए) खड़े न हों। बल्कि आपको ऐसी ही मस्जिद में नमाज़ पढ़ना चाहिए, जिसकी बुनियाद पहले दिन से ही अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचने के इरादे से रखी गयी थी: इस मस्जिद में ऐसे लोग आते हैं, जो (अपने मन की) सफ़ाई को और बढ़ाना चाहते हैं------ अल्लाह ऐसे लोगों को पसन्द करता है जो अपने आपको शुद्ध [purify] करना चाहते हैं।  (108)

अब बताओ कौन अच्छा हुआ, वह जो अपनी इमारत की बुनियाद अल्लाह से डरते हुए और उसकी ख़ुशी हासिल करने के इरादे से रखता है, या वह जिसने अपनी इमारत की बुनियाद किसी खाई के टूटते हुए किनारे पर रखी हो, फिर वह उसे लिए-दिए लुढ़कती हुई जहन्नम की आग में जा गिरे? अल्लाह शैतानी करने वालों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता:  (109

जो इमारत इन लोगों ने बनायी है, वह हमेशा उनके दिलों के अंदर उस समय तक संदेह पैदा करती रहेगी, जब तक कि उनके दिल ही टुकड़े-टुकड़े न हो जाएँ। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, और (हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।  (110)


अल्लाह ने जन्नत [Garden] के बदले में, ईमानवालों से उनकी जान और उनके माल ख़रीद लिए हैं ------ वे अल्लाह के रास्ते में लड़ते हैं: वे जान मारते भी हैं, और मारे भी जाते हैं---- यह अल्लाह का किया हुआ एक पक्का वादा है जो तौरात [Torah], इंजील [Gospel] और क़ुरआन में मौजूद है। अल्लाह से बढ़कर अपने वादे को पूरा करनेवाला कौन हो सकता है? अतः जो सौदा तुमने उससे किया है, उस पर खु़शियाँ मनाओ: यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (111)

(ईमानवाले वो हैं), जो (गुनाहों से) तौबा के लिए अल्लाह के सामने झुकते हैं; उसकी बन्दगी और उसका (दिन-रात) गुणगान करते हैं; जो (सच की खोज में) घूमते रहते हैं; जो रुकू और सज्दे में (अल्लाह के आगे) अपने आपको झुकाते हैं; जो अच्छा काम करने का हुक्म देते हैं, और बुरे काम से रोकते हैं और अल्लाह की तय की हुई सीमाओं की निगरानी करते हैं। ऐसे ईमानवालों को ख़ुशख़बरी सुना दें।  (112)


यह बात नबी [Prophet] और ईमान रखनेवालों के लिए उचित नहीं कि वे बहुदेववादियों [Idolaters] के लिए माफ़ी की दुआ करें ----- चाहे वे उनके नातेदार ही क्यों न हो ---- जबकि उनपर यह बात खुल चुकी है कि वे (जहन्नम की) भड़कती आग में रहने वाले हैं:  (113)

इबराहीम ने अपने बाबा की माफ़ी के लिए जो दुआ की थी, वह इस कारण से थी कि उन्होंने अपने बाप से एक वादा कर लिया था, मगर एक बार जब उनकी समझ में आ गया कि उनके बाप अल्लाह (की सच्चाई) के दुश्मन हैं, तो फिर वह उनसे अलग हो गए। असल में, इबराहीम बड़े ही नर्म दिल, और बहुत सहनशील थे।  (114

अल्लाह ऐसा नहीं है कि लोगों को (ईमान का) सही रास्ता दिखा देने के बाद उन्हें भटकता छोड़ दे, जब तक कि वह उन्हें पूरी तरह साफ़-साफ़ बता न दे कि उन्हें किन चीज़ों से बचना चाहिए। अल्लाह के पास हर चीज़ की जानकारी है;  (115

आसमानों और ज़मीन का नियंत्रण [बादशाही] अल्लाह के ही पास है; वही है जो ज़िंदगी और मौत देता है; उसके सिवा तुम्हारा कोई दोस्त और मददगार नहीं है। (116)


अल्लाह ने अपने नबी [Prophet] पर और मुहाजिरों [Emigrants] और अंसार [Helpers] पर अपनी रहमत व ख़ास दया दृष्टि डाली, जिन्होंने ऐसी मुश्किल घड़ी में (तबूक के अभियान में नबी का) साथ दिया, जबकि उनमें से कुछ के दिल क़रीब-क़रीब डगमगा गए थे: फिर अल्लाह ने (माफ़ करते हुए) उनके हाल पर रहम किया; सचमुच वह उनके लिए बेहद उदार और मेहरबान था।  (117)

और वे तीन आदमी जो (घर पर) रुके रह गए थे: जब ज़मीन अपने पूरे फैलाव के बावजूद उन पर तंग हो गई थी, और जब वे ख़ुद अपनी जानों से तंग आ गए थे, और जब उन्हें समझ आ गया कि अल्लाह (की पकड़) से बचने के लिए उसकी शरण के सिवा कहीं कोई शरण नहीं मिल सकती है, फिर अल्लाह ने उन पर अपनी रहमत [Mercy] दिखायी, ताकि वे (उसकी ओर तौबा करते हुए) लौट आएँ। सचमुच अल्लाह हमेशा ग़लतियों को माफ़ करनेवाला, बेहद मेहरबान है।  (118)


ऐ ईमानवालो!, तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो: और सच्चे लोगों के साथ हो जाओ।  (119)

मदीना के लोगों और उसके आसपास बसने वाले देहाती लोगों को अल्लाह के रसूल का साथ देने से अपने आपको न तो रोकना चाहिए था, और न ही उन्हें उस (रसूल) की जान से ज़्यादा अपनी जान की फ़िक्र करनी चाहिए थी: अल्लाह के रास्ते में (लड़ने वालों को) जब कभी प्यास लगती है, थकान होती है, या भूख सताती है, या जब वे कोई ऐसा क़दम उठाते हैं जिससे काफ़िरों का क्रोध भड़के, या किसी दुश्मन को कोई नुक़सान पहुँचाते हैं, तो ऐसे हर काम पर उनके कर्म-खाते में नेकी लिख ली जाती है----- अच्छा कर्म करने का बदला [reward], अल्लाह कभी बेकार नहीं जाने देता ------  (120)

अल्लाह के रास्ते में चाहे वे थो़ड़ा ख़र्च करें या ज़्यादा, या किसी पहाड़ की घाटी को पार कर लें, ये सारी चीज़े उनके हिसाब में लिख ली जाती हैं, ताकि अल्लाह उन्हें हर ऐसे काम का इनाम दे जो उनके बेहतरीन कर्मों के लिए तय है।  (121)


हाँ, यह बात ठीक नहीं होगी कि सब के सब ईमानवाले एक साथ (युद्ध के लिए) निकल खड़े हों: हर एक समुदाय [Group] में से लोगों का एक दल होना चाहिए जो बाहर निकलकर दीन [Religion] की सही समझ हासिल करे, ताकि वह अपने लोगों को सिखा सके जब वे (युद्ध से) लौटकर आएं और ताकि वे अपने आपको बुरे कामों से बचा सकें।  (122)

ऐ ईमानवालो! तुम उन विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] से लड़ो जो तुम्हारे आसपास फैले हुए हैं, और उन्हें लगना चाहिए कि तुम (जंग के लिए) मज़बूती से खड़े हो: यह जान लो कि अल्लाह उन लोगों के साथ होता है जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।  (123


जब भी कोई सूरह (अल्लाह की तरफ़ से) उतारी गई, तो उन (पाखंडियों) में से कुछ लोग कहते हैं, "क्या तुममें से किसी के भी ईमान में इससे मज़बूती आयी है?" निश्चय ही इससे विश्वास रखनेवालों [मोमिनों] का ईमान और भी मज़बूत हो जाता है, और वे (नये संदेश के आने की) ख़ुशियाँ मनाने लगते हैं,  (124)

रहे वे लोग जिनके दिलों में (ग़लती पर अड़े रहने का) रोग है, तो हर नई सूरह उनके इस अड़ियल रोग को और ज़्यादा बढ़ा देती है। (नतीजा यह है कि) वे विश्वास नहीं करते और इसी हाल में मर जाते हैं। (125)

क्या वे देखते नहीं कि हर साल वॆ एक या दो बार किसी न किसी आज़माईश [Test] में डाले जाते हैं? फिर भी न तो वे (गुनाहों से) तौबा करते हैं, और न कुछ सबक़ सीखते हैं।  (126)

जब कभी कोई सूरह उतरती [reveal] है, (और उसमें अगर पाखंडियों का ज़िक्र हो) तो वे (चौंककर) एक-दूसरे को देखते हैं, और (इशारों में) कहते हैं, "तुम्हें कोई देख तो नहीं रहा है?" और फिर वहाँ से (मुँह फेरकर) चल देते हैं---- अल्लाह ने उनके दिल फेर दिए हैं, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो समझ-बूझ से काम नहीं लेते।  (127)


[लोगो!] तुम्हारे पास (अल्लाह का) एक रसूल आ गया है, जो तुम्हीं लोगों में से है। तुम्हारी तकलीफ़ें उसे बहुत दुखी कर देती हैं: वह तुम्हारी भलाई की ही चिंता में लगा रहता है, और ईमानवालों के प्रति वह बहुत नर्म दिल और बेहद मेहरबान है।  (128)

अगर फिर भी ये लोग मुँह मोड़ें, तो [ऐ रसूल!], आप कह दें, "मेरे लिए अल्लाह का सहारा काफ़ी है: उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं; उसी पर मैंने भरोसा किया है; वह बड़े महान सिंहासन [अर्श/Throne] का मालिक है।" (129)







नोट:

1-4: इस आयत की पृष्टभूमि को समझने की ज़रूरत है। हिजरी/ 628 ई में मुहम्मद (सल्ल) अपने साथियों के साथ छोटे हज [उमरा] के लिए शांतिपूर्ण तरीक़े से मदीना से मक्का के लिए निकलेमगर उन लोगों को मक्का से थोड़ा पहले हुदैबिया नामक जगह पर रुकना पड़ामक्का के सरदारों से मुसलमानों की बड़ी लम्बी बातचीत चलती रहीफिर यह तय हुआ कि मुसलमानों को इस बार बिना हज किए लौटना होगा और वे अगले साल आकर मक्का में हज कर सकते हैं। अंत में दोनों पक्षों के बीच 10 साल के लिए "हुदैबिया की संधिहुई जिसकी कुछ शर्तें मुसलमानों के लिए फ़ायदेमंद नहीं दिखती थींमगर मुहम्मद (सल्ल) ने शांति व अमन की बहाली के लिए उन शर्तों को मान लिया। इसकी एक शर्त यह थी कि कोई भी क़बीला अगर चाहे तो वह मुसलमानों का साथी व सहयोगी हो सकता है और इसी तरह कोई भी क़बीला मक्का के बहुदेववादियों का भी सहयोगी हो सकता हैतो जिस तरह दोनों पक्ष एक दूसरे के ख़िलाफ़ युद्ध नहीं करेंगेउसी तरह उनके सहयोगियों पर भी हमला नहीं करेंगेमगर हुआ यूँ कि इस संधि के दो साल के अंदर ही मक्का के बहुदेववादियों ने संधि की शर्त तोड़ डाली जबकि उन लोगों ने क़बीला बनु बक्र को आदमी व हथियार दिए ताकि वे बनु ख़ुज़ा पर हमला कर सकेंबनु ख़ुज़ा मुसलमानों के सहयोगी थेफिर उन लोगों पर हमला कर दिया गयायहाँ तक कि बनु ख़ुज़ा के कुछ लोगों ने काबा के परिसर में शरण [पनाह] माँगी थीइसके बावजूद उन लोगों को वहाँ क़त्ल किया गयाउसमें से कुछ लोग बड़ी मुश्किल से जान बचाकर मदीना पहुँचे और वहाँ का हाल सुनाया। इसी के नतीजे में मदीना के मुसलमानों ने मक्का पर हिजरी/ 630 ई में हमला कर दियाऔर बिना कुछ ख़ास ख़ून बहाए हुए मक्का को जीत लियामक्का की जीत के बाद वहाँ के बहुत सारे बहुदेववादियों ने इस्लाम अपना लियामगर बहुत सारे अपने दीन पर ही टिके रहे। 

हिजरी में मुसलमानों की बहुत बड़ी फ़ौज मदीना से उत्तर की तरफ़ सीरिया जाने वाले रास्ते पर स्थित "तबूकके अभियान पर गईवहाँ से ख़बर मिली थी कि बाइज़ेंटाइनी फौज मदीना पर हमला करने के लिए बढ़ रही है। चूँकि इस बार मुक़ाबला बहुत मज़बूत सेना से थाइसलिए ऐसे कई बहुदेववादी क़बीले जिन्होंने मुसलमानों के साथ शांति संधि कर रखी थीउन लोगों ने संधि की शर्तों को तोड़ना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें यह विश्वास था कि इस बार मुसलमानों की सेना बुरी तरह हारकर तबाह हो जाएगीउधर जब मुस्लिम सेना तबूक पहुँची तो वहाँ पता चला कि बाइज़ेंटाइनी सेना के हमला किए जाने की ख़बर सही नहीं थीसो वे लोग बिना लड़े ही वापस मदीना लौट आए। उसी साल कुछ समय बाद हज़रत अबु बक्र (रज़ि) की अगुवाई में मदीना के लोगों को हज के मौक़े पर मक्का भेजा गयाइसके तुरंत बाद ही इस सूरह का शुरुआती हिस्सा [1--5] उतरा।

इसके तुरंत बाद मुहम्मद (सल्ल) ने हज़रत अली (रज़ि) को हज पर गए दल के पास भेजा ताकि वह हज के दिन सब हाजियों के सामने यानी ईमानवालों और मुशरिकों के सामने एक ख़ास घोषणा कर दें जैसाकि आयत में आया हैउन्होंने घोषणा की: 1. इस बार के बाद अगले साल से बहुदेववादियों [मुशरिकों] को हज करने की अनुमति नहीं होगी, 2. किसी को भी काबा के गिर्द नंगे होकर चक्कर लगाने [तवाफ़] नहीं दिया जाएगा, 3. केवल सच्चाई पर विश्वास करनेवाले ही जन्नत में जाएंगेऔर 4. कोई भी संधि जितनी अवधि [मियाद] के लिए की गई होउसे हर हाल में मानना चाहिए। हज़रत अली की घोषणा सुनने के बाद मुशरिकों के सरदार ने अली (रज़ि) से कहा, "अपने भाई से कह देना कि हमने संधि तोड़ दी हैऔर अब हमारे और उनके बीच सिवाय छुरा घोंपने और तलवार चलाने के कुछ नहीं बचा।

5: यह एक बहुत ही मशहूर आयत हैजिसे कुछ लोग “Sword Verse” यानी तलवार वाली आयत के नाम से भी जानते हैं। इस आयत को अक्सर उसके संदर्भ से अलग हटाकर देखा गया हैऔर अलग-अलग लोगों ने अपने-अपने हिसाब से उसके ग़लत मतलब निकाले हैंइसमें इस्लाम के ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा करने वाले भी हैंमुसलमानों के कट्टरवादी विचारों के लोग भी हैं और साथ में आतंकवादी भी शामिल हैं। 

"जब चार महीने की मुहलत समाप्त हो जाए तो मुशरिकों [बहुदेववादियों] से जहाँ सामना हो जाएउनका क़त्ल करो......"इस आयत को इस तरह पेश किया जाता है कि जैसे यह आदेश दुनिया-भर के मुशरिकों के लिए है और हर दौर के लिए है कि मुसलमानों को चाहिए कि जहाँ उन्हें देखें उनका क़त्ल करें!! ज़ाहिर है कि इस तरह का मतलब निकालना बेबुनियाद है। सही बात तो यह है कि इस सूरह का पहला हिस्सा आयत 1- 28 तक है जो एक दूसरे से जुड़ा हुआ हैऔर इसे असल संदर्भ से अलग करके नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

अत: चार महीने की नोटिस समाप्त हो जाने के बादयहाँ मक्का के केवल उन मुशरिकों के ख़िलाफ कार्र्वाई करने को कहा गया है जिन्होंने संधि की शर्तों को तोड़ डाला और मुसलमानों के विरुद्ध किसी की मदद की। इस आदेश में वे मुशरिक शामिल नहीं हैं जिन्होंने ऐसा काम नहीं किया (9:4), और वे भी शामिल नहीं हैं जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) से शरण माँगी है ताकि वे क़ुरआन को समझ सकें (9:6). 

एक और ध्यान देने की बात है कि यहाँ क़त्ल करने के अलावा गिरफ़्तार करनेघेराबंदी करने और उनकी ताक में बठने को भी कहा गया हैमगर लोगों ने केवल क़त्ल किए जाने पर ही ज़ोर दिया हैज़ाहिर है कि अगर सबको क़त्ल करना होतो फिर गिरफ़्तार या घेराबंदी किसकी होगीपढ़ने से साफ़ स्पष्ट है कि यहाँ उन मुशरिकों के ख़िलाफ़ चार तरह की सज़ा देने का विकल्प [option] दिया गया है। ग़लत अनुवाद से भी मतलब कुछ का कुछ हो जाता है। इस आयत का सही मतलब यह है कि चार महीने की नोटिस अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी अगर कुछ मुशरिक वहाँ हैं तो मतलब यह हुआ कि वे युद्ध के लिए तैयार हैंतो फिर यह अनुमति दी जाती है कि उन्हें काबा के परिसर के अंदर या बाहर जहाँ देखो या तो उन्हें क़त्ल कर दोया उन्हें गिरफ़्तार कर लोया उनकी घेराबंदी कर लो ताकि वे काबा या मुस्लिम इलाक़ों में न जाने पाएं और निगरानी चौकियों पर उनकी ताक में बैठो ताकि उन्हें आने से रोक सको। फिर उनमें से कुछ मुशरिक अगर यह कहते हैं उन्होंने ग़लतियों से तौबा कर लीऔर वे नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात [टैक्स] देते हैंतो उनके पीछे न पड़ोबल्कि उन्हें माफ़ कर दो भले ही पहले उन्होंने तुम्हारे साथ ज़ुल्म किए थे। इस बात को आयत 11 में भी कहा गया है कि ऐसे लोग ईमान में तुम्हारे भाई हैं।

6: पिछली आयत का कुछ लोगों ने जो यह मतलब निकाला है कि "इन मुशरिकों को क़त्ल करो जब तक कि वे मुसलमान न बन जाएं", वह यहाँ ग़लत साबित होता है क्योंकि अगली ही आयत में मुहम्मद (सल्ल) से कहा जा रहा है कि जो कोई भी मुशरिक [idolater] अगर आपसे शरण [पनाह] माँगेउसे शरण दे दें ताकि वह अल्लाह के संदेश को ठीक ढंग से समझ सके और फिर उसको ऐसी जगह पहुँचा दिया जाए जो उसके लिए सुरक्षित होयहाँ मुशरिकों को मुसलमान बन जाने की शर्त नहीं लगाई गई है।  

7: यहाँ फिर ज़ोर दिया गया है कि जिन मुशरिकों के साथ पवित्र मस्जिद के नज़दीक यानी "हुदैबियामें संधि (628 ई.) हुई थीअगर वे उसकी शर्तों को नहीं तोड़ते हैंतो मुसलमानों को भी चाहिए कि उसकी शर्तों पर क़ायम रहें। 

11: आयत 10 में बताया गया कि ये ऐसे लोग हैं जो न तो रिश्ते-नाते का मान रखते हैं और न ही किसी संधि का और ये हमेशा आक्रामक रवैया अपनाते हैंइसके बावजूद अगर ये अपनी ग़लतियों की तौबा कर लेंनमाज़ पढ़ें और निर्धारित ज़कात देंतो वे मुसलमानों के दीनी भाई हो जाएंगेइस तरह यहाँ मुसलमानों को इनसे दुशमनी करने या बदला लेने से फिर से रोका गया है। 

12: यहाँ उन लोगों से युद्ध करने की फिर से अनुमति दी गई हैमगर इसलिए नहीं कि उन्होंने तौबा नहीं की या नमाज़ नहीं पढ़ी या ज़कात नहीं दियाबल्कि इसलिए कि उन्होंने अपने दिए हुए वचन तोड़ डाले और मुसलमानों के दीन को बुरा भला कहा। यहाँ अधर्म के सरदारों से साफ़ तौर से युद्ध करने को कहा गया है जिन्होंने अपनी ग़लतियों की तौबा करने के बाद भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुश्मनी भड़काने का काम किया। 

13: आयत 9:5 में मारने का हुक्म नहीं दिया गयाबल्कि इजाज़त दी गई थीलेकिन अगर ऐसी ज़रूरत आ पड़े कि अपनी और दूसरों की रक्षा के लिए लड़ना पड़ेतब ऐसी हालत में यह अहम था कि मुसलमान लड़ने से पीछे नहीं हटें। मुस्लिम समुदाय में कुछ नये-नये मुस्लिम भी शामिल थेजिनका ईमान उतना मज़बूत नहीं थाउन्हें जो हुक्म मिलताउसे बेझिझक कर गुज़रने की उनमें वैसी लगन नहीं थीफिर कुछ पाखंडी लोग भी थे जो मुस्लिम होने का ढोंग करते थे। इस आयत से पता चलता है कि मुस्लिम समुदाय में कुछ ऐसे लोग थे जो 9:5 में दिए गए आदेश का पालन करने में कतराते थेइसीलिए यहाँ उन्हें ज़ुल्म करने वालों और प्रतिज्ञा तोड़ने वालों से बेझिझक लड़ने पर ज़ोर दिया गया है। 

16: यहाँ वैसे मुसलमानों की तरफ़ शायद इशारा है जो मक्का के जीत के बाद नये-नये मुस्लिम हुए थे। इसे भी देखें 29: 2

17: मक्का के मुशरिकीन [विश्वास न करने वाले] इस बात पर फ़ख़्र करते थे कि वे काबा परिसर की देखभाल और रख-रखाव करते हैंऔर हाजियों के लिए पीने के पानी का इंतिज़ाम करते हैंइसलिए उनका दर्जा ईमानवालों से बड़ा है। लेकिन अल्लाह ने बता दिया कि ईमानवालों से उनकी कोई तुलना नहीं की जा सकती। 

23: अगर बाप और भाई 'दीनके ज़रूरी काम में रुकावट बन रहे होंतो उनके साथ कोई गठबंधन नहीं रखना चाहिए। लेकिन बाप-भाई होने के नाते उनके साथ अच्छा सलूक करना ज़रूरी है। देखें 31:15; 60: 8.

25: "हुनैन की जंगमक्का की जीत (630 ई) के कुछ ही दिन बाद हुई थी, जबकि अरब के ज़्यादातर क़बीलों ने मुहम्मद (सल्ल) से संधि कर ली थी। मगर मक्का के दक्षिण-पश्चिम में स्थित तायफ़ शहर के आसपास 'हवाज़िन' के क़बीले ने 'सक़ीफक़बीले के साथ मिलकर क़रीब 25,000 लोगों की बड़ी फ़ौज इकट्ठा कर ली थीमक़सद मुसलमानों की बढ़ती ताक़त को कुचल डालना था। मुक़ाबले के लिए मुसलमानों की फ़ौज में भी क़रीब 12-13 हज़ार लोग जमा हुए जो इनकी अभी तक की सबसे बड़ी फ़ौज थीइस पर कुछ मुसलमानों ने कहा कि "इतनी बड़ी फ़ौज के रहते हम हार ही नहीं सकते।मक्का और तायफ़ के बीच "हुनैन" की घाटी में जब दोनों फ़ौजें आमने-सामने हुईं तो शुरुआत में जबकि मुस्लिम सेना एक संकरी घाटी से गुज़र रही थीहवाज़िन वालों ने इस ज़ोर का हमला किया कि मुसलमानों के पाँव उखड़ गए और फौज की एक टुकड़ी को पीछे हटना पड़ाफिर बड़ी मुश्किल से तितत-बितर फ़ौज ने अपने आपको दोबारा संभाला और फिर बड़े ज़ोर का हमला कियातब जाकर अल्लाह ने उन्हें जीत दिलाईनतीजे में मुसलमानों को ढेर सारा लूट का सामान हासिल हुआ।  

27: अल्लाह जिसे चाहे उसको गुनाहों से तौबा करने की तौफ़ीक़ दे देता हैअत: ऐसा ही हुआ कि हुनैन की जंग में जिस जोश से 'हवाज़िन' और 'सक़ीफ़' क़बीले के लोग लड़ेहार जाने के बाद उनमें बहुत सारे लोग गुनाहों से तौबा करते हुए मुसलमान हो गए। 

28: बुतों की पूजा करने के कारण उन्हें "अपवित्र" कहा गया है......सच्चाई पर विश्वास करने से इंकार करने वालों को अगले साल से पवित्र मस्जिद [काबा] के नज़दीक आने से मना कर दिया गयाइसका मतलब यह भी हुआ कि उन्हें अगले साल से हज करने की भी रोक लगा दी गई। विद्वानों का कहना है कि यह रोक वहाँ जाकर केवल पूजा-पाठ करने पर लगाई गई थी, लेकिन अगर कोई किसी और ज़रूरत से जाना चाहेतो जा सकता थाजैसे कई मौक़े पर मुहम्मद (सल्ल) ने विश्वास न करने वालों को मस्जिद ए नबवी में जाने की इजाज़त दी थी। 

29:  यहाँ "किताबवालोंयानी यहूदियों और ईसाइयों से लड़ने की बात कही जा रही है जो (अल्लाह और अंतिम दिन पर) विश्वास नहीं रखतेमगर देखा जाए तो सभी किताबवाले अल्लाह और अंतिम दिन [क़यामत] पर विश्वास रखते हैं। असल में यहाँ यहूदियों और ईसाइयों में से उन लोगों के बारे में कहा जा रहा है जो सच्चे दिल से विश्वास नहीं रखतेक्योंकि वे उन चीज़ों से लोगों को नहीं रोकते जिनसे अल्लाह और उनके रसूल ने (तौरात और इंजील में) रोका थाऔर वे इंसाफ़ के नियमों का भी पालन नहीं करते। असल में मुसलमानों और किताबवालों के बीच एक समझौता हुआ था कि वे हुकूमत को जज़िया अदा करेंगे जिसे उन लोगों ने देना बंद कर दिया थाइसलिए यहाँ कहने का मतलब यह है कि उनकी किताबों में समझौता तोड़ने से मना किया गया है और साथ में किसी का अगर बक़ाया है तो उसे देने के लिए ज़ोर दिया गया हैमगर ये लोग इंसाफ़ के इन नियमों का पालन नहीं कर रहे हैंइसीलिए ऐसे लोगों से भी उस समय तक लड़ने का हुक्म दिया गया है जब तक कि जिस टैक्स को देने के लिए ये लोग पहले तैयार थे वह अदा न कर दें और आगे देने के लिए तैयार न हो जाएं।

"जज़ियाएक टैक्स है जो मुस्लिम रियासत में ऐसे ग़ैर मुस्लिम लोगों से लिया जाता है जो लड़ने की सलाहियत रखते होंअत: औरतोंबच्चोंबूढ़ोंसाधुओंपुजारियों आदि से यह टैक्स नहीं लिया जाता। यह असल में हुकूमत की तरफ़ से उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने के बदले में होता है जिसके साथ एक शहरी होने के नाते सारी सुख-सुविधा दी जाती हैऔर युद्ध में भाग लेने से छूट भी मिलती है। यह क़रीब सालाना 1 दिनार (4.25 ग्राम सोना) के बराबर था। इसी तरह मुसलमानों से "ज़कात" (साल भर की बचत का 2.5%) वसूल किया जाता है जो ग़ैर-मुस्लिमों से नहीं लिया जाता। अक्सर "जज़ियाकी निंदा करने वाले इस बात को छिपाते हैं।

30: हज़रत उज़ैर [Ezra]  को अरब में रहने वाले कुछ यहूदी अल्लाह का बेटा मानते थेहालाँकि सब यहूदी ऐसा नहीं मानते थे।..... यहाँ कहा गया है कि कुछ यहूदी और ईसाई भी वैसी ही बात दोहराते हैं जो विश्वास न करने वाले [काफिर] लोगों की मान्यता थीजैसे कि "फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं।

31: धर्म-गुरुओं और महात्माओं को अपना रब बना लेने से मतलब यह है कि उन ईसाइयों और यहूदियों ने उन्हें यह अधिकार दे रखे थे कि वे तौरात या बाइबल के हुक्म के बजाय अपने मन से किसी चीज़ को हराम [अवैध] या हलाल [वैध] ठहरा देते थे। 

34: कुछ धर्म-गुरू और संत-महात्मा ऐसे थे जो लोगों से माल हड़प लेते और मन-मर्ज़ी के नियम-क़ायदे बना लेते जिससे वे लोगों को सही रास्ते से भटका देते थे। 

36 /37: बहुत पुराने ज़माने से अरबों में चाँद के कैलेंडर के हिसाब से चार (4) महीने "आदर के महीनेमाने जाते थेऔर उन महीनों में लड़ाई करना हराम [अवैध] था सिवाय अपने बचाव में (2: 194), ये चार महीने थे: ज़ुल-क़ादाज़ुल-हिज्जामुहर्र्म और रजब जो कि कैलेंडर के मुताबिक़ लगातार 11वाँ, 12वाँऔर पहला महीना था और एक 7वाँ महीना था। धीरे-धीरे अरब के लोगों को तीन महीने लगातार मार-पीट पर अंकुश रखना मुश्किल लगने लगा तो उन लोगों ने इसका रास्ता इस तरह निकाला कि कभी मुहर्र्म के महीने में लड़ाई करना पड़ेतो उसको एक महीना आगे बढ़ा देते और अगले महीने को आदर का महीना बना लेते थे। उसी तरहचूँकि हज का महीना अलग-अलग मौसमों में पड़ता हैतो जो जिस साल हज का महीना व्यापार के हिसाब से ठीक समय पर नहीं पड़ताउस साल इसका क्रम भी बदल डालते थे। कुछ विद्वान मानते हैं कि चूँकि चाँद वाला कैलेंडर 11/12 दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर से कम होता है जिसके चलते हज या रमज़ान अलग-अलग मौसमों में पड़ता हैइसलिए उसे ठीक करने के लिए वे समय-समय पर कुछ दिन जोड़ देते थे। 

38: उस समय रोमन साम्राज्य [बाइज़ेंटाइन] और फ़ारस की ससानी हुकूमत दो महाशक्तियाँ थीं। जब मुसलमानों को यह ख़बर मिली कि रोमन सेना मदीना पर हमला करने की तैयारियाँ कर रही है, तब मुहम्मद(सल्ल) ने आगे बढ़कर तबूक पर हमला करने की ठानी, और क़रीब 30,000 की फ़ौज इकट्ठा की। मक्का और हुनैन की जीत के बाद हिजरी/ 631 ई. में मदीना से मुसलमानों की सेना जब "तबूकके अभियान पर जा रही थीउस समय जो लोग इस अभियान में बहाने बनाकर नहीं गएयह आयत उनके बारे में है। 

विद्वानों के अनुसार कुछ क़बीले मुहम्मद (सल्ल) के साथ इस अभियान पर नहीं जाना चाहते थेइसके उन्होंने कई कारण बताए हैं:  सख़्त गर्मी का मौसमबहुत लम्बी (800 मील) यात्रासाधन जुटाने के लिए धन की कमी और सबसे बड़ी बात बाइज़ेंटाइन रोमियों की मज़बूत सेना से टक्करऔर उस पर अभी तक खजूरों की फ़सल तैयार भी नहीं हुई थी जो कि उनकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी। इतने मुश्किल अभियान में भी ज़्यादातर मुसलमान आम तौर से जाने के लिए तैयार हो गए थे, कुछ 10 लोग ही ऐसे थे जो नहीं गएमगर पाखंडियों ने नहीं जाने के तरह-तरह के बहाने बनाए और मुहम्मद (सल्ल) से इसके लिए इजाज़त ली जिसका ज़िक्र आगे किया गया है। हालाँकि जब ये लोग वहाँ पहुँचे, तब तक रोमन सेना तबूक से जा चुकी थी और जंग नहीं हुई और मुसलमान वहाँ से मदीना आराम से वापस लौट आए और पूरे अरब में वे एक नई शक्ति बनकर उभरे। 

40: यह मक्का से मदीना हिजरत करने की घटना की तरफ़ इशारा हैजब मुहम्मद (सल्ल) के साथ हज़रत अबु बक्र (रज़ि) एक गुफा में छुपे हुए थे और अल्लाह की मदद से दुश्मनों से बचने में कामयाब हुए थे।  

48: उदाहरण के लिए पाखंडियों का एक समूह उहुद की जंग के समय मुस्लिम फ़ौज के साथ गया, मगर अंत में फ़ैसला किया कि उन्हें जंग नहीं लड़नी है, और वे सब मैदान छोड़कर चले गए। .....यहाँ शायद मक्का की जीत और उसके बाद हुनैन की जंग में जीत की तरफ़ इशारा है कि पाखंडियों की कोशिशों के बावजूद सच्चाई की जीत हुई।

49: बताया जाता है कि एक पाखंडी जिसका नाम जद्द इब्ने क़ैस था, उसने मुहम्मद (सल्ल) से तबूक की जंग में न जाने की छूट माँगी, और कारण यह बताया कि औरतें उसकी बहुत बड़ी कमज़ोरी रही हैं, और उसे यह डर है कि अगर वह गया, तो वहाँ की रोमन औरतों को देखकर कहीं वह पूरी तरह बहक न जाए। 

56: पाखंडी लोग असल में डरपोक थेइसलिए वे अल्लाह की राह में लड़ना नहीं चाहते थे।

60: यहाँ बताया गया है कि निर्धारित ज़कात किस-किस को दी जा सकती हैं। यहाँ आठ (8) क़िस्म के लोग बताए गए हैं जिनमें ज़कात की रक़म को बाँटना चाहिए: 

(i) ऐसे ग़रीब जिनकी रोज़ के खाने-पीने की ज़रूरतें भी पूरी न होती हों [फ़क़ीर], (ii) ऐसे ज़रूरतमंद लोग जिनका रोज़ का खाना-पीना तो हो जाता है मगर अगले हफ़्ते क्या होगा मालूम नहीं होता [मिस्कीन], (iii) ऐसे लोग जो ज़कात की रक़म वसूल करने और बाँटने की व्यवस्था  में लगे रहते हैं, (iv) ऐसे लोग जो बड़ी मुसीबत और सदमे की हालत से गुज़र रहे हों या ऐसे नव-मुस्लिम जिनके दिलों को (सच्चाई से) जीतने की ज़रूरत थी (क्योंकि उनका ईमान अभी पूरी तरह से मज़बूत नहीं था), (v) ग़ुलामों और युद्ध-बंदियों [Prisoners of war] को मदद पहुँचाने व उन्हें आज़ाद कराने के लिए, (vi) क़र्ज़ के बोझ से दबे हुए लोगों के लिए,  (vii) अल्लाह के रास्ते में संघर्ष करने या समाज के फ़ायदे के लिए कोई सामुदायिक काम (civic project] पर ख़र्च करने के लिए [फ़ी सबीलिल्लाह], और (viii)  मुसाफ़िरों और शरण लेने वालों [refugees] पर ख़र्च करने के लिए। 

66: पाखंडियों में जो अपने गुनाहों की तौबा कर लेगाउसे माफ़ कर दिया जाएगा। हाँजो तौबा नहीं करेगाउसे सज़ा ज़रूर मिलेगी। 

70: "लूत की खंडहर बनी बस्ती" का नाम "सदोम"[Sodom] और "गोमोरह" [Gomorrah] था, देखें 7: 59, 7:92

73: "जिहादका असल मतलब संघर्ष करनाकोशिश करनामेहनत करना आदि होता है। दीन की रक्षा के लिए अगर अपने बचाव में युद्ध लड़ा जाए तो यह जिहाद हैमगर यह जिहाद अलग-अलग नहींबल्कि इस्लामी हुकूमत की तरफ़ से किया जाता है। इसके साथ-साथ लोगों को सच्चाई का संदेश सुनाना और इस तरह समझाना कि वे बात मान लें यह भी जिहाद है या अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने के लिए कोशिश करना भी जिहाद है। विश्वास न करने वाले (मुशरिकों) के साथ तो अपनी रक्षा में कई लड़ाइयाँ लड़नी पड़ींमगर पाखंडी लोग चूँकि ईमान रखने का दावा करते थेइसलिए उनके साथ वैचारिक जिहाद ही किया गया।

74: पाखंडियों ने कई बार मुहम्मद (सल्ल) को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश की थीजैसे तबूक के अभियान से वापसी के समय रास्ते में उन्हें मार देने की साज़िश की गईमगर हर बार आप (सल्ल) को ख़बर हो जाती थी।

98: ये लोग तबूक की जंग से उम्मीद लगाए हुए थे कि मुसलमानों की क़िस्मत ख़राब होने वाली है कि इनकी फ़ौज रूमियों के मुक़ाबले में तबाह हो जाएगीमगर जब मुसलमान सही-सलामत वहाँ से लौट आएतो उल्टा ये लोग मुसीबत में पड़ गएऔर उनकी पोल खुल गई। 

101: दो बार की सज़ा के कई मतलब बताए गए हैंएक सज़ा तो उनकी मानसिक थी कि उन लोगों को यक़ीन था कि मुसलमानों की फ़ौज "तबूककी लड़ाई में बुरी तरह हारकर तबाह हो जाएगीमगर उल्टा हुआ कि लोग सही-सलामत मदीना लौट आएदूसरा यह कि मदीना और उसके आसपास रहने वाले देहातियों में वैसे पाखंडी लोग जिनको अभी तक पहचाना नहीं गया थाउनका पाखंड सामने आ गया। इस तरह, इस दुनिया में एक बार तो वे बुरी तरह बेइज़्ज़त हुए और दूसरा यह कि उनकी ज़िंदगी का अंत भी बुरा ही होगा। 

102: यहाँ उन मुसलमानों के बारे में कहा गया है जो अपनी सुस्ती के कारण "तबूकके अभियान पर नहीं गए थेमगर बाद में उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआतो उन्होंने गुनाहों से तौबा की और अपने आपको मस्जिद के खम्भे से बाँध लिया था। ऐसे लोगों की संख्या बतायी जाती है और उनको अल्लाह ने माफ़ी की उम्मीद दिलाई है। 

103: ऊपर की आयत में जिन लोगों की तौबा क़बूल हुईउन लोगों ने अपने माल में से मुहम्मद (सल्ल) को कुछ तोहफ़ा [सदक़ा] देना चाहा जिसे आप (सल्ल) ने शुरू में लेने से मना कियामगर फिर अल्लाह के हुक्म से इसे क़बूल कियाक्योंकि बताया गया है कि सदक़ा देना आदमी के मन की गंदगी को दूर करने के लिए अच्छा है। 

105: यानी तौबा करने के बाद भी आगे की ज़िंदगी में सुधार के लिए लगातार अच्छे कर्म करते रहना होगा।

106: बताया जाता है कि तीन (3) मुसलमान ऐसे भी थे जो साधन रहते हुए केवल अपनी सुस्ती के चलते "तबूककी लड़ाई में नहीं गए और उन्होंने माफ़ी माँगने और तौबा करने में भी वैसी तत्परता नहीं दिखायी जैसी कि बाक़ी लोगों की तरफ़ से देखने को मिली थी (9:102)। जब ये लोग मुहम्मद (सल्ल) के पास माफ़ी के लिए गए तो उन्होंने अपना फ़ैसला अल्लाह के आदेश आने तक टाल दियाआम मुसलमानों ने उनका क़रीब 50 दिनों तक सामाजिक बायकाट कियाफिर उन्हें बाद में माफ़ी दे दी गईदेखें आयत 118.

107: मदीना में ख़ज़रज क़बीले का एक अबु आमिर नामक आदमी ईसाई संयासी हो गया था और मुहम्मद (सल्ल) के मदीना आने से पहले वहाँ उसकी बड़ी इज़्ज़त थीमगर वह आप (सल्ल) को अपना दुशमन समझने लगा और हर जंग में वह दुश्मनों की मदद किया करता था। मक्का और हुनैन की जीत के बाद वह सीरिया चला गया था और वहाँ जाकर उसने बाइज़ेंटाइनी राजा हेराक्लियस को मदीना पर हमला करने के लिए उकसाया था। उसके ही मशविरे पर मदीना के पाखंडियों ने मदीना शहर से लगी हुई एक नई मस्जिद बनवाई जो कि मुसलमानों की पहली मस्जिद "मस्जिद-ए-क़ुबा" से नज़दीक में थी। यह दिखावे के लिए तो मस्जिद थीलेकिन यहाँ मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें होती थीं और इसमें हथियार भी जमा किए गए थे। वे इस बात के लिए भी आस लगाए हुए थे कि रोमन फ़ौज उनकी मदद के लिए आएगी। इसमें नमाज़ पढ़ने के लिए उन लोगों ने आप (सल्ल) को बुलाया था, और आपने 'तबूक' से वापसी पर वहाँ जाने का इरादा भी किया था। मगर इस आयत के उतरने के बाद कुछ लोग कहते हैं कि आपके आदेश पर इस मस्जिद को जला दिया गया।

110: चूँकि यह मस्जिद पाखंडियों ने मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाने और नफ़रत फैलाने की नीयत से बनवाई थीइसलिए वह बर्बाद कर दी गई। फिर पाखंडियों की ऐसी हालत हो गई कि मरते दम तक वे संदेह की हालत में रहे कि जाने कब उनका कोई और राज़ जग-ज़ाहिर हो जाए। 

112: "जो सच की खोज में घूमते रहते हैंका कुछ लोगों ने अनुवाद "जो रोज़ा रखते हैंभी किया है।

114: जब इबराहीम (अलै) के बाबा की मौत एक विश्वास न करने वाले के रूप में हो गई, तब से इबराहीम (अलै) ने उनके लिए दुआ करना छोड़ दिया था। देखें 19:47; 60:4; 26: 86

117: मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह ने इस ग़लती के लिए माफ़ कर दिया जबकि आपने कुछ लोगों के युद्ध में नहीं जाने की प्रार्थना को मानते हुए उन्हें छूट दे दी, भले ही वे झूठे बहाने बना रहे थे, या जब आपने बुतपरस्तों के लिए माफ़ी की दुआ करनी चाही। 

118: जैसाकि आयत 106 के नोट में है,  मदीना के मुसलमानों ने अपने तीन सहाबियों का "तबूक के अभियानपर नहीं जाने के चलते 50 दिनों तक सामाजिक बायकाट किया गया थाइसके नतीजे में उनकी ज़िंदगी तंग हो गई थी और उन्हें समझ में आ गया कि अल्लाह की शरण के सिवा कहीं पनाह नहीं मिलेगी। 

122: "तबूक के अभियानपर सभी लोगों को लड़ाई में शामिल होने का हुक्म दिया गया थालेकिन हर बार ऐसा नहीं होता थाबल्कि आम हालत में हर समुदाय में से कुछ लोग जिहाद के लिए जाते थे। इस आयत में कहा गया है कि हर समुदाय [Group] में कुछ लोग ऐसे भी होने चाहिए जो बाहर निकलकर दीन की सही समझ हासिल करें और फिर जो कुछ उन्होंने सीखा हैवह दूसरों को और ख़ासकर जिहाद से लौटकर आने वालों को सिखाएंताकि वे बुराइयों से बच सकें। कुछ विद्वान कहते हैं कि इस आयत का संबंध युद्ध से नहीं हैबल्कि यह आम हालत में घर से निकलकर दीन को सीखने-सिखाने के बारे में है।  

123: जैसा कि सूरह के शुरू में विश्वास न करनेवाले मुश्रिकों से लड़ने के लिए कहा गया हैअंत में यहाँ फिर से इस बात पर ज़ोर दिया गया है। असल में मक्का की जीत के बाद बहुत से लोग नये-नये मुस्लिम हो गए थे और उनमें वहाँ के मुश्रिकों के लिए दिल में नर्मी थी क्योंकि वे उनके रिश्तेदार भी थेमगर उन्हें विश्वास न करनेवालों के प्रति सख़्त रवैया अपनाने के लिए कहा गया है ताकि वे मुसलमानों से डरते हुए फिर लड़ने की हिम्मत न कर सकें। 

127: मदीना के पाखंडी लोग मजबूरी में मुसलमानों की मजलिस में बैठा करते थेमगर उनका दिल वहाँ लगता नहीं था। जब मजलिस में मुहम्मद (सल्ल) कोई नई सूरह पढ़कर सुनाते और उसमें अगर पाखंडियों का ज़िक्र होतातो वे आपस में एक दूसरे को इशारे करते और किसी तरह चुपके से वहाँ से खिसक लेते थे। 


















                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 

 


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