सूरह 9: अत-तौबा
[गुनाहों पर पछतावा/ Repentance]
क़ुरआन में यही ऐसी सूरह है जो "अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है" से नहीं शुरू हुई है; कुछ विद्वानों की राय है कि सूरह 8 और सूरह 9 अलग-अलग नहीं, बल्कि असल में एक ही सूरह है जिसमें बात आगे बढ़ायी गई है। यह एक मदनी सूरह है जिसका नाम आयत 104 से लिया गया है। यह एक घोषणा के साथ शुरू होती है जिसमें मक्का के बुतपरस्तों के साथ की गई संधि को तोड़ देने की नोटिस दी गई है, क्योंकि उन लोगों ने संधि की शर्तों को तोड़ दिया था। लेकिन इसका बड़ा हिस्सा "तबूक के अभियान" में जाने की तैयारी और उसमें जाने वाले लोगों के चुनाव से संबंधित है, जो 631 ई./ 9 हिजरी में सख़्त गर्मी के मौसम में हुआ था। मदीना के पाखंडी लोग, और जो लोग युद्ध में किसी न किसी कारण से नहीं जा सके, और जिन लोगों ने रसूल के इस अभियान में उनको सहयोग नहीं दिया, ऐसे सभी लोगों की कड़ी निंदा की गई है। मुसलमानों को याद दिलाया गया है कि "हुनैन की जंग" में कैसे शुरुआती हार के बाद अल्लाह ने ईमानवालों को जीत दिलायी और किस तरह अल्लाह ने मक्का से मदीना जाते समय अपने रसूल की बुतपरस्तों से रक्षा की। पूरी सूरह में अल्लाह के तौबा क़बूल करने की बात सामने आती है जिसके कारण इसका नाम "अत-तौबा" है।
03-12: एक घोषणा
13-24: ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने का आहवान
25-27: हुनैन की जंग में अल्लाह की मदद
28 : घोषणा का नतीजा
29-35: किताबवाले [यहूदी, ईसाई] लोगों के ख़िलाफ़ भी लड़ो
36-37: आदर के महीनों के दौरान लड़ाई
38-49: लड़ाई लड़ने के लिए बहाने बनाना
50-57: पाखंडियों के ख़िलाफ़ ज़ोरदार हमला
58-60: ग़रीबों को दिए जाने वाला माल [ज़कात/सदक़ा]
61-70: पाखंडियों की कड़ी निंदा (जारी)
71-72: ईमानवालों को इनाम
73-80: पाखंडियों [मुनाफिक़] की कड़ी निंदा (जारी)
81-96: युद्ध में जाने से हिचकिचाने की निंदा
97-99: अरब के देहाती लोगों का रवैया
101-106: अरब के लोगों का रवैया (जारी)
107-110: पाखंडियों ने फितना फैलाने के लिए एक मस्जिद बनाई
111-112: ईमानवालों के साथ अल्लाह का सौदा
113-116: बहुदेववादियों की माफ़ी के लिए कोई दुआ नहीं
117-118: ईमानवालों की ग़लतियों को माफ़ करके अल्लाह ने रहम किया
119-129: ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ाई करना ईमानवालों का कर्तव्य है
1-4: इस आयत की पृष्टभूमि को समझने की ज़रूरत है। 6 हिजरी/ 628 ई में मुहम्मद (सल्ल) अपने साथियों के साथ छोटे हज [उमरा] के लिए शांतिपूर्ण तरीक़े से मदीना से मक्का के लिए निकले, मगर उन लोगों को मक्का से थोड़ा पहले हुदैबिया नामक जगह पर रुकना पड़ा, मक्का के सरदारों से मुसलमानों की बड़ी लम्बी बातचीत चलती रही, फिर यह तय हुआ कि मुसलमानों को इस बार बिना हज किए लौटना होगा और वे अगले साल आकर मक्का में हज कर सकते हैं। अंत में दोनों पक्षों के बीच 10 साल के लिए "हुदैबिया की संधि" हुई जिसकी कुछ शर्तें मुसलमानों के लिए फ़ायदेमंद नहीं दिखती थीं, मगर मुहम्मद (सल्ल) ने शांति व अमन की बहाली के लिए उन शर्तों को मान लिया। इसकी एक शर्त यह थी कि कोई भी क़बीला अगर चाहे तो वह मुसलमानों का साथी व सहयोगी हो सकता है और इसी तरह कोई भी क़बीला मक्का के बहुदेववादियों का भी सहयोगी हो सकता है, तो जिस तरह दोनों पक्ष एक दूसरे के ख़िलाफ़ युद्ध नहीं करेंगे, उसी तरह उनके सहयोगियों पर भी हमला नहीं करेंगे, मगर हुआ यूँ कि इस संधि के दो साल के अंदर ही मक्का के बहुदेववादियों ने संधि की शर्त तोड़ डाली जबकि उन लोगों ने क़बीला बनु बक्र को आदमी व हथियार दिए ताकि वे बनु ख़ुज़ा पर हमला कर सकें, बनु ख़ुज़ा मुसलमानों के सहयोगी थे, फिर उन लोगों पर हमला कर दिया गया, यहाँ तक कि बनु ख़ुज़ा के कुछ लोगों ने काबा के परिसर में शरण [पनाह] माँगी थी, इसके बावजूद उन लोगों को वहाँ क़त्ल किया गया, उसमें से कुछ लोग बड़ी मुश्किल से जान बचाकर मदीना पहुँचे और वहाँ का हाल सुनाया। इसी के नतीजे में मदीना के मुसलमानों ने मक्का पर 8 हिजरी/ 630 ई में हमला कर दिया, और बिना कुछ ख़ास ख़ून बहाए हुए मक्का को जीत लिया, मक्का की जीत के बाद वहाँ के बहुत सारे बहुदेववादियों ने इस्लाम अपना लिया, मगर बहुत सारे अपने दीन पर ही टिके रहे।
9 हिजरी में मुसलमानों की बहुत बड़ी फ़ौज मदीना से उत्तर की तरफ़ सीरिया जाने वाले रास्ते पर स्थित "तबूक" के अभियान पर गई, वहाँ से ख़बर मिली थी कि बाइज़ेंटाइनी फौज मदीना पर हमला करने के लिए बढ़ रही है। चूँकि इस बार मुक़ाबला बहुत मज़बूत सेना से था, इसलिए ऐसे कई बहुदेववादी क़बीले जिन्होंने मुसलमानों के साथ शांति संधि कर रखी थी, उन लोगों ने संधि की शर्तों को तोड़ना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें यह विश्वास था कि इस बार मुसलमानों की सेना बुरी तरह हारकर तबाह हो जाएगी, उधर जब मुस्लिम सेना तबूक पहुँची तो वहाँ पता चला कि बाइज़ेंटाइनी सेना के हमला किए जाने की ख़बर सही नहीं थी, सो वे लोग बिना लड़े ही वापस मदीना लौट आए। उसी साल कुछ समय बाद हज़रत अबु बक्र (रज़ि) की अगुवाई में मदीना के लोगों को हज के मौक़े पर मक्का भेजा गया, इसके तुरंत बाद ही इस सूरह का शुरुआती हिस्सा [1--5] उतरा।
इसके तुरंत बाद मुहम्मद (सल्ल) ने हज़रत अली (रज़ि) को हज पर गए दल के पास भेजा ताकि वह हज के दिन सब हाजियों के सामने यानी ईमानवालों और मुशरिकों के सामने एक ख़ास घोषणा कर दें जैसाकि आयत 3 में आया है, उन्होंने घोषणा की: 1. इस बार के बाद अगले साल से बहुदेववादियों [मुशरिकों] को हज करने की अनुमति नहीं होगी, 2. किसी को भी काबा के गिर्द नंगे होकर चक्कर लगाने [तवाफ़] नहीं दिया जाएगा, 3. केवल सच्चाई पर विश्वास करनेवाले ही जन्नत में जाएंगे, और 4. कोई भी संधि जितनी अवधि [मियाद] के लिए की गई हो, उसे हर हाल में मानना चाहिए। हज़रत अली की घोषणा सुनने के बाद मुशरिकों के सरदार ने अली (रज़ि) से कहा, "अपने भाई से कह देना कि हमने संधि तोड़ दी है, और अब हमारे और उनके बीच सिवाय छुरा घोंपने और तलवार चलाने के कुछ नहीं बचा।"
5: यह एक बहुत ही मशहूर आयत है, जिसे कुछ लोग “Sword Verse” यानी तलवार वाली आयत के नाम से भी जानते हैं। इस आयत को अक्सर उसके संदर्भ से अलग हटाकर देखा गया है, और अलग-अलग लोगों ने अपने-अपने हिसाब से उसके ग़लत मतलब निकाले हैं, इसमें इस्लाम के ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा करने वाले भी हैं, मुसलमानों के कट्टरवादी विचारों के लोग भी हैं और साथ में आतंकवादी भी शामिल हैं।
"जब चार महीने की मुहलत समाप्त हो जाए तो मुशरिकों [बहुदेववादियों] से जहाँ सामना हो जाए, उनका क़त्ल करो......"इस आयत को इस तरह पेश किया जाता है कि जैसे यह आदेश दुनिया-भर के मुशरिकों के लिए है और हर दौर के लिए है कि मुसलमानों को चाहिए कि जहाँ उन्हें देखें उनका क़त्ल करें!! ज़ाहिर है कि इस तरह का मतलब निकालना बेबुनियाद है। सही बात तो यह है कि इस सूरह का पहला हिस्सा आयत 1- 28 तक है जो एक दूसरे से जुड़ा हुआ है, और इसे असल संदर्भ से अलग करके नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
अत: चार महीने की नोटिस समाप्त हो जाने के बाद, यहाँ मक्का के केवल उन मुशरिकों के ख़िलाफ कार्र्वाई करने को कहा गया है जिन्होंने संधि की शर्तों को तोड़ डाला और मुसलमानों के विरुद्ध किसी की मदद की। इस आदेश में वे मुशरिक शामिल नहीं हैं जिन्होंने ऐसा काम नहीं किया (9:4), और वे भी शामिल नहीं हैं जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) से शरण माँगी है ताकि वे क़ुरआन को समझ सकें (9:6).
एक और ध्यान देने की बात है कि यहाँ क़त्ल करने के अलावा गिरफ़्तार करने, घेराबंदी करने और उनकी ताक में बठने को भी कहा गया है, मगर लोगों ने केवल क़त्ल किए जाने पर ही ज़ोर दिया है, ज़ाहिर है कि अगर सबको क़त्ल करना हो, तो फिर गिरफ़्तार या घेराबंदी किसकी होगी? पढ़ने से साफ़ स्पष्ट है कि यहाँ उन मुशरिकों के ख़िलाफ़ चार तरह की सज़ा देने का विकल्प [option] दिया गया है। ग़लत अनुवाद से भी मतलब कुछ का कुछ हो जाता है। इस आयत का सही मतलब यह है कि चार महीने की नोटिस अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी अगर कुछ मुशरिक वहाँ हैं तो मतलब यह हुआ कि वे युद्ध के लिए तैयार हैं, तो फिर यह अनुमति दी जाती है कि उन्हें काबा के परिसर के अंदर या बाहर जहाँ देखो या तो उन्हें क़त्ल कर दो, या उन्हें गिरफ़्तार कर लो, या उनकी घेराबंदी कर लो ताकि वे काबा या मुस्लिम इलाक़ों में न जाने पाएं और निगरानी चौकियों पर उनकी ताक में बैठो ताकि उन्हें आने से रोक सको। फिर उनमें से कुछ मुशरिक अगर यह कहते हैं उन्होंने ग़लतियों से तौबा कर ली, और वे नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात [टैक्स] देते हैं, तो उनके पीछे न पड़ो, बल्कि उन्हें माफ़ कर दो भले ही पहले उन्होंने तुम्हारे साथ ज़ुल्म किए थे। इस बात को आयत 11 में भी कहा गया है कि ऐसे लोग ईमान में तुम्हारे भाई हैं।
6: पिछली आयत का कुछ लोगों ने जो यह मतलब निकाला है कि "इन मुशरिकों को क़त्ल करो जब तक कि वे मुसलमान न बन जाएं", वह यहाँ ग़लत साबित होता है क्योंकि अगली ही आयत में मुहम्मद (सल्ल) से कहा जा रहा है कि जो कोई भी मुशरिक [idolater] अगर आपसे शरण [पनाह] माँगे, उसे शरण दे दें ताकि वह अल्लाह के संदेश को ठीक ढंग से समझ सके और फिर उसको ऐसी जगह पहुँचा दिया जाए जो उसके लिए सुरक्षित हो, यहाँ मुशरिकों को मुसलमान बन जाने की शर्त नहीं लगाई गई है।
7: यहाँ फिर ज़ोर दिया गया है कि जिन मुशरिकों के साथ पवित्र मस्जिद के नज़दीक यानी "हुदैबिया" में संधि (628 ई.) हुई थी, अगर वे उसकी शर्तों को नहीं तोड़ते हैं, तो मुसलमानों को भी चाहिए कि उसकी शर्तों पर क़ायम रहें।
11: आयत 10 में बताया गया कि ये ऐसे लोग हैं जो न तो रिश्ते-नाते का मान रखते हैं और न ही किसी संधि का और ये हमेशा आक्रामक रवैया अपनाते हैं, इसके बावजूद अगर ये अपनी ग़लतियों की तौबा कर लें, नमाज़ पढ़ें और निर्धारित ज़कात दें, तो वे मुसलमानों के दीनी भाई हो जाएंगे, इस तरह यहाँ मुसलमानों को इनसे दुशमनी करने या बदला लेने से फिर से रोका गया है।
12: यहाँ उन लोगों से युद्ध करने की फिर से अनुमति दी गई है, मगर इसलिए नहीं कि उन्होंने तौबा नहीं की या नमाज़ नहीं पढ़ी या ज़कात नहीं दिया, बल्कि इसलिए कि उन्होंने अपने दिए हुए वचन तोड़ डाले और मुसलमानों के दीन को बुरा भला कहा। यहाँ अधर्म के सरदारों से साफ़ तौर से युद्ध करने को कहा गया है जिन्होंने अपनी ग़लतियों की तौबा करने के बाद भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुश्मनी भड़काने का काम किया।
13: आयत 9:5 में मारने का हुक्म नहीं दिया गया, बल्कि इजाज़त दी गई थी, लेकिन अगर ऐसी ज़रूरत आ पड़े कि अपनी और दूसरों की रक्षा के लिए लड़ना पड़े, तब ऐसी हालत में यह अहम था कि मुसलमान लड़ने से पीछे नहीं हटें। मुस्लिम समुदाय में कुछ नये-नये मुस्लिम भी शामिल थे, जिनका ईमान उतना मज़बूत नहीं था, उन्हें जो हुक्म मिलता, उसे बेझिझक कर गुज़रने की उनमें वैसी लगन नहीं थी, फिर कुछ पाखंडी लोग भी थे जो मुस्लिम होने का ढोंग करते थे। इस आयत से पता चलता है कि मुस्लिम समुदाय में कुछ ऐसे लोग थे जो 9:5 में दिए गए आदेश का पालन करने में कतराते थे, इसीलिए यहाँ उन्हें ज़ुल्म करने वालों और प्रतिज्ञा तोड़ने वालों से बेझिझक लड़ने पर ज़ोर दिया गया है।
16: यहाँ वैसे मुसलमानों की तरफ़ शायद इशारा है जो मक्का के जीत के बाद नये-नये मुस्लिम हुए थे। इसे भी देखें 29: 2
17: मक्का के मुशरिकीन [विश्वास न करने वाले] इस बात पर फ़ख़्र करते थे कि वे काबा परिसर की देखभाल और रख-रखाव करते हैं, और हाजियों के लिए पीने के पानी का इंतिज़ाम करते हैं, इसलिए उनका दर्जा ईमानवालों से बड़ा है। लेकिन अल्लाह ने बता दिया कि ईमानवालों से उनकी कोई तुलना नहीं की जा सकती।
23: अगर बाप और भाई 'दीन' के ज़रूरी काम में रुकावट बन रहे हों, तो उनके साथ कोई गठबंधन नहीं रखना चाहिए। लेकिन बाप-भाई होने के नाते उनके साथ अच्छा सलूक करना ज़रूरी है। देखें 31:15; 60: 8.
25: "हुनैन की जंग" मक्का की जीत (630 ई) के कुछ ही दिन बाद हुई थी, जबकि अरब के ज़्यादातर क़बीलों ने मुहम्मद (सल्ल) से संधि कर ली थी। मगर मक्का के दक्षिण-पश्चिम में स्थित तायफ़ शहर के आसपास 'हवाज़िन' के क़बीले ने 'सक़ीफ' क़बीले के साथ मिलकर क़रीब 25,000 लोगों की बड़ी फ़ौज इकट्ठा कर ली थी, मक़सद मुसलमानों की बढ़ती ताक़त को कुचल डालना था। मुक़ाबले के लिए मुसलमानों की फ़ौज में भी क़रीब 12-13 हज़ार लोग जमा हुए जो इनकी अभी तक की सबसे बड़ी फ़ौज थी, इस पर कुछ मुसलमानों ने कहा कि "इतनी बड़ी फ़ौज के रहते हम हार ही नहीं सकते।" मक्का और तायफ़ के बीच "हुनैन" की घाटी में जब दोनों फ़ौजें आमने-सामने हुईं तो शुरुआत में जबकि मुस्लिम सेना एक संकरी घाटी से गुज़र रही थी, हवाज़िन वालों ने इस ज़ोर का हमला किया कि मुसलमानों के पाँव उखड़ गए और फौज की एक टुकड़ी को पीछे हटना पड़ा, फिर बड़ी मुश्किल से तितत-बितर फ़ौज ने अपने आपको दोबारा संभाला और फिर बड़े ज़ोर का हमला किया, तब जाकर अल्लाह ने उन्हें जीत दिलाई, नतीजे में मुसलमानों को ढेर सारा लूट का सामान हासिल हुआ।
27: अल्लाह जिसे चाहे उसको गुनाहों से तौबा करने की तौफ़ीक़ दे देता है, अत: ऐसा ही हुआ कि हुनैन की जंग में जिस जोश से 'हवाज़िन' और 'सक़ीफ़' क़बीले के लोग लड़े, हार जाने के बाद उनमें बहुत सारे लोग गुनाहों से तौबा करते हुए मुसलमान हो गए।
28: बुतों की पूजा करने के कारण उन्हें "अपवित्र" कहा गया है......सच्चाई पर विश्वास करने से इंकार करने वालों को अगले साल से पवित्र मस्जिद [काबा] के नज़दीक आने से मना कर दिया गया, इसका मतलब यह भी हुआ कि उन्हें अगले साल से हज करने की भी रोक लगा दी गई। विद्वानों का कहना है कि यह रोक वहाँ जाकर केवल पूजा-पाठ करने पर लगाई गई थी, लेकिन अगर कोई किसी और ज़रूरत से जाना चाहे, तो जा सकता था, जैसे कई मौक़े पर मुहम्मद (सल्ल) ने विश्वास न करने वालों को मस्जिद ए नबवी में जाने की इजाज़त दी थी।
29: यहाँ "किताबवालों" यानी यहूदियों और ईसाइयों से लड़ने की बात कही जा रही है जो (अल्लाह और अंतिम दिन पर) विश्वास नहीं रखते, मगर देखा जाए तो सभी किताबवाले अल्लाह और अंतिम दिन [क़यामत] पर विश्वास रखते हैं। असल में यहाँ यहूदियों और ईसाइयों में से उन लोगों के बारे में कहा जा रहा है जो सच्चे दिल से विश्वास नहीं रखते, क्योंकि वे उन चीज़ों से लोगों को नहीं रोकते जिनसे अल्लाह और उनके रसूल ने (तौरात और इंजील में) रोका था, और वे इंसाफ़ के नियमों का भी पालन नहीं करते। असल में मुसलमानों और किताबवालों के बीच एक समझौता हुआ था कि वे हुकूमत को जज़िया अदा करेंगे जिसे उन लोगों ने देना बंद कर दिया था, इसलिए यहाँ कहने का मतलब यह है कि उनकी किताबों में समझौता तोड़ने से मना किया गया है और साथ में किसी का अगर बक़ाया है तो उसे देने के लिए ज़ोर दिया गया है, मगर ये लोग इंसाफ़ के इन नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं, इसीलिए ऐसे लोगों से भी उस समय तक लड़ने का हुक्म दिया गया है जब तक कि जिस टैक्स को देने के लिए ये लोग पहले तैयार थे वह अदा न कर दें और आगे देने के लिए तैयार न हो जाएं।
"जज़िया" एक टैक्स है जो मुस्लिम रियासत में ऐसे ग़ैर मुस्लिम लोगों से लिया जाता है जो लड़ने की सलाहियत रखते हों, अत: औरतों, बच्चों, बूढ़ों, साधुओं, पुजारियों आदि से यह टैक्स नहीं लिया जाता। यह असल में हुकूमत की तरफ़ से उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने के बदले में होता है जिसके साथ एक शहरी होने के नाते सारी सुख-सुविधा दी जाती है, और युद्ध में भाग लेने से छूट भी मिलती है। यह क़रीब सालाना 1 दिनार (4.25 ग्राम सोना) के बराबर था। इसी तरह मुसलमानों से "ज़कात" (साल भर की बचत का 2.5%) वसूल किया जाता है जो ग़ैर-मुस्लिमों से नहीं लिया जाता। अक्सर "जज़िया" की निंदा करने वाले इस बात को छिपाते हैं।
30: हज़रत उज़ैर [Ezra] को अरब में रहने वाले कुछ यहूदी अल्लाह का बेटा मानते थे, हालाँकि सब यहूदी ऐसा नहीं मानते थे।..... यहाँ कहा गया है कि कुछ यहूदी और ईसाई भी वैसी ही बात दोहराते हैं जो विश्वास न करने वाले [काफिर] लोगों की मान्यता थी, जैसे कि "फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं।"
31: धर्म-गुरुओं और महात्माओं को अपना रब बना लेने से मतलब यह है कि उन ईसाइयों और यहूदियों ने उन्हें यह अधिकार दे रखे थे कि वे तौरात या बाइबल के हुक्म के बजाय अपने मन से किसी चीज़ को हराम [अवैध] या हलाल [वैध] ठहरा देते थे।
34: कुछ धर्म-गुरू और संत-महात्मा ऐसे थे जो लोगों से माल हड़प लेते और मन-मर्ज़ी के नियम-क़ायदे बना लेते जिससे वे लोगों को सही रास्ते से भटका देते थे।
36 /37: बहुत पुराने ज़माने से अरबों में चाँद के कैलेंडर के हिसाब से चार (4) महीने "आदर के महीने" माने जाते थे, और उन महीनों में लड़ाई करना हराम [अवैध] था सिवाय अपने बचाव में (2: 194), ये चार महीने थे: ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-हिज्जा, मुहर्र्म और रजब जो कि कैलेंडर के मुताबिक़ लगातार 11वाँ, 12वाँ, और पहला महीना था और एक 7वाँ महीना था। धीरे-धीरे अरब के लोगों को तीन महीने लगातार मार-पीट पर अंकुश रखना मुश्किल लगने लगा तो उन लोगों ने इसका रास्ता इस तरह निकाला कि कभी मुहर्र्म के महीने में लड़ाई करना पड़े, तो उसको एक महीना आगे बढ़ा देते और अगले महीने को आदर का महीना बना लेते थे। उसी तरह, चूँकि हज का महीना अलग-अलग मौसमों में पड़ता है, तो जो जिस साल हज का महीना व्यापार के हिसाब से ठीक समय पर नहीं पड़ता, उस साल इसका क्रम भी बदल डालते थे। कुछ विद्वान मानते हैं कि चूँकि चाँद वाला कैलेंडर 11/12 दिन ग्रेगोरियन कैलेंडर से कम होता है जिसके चलते हज या रमज़ान अलग-अलग मौसमों में पड़ता है, इसलिए उसे ठीक करने के लिए वे समय-समय पर कुछ दिन जोड़ देते थे।
38: उस समय रोमन साम्राज्य [बाइज़ेंटाइन] और फ़ारस की ससानी हुकूमत दो महाशक्तियाँ थीं। जब मुसलमानों को यह ख़बर मिली कि रोमन सेना मदीना पर हमला करने की तैयारियाँ कर रही है, तब मुहम्मद(सल्ल) ने आगे बढ़कर तबूक पर हमला करने की ठानी, और क़रीब 30,000 की फ़ौज इकट्ठा की। मक्का और हुनैन की जीत के बाद 9 हिजरी/ 631 ई. में मदीना से मुसलमानों की सेना जब "तबूक" के अभियान पर जा रही थी, उस समय जो लोग इस अभियान में बहाने बनाकर नहीं गए, यह आयत उनके बारे में है।
विद्वानों के अनुसार कुछ क़बीले मुहम्मद (सल्ल) के साथ इस अभियान पर नहीं जाना चाहते थे, इसके उन्होंने कई कारण बताए हैं: सख़्त गर्मी का मौसम, बहुत लम्बी (800 मील) यात्रा, साधन जुटाने के लिए धन की कमी और सबसे बड़ी बात बाइज़ेंटाइन रोमियों की मज़बूत सेना से टक्कर, और उस पर अभी तक खजूरों की फ़सल तैयार भी नहीं हुई थी जो कि उनकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी। इतने मुश्किल अभियान में भी ज़्यादातर मुसलमान आम तौर से जाने के लिए तैयार हो गए थे, कुछ 10 लोग ही ऐसे थे जो नहीं गए, मगर पाखंडियों ने नहीं जाने के तरह-तरह के बहाने बनाए और मुहम्मद (सल्ल) से इसके लिए इजाज़त ली जिसका ज़िक्र आगे किया गया है। हालाँकि जब ये लोग वहाँ पहुँचे, तब तक रोमन सेना तबूक से जा चुकी थी और जंग नहीं हुई और मुसलमान वहाँ से मदीना आराम से वापस लौट आए और पूरे अरब में वे एक नई शक्ति बनकर उभरे।
40: यह मक्का से मदीना हिजरत करने की घटना की तरफ़ इशारा है, जब मुहम्मद (सल्ल) के साथ हज़रत अबु बक्र (रज़ि) एक गुफा में छुपे हुए थे और अल्लाह की मदद से दुश्मनों से बचने में कामयाब हुए थे।
48: उदाहरण के लिए पाखंडियों का एक समूह उहुद की जंग के समय मुस्लिम फ़ौज के साथ गया, मगर अंत में फ़ैसला किया कि उन्हें जंग नहीं लड़नी है, और वे सब मैदान छोड़कर चले गए। .....यहाँ शायद मक्का की जीत और उसके बाद हुनैन की जंग में जीत की तरफ़ इशारा है कि पाखंडियों की कोशिशों के बावजूद सच्चाई की जीत हुई।
49: बताया जाता है कि एक पाखंडी जिसका नाम जद्द इब्ने क़ैस था, उसने मुहम्मद (सल्ल) से तबूक की जंग में न जाने की छूट माँगी, और कारण यह बताया कि औरतें उसकी बहुत बड़ी कमज़ोरी रही हैं, और उसे यह डर है कि अगर वह गया, तो वहाँ की रोमन औरतों को देखकर कहीं वह पूरी तरह बहक न जाए।
56: पाखंडी लोग असल में डरपोक थे, इसलिए वे अल्लाह की राह में लड़ना नहीं चाहते थे।
60: यहाँ बताया गया है कि निर्धारित ज़कात किस-किस को दी जा सकती हैं। यहाँ आठ (8) क़िस्म के लोग बताए गए हैं जिनमें ज़कात की रक़म को बाँटना चाहिए:
(i) ऐसे ग़रीब जिनकी रोज़ के खाने-पीने की ज़रूरतें भी पूरी न होती हों [फ़क़ीर], (ii) ऐसे ज़रूरतमंद लोग जिनका रोज़ का खाना-पीना तो हो जाता है मगर अगले हफ़्ते क्या होगा मालूम नहीं होता [मिस्कीन], (iii) ऐसे लोग जो ज़कात की रक़म वसूल करने और बाँटने की व्यवस्था में लगे रहते हैं, (iv) ऐसे लोग जो बड़ी मुसीबत और सदमे की हालत से गुज़र रहे हों या ऐसे नव-मुस्लिम जिनके दिलों को (सच्चाई से) जीतने की ज़रूरत थी (क्योंकि उनका ईमान अभी पूरी तरह से मज़बूत नहीं था), (v) ग़ुलामों और युद्ध-बंदियों [Prisoners of war] को मदद पहुँचाने व उन्हें आज़ाद कराने के लिए, (vi) क़र्ज़ के बोझ से दबे हुए लोगों के लिए, (vii) अल्लाह के रास्ते में संघर्ष करने या समाज के फ़ायदे के लिए कोई सामुदायिक काम (civic project] पर ख़र्च करने के लिए [फ़ी सबीलिल्लाह], और (viii) मुसाफ़िरों और शरण लेने वालों [refugees] पर ख़र्च करने के लिए।
66: पाखंडियों में जो अपने गुनाहों की तौबा कर लेगा, उसे माफ़ कर दिया जाएगा। हाँ, जो तौबा नहीं करेगा, उसे सज़ा ज़रूर मिलेगी।
70: "लूत की खंडहर बनी बस्ती" का नाम "सदोम"[Sodom] और "गोमोरह" [Gomorrah] था, देखें 7: 59, 7:92
73: "जिहाद" का असल मतलब संघर्ष करना, कोशिश करना, मेहनत करना आदि होता है। दीन की रक्षा के लिए अगर अपने बचाव में युद्ध लड़ा जाए तो यह जिहाद है, मगर यह जिहाद अलग-अलग नहीं, बल्कि इस्लामी हुकूमत की तरफ़ से किया जाता है। इसके साथ-साथ लोगों को सच्चाई का संदेश सुनाना और इस तरह समझाना कि वे बात मान लें यह भी जिहाद है या अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने के लिए कोशिश करना भी जिहाद है। विश्वास न करने वाले (मुशरिकों) के साथ तो अपनी रक्षा में कई लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं, मगर पाखंडी लोग चूँकि ईमान रखने का दावा करते थे, इसलिए उनके साथ वैचारिक जिहाद ही किया गया।
74: पाखंडियों ने कई बार मुहम्मद (सल्ल) को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश की थी, जैसे तबूक के अभियान से वापसी के समय रास्ते में उन्हें मार देने की साज़िश की गई, मगर हर बार आप (सल्ल) को ख़बर हो जाती थी।
98: ये लोग तबूक की जंग से उम्मीद लगाए हुए थे कि मुसलमानों की क़िस्मत ख़राब होने वाली है कि इनकी फ़ौज रूमियों के मुक़ाबले में तबाह हो जाएगी, मगर जब मुसलमान सही-सलामत वहाँ से लौट आए, तो उल्टा ये लोग मुसीबत में पड़ गए, और उनकी पोल खुल गई।
101: दो बार की सज़ा के कई मतलब बताए गए हैं, एक सज़ा तो उनकी मानसिक थी कि उन लोगों को यक़ीन था कि मुसलमानों की फ़ौज "तबूक" की लड़ाई में बुरी तरह हारकर तबाह हो जाएगी, मगर उल्टा हुआ कि लोग सही-सलामत मदीना लौट आए, दूसरा यह कि मदीना और उसके आसपास रहने वाले देहातियों में वैसे पाखंडी लोग जिनको अभी तक पहचाना नहीं गया था, उनका पाखंड सामने आ गया। इस तरह, इस दुनिया में एक बार तो वे बुरी तरह बेइज़्ज़त हुए और दूसरा यह कि उनकी ज़िंदगी का अंत भी बुरा ही होगा।
102: यहाँ उन मुसलमानों के बारे में कहा गया है जो अपनी सुस्ती के कारण "तबूक" के अभियान पर नहीं गए थे, मगर बाद में उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ, तो उन्होंने गुनाहों से तौबा की और अपने आपको मस्जिद के खम्भे से बाँध लिया था। ऐसे लोगों की संख्या 7 बतायी जाती है और उनको अल्लाह ने माफ़ी की उम्मीद दिलाई है।
103: ऊपर की आयत में जिन लोगों की तौबा क़बूल हुई, उन लोगों ने अपने माल में से मुहम्मद (सल्ल) को कुछ तोहफ़ा [सदक़ा] देना चाहा जिसे आप (सल्ल) ने शुरू में लेने से मना किया, मगर फिर अल्लाह के हुक्म से इसे क़बूल किया, क्योंकि बताया गया है कि सदक़ा देना आदमी के मन की गंदगी को दूर करने के लिए अच्छा है।
105: यानी तौबा करने के बाद भी आगे की ज़िंदगी में सुधार के लिए लगातार अच्छे कर्म करते रहना होगा।
106: बताया जाता है कि तीन (3) मुसलमान ऐसे भी थे जो साधन रहते हुए केवल अपनी सुस्ती के चलते "तबूक" की लड़ाई में नहीं गए और उन्होंने माफ़ी माँगने और तौबा करने में भी वैसी तत्परता नहीं दिखायी जैसी कि बाक़ी 7 लोगों की तरफ़ से देखने को मिली थी (9:102)। जब ये लोग मुहम्मद (सल्ल) के पास माफ़ी के लिए गए तो उन्होंने अपना फ़ैसला अल्लाह के आदेश आने तक टाल दिया, आम मुसलमानों ने उनका क़रीब 50 दिनों तक सामाजिक बायकाट किया, फिर उन्हें बाद में माफ़ी दे दी गई, देखें आयत 118.
107: मदीना में ख़ज़रज क़बीले का एक अबु आमिर नामक आदमी ईसाई संयासी हो गया था और मुहम्मद (सल्ल) के मदीना आने से पहले वहाँ उसकी बड़ी इज़्ज़त थी, मगर वह आप (सल्ल) को अपना दुशमन समझने लगा और हर जंग में वह दुश्मनों की मदद किया करता था। मक्का और हुनैन की जीत के बाद वह सीरिया चला गया था और वहाँ जाकर उसने बाइज़ेंटाइनी राजा हेराक्लियस को मदीना पर हमला करने के लिए उकसाया था। उसके ही मशविरे पर मदीना के पाखंडियों ने मदीना शहर से लगी हुई एक नई मस्जिद बनवाई जो कि मुसलमानों की पहली मस्जिद "मस्जिद-ए-क़ुबा" से नज़दीक में थी। यह दिखावे के लिए तो मस्जिद थी, लेकिन यहाँ मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें होती थीं और इसमें हथियार भी जमा किए गए थे। वे इस बात के लिए भी आस लगाए हुए थे कि रोमन फ़ौज उनकी मदद के लिए आएगी। इसमें नमाज़ पढ़ने के लिए उन लोगों ने आप (सल्ल) को बुलाया था, और आपने 'तबूक' से वापसी पर वहाँ जाने का इरादा भी किया था। मगर इस आयत के उतरने के बाद कुछ लोग कहते हैं कि आपके आदेश पर इस मस्जिद को जला दिया गया।
110: चूँकि यह मस्जिद पाखंडियों ने मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाने और नफ़रत फैलाने की नीयत से बनवाई थी, इसलिए वह बर्बाद कर दी गई। फिर पाखंडियों की ऐसी हालत हो गई कि मरते दम तक वे संदेह की हालत में रहे कि जाने कब उनका कोई और राज़ जग-ज़ाहिर हो जाए।
112: "जो सच की खोज में घूमते रहते हैं" का कुछ लोगों ने अनुवाद "जो रोज़ा रखते हैं" भी किया है।
114: जब इबराहीम (अलै) के बाबा की मौत एक विश्वास न करने वाले के रूप में हो गई, तब से इबराहीम (अलै) ने उनके लिए दुआ करना छोड़ दिया था। देखें 19:47; 60:4; 26: 86
117: मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह ने इस ग़लती के लिए माफ़ कर दिया जबकि आपने कुछ लोगों के युद्ध में नहीं जाने की प्रार्थना को मानते हुए उन्हें छूट दे दी, भले ही वे झूठे बहाने बना रहे थे, या जब आपने बुतपरस्तों के लिए माफ़ी की दुआ करनी चाही।
118: जैसाकि आयत 106 के नोट में है, मदीना के मुसलमानों ने अपने तीन सहाबियों का "तबूक के अभियान" पर नहीं जाने के चलते 50 दिनों तक सामाजिक बायकाट किया गया था, इसके नतीजे में उनकी ज़िंदगी तंग हो गई थी और उन्हें समझ में आ गया कि अल्लाह की शरण के सिवा कहीं पनाह नहीं मिलेगी।
122: "तबूक के अभियान" पर सभी लोगों को लड़ाई में शामिल होने का हुक्म दिया गया था, लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता था, बल्कि आम हालत में हर समुदाय में से कुछ लोग जिहाद के लिए जाते थे। इस आयत में कहा गया है कि हर समुदाय [Group] में कुछ लोग ऐसे भी होने चाहिए जो बाहर निकलकर दीन की सही समझ हासिल करें और फिर जो कुछ उन्होंने सीखा है, वह दूसरों को और ख़ासकर जिहाद से लौटकर आने वालों को सिखाएं, ताकि वे बुराइयों से बच सकें। कुछ विद्वान कहते हैं कि इस आयत का संबंध युद्ध से नहीं है, बल्कि यह आम हालत में घर से निकलकर दीन को सीखने-सिखाने के बारे में है।
123: जैसा कि सूरह के शुरू में विश्वास न करनेवाले मुश्रिकों से लड़ने के लिए कहा गया है, अंत में यहाँ फिर से इस बात पर ज़ोर दिया गया है। असल में मक्का की जीत के बाद बहुत से लोग नये-नये मुस्लिम हो गए थे और उनमें वहाँ के मुश्रिकों के लिए दिल में नर्मी थी क्योंकि वे उनके रिश्तेदार भी थे, मगर उन्हें विश्वास न करनेवालों के प्रति सख़्त रवैया अपनाने के लिए कहा गया है ताकि वे मुसलमानों से डरते हुए फिर लड़ने की हिम्मत न कर सकें।
127: मदीना के पाखंडी लोग मजबूरी में मुसलमानों की मजलिस में बैठा करते थे, मगर उनका दिल वहाँ लगता नहीं था। जब मजलिस में मुहम्मद (सल्ल) कोई नई सूरह पढ़कर सुनाते और उसमें अगर पाखंडियों का ज़िक्र होता, तो वे आपस में एक दूसरे को इशारे करते और किसी तरह चुपके से वहाँ से खिसक लेते थे।
No comments:
Post a Comment