Thursday, March 1, 2018

सूरह 60 : अल मुमतहिना [जाँच-परख की गयी औरतें/ The Women Tested]

सूरह 60: अल-मुमतहिना 
[जाँच-परख की गयी औरतें/ The Women Tested]



1- 3:  दुश्मनों के साथ सुलूक 

 4- 6:  इबराहीम (अलै.) की मिसाल 

7- 9:  मेल-मिलाप अभी भी संभव है 

10-11: मक्का से आकर पनाह लेने वाली औरतें और छोड़कर जाने वाली बीवियाँ 

12:     ईमान रखने वाली औरतों के साथ व्यवहार

13:     दूसरे दुश्मनों के साथ व्यवहार 

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


ऐ ईमानवालो! मेरे दुश्मनों और अपने दुश्मनों को अपना सहयोगी [Allies] न बना लो, कि उनके साथ दोस्ती का रिश्ता निभाने लग जाओ, जबकि जो सच्चाई तुम्हारे पास (रब की तरफ़ से) आयी है, उसे तो वे मानने से इंकार कर चुके हैं। उन्होंने तुम्हें और (तुम्हारे) रसूल को केवल इसलिए (मक्का से) बाहर निकाल दिया कि तुमने अपने रब, अल्लाह पर विश्वास [ईमान] कर लिया? अगर तुम सचमुच मेरे रास्ते में संघर्ष [जिहाद] के लिए और मेरी ख़ुशी की तलाश में (घर से दूसरी जगह के लिए) निकले हो, तो फिर (अब) तुम चोरी-छिपे उनसे दोस्ती की बातें (क्यों) करते हो?-------(याद रहे) जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ सामने ज़ाहिर करते हो, मैं सब कुछ जानता हूँ-----तुम में से कोई भी अगर ऐसा करता है, तो सचमुच वह सीधे रास्ते से भटक गया है।  (1)

अगर वे तुम पर हावी हो जाएँ, तो (देखना) वे फिर से तुम्हारे दुश्मन बन जाएँगे और तुम्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए अपने हाथ और ज़बान फैलाने लगेंगे; उनकी तो यह दिली ख़्वाहिश है कि तुम (एक अल्लाह में) ईमान [विश्वास] रखना छोड़ दो। (2)

क़यामत के दिन न तो तुम्हारी रिश्तेदारियाँ तुम्हारे कोई काम आएंगी और न तुम्हारी औलाद: वह [अल्लाह] तुम्हें [ईमानवाले और काफ़िरों में) अलग-अलग कर देगा। जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा होता है। (3)

तुम लोगों (की सीख) के लिए इबराहीम और उनके साथियों में एक अच्छा उदाहरण है, जब उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था,  "हम तुम (लोगों) का और जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, उन (सब) का त्याग करते हैं! हम तुम्हें मानने से साफ़ इंकार करते हैं! हमारे और तुम्हारे बीच हमेशा के लिए दुश्मनी और नफ़रत पैदा हो चुकी है, और यह उस समय तक रहेगी जब तक कि तुम एक अल्लाह पर विश्वास न कर लो" -----हाँ, मगर इबराहीम ने अपने बाप से यह ज़रूर कहा था कि "मैं आपके लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ करूँगा, हालाँकि मैं आपको अल्लाह से बचा नहीं सकता"------[ईमानवालों ने दुआएं की], "ऐ रब! हमने तुझ पर ही भरोसा किया; तौबा के लिए हम तेरे ही सामने झुकते हैं; और तेरे ही पास अन्त में लौटकर हमें जाना है। (4)

ऐ हमारे रब! हमें विश्वास न करनेवालों के हाथों होने वाले दुर्व्यवहार का सामना करने (या आज़माइश) से बचा। ऐ रब! हमें माफ़ कर दे, सचमुच तू ही बेहद ताक़तवाला, और समझ-बूझवाला है।" (5)

सचमुच [ऐ ईमानवालो!], तुम्हारे लिए वे अच्छा उदाहरण हैं जिनके रास्ते पर तुम्हें चलना चाहिए, और हर उस आदमी के लिए भी वे अच्छा उदाहरण हैं जो अल्लाह और अंतिम दिन का डर रखता हो। अगर कोई उससे मुँह मोड़ता है, तो (याद रखो) अल्लाह (को किसी की ज़रूरत नहीं, वह) तो आत्मनिर्भर [Self-sufficing], और सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (6)

हो सकता है कि अल्लाह अब भी तुम और तुम्हारे मौजूदा दुश्मनों के बीच (कुछ समय बाद) प्रेम का भाव पैदा कर दे----- अल्लाह बहुत ज़्यादा ताक़तवाला, बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है------ (7)

और अल्लाह तुम्हें इस बात से नहीं रोकता कि तुम किसी के साथ अच्छा व्यवहार करो, और उसके साथ इंसाफ़ करो जिसने तुम से धर्म [Faith] के नाम पर युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया: अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है। (8)

मगर अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों को अपना दोस्त बनाने से रोकता है जिन्होंने धर्म के नाम पर तुम से युद्ध किया, तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया, और तुम्हें निकलवाने में दूसरों की मदद की: तुममें से कोई भी अगर इन्हें अपना सहयोगी बनाता है, तो वह सचमुच ही ज़ालिमों में होगा। (9)

ऐ ईमानवालो! जब तुम्हारे पास (मक्का से) हिजरत [migration] करके ऐसी औरतें (मदीना में) आ जाएं जो यह दावा करती हों कि वे ईमानवाली हैं, तो तुम उन्हें जाँच-परख लिया करो---- यूँ तो अल्लाह उनके ईमान के बारे में अच्छी तरह जानता है---- और अगर तुम्हें उनके ईमान पर यक़ीन हो जाए, तो उन्हें विश्वास न करनेवालों [Disbelievers/ काफ़िरों] के पास वापस मत भेजो: ये औरतें (अब) उनके लिए जायज़ [lawful] बीवियां नहीं रह गयीं, और न ही अब वे काफ़िर [Disbelievers] मर्द, उनके जायज़ [lawful] पति होंगे। जो कुछ उन काफ़िर (पतियों) ने मेहर [bride-gift] के तौर पर (अपनी बीवी पर) ख़र्च किया हो, तुम उनके पतियों को उतना वापस कर दो-------अगर तुम उन (औरतों) से शादी करना चाहते हो, तो इसमें तुम्हारे लिए कोई बुराई की बात नहीं है, अगर तुम एक बार उन्हें मेहर अदा कर दो----और काफ़िर औरतों के साथ अब तुम ख़ुद भी शादी के बंधन को बनाए मत रखो। इनके लिए जो कुछ मेहर [bride-gift] तुमने अदा की थी, उसे काफ़िरों से मांग लो। और उन्हें भी चाहिए कि जो कुछ उन्होंने (अपनी बीवियों पर) ख़र्च किया हो, वह (तुम लोगों से) माँग लें। यह अल्लाह का आदेश है: वह तुम्हारे बीच फ़ैसला करता है, और अल्लाह सब जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (10)

अगर तुम्हारी बीवियों में से कोई तुम्हें छोड़कर काफ़िरों [Disbelievers] के पास चली गयी हो (और उनसे मेहर की रक़म वापस मिलने की उम्मीद न हो), और फिर अगर तुम्हारे समुदाय के लोगों को (काफ़िरों से) जंग के बाद कुछ माल हाथ आ गया हो, तो उस (माल में) से उन (पतियों) को उतनी रक़म दे दो जितनी उन्होंने अपनी (छोड़कर गयी) बीवियों पर मेहर के तौर पर ख़र्च किया होगा। और (देखो!) अल्लाह का डर रखो, जिस पर तुम ईमान रखते हो। (11)

ऐ रसूल! जब ईमान रखनेवाली औरतें आपके पास आकर इस बात की क़सम खाएं कि वे अल्लाह के साथ किसी चीज़ को (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] नहीं ठहराएँगी, न चोरी करेंगी, न किसी ग़ैर-मर्द के साथ मुँह काला [adultery] करेंगी, न अपने बच्चों की हत्या करेंगी, और न अपने हाथ और पैरों के बीच झूठी बातें गढ़ेंगी, (अर्थात, इस बात में झूठ नहीं कहेंगी कि उनके बच्चों का बाप कौन है), और न किसी सही चीज़ में आपके हुक्म को मानने से इंकार करेंगी, तो फिर आपको उनके द्वारा ली गयी निष्ठा की क़सम [बै'त] को स्वीकार कर लेना चाहिए, और उनके लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ करनी चाहिए: सचमुच अल्लाह बेहद माफ़ करनेवाला, बहुत दयावान है।  (12)

ऐ ईमानवालो! तुम ऐसे लोगों को अपना सहयोगी [Allies] न बनाओ, जिनसे अल्लाह नाराज़ है: वे आने वाली ज़िंदगी [आख़िरत/ Hereafter] से कोई आशा नहीं रखते, यहाँ तक कि विश्वास न करने वाले [काफ़िरों] को उन लोगों (के दोबारा उठाए जाने) की भी कोई उम्मीद नहीं है, जो अपनी क़ब्रों में दफ़न हैं। (13)



नोट:

1: हुदैबिया की संधि (630 ई) के बाद उसकी शर्तें को मक्का के लोगों ने दो साल के अंदर ही तोड़ दिया था, जिसके चलते मुहम्मद (सल्ल) ने मक्का पर हमला करने की ख़ुफ़िया योजना बनाई थी। मदीना के एक मुहाजिर हातिब बिन अबी बलतआ ने एक ख़ुफ़िया चिट्ठी मक्का के सरदारों के नाम लिखी जिसमें उन्होंने मदीना में चल रही हमले की तैयारियों की ख़बर दी थी, मगर उस चिट्ठी की भनक मुहम्मद (सल्ल) को हो गई और उसे रास्ते में ही पकड़ लिया गया। जब हातिब से पूछताछ हुई तो उन्होंने अपनी सफ़ाई में बताया कि असल में उनके परिवार के लोग और उनकी सम्पत्तियाँ मक्का में हैं, और उनका अब कोई और संबंंधी वहाँ मौजूद नहीं हैं, इसलिए उन्हें लगा कि मक्का वालों को युद्ध की तैयारी की ख़बर दे देने से वे एहसान मानते हुए उनके परिवार को नुक़सान नहीं पहुँचाएंगे। 


4: हज़रत इबराहीम (अलै) ने शुरू में अपने बाबा की माफ़ी के लिए अल्लाह से दुआ करने का वादा ज़रूर किया था (14:41; 19:47; 26:86), मगर जैसा कि सूरह तौबा (9: 114) में आया है कि जब उन्हें पता चल गया कि उनके बाप एक अल्लाह पर विश्वास करने वाले नहीं हैं, तो फिर उन्होंने उनके लिए दुआ करना छोड़ दिया। 


7: यानी मक्का में बहुत से लोग जो अभी दुश्मन बने हुए हैं, उम्मीद है कि वे आगे चलकर सच्चाई पर विश्वास कर लेंगे और दोस्त बन जाएंगे, सो मक्का की जीत के बाद ऐसा ही हुआ। 


8: यहाँ साफ़ तौर से कहा गया है कि जो ग़ैर-मुस्लिम [Non-Muslims] ऐसे हैं जिन्होंने मुसलमानों के साथ न तो युद्ध लड़ा, न उन्हें उनके घरों से निकाल बाहर किया और न कोई तकलीफ़ पहुँचाई, तो उनके साथ तो अच्छे संबंध रखने के लिए अल्लाह मना नहीं करता, बल्कि उनके साथ तो भलाई और इंसाफ़ का सलूक करना ही चाहिए।


10: हुदैबिया की संधि में यह तय हुआ था कि अगर मक्का से कोई आदमी (मर्द) मुसलमान होकर मदीना आएगा तो उसे वापस मक्का भेज देना होगा। लेकिन अगर कोई औरत मदीना आती है, तो उसकी जाँच-पड़ताल करने के बाद अगर पाया गया कि सचमुच वह मुसलमान बनकर आयी है, तो उसे वापस मक्का नहीं भेजा जाएगा। चूँकि ऐसी औरतें अपने पति को छोड़कर आती थीं, इसलिए उनका निकाह ख़त्म हो जाता था, अब मुसलमानों को ऐसी औरतों के साथ निकाह करने की इजाज़त दे दी गई इस शर्त के साथ कि वह मेहर की रक़म अदा कर दें। चूँकि अभी मक्का के साथ संधि क़ायम थी, इसलिए यह हुक्म हुआ कि ऐसी औरतों के पुराने पतियों ने जो भी अपनी बीवियों पर ख़र्च किया था, उसको इस तरह से वापस कर दिया जाए कि जो मुसलमान इन औरतों से निकाह करे, वह उसके महर की रक़म उसके पुराने (काफ़िर) पति को अदा कर दे। 

 इसके साथ यह भी आदेश हो गया कि अब किसी मुसलमान के लिए काफ़िरों से शादी का संबंध रखना वैध नहीं होगा। इस तरह, मुसलमानों ने भी अपनी काफ़िर बीवियों को तलाक़ दे दिया और उन बीवियों ने जाकर (मक्का के) काफ़िर मर्दों से निकाह किया। मुसलमान मर्दों को भी यह अधिकार दिया गया कि वे अपनी काफ़िर बीवियों पर ख़र्च की गई रक़म को अपनी बीवियों के नए पतियों से माँग लें। हालाँकि वे उनके (काफ़िर) पतियों से मेहर की रक़म वसूल नहीं कर पाए। 


13: कुछ विद्वानों के मुताबिक़ अल्लाह "यहूदियों" से नाराज़ है, और यह आयत मदीना के कुछ उन ग़रीब मुसलमानों के बारे में है जो थोड़े से धन की लालच में यहूदियों को मुसलमानों की योजनाओं के बारे में बता दिया करते थे। (देखें 58:14)

मदीना के यहूदी लोग आने वाली दुनिया [परलोक] पर विश्वास नहीं रखते थे, और मदीना के पाखंडियों का हाल भी वैसा ही था। यहूदियों ने जानते-बूझते मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का पैग़म्बर नहीं माना, और पाखंडी लोग जान-बूझकर उन्हें धोखा देते रहे। 


Friday, February 23, 2018

Surah 66: al-Tahrim/ सूरह 66: अत-तहरीम [अवैध करना/रोक लगाना/Prohibition]

सूरह 66: अत-तहरीम 
[अवैध करना/ रोक लगाना/Prohibition]



01-05: रसूल और उनकी बीवियाँ 

06-07: ईमानवालों को कड़ी चेतावनी

08     : गुनाहों से तौबा करने का इनाम

09     : विश्वास न करने वालों और पाखंडियों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष 

10-12: (सच्चाई पर) विश्वास करने वाली और विश्वास न करने वाली औरतों के उदाहरण





अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ रसूल! आप अपनी बीवियों को ख़ुश करने की इच्छा से, ऐसी चीज़ को क्यों अपने लिए हराम (Prohibit) करते हैं, जिसे अल्लाह ने आपके लिए हलाल [वैध/Lawful] ठहराया है? फिर भी, अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है: (1)  

(ऐ ईमानवालो!) अल्लाह ने अपने आदेश से तुम लोगों को (ऐसी) क़समों को तोड़ने का रास्ता बता दिया है------ (असल में) अल्लाह ही तुम्हारा मददगार है: वह सब कुछ जानता है, बहुत ज्ञानी है। (2)
 

(एक बार ऐसा हुआ कि) रसूल ने अपनी एक बीवी [हफ़्सा] से कोई राज़ की बात कही, फिर जब उस (बीवी) ने वह बात [दूसरी बीवी, आयशा को] बता दी और (फिर) अल्लाह ने उस (रसूल) को इसकी जानकारी दे दी, तो रसूल ने (हफ़्सा को) उस (राज़ की) बात का कुछ हिस्सा सुना दिया (जो उसने आयशा को बताया था), और बाक़ी बातें टाल गए। फिर जब रसूल ने अपनी उस बीवी [हफ़्सा] से राज़ खोलने के बारे में पूछताछ की, तो वह बोली, "आपको इसकी ख़बर किसने दी?" रसूल ने कहा, "मुझे उसी ने ख़बर दी जो सब कुछ जाननेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है।" (3)

अगर तुम दोनों (बीवियाँ) अल्लाह के सामने तौबा कर लो---- क्योंकि तुम्हारे दिल सच्चाई की जगह से हट गए हैं-----(तो यह बहुत अच्छा होगा); किन्तु अगर तुम उन (रसूल) के विरुद्ध एक-दूसरे की मदद करोगी, तो फिर (याद रखना कि) अल्लाह उनकी मदद करेगा, और जिबरील [Gabriel] और नेक ईमानवाले भी, और सारे फ़रिश्ते भी उनकी तरफ़ हो जाएंगे। (4)

अगर रसूल तुममें से किसी को तलाक़ देने का फ़ैसला करें, तो उनका रब बड़ी आसानी से, (तुम्हारे बदले) तुम से अच्छी बीवियाँ, उन्हें दे सकता है: बीवियाँ जो पूरी तरह अल्लाह पर समर्पित हों, पक्की ईमानवाली, आज्ञा मानने वाली, तौबा करने वाली, इबादत करने वाली और अल्लाह के रास्ते में सफ़र करने वाली (या रोज़ा रखनेवाली) हों, चाहे उनकी पहले शादी हो चुकी हो या कुँवारी हों। (5)
 

ऐ ईमान रखनेवालो! अपने आपको और अपने घरवालों को उस आग से बचाओ जिसका ईधन आदमी और पत्थर होंगे, जिस पर कठोर स्वभाव के मज़बूत फ़रिश्ते नियुक्त होते हैं जो अल्लाह के हुक्म को मानने से कभी इंकार नहीं करते, और वही करते हैं जिसका उन्हें आदेश दिया जाता है: (6)

“तुम (लोग) जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, आज [क़यामत के दिन] कोई बहाने न बनाओ: तुम्हें तो उन्हीं कर्मों का बदला दिया जा रहा है जो कुछ तुम किया करते थे।" (7)
 

ऐ ईमानवालो! अल्लाह के सामने सच्चे मन से (अपनी ग़लतियों की) तौबा करो, बहुत सम्भव है कि तुम्हारा रब तुम्हारी बुराइयों को तुम से दूर हटा दे और तुम्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर दे, जहां बहती हुई नहरें हों------- उस दिन अल्लाह अपने रसूल को और उनको जिन्होंने (रसूल की) बातों पर विश्वास किया, उन्हें अपमानित नहीं करेगा। और उनकी रौशनी [नूर] उनके आगे-आगे और उनके दाहिने तरफ़ फैल रही होगी, और वे कह रहे होंगे, "ऐ हमारे रब! हमारी रौशनियों को हमारे लिए पूरा कर दे और हमें माफ़ कर दें: तुझे तो हर चीज़ करने की ताक़त है।" (8
 

ऐ रसूल! (सच्चाई से) इंकार करने वालों और (मदीना के) पाखंडियों [Hypocrites] के ख़िलाफ़ जमकर संघर्ष करें, और उनके साथ सख़्ती से पेश आएं। उनका घर जहन्नम होगा, और वह कितना बुरा ठिकाना है! (9)

अल्लाह ने (सच्चाई से) इंकार करने वालों का उदाहरण पेश किया है: नूह [Noah] और लूत [Lot] की बीवियों ने हमारे दो बहुत ही नेक बंदों से शादी की थी, फिर उनके साथ विश्वासघात किया। मगर अल्लाह के मुक़ाबले में उनके पति उनकी कोई मदद नहीं कर सके: (उन बीवियों से) कह दिया गया, "दूसरों के साथ तुम दोनों भी (जहन्नम की) आग में दाख़िल हो जाओ।" (10)  

और ईमान रखनेवालों के लिए अल्लाह ने फ़िरऔन [Pharaoh] की बीवी की मिसाल पेश की है, जबकि उसने कहा, "ऐ मेरे रब! तू मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना दे, और मुझे फ़िरऔन और उसके कर्मों से छुटकारा दे दे, और मुझे शैतानियाँ करने वालों से बचा ले।" (11)

और इमरान की बेटी मरयम [Mary] का उदाहरण भी है, जिसने अपनी इज़्ज़त बचा कर रखी थी, तो फिर हमने उसके अंदर अपनी रूह [Spirit] फूँक दी, उसने अपने रब की बातों और उसकी किताबों की (सच्चाई की) पुष्टि की: वह सचमुच पूरी भक्ति से (अल्लाह की) आज्ञा माननेवालों में शामिल थी। (12)



नोट:

1: इस आयत के बारे में दो तरह की बातें बतायी जाती हैं। पहली यह कि मुहम्मद (सल्ल) ने मारिया नाम की अपनी एक दासी के साथ संबंध क़ायम किए थे, जिसके बारे में उनकी एक बीवी हफ़्सा (रज़ि) को पता चल गया जिससे वह नाराज़ हो गईं, मुहम्मद (सल्ल) ने यह क़सम खा ली कि अब वह उस दासी के साथ कोई संबंध नहीं रखेंगे और आपने यह बात राज़ रखने के लिए कहा था, लेकिन उनकी बीवी हफ्सा (रज़ि) ने उनकी दूसरी बीवी आयशा (रज़ि) को यह बात बता दी।

दूसरी बात यह कही जाती है कि आप (सल्ल) अपनी एक बीवी (ज़ैनब) के यहाँ शहद पिया करते थे, उस बीवी से जलन के कारण उनकी दूसरी बीवी हफ़्सा ने जान-बूझकर यह कहा कि आपके मुँह से गंदी महक आ रही है, फिर यह बात हफ़्सा (रज़ि) ने उनकी एक और बीवी आयशा (रज़ि) को भी बता दी, और उन्होंने भी मुँह महकने की झूठी बात कही। इस पर उन्होंने आगे शहद नहीं खाने की क़सम खा ली थी। 

मगर यह दोनों ही चीज़ें उनके लिए वैध [हलाल] थीं जिसे उन्होंने अपनी बीवियों को ख़ुश करने के लिए अपने ऊपर हराम [अवैध] करने की क़सम खा ली थी। 


2. ऐसी क़समों को तोड़ने का तरीक़ा सूरह मायदा में यह बताया गया है कि इसकी भरपाई के तौर पर 10 ग़रीबों को खाना खिलाना है, या उन्हें कपड़ा देना है, या एक ग़ुलाम को आज़ाद करना है। अगर किसी के पास इतना पैसा नहीं है, तो उसे तीन दिन लगातार रोज़ा रखना चाहिए,  देखें 5: 89. 


6: जहन्नम की आग का ईंधन पत्थर भी होंगे, यानी वे पत्थर की मूर्तियाँ जिनकी पूजा की जाती थी। 


8: रौशनी [नूर] उनके आगे-आगे और दाहिनी तरफ़ फ़ैलने का वर्णन सूरह हदीद ( 57: 12)  में आया है, जो शायद उस समय होगा जब अंतिम फ़ैसले के लिए लोग पुल-सिरात से गुज़र रहे होंगे, वहाँ हर आदमी का ईमान उसके सामने रौशनी बनकर उसे रास्ता दिखाएगा। ..... रौशनी को पूरा कर देने की दुआ से मतलब है कि रौशनी अंत तक बनी रहे। 


9: यह आयत 9: 73 से मिलती-जुलती है, सच्चाई से इंकार करने वालों के साथ जमकर संघर्ष करने को कहा गया है, यह दोनों तरह का हो सकता है, यानी बातचीत के द्वारा उन्हें अल्लाह का संदेश पहुँचाकर भी, और अगर वे लड़ें तो फिर लड़कर भी। मदीना के पाखंडियों के साथ भी कड़ी क़ानूनी कार्रवाई करने को कहा गया है। 


10: बताया जाता है कि नूह (अलै) की बीवी अपने पवित्र पति को दीवाना कहती थी और उनके राज़ दुश्मनों को बताया करती थीं। उसी तरह, लूत (अलै) की बीवी भी उनके दुश्मनों से मिली हुई थी, और उसी ने उनके घर आए हुए मेहमानों का पता बताया था। इस तरह दोनों ने अपने पतियों को धोखा दिया था।  


11: इसके विपरीत, जब मूसा (अलै) ने जादूगरों को चैलेंज में हरा दिया था, तो उस समय जादूगरों के साथ फ़िरऔन की बीवी, हज़रत आसिया भी ईमान ले आयी थीं जिसके नतीजे में फ़िरऔन ने उन पर भी बहुत ज़ुल्म किए थे, यहाँ उनके द्वारा की हुई दुआ को लिखा गया है। 


12: उसी "रूह" के फूँकने से ईसा (अलै) पैदा हुए थे, इसलिए उन्हें "रूहुल्लाह" कहा जाता है। 


Surah 65: al-Talaq/ अत-तलाक़ [तलाक़/ Divorce]

सूरह 65: अत-तलाक़
 [तलाक़/ Divorce]


01- 07: तलाक़ से जुड़े हुए नियम-क़ायदे

08-10: चेतावनी पिछली पीढ़ियों को मिलने वाली सज़ा से 

10-11: ईमानवालों का अंजाम

12   : सातों आसमान और सातों ज़मीन 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल!] जब तुम में से कोई भी अपनी बीवियों को तलाक़ देना चाहे, तो ऐसे समय पर दे, जब उनके लिए इद्दत का समय [waiting period] शुरू हो सके, और इस अवधि का हिसाब ध्यान से करो: और अल्लाह का डर रखो, जो तुम्हारा रब है। (इस दौरान) उन (बीवियों) को अपने घरों से न निकालो--- और न उन्हें ख़ुद से निकलना चाहिए----- सिवाए इसके कि वे कोई खुला हुआ अश्लील कर्म [indecency] कर बैठें। ये अल्लाह की तय की हुई सीमाएँ हैं ----जिसने अल्लाह की तय की हुई सीमाएं तोड़ी, तो उसने  स्वयं अपने आप पर ही ज़ुल्म किया ---- क्योंकि तुम नहीं जानते कि शायद इस (तलाक़) के बाद अल्लाह (सुलह की) कोई नयी सूरत पैदा कर दे। (1)  

फिर जब वे (औरतें) अपनी (इद्दत की) निर्धारित अवधि पूरी करने के नज़दीक पहुंच जाएं, तो या तो उन्हें इज़्ज़त के साथ (अपने वैवाहिक जीवन में) वापस ले लो, या (इद्दत पूरी होने के बाद) इज़्ज़त के साथ उनसे अलग हो जाओ। अपने लोगों में से दो न्याय पसंद करने वाले गवाहों को बुला लो और अल्लाह के वास्ते गवाही को पक्का बनाओ। जो कोई अल्लाह पर और अंतिम दिन [क़यामत] पर ईमान रखता है, उसे इस बात पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए: अल्लाह उनके लिए (परेशानी से) निकलने का कोई न कोई रास्ता निकाल देगा, जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, (2)

और उन्हें उस जगह से रोज़ी देगा जिसका उन्हें अंदाज़ा तक न होगा; जो कोई अल्लाह पर भरोसा करता है, तो उसके लिए अल्लाह काफ़ी है। अल्लाह अपना काम पूरा करके रहता है; अल्लाह ने हर चीज़ का एक सही अंदाज़ा तय कर रखा है। (3)  

अगर तुम्हें (इद्दत के बारे में) कोई संदेह हो, (तो जान लो) कि उन औरतों के लिए इद्दत की अवधि तीन महीने है, जिनकी माहवारी आनी बंद हो चुकी है, और उनकी भी इतनी ही है जिनकी अभी तक माहवारी शुरू नहीं हुई; जो औरतें गर्भवती हों, उनके लिए इद्दत की अवधि उस समय तक होगी, जब तक कि वे बच्चा जन न लें: जो कोई अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचता है, अल्लाह उसके काम में आसानी पैदा कर देता है। (4)  

यह अल्लाह का आदेश है जो उसने तुम पर उतार भेजा है। जो कोई अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचता है, अल्लाह उसके गुनाहों को मिटा देगा और उसके इनाम को बढ़ा देगा। (5)
 

अपनी हैसियत के अनुसार, जहाँ तुम स्वयं रहते हो, उन औरतों को भी वहीं रहने की जगह दो जिनको तलाक़ दे रहे हो, और उन्हें इतना परेशान न करो कि उनका जीना दूभर हो जाए। अगर वे गर्भवती हों, तो उनपर तब तक ख़र्च करते रहो जब तक कि वे बच्चा जन न दें; फिर अगर वे तुम्हारे बच्चे को दूध पिलाएँ तो तुम उन्हें उनका पारिश्रामिक [compensation] दो। भले तरीक़े से आपस में सलाह कर के (दूध पिलाने की) बात तय कर लो----- अगर तुम एक दूसरे के लिए मुश्किलें पैदा करोगे, तो फिर कोई दूसरी औरत उस [बाप] के लिए (पैसे के बदले) बच्चे को दूध पिला सकती है। (6)

और अमीर आदमी को अपनी हैसियत के मुताबिक़ (ऐसी औरतों को) ख़र्चा-पानी देना चाहिए। मगर जिसकी रोज़ी ज़रा कम हो, तो जो कुछ अल्लाह ने उसे दे रखा है, उसी में से वह ख़र्च करे: अल्लाह ने किसी को जितना (माल) दिया है, उससे बढ़कर वह किसी आदमी पर (ज़िम्मेदारी का) बोझ नहीं डालता----- (पैसे की) तंगी के बाद अल्लाह आसानी पैदा कर देगा। (7)
 

कितनी ही बस्तियाँ हैं जिन्होंने अपने रब और उसके रसूलों के आदेश का बड़ी ढिटाई से विरोध किया, तो हमने उनका पूरी कड़ाई से हिसाब लिया: और उन्हें बड़ी सख़्त सज़ा दी! (8)  

ताकि उन्हें उनके कुकर्मों के बुरे नतीजे का मज़ा चखा सकें---- उनके (बुरे) कर्मों का अंजाम उनकी बर्बादी थी। (9)  

अल्लाह ने उनके लिए (आख़िरत/परलोक में) कठोर यातना तैयार कर रखी है।
 
अतः तुम जो समझ-बूझ रखते हो, तुम जो ईमान रखते हो, अल्लाह से डरते रहो। उसने तुम्हारे पास नसीहत देनेवाली क़ुरआन भेजी है, (10)

और (साथ में) भेजा है एक रसूल ----- जो तुम्हें अल्लाह की आयतें पढ़कर सुनाते हैं, ये (आयतें) चीज़ों को साफ़ व स्पष्ट कर देती है---- ताकि वे जो ईमान रखते हैं और नेक व अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें अँधेरों से निकालकर रौशनी की तरफ़ ले जाए। जो कोई अल्लाह पर विश्वास रखे, और अच्छा कर्म करे, उसे वह ऐसे (जन्नत के) बाग़़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहां ऐसे लोग हमेशा के लिए रहेंगे --- अल्लाह ने उनके लिए बहुत अच्छी रोज़ी रखी है। (11)


वह अल्लाह है जिसने सात आसमानों को पैदा किया, और उन्हीं के जैसी (सात) ज़मीन भी। उसका आदेश [आयतें] उनके बीच उतरता रहता है। अतः तुम्हें जान लेना चाहिए कि हर चीज़ पूरी तरह से अल्लाह के क़ाबू में है, और यह कि उसने हर चीज़ को अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। (12)




नोट:

1: जब मियाँ-बीवी में तलाक़ हो जाए, तो औरत को दूसरी शादी करने से पहले जितनी अवधि तक इंतज़ार करना होता है, उसे "इद्दत" [Waiting period] कहते हैं।  तलाक़ अगर देना ही है, तो ऐसे समय देना चाहिए जब 'इद्दत' का समय शुरू हो सके, मतलब यह है कि जब औरत माहवारी ख़त्म करने के बाद साफ़-सुथरी हो गई हो, और उसके साथ पति ने सेक्स न किया हो, तब से इद्दत की अवधि शुरू होगी और यह अवधि तीन माहवारी [menstrual cycle] तक चलती है [2: 228].  इद्दत की अवधि पूरी होने तक अगर पति ने एक या दो बार ही तलाक़ दिया हो, तो वह अपनी बीवी को फिर से अपना सकता है। इद्दत पूरी हो जाने के बाद अगर तीसरा तलाक़ भी दे दिया, तो फिर तलाक़ पक्का हो जाएगा।  

2: अगर पति ने तलाक़ के बाद बीवी को दोबारा अपनाने का फ़ैसला किया है, तो अच्छा तरीक़ा यह है कि यह फ़ैसला दो गवाहों के सामने किया जाए। अगर इस बात को साबित करने की ज़रूरत पड़ जाए कि पति ने अपनी बीवी को दोबारा अपनाया है या नहीं, तो फिर उन गवाहों को इस बात की ठीक-ठीक गवाही देनी चाहिए। 

4: आम हालत में तो इद्दत की अवधि तीन माहवारी तक है। मगर यह अवधि उन औरतों के लिए तीन महीने होगी जिन्हें माहवारी आनी अब बंद हो गई हो, या उन लड़कियों के लिए भी इतनी ही होगी जिनकी माहवारी अभी शुरू नहीं हुई है। 

6: बच्चे को दूध पिलवाने की ज़िम्मेदारी बाप की मानी जाती है, इसलिए अगर ज़रूरत पड़े, तो बाप को उसके लिए पैसा देना होगा, वह चाहे तलाक़शुदा बीवी को दे या किसी दूध पिलानेवाली को।  


Sunday, February 18, 2018

Surah 64 : at- Taghabun/ सूरह 64 : अत तग़ाबुन [एक-दूसरे के मुक़ाबले में हार-जीत या एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करना/ Mutual Neglect]

सूरह 64: अत-तग़ाबुन 
[एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करना/ Mutual Neglect]



01-04: अल्लाह की महानता, उसकी ताक़त और उसका ज्ञान 

05-06:  चेतावनी पिछली पीढ़ियों को मिलने वाली सज़ा से 

07-10: (सच्चाई पर) विश्वास करने वाले और विश्वास न करने वालों का अंजाम 

11-18: ईमानवालों की आज़माइश और उन्हें ग़लत चीज़ करने पर उकसाना 

 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हर चीज़ जो आसमानों और ज़मीन में है, अल्लाह की बड़ाई बयान करती है; सारा नियंत्रण [बादशाही], और सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं; उसके पास हर चीज़ की ताक़त है।  (1)

वही है जिसने तुम्हें पैदा किया, फिर भी तुममें से कुछ (लोग) विश्वास नहीं करते [काफ़िर] हैं, और कुछ (लोग) विश्वास करनेवाले [मोमिन] हैं: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह हर चीज़ को देख रहा होता है। (2)

उसने आसमानों और ज़मीन को सही मक़सद के साथ पैदा किया; उसने तुम्हारा रूप बनाया, और (देखो) कितना अच्छा रूप बनाया: तुम सबको (अंत में) उसी के पास लौटकर जाना होगा।  (3)

जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, वह उसे जानता है; वह उसे भी जानता है जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ तुम सामने बता देते हो; अल्लाह तो हर दिल के अंदर छिपे हुए राज़ तक को अच्छी तरह जानता है! (4)


[विश्वास न करनेवाले, काफ़िरो!] क्या तुमने उन लोगों के बारे में नहीं सुना, जिन्होंने तुम से पहले (सच्चाई को मानने से) इंकार किया था? उन्होंने (दुनिया में) अपने काम के बुरे नतीजे का मज़ा चखा, और (आख़िरत में) एक दर्दनाक यातना उनके इंतज़ार में है। (5)

वह इसलिए हुआ कि उनके रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाण लेकर आते रहे, मगर इसके बावजूद, वे कहते थे, "क्या (मर-खप जानेवाले मामूली) आदमी हमें मार्ग दिखाएँगे?", उन्होंने (हमारे संदेश को) मानने से इंकार किया, और मुँह फेर लिया। मगर अल्लाह को तो उनकी कोई ज़रूरत नहीं थी: वह तो हर तरह से आत्मनिर्भर है, सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (6)


विश्वास न करनेवाले यह दावा करते थे कि मरने के बाद वे दोबारा नहीं उठाए जाएँगे। (ऐ रसूल) आप कह दें, "हां, क़सम है मेरे रब की! तुम ज़रूर उठाए जाओगे, और तब तुम्हें वे सारी चीज़ें बता दी जाएंगी, जो कुछ तुमने किया होगा: अल्लाह के लिए यह बहुत आसान काम है।" (7)


अतः ईमान रखो अल्लाह पर, उसके रसूल पर, और (रास्ता दिखानेवाली) उस रौशनी [क़ुरआन] पर, जिसे हमने भेजा है: तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (8)

(एक दिन) जब वह तुम (सब) को जमा करेगा, उस ‘इकट्ठा किए जानेवाले दिन' [क़यामत] पर, जो "एक-दूसरे के मुक़ाबले में हार-जीत का दिन (या एक दूसरे को नज़रअंदाज़ करने का दिन)" [तग़ाबुन] होगा, तो जिसने अल्लाह पर ईमान रखा होगा, और अच्छे कर्म किए होंगे, उनके गुनाहों को वह मिटा देगा: वह उन्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, वहाँ वे हमेशा के लिए रहेंगे---- यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (9)

मगर वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, और हमारी निशानियों को ठुकरा दिया, वे (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं, उसी में वे (हमेशा) रहेंगे---- वह कितना बुरा ठिकाना है!  (10)


मुसीबतें बिना अल्लाह की अनुमति के नहीं आ सकती हैं ---- जो कोई अल्लाह पर ईमान रखता है, तो अल्लाह उसके दिल को सही रास्ता दिखा देगा: अल्लाह हर चीज़ जानता है----(11)

अतः अल्लाह और रसूल की आज्ञा का पालन करो। अगर तुम उससे मुँह मोड़ते हो, तो याद रखो, हमारे रसूल की ज़िम्मेदारी बस हमारे संदेशों को साफ़-साफ़ पहुँचा देने की है। (12)

अल्लाह! कि उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं है, अतः ईमानवालों को अल्लाह पर ही भरोसा करना चाहिए। (13)

ऐ ईमानवालो, यहाँ तक कि तुम्हारे पति/ पत्नियों और तुम्हारे बच्चों में से कुछ ऐसे हैं जो तुम्हारे दुश्मन हैं ----- उनसे होशियार रहो----- लेकिन अगर तुम उनकी ग़लतियों को अनदेखा करो, उन पर ग़ुस्सा न करो, और उन्हें माफ़ कर दो, तो फिर अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (14)


तुम्हारी धन-दौलत और तुम्हारे बाल-बच्चे, तुम्हारे लिए केवल एक आज़माइश हैं। और वह अल्लाह है जिसके पास बड़ा इनाम है: (15)
 
जहाँ तक तुम से हो सके, अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो; सुनो और आज्ञा का पालन करो; और (ज़रूरतमंदों पर) ख़र्च करो---- यह तुम्हारे ख़ुद के लिए अच्छा होगा। जो अपने मन के लोभ से बचा रहा, वही कामयाब लोगों में से होगा:  (16)

अगर तुम साफ़ दिल से अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दो, तो वह उसे तुम्हारे लिए कई गुना बढ़ा देगा और तुम्हें माफ़ कर देगा। अल्लाह हमेशा अच्छाई की क़द्र करनेवाला, और सहनशील है, (17)

अल्लाह उसे भी जानता है, जो चीज़ दिखायी नहीं देती, और उसे भी जो चीज़ दिखायी देती है; वह बहुत ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (18)




नोट:

9: क़यामत के दिन को "तग़ाबुन" का दिन कहा गया है। तग़ाबुन के कई मतलब हैं, एक-दूसरे को नुक़सान में डाल देना, किसी चीज़ के न मिलने का दुख होना, एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करना आदि। चूंकि क़यामत के दिन लोगों को अपनी-अपनी पड़ी होगी, इसलिए यह एक दूसरे को नज़रअंदाज़ करने का दिन होगा, फिर यह कि जहन्नम में जाने वाले लोग जन्नतियों को देखकर अफ़सोस करेंगे कि काश उन्होंने भी अच्छे काम किए होते, तो यह एक-तरह से हार-जीत का भी दिन होगा। 


11: ईमानवालों को इस बात पर यक़ीन होना चाहिए कि कोई भी मुसीबत बिना अल्लाह के हुक्म के नहीं आती, इसलिए हर मुसीबत को धीरज [सब्र] के साथ बर्दाश्त करना चाहिए। इसे भी देखें 57:22


14: जो बीवी-बच्चे आदमी को अल्लाह के हुक्म के ख़िलाफ़ काम करने पर उकसाएं, वे आदमी के एक तरह से दुश्मन हैं, हाँ, अगर वे अपने ग़लत काम से तौबा करते हुए माफ़ी माँग लें,  तो उन्हें माफ़ कर देना चाहिए।


15: धन-दौलत और बाल-बच्चों के मोह में अल्लाह के हुक्म को भूल नहीं जाना चाहिए।


17: अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ देने का मतलब यह है कि नेक कामों में पूरे दिल से ख़र्च करना, बिना नाम कमाने की चाहत या दिखावा किए हुए। 



Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...