Saturday, December 17, 2016

सूरह 28 : अल क़सस [कहानी / The Story]

सूरह 28: अल-क़सस
 [कहानी / The Story]


01-02: किताब की आयतें (निशानियाँ) 

03-06: मूसा (अलै) की कहानी: परिचय 

07-14: मूसा का बचपन और उनकी शुरुआती ज़िंदगी 

15-28: मूसा की जवानी के दिन 

29-35: मूसा को पुकारा गया 

36-42: मूसा का फिरऔन के साथ संघर्ष 

43-51: मूसा की कहानी की (सच्चाई की) पुष्टि [confirmation]

52-55: जिन्हें पहले किताब दी गई थी, वे क़ुरआन पर विश्वास करते हैं 

56-59: मक्कावालों को मुहम्मद (सल्ल) का रास्ता अपनाने से नुक़सान का डर 

60-61: इस सांसारिक जीवन से आने वाली (आख़िरत की) ज़िंदगी कहीं बेहतर होगी 

62-67: फ़ैसले के दिन के दो दृश्य 

68-73: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

74-75: फ़ैसले का एक दृश्य

 

76-82: क़ारून की कहानी 

83-84: आख़िरत [परलोक] का घर

85-88: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ सीन/ सीम॰ मीम॰ (1)
यह (आसमानी) किताब की आयतें हैं जो चीज़ों को बिल्कुल स्पष्ट कर देती हैं: (2)
[ऐ रसूल] हम आपको सच्चाई से जुड़ी हुई, मूसा [Moses] और फ़िरऔन [Pharaoh] की कहानी का कुछ हिस्सा सुनाते हैं, उन लोगों के लिए जो ईमान रखते हैं। (3)
सचमुच फ़िरऔन ने धरती पर अपने आपको बहुत ही ऊँचा और ताक़तवर बना लिया था और वहाँ के लोगों को अलग अलग गिरोहों में बाँट रखा था: उनमें से एक गिरोह [इसराईल की संतानों] को उसने एकदम दबाकर रखा था, उनके बेटों को मार डालता और उनकी औरतों को ज़िंदा रहने देता--- सचमुच ही वह (समाज में) फ़साद व बिगाड़ [corruption] पैदा करने वालों में से था ----(4)
मगर हम यह चाहते थे कि उन लोगों पर उपकार करें जिन्हें ज़मीन पर इतना दबाकर रखा गया था, उन्हें नायक बनाएँ, और उन्हें (उस धरती का) वारिस बनाएं,  (5)
और ज़मीन पर उनके क़दम मज़बूती से जमा दें, और उनके द्वारा फ़िरऔन और हामान और उनकी सेनाओं को वही चीज़ दिखा दें, जिसका उन्हें डर था।  (6)
 
हमने यह कहते हुए मूसा की माँ के दिल में यह बात डाल दी कि, "इस (बच्चे) को दूध पिलाओ, फिर जब तुम्हें उसकी सुरक्षा ख़तरे में लगे, तो उसे (बक्से में रखकर) दरिया में डाल देना: डरो नहीं, और न ही दुखी हो, कि हम उसे ज़रूर तुम्हारे पास वापस भेज देंगे और उसे (एक दिन अपने) रसूलों में से एक बनाएँगे।" (7)
इस तरह, फ़िरऔन के लोगों ने उस बच्चे को (दरिया से) उठा लिया---- जो बाद में, उनका दुश्मन, और उनके लिए दुख व परेशानी का कारण बनने वाला था: सचमुच फ़िरऔन, हामान और उनकी सेनाओं में जो लोग थे वे ग़लती पर थे---- (8)
फ़िरऔन की पत्नी ने कहा, "इस (बच्चे को) देखकर मेरे और तुम्हारे मन में कितनी ख़ुशी हो रही है! (सचमुच यह हमारी आँखों की ठंढक है), इसकी हत्या न करो, शायद हमें इससे कुछ फ़ायदा पहुँचे, या हम इसे अपना बेटा ही बना लें।" (मगर उस समय) उन्हें मालूम न था कि वे क्या (भूल) कर बैठे थे! (9)
अगले दिन, मूसा की माँ ने अपने दिल में एक अजीब ख़ालीपन व बेक़रारी महसूस की---- अगर हमने (उस वक़्त) उनके दिल को मज़बूत करके उन्हें हमारी बातों में विश्वास रखने वाला न बनाया होता, तो मुमकिन था कि वह (बच्चे के बारे में) सब राज़ की बातें उगल देतीं---- (10)
मूसा की माँ ने उसकी बहन से कहा, "तू उसके पीछे-पीछे जा।" सो वह उसे दूर ही दूर से देखती रही, इस तरह कि उन्हें पता न चले  (11)
और हम यह तय कर चुके थे कि वह [मूसा] किसी भी दूध पिलानेवालियों का दूध पीने को तैयार नहीं होंगे। फिर मूसा की बहन ने उनके पास जाकर कहा कि "क्या मैं तुम्हें ऐसे घरवालों का पता बताऊँ, जो तुम्हारे लिए इस (बच्चे) की परवरिश करें और इसकी ख़ूब अच्छी तरह देखभाल करें?" (12)
इस तरह हमने बच्चे को उसकी माँ के पास वापस पहुँचा दिया, ताकि उसका मन शांत हो सके, वह दुखी न रहे और ताकि वह जान ले कि अल्लाह का वादा सच्चा होता है, किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते।  (13)
 
और जब मूसा अपनी जवानी को पहुँचे और पूरी तरह परिपक्व [mature] हो गए, तो हमने उन्हें (सही फ़ैसला करने की) गहरी समझ-बूझ [wisdom] प्रदान कर दी: और हम अच्छा कर्म करने वालों को ऐसा ही इनाम देते हैं। (14)
(एक दिन) मूसा जब शहर [मिस्र] में दाख़िल हुए, उस समय किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया, उन्होंने वहाँ दो आदमियों को लड़ते हुए पाया: एक तो उनकी बिरादरी के लोगों में से था और दूसरा उनके दुश्मन क़ौम का था। जो उनकी बिरादरी में से था, उसने अपने दुश्मन के मुक़ाबले में, उन्हें मदद के लिए पुकारा। इस पर मूसा ने उस (दुश्मन) को ऐसा घूँसा मारा कि वह मर ही गया। (मूसा अपने किए पर पछताने लगे) उन्होंने कहा, "यह ज़रूर किसी शैतान का काम है: सचमुच ही वह ऐसा दुश्मन है जो (आदमी को) बहका देता है।" (15)
उन्होंने कहा, "ऐ मेरे रब, मुझ से बहुत बड़ी ग़लती हो गयी। तू मुझे क्षमा कर दे,” सो अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया; सचमुच वह बेहद क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है। (16)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! जिस तरह तूने मुझ पर अपनी ख़ास मेहरबानी [blessings] की है, अब मैं भी कभी शैतानी करने वालों का मददगार नहीं बनूँगा।" (17)

अगले दिन, वह डरते हुए और चौकन्ना होकर शहर में चले जा रहे थे, कि अचानक क्या देखते हैं कि कल जिसकी मदद की थी, वही आदमी फिर उन्हें मदद के लिए पुकार रहा है। मूसा ने उससे कहा, "अरे तुम तो सचमुच बड़े बदमाश आदमी हो।” (18)
फिर जैसे ही मूसा ने इरादा किया कि वह उस आदमी को पकड़ ले, जो उन दोनों का शत्रु था, तो वह आदमी कहने लगा, "ऐ मूसा, क्या तू चाहता है कि मुझे भी मार डाले, जिस तरह तूने कल एक आदमी को मार डाला? धरती में सचमुच तू एक निर्दयी अत्याचारी बनकर रहना चाहता है; तू उन लोगों जैसा नहीं जो चीज़ों में सुधार लाते हैं।" (19)
फिर ऐसा हुआ कि शहर के दूरवाले इलाक़े से एक आदमी दौड़ता हुआ आया, और उसने कहा, "ऐ मूसा, कुछ सरदार तेरे बारे में परामर्श कर रहे हैं कि तुझे मार डालें, अतः तू यहाँ से निकल जा--- मेरी सलाह मान कि मैं तेरा भला चाहता हूँ।" (20)
सो मूसा डरते हुए और ख़तरा भाँपते हुए वहाँ से निकल खड़े हुए, और दुआ की, "ऐ मेरे रब! मुझे शैतान लोगों से बचा ले।" (21)

जब मूसा मदयन [Midian] जाने वाले रास्ते पर चल पड़े, तो उन्होंने कहा था, "आशा है, मेरा रब मार्गदर्शन करते हुए मुझे सही रास्ते पर डाल देगा।" (22)
और जब वह मदयन के कुंएँ पर पहुँचे, तो वहाँ उन्होंने लोगों के एक गिरोह को देखा कि वे अपने जानवरों को पानी पिला रहे थे, और उनके अलावा वहाँ दो औरतों को भी देखा, जो अपने जानवरों को रोके खड़ी थीं। मूसा ने उनसे कहा, "तुम दोनों का क्या मामला है?" उन्होंने कहा, "हम उस समय तक (अपने जानवरों को) पानी नहीं पिला सकते, जब तक ये चरवाहे अपने भेड़ों को लेकर चले नहीं जाते: हमारे बाप बहुत ही बूढ़े हैं।" (23)
तब मूसा ने उनकी ख़ातिर उनके जानवरों को पानी पिला दिया, और वहाँ से छायादार जगह के पास चले गए और दुआ की, "ऐ मेरे रब, जो कुछ भी अच्छी चीज़ हो सके, तू मेरी तरफ़ भेज दे, मैं उसका बहुत ज़रूरतमंद हूँ।" (24)
 
थोड़ी देर बाद, उन दो औरतों में से एक ज़रा शर्मायी हुई चाल से चलती हुई उनके पास आयी, और कहने लगी, "मेरे बाबा आपको बुला रहे हैं: आपने हमारे लिए जानवरों को जो पानी पिलाया है, उसके लिए वह आपको कुछ इनाम देना चाहते हैं।"
फिर जब मूसा उनके (बाबा के) पास पहुँचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनायी, तो उस बूढ़े आदमी ने कहा, "अब डरो नहीं, ग़लत काम करने वालों से बचकर तुम सुरक्षित जगह आ गए हो।" (25)
उनमें से एक औरत ने कहा, "बाबा! इनको मज़दूरी पर रख लीजिए: मज़दूरी पर रखने के लिए सबसे सही आदमी वही होता है, जो मज़बूत और भरोसेमंद हो।" (26)
उसके बाप ने कहा, "मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक का विवाह तुम्हारे साथ इस शर्त पर कर दूँ कि तुम आठ वर्ष तक मेरे यहाँ नौकरी करो: और यदि तुम दस वर्ष पूरे कर दो, तो यह तुम्हारी अपनी इच्छा होगी। मैं तुम्हें कठिनाई में डालना नहीं चाहता: अगर अल्लाह ने चाहा तो तुम मुझे सही व नेक आदमी पाओगे।" (27)
मूसा ने कहा, "तो मेरे और आपके बीच यह बात तय रही --- इन दोनों अवधियों में से जो भी मैं पूरी कर दूँ, तो मेरे साथ कोई अन्याय नहीं होगा ---- और जो कुछ हम कह रहे हैं, उसपर अल्लाह गवाह है।" (28)
एक बार जब मूसा तय की हुई अवधि पूरी कर चुके थे और अपने परिवारवालों को लेकर जा रहे थे, कि अचानक उन्हें तूर नामक पहाड़ के किनारे एक आग-सी दिखायी दी। उन्होंने अपने घरवालों से कहा, "ठहरो (यहाँ), मैंने एक आग देखी है। शायद मैं वहाँ से तुम्हारे पास (रास्ते की) कोई ख़बर ले आऊँ या तुम्हारे लिए एक जलती हुई लकड़ी मिल जाए जिससे तुम अपने आपको गर्मा सको।" (29)
मगर जब वह वहाँ पहुँचे, तो घाटी के दाहिनी तरफ़, एक पवित्र ज़मीन पर (लगे हुए) पेड़ से उन्हें पुकारती हुई आवाज़ आयी: "मूसा! मैं अल्लाह हूँ, सारे जहाँनों का पालनेवाला (रब!)। (30)
अपनी लाठी नीचे फेंक दो।" फिर जब मूसा ने देखा कि उनकी लाठी किसी साँप की तरह हिल-डुल रही है, तो वह मारे डर के पीठ फेरकर भागे और पीछे मुड़कर भी न देखा। फिर (से उन्हें पुकारा गया), "ऐ मूसा! सामने आओ और डरो नहीं! निस्संदेह तुम उनमें से हो जो पूरी तरह सुरक्षित हैं। (31)
अपना हाथ अपने गिरेबान में डालो और फिर बाहर निकालो तो वह सफ़ेद चमकता हुआ हो जाएगा, और वह भी बिना किसी ख़राबी (या नुक़सान) के--- और डर भगाना हो तो अपने बाज़ू को अपने बदन से सटा लेना। ये फ़िरऔन और उसके दरबारियों के लिए तेरे रब की ओर से दो निशानियाँ [लाठी व चमकता हाथ] होंगी; सचमुच वे बड़े शैतान लोग हैं।" (32)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! मैंने उनके एक आदमी को मार डाला था, और मुझे डर है कि वे कहीं मुझे मार न डालें। (33)
मेरे भाई हारून [Aaron] मुझसे कहीं अधिक साफ़ व प्रभावशाली भाषा बोलते हैं: उन्हें भी मेरी मदद के लिए मेरे साथ भेजें ताकि वह मेरी बातों का समर्थन करें--- मुझे डर है कि वे (लोग) मुझे झुठा कहेंगे।" (34)
अल्लाह ने कहा, "हम तुम्हारे भाई के द्वारा तुम्हारा हाथ मज़बूत कर देंगे; और हमारी निशानियों के साथ, तुम दोनों को इस तरह ताक़त व अधिकार देंगे कि वे तुम्हारे नज़दीक भी नहीं पहुँच सकेंगे। (अंत में) तुम और तुम्हारे माननेवालों की ही जीत होगी।" (35)
फिर जब मूसा उनके पास हमारी साफ़ व स्पष्ट निशानियाँ लेकर पहुँचे, तो उन्होंने कहा, "यह तो बस बनावटी जादू के करतब हैं; हमने तो यह बात अपने बाप-दादा से कभी नहीं सुनी।" (36)
मूसा ने कहा, "मेरा रब अच्छी तरह जानता है कि कौन उसके यहाँ से मार्गदर्शन लेकर आता है, और किसके पास (परलोक में) रहने का अंतिम ठिकाना [Final Home] होगा: ग़लत काम करने वाले कभी कामयाब नहीं होंगे।" (37)
फ़िरऔन ने (व्यंग्य से) कहा, "दरबारियो, अपने अलावा तो मैं तुम्हारे किसी देवता को नहीं जानता। ऐ हामान! तू मेरे लिए मिट्टी की ईंटों को आग में पकवाकर मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना कि मैं उसपर चढ़कर मूसा के ख़ुदा तक पहुँच सकूँ: मैं यक़ीन से कह सकता हूँ कि यह झूठ बोल रहा है।" (38)
फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने बिना किसी अधिकार के धरती पर घमंड भरा व्यवहार किया---- और समझा कि उन्हें हमारे पास वापस नहीं लाया जाएगा-----  (39)
अन्त में हमने उसे और उसकी सेनाओं को अपनी पकड़ में ले लिया और उन्हें समंदर में फेंक दिया। अब देख लो कि ग़लत काम करने वालों का क्या नतीजा हुआ! (40)
और हमने उन्हें (दूसरों को जहन्नम की) आग की ओर बुलानेवालों का नेता बना दिया: क़यामत के दिन उनकी कोई मदद नहीं की जाएगी।  (41)
और हमने इस दुनिया में उनके पीछे लानत [श्राप] लगा दी और क़यामत के दिन वे घृणित लोगों में शामिल होंगे। (42)
पिछली नस्लों को बर्बाद कर देने के बाद हमने मूसा को एक किताब [तोरात/ Torah] दी थी, जिसमें लोगों के लिए समझदारी की बातें, मार्गदर्शन और दयालुता [रहमत/Mercy] थी, ताकि वे उस पर ध्यान दें और इससे नसीहत ले सकें।  (43)
[ऐ रसूल] आप तो (तूर) पहाड़ के पश्चिमी किनारे पर मौजूद नहीं थे, जब हमने मूसा को अपने धर्म आदेश [commandments] दिए थे: आप वहाँ इस घटना को देखने वालों में भी नहीं थे--- 44)
बल्कि हमने बहुत-सी नस्लें पैदा कीं, जिन्होंने इस दुनिया में बहुत लम्बी ज़िंदगियाँ गुज़ारीं --- आप तो मदयन [Midian] के लोगों के बीच (भी) नहीं रहते थे, और न ही आपने हमारे संदेश [आयतें] उन लोगों को सुनाए----हमने लोगों के पास अपने रसूलों को (अपने संदेश के साथ) हमेशा ही भेजा है---- (45)
और न ही आप सीना की पहाड़ी [Mount Sinai] के किनारे ही मौजूद थे, जब हमने मूसा को पुकारा था। मगर आपको रब की तरफ़ से रहमत [grace] के रूप में भेजा गया है, ऐसे लोगों को सावधान करने के लिए जिनके पास आपसे पहले कोई सावधान करने वाला नहीं आया, ताकि वे ध्यान दें व नसीहत ले सकें।  (46)
और उनके हाथों द्वारा किए गए करतूतों के नतीजे में अगर कोई बड़ी आफ़त उन पर आ जाए, तो वे यह न कह सकें कि, "ऐ हमारे रब, अगर तूने हमारे पास कोई रसूल भेजा होता तो शायद हमने तेरी आयतों का अनुसरण किया होता और हम भी विश्वास करनेवालों में [मोमिन] शामिल हो जाते?" (47)
मगर अब, जबकि हमारी तरफ़ से सच्चाई उनके पास आ चुकी है, तब भी वे कहते हैं, "उनको [मोहम्मद] क्यों नहीं वैसी निशानियाँ दी गयीं, जैसी कि मूसा को मिली थीं?" मगर जो (निशानियाँ) इससे पहले मूसा को दी गयी थीं, क्या उन लोगों ने उस सच्चाई को भी मानने से इंकार नहीं कर दिया था? वे कहते हैं, "दोनों [क़ुरआन व तोरात] दो क़िस्म के जादू हैं, जो एक-दूसरे की (सच्चाई की) पुष्टि करते हैं", और "हम तो दोनों में किसी एक को भी मानने से इंकार करते हैं।" (48)
[ऐ रसूल] आप कहें, "ठीक है, अगर तुम सच कहते हो, तो ले आओ अल्लाह के यहाँ से कोई ऐसी किताब, जो इन दोनों से ज़्यादा सही रास्ता दिखानेवाली हो, ताकि मैं भी उसका अनुसरण करूँ?" (49)
अब अगर वे आपकी बात का जवाब न दे पाएं, तो जान लें कि वे केवल अपनी इच्छाओं के पीछे चलने वाले हैं। उस आदमी से बढ़कर भटका हुआ कौन होगा जो अल्लाह के मार्गदर्शन के बिना, केवल अपनी इच्छाओं के पीछे चलता हो? सचमुच अल्लाह ग़लत काम करनेवालों को सही मार्ग नहीं दिखाता। (50)
हम उनके पास अपनी वाणी [क़ुरआन] पहुँचाते रहते हैं, ताकि वे ध्यान से सोच-विचार करें।  (51)
जिन लोगों को हमने इससे पहले (आसमानी) किताब दी थीं, वे इस [क़ुरआन] में विश्वास कर लेते हैं।  (52)
और जब यह उनके सामने पढ़कर सुनायी जाती है, तो कहते हैं, "हम इस पर विश्वास [ईमान] रखते हैं, सचमुच हमारे रब की ओर से यह सत्य है। हम तो इसके आने के पहले से ही उस [अल्लाह] पर पूरी भक्ति से समर्पित [मुस्लिम] थे।" (53)
ऐसे लोगों को दुगना इनाम दिया जाएगा, क्योंकि वे सब्र के साथ जमे रहते हैं, भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते हैं, और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दी है, उसमें से दूसरों को भी देते हैं, (54)
और जब कभी वे बेकार की फ़ालतू बातें सुनते हैं, तो यह कहते हुए वहाँ से किनारे हट जाते हैं कि "हमारे लिए हमारे कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। तुम पर सलामती हो! हम जाहिल लोगों के साथ (उलझना) नहीं चाहते।" (55)
[ऐ रसूल] आप जिसे चाहें, हर एक को सच्चाई की राह पर नहीं ला सकते; यह तो अल्लाह है कि जिसे चाहता है राह दिखा देता है: वह अच्छी तरह जानता है कि वे कौन लोग हैं जो बताए गए सही रास्ते पर चलेंगे।  (56)
वे कहते हैं, "अगर हम आप [मोहम्मद] के साथ आपके बताए हुए रास्ते पर चलेंगे, तो हमें अपनी ज़मीन से उखाड़कर फेंक दिया जाएगा।" क्या हमने उनके लिए (मक्का के रूप में) एक सुरक्षित जगह [sanctuary] की स्थापना नहीं की, जहाँ हमारी ओर से रोज़ी के रूप में हर क़िस्म की पैदावार (और फल) लाए जाते हैं? मगर ज़्यादातर लोग समझते नहीं हैं।  (57)
हम कितनी ही बस्तियों को बर्बाद कर चुके हैं, जो कभी अपने बेहिसाब धन-दौलत और आराम की ज़िंदगी के लिए जानी जाती थीं: उस वक़्त से लेकर आज तक, कुछ एक को छोड़कर, वे बस्तियाँ शायद ही फिर कभी दोबारा आबाद हो पायीं--- अन्ततः हम ही इसके वारिस हुए!  (58)
आपका रब कभी भी बस्तियों को उस वक़्त तक तबाह-बर्बाद नहीं करता जब तक कि पहले उनकी बस्ती में से कोई रसूल [Messenger] न ख़ड़ा कर दे, जो हमारे संदेशों [आयतों] को उनके सामने सुनाए। और न ही हम बस्तियों को उस वक़्त तक बर्बाद करते हैं, जब तक कि वहाँ के रहनेवाले शैतानी न करने लग जाएं।  (59)
जो भी चीज़ें तुम्हें इस संसार में दी गई हैं, वह तो बस (कुछ ही दिनों के लिए) इसी जीवन की ख़ुशियाँ हैं और उनकी सजावट के सामान हैं: और जो कुछ अल्लाह के पास है वह कहीं बेहतर और कहीं अधिक समय तक रहने वाला है--- तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लोगे? (60)
भला वह आदमी जो उस अच्छे वादे को पूरा होता हुआ देखेगा जो हमने उसके साथ कर रखा था, क्या उसकी तुलना एक ऐसे आदमी से हो सकती है जिसे हमने इस सांसारिक जीवन में थोड़ी सी ख़ुशियाँ दे रखी हों, और फिर वह क़यामत के दिन पकड़कर (सज़ा के लिए) पेश किया जाने वाला हो? (61)
एक दिन आएगा जिस दिन अल्लाह उन्हें पुकारेगा और कहेगा, "कहाँ हैं मेरे वे (ख़ुदायी में) साझेदार [Partners], जिनके (देवता होने का) तुम दावा करते थे?" (62)
और वे [बड़े सरदार] जिनके ख़िलाफ़ फ़ैसला सुना दिया जाएगा, वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! ये वे लोग हैं जिन्हें हमने बहका दिया था। चूँकि हम स्वयं बहके हुए थे, सो हमने इन्हें भी बहका दिया, लेकिन अब हम तेरे सामने इनसे अपना सम्बन्ध तोड़ते हैं: सच बात तो यह है कि ये हमारी बन्दगी करते ही नहीं थे।" (63)
उसके बाद उन (काफिरों) से कहा जाएगा, "पुकारो उन सबको, जिन्हें तुम (अल्लाह के) साझेदार [Partners] के रूप में पूजते थे," तो वे उन्हें पुकारेंगे, मगर उन्हें कोई जवाब नहीं मिलेगा। वे अपनी आँखों से उस दी जा रही यातना को देखेंगे, और सोचेंगे कि काश उन्होंने सही मार्गदर्शन को मान लिया होता! (64)
और उस दिन अल्लाह उन्हें अपने सामने बुलाकर पूछेगा, "तुमने हमारे रसूलों को क्या जवाब दिया था?" (65)
उस दिन सारी दलीलें उन्हें बेमानी लगेंगी; वे एक दूसरे से सलाह मशविरा भी नहीं कर पाएंगे।  (66)
मगर हाँ, जिस किसी ने (गुनाहों से) तौबा कर ली, (अल्लाह में) विश्वास [ईमान] रखा, और अच्छे कर्म किए, तो वह सफल होने वालों में अपने आपको शामिल करने की आशा रख सकता है। (67)
तेरा रब जो चाहता है पैदा करता है, और जिसे चाहता है चुन लेता है--- चुनने का उन्हें कोई अधिकार नहीं--- सो अल्लाह महान है, और उनके ठहराए हुए अल्लाह (के झूठे) साझेदारों [Partners] से कहीं ऊँचा व बड़ा है!  (68)
तेरा रब वह भी जानता है जो कुछ उनके सीनों के अंदर छिपा होता है, और वह भी जो वे सामने बता देते हैं। (69)
वह अल्लाह है; उसको छोड़कर कोई भी बंदगी के लायक़ नहीं; सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं —--- इस जीवन में भी और आनेवाले जीवन [परलोक] में भी; अंतिम फ़ैसले का अधिकार उसी के हाथ में है और उसी के पास तुम को लौटकर जाना होगा।  (70)
‍‍[ऐ रसूल] आप कहें, "ज़रा सोचो, अगर अल्लाह क़यामत के दिन तक तुम्हारे ऊपर लगातार रात कर दे, तो अल्लाह को छोड़कर कौन सा देवता है जो तुम्हारे लिए रौशनी ला सके? तो क्या तब भी, तुम सुनते नहीं?" (71)
कह दें, "ज़रा सोचो, अगर अल्लाह क़यामत तक तुम्हारे ऊपर लगातार दिन कर दे, तो अल्लाह को छोड़कर कौन सा देवता है जो तुम्हारे आराम के लिए रात ला सके? तो क्या तब भी, तुम देखते नहीं? (72)
यह तो उसकी रहमत है कि उसने तुम्हें रात और दिन दिए हैं, ताकि तुम रात में आराम पा सको, और दिन के समय रोज़ी तलाश कर सको, और ताकि तुम शुक्र अदा कर सको।" (73)
एक दिन आएगा जिस दिन वह उन्हें बुलाएगा और कहेगा, "कहाँ है मेरी (ख़ुदायी में) गढ़े हुए साझेदार [partners], जिनके (देवता होने का) तुम दावा करते थे ?"(74)
और हम हर एक समुदाय में से एक गवाह को बुलाएंगे और कहेंगे, "पेश करो अपना सबूत।" और तब वे जान लेंगे कि सच्चाई तो केवल अल्लाह के पास है; और उनके द्वारा गढ़े हुए ख़ुदा उन्हें छोड़ देंगे। (75)
क़ारून [Korah] मूसा की क़ौम में से था, मगर वह उनपर बड़े ज़ुल्म करता था। हमने उसे इतने ख़ज़ाने दे रखे थे कि उनकी कुंजियों को रखना मज़बूत लोगों के दल के लिए भी बड़ा भारी काम था। (याद करो जब) उसकी क़ौम के लोगों ने उससे कहा, "इतराओ मत! क्योंकि सचमुच अल्लाह इतरानेवालों को पसन्द नहीं करता।  (76)
और जो कुछ अल्लाह ने तुझे दे रखा है, उसकी मदद से आने वाली दुनिया [आख़िरत] में भी अपने लिए अच्छा ठिकाना माँगो, और इस दुनिया में भी तुम्हारी क़िस्मत से जो हिस्सा मिला है, उसे भी नज़रअंदाज़ न करो। दूसरों के साथ भलाई करो, जैसा कि अल्लाह ने तेरे साथ भलाई की है। और धरती पर गड़बड़ी पैदा करने की कोशिश मत करो, निश्चय ही अल्लाह गड़बड़ी [corruption] पैदा करने वालों को पसन्द नहीं करता", (77)
लेकिन उसने जवाब दिया, "मुझे तो यह दौलत मेरे अपने ज्ञान के कारण मिली है।" क्या वह नहीं जानता था कि अल्लाह ने उससे पहले कितनी ही नस्लों को तबाह कर दिया, जो ताक़त में उससे बढ़-चढ़कर थीं और धन-दौलत भी उन्होंने ज़्यादा जमा कर रखा था? अपराधियों से तो उनके गुनाहों के विषय में पूछा भी नहीं जाएगा (बल्कि उन्हें बताया जाएगा)।  (78)
फिर (एक दिन) वह अपनी क़ौम के सामने पूरी आन-बान से निकला, और जिन लोगों का मक़सद इसी सांसारिक जीवन को पाना था, उन्होंने कहा, "काश हमें भी कुछ ऐसी चीज़ें दी गयी होतीं, जैसी कि क़ारून को मिली हैं: सचमुच वह बड़ा ही भाग्यशाली आदमी है।" (79)
मगर जिनको ज्ञान दिया गया था, उन्होंने कहा, "अफ़सोस तुम पर! अल्लाह का इनाम उन लोगों के लिए कहीं अच्छा है जो विश्वास [ईमान] रखते हैं और अच्छा कर्म करते हैं: मगर यह केवल उन्हीं को हासिल होगा जो धीरज व सब्र से जमे रहते हैं।" (80)
अन्ततः हमने उसको और उसके घर को धरती में धँसा दिया: उसके पास कोई न था जो अल्लाह के मुक़ाबले में उसकी सहायता करता, और न ही ख़ुद वह अपना बचाव कर सका।  (81)
अगले दिन, वही लोग, जिन्होंने एक दिन पहले यह कामना की थी कि काश वे उसकी जगह होते, कहने लगे, "अफ़सोस [तुम पर, क़ारून!], यह तो अल्लाह ही है कि जो चाहता है देता है, किसी को ज़्यादा तो किसी को कम, और अपने बंदों में जिसे चाहता है, उसे देता है: अगर अल्लाह ने हम पर उपकार न किया होता तो हमें भी धरती में धँसा देता। अफ़सोस उस पर! सच्चाई को मानने से इंकार करने वाले कभी कामयाब नहीं होंगे।"(82)

यह वो आख़िरत [परलोक, Hereafter] का घर है जिसे हम उन लोगों को देना मंज़ूर करेंगे, जो ज़मीन पर अपनी बड़ाई नहीं चाहते, और न ही गड़बड़ी [corruption] फैलाते हैं: अच्छा अंत तो उन्हें ही मिलेगा, जो अपने दिल में अल्लाह का डर रखता हो और बुराइयों से बचता हो।  (83)
जो कोई भी अल्लाह के सामने अच्छे कर्म लेकर आया, तो उसे बदले में उससे कहीं अच्छा इनाम मिलेगा; और जो कोई बुरे कर्मों को लेकर आएगा, तो उस कुकर्मी को वैसी ही सज़ा दी जाएगी जैसा कि उसने कर्म किया होगा। (84)
जिसने इस क़ुरआन की ज़िम्मेदारी [ऐ रसूल] आप पर डाली है, वह आपको वापस (आपके) असली घर तक ज़रूर पहुँचा देगा। अत: कह दें, "मेरा रब उसे अच्छी तरह से जानता है कि कौन मार्गदर्शन लेकर आया, और कौन है जो खुली गुमराही में पड़ा है।" (85)
आपको ख़ुद ही यह उम्मीद नहीं थी कि आप पर किताब उतारी जाएगी; ऐसा तो केवल आपके रब की रहमत [दयालुता, mercy] के कारण हआ। अतः आप (सच्चाई से) इंकार करने वालों के मददगार न बनें। (86)
अब जबकि आप पर (अल्लाह की) आयतें [revelations] उतारी जा चुकी हैं, तो देखना ऐसा न हो कि वे आपको अल्लाह की आयतों से मुँह मोड़ने पर मजबूर करें। आप लोगों को अपने रब की ओर बुलाएं। और कभी भी उनमें से न हो जाएं जो हमारी ख़ुदायी में साझेदार [Partner] बना लेते हैं। (87)
अल्लाह के साथ किसी दूसरे देवता को न पुकारो, क्योंकि उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं। हर चीज़ एक दिन ख़त्म हो जाएगी सिवाए उस (अल्लाह) के स्वरूप के। आख़िरी फ़ैसला उसी के हाथ में है, और उसी के पास तुम सबको वापस ले जाया जाएगा।  (88)
 
 
 
नोट: 

4: फ़िरऔन के एक भविष्यवक्ता ने उसे बताया था कि इसराईल की संतानों में से एक आदमी तुम्हारी सल्तनत समाप्त करेगा, इसीलिए उसने हुक्म दिया था कि उनके यहाँ जो भी बेटा पैदा हो, उसे मार दिया जाए।

7: दरिया यानी नील नदी।

12: फ़िरऔन की बीवी का नाम आसियाबताया जाता है, जब उन्होंने तय कर लिया कि बच्चे को पालना है, तो दूध पिलाने वालियों की खोज शुरू हुई। इतने में वहाँ मूसा (अल.) की बहन पहुँच गईं।

17: फ़िरऔन की हुकूमत में मिस्र के लोग इसराइलियों पर ख़ूब अत्याचार किया करते थे, इस घटना के बाद मूसा (अलै.) ने फ़ैसला किया कि अब वे फिरऔन और उनके कारिंदों से अलग-थलग हो जाएंगे और उनकी कोई मदद नहीं करेंगे।

19: मूसा (अलै) ने शायद अपना हाथ उस मिस्री की तरफ़ उठाया था ताकि उसे एक इसराइली को मारने से रोक सकें।

22: फ़िरऔन की सल्तनत के बाहर मदयन नाम की एक बस्ती थी जहाँ की क़ौम के बीच हज़रत शोएब (अलै.) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था।

26: “मज़दूरी” यानी जानवरों को चराने और उनको पानी पिलाने का काम।

34: जैसा कि सूरह ताहा (20: 25) में आया है कि बचपन में मूसा (अलै.) ने ग़लती से एक अंगारा ज़बान पर रख लिया था, जिसकी वजह से उनकी ज़बान थोड़ी सी लड़खड़ाती थी।

48: मूसा (अलै.) को पूरी तोरात एक ही बार में दी गयी थी, कुछ लोग यह कहते थे कि क़ुरआन भी उसी तरह एक ही बार में क्यों नहीं उतरी?

51: क़ुरआन के हिस्से ज़रूरत के हिसाब से थोड़ा-थोड़ा करके उतरते थे।

52: यानी यहूदी और ईसाई जिनको आसमानी किताबें दी गयी थीं, उनमें से कुछ लोग क़ुरआन पर विश्वास कर लेते थे।

57: मक्का के बहुदेववादियों को लगता था कि काबा में जो इतने बुत हैं उन्हीं की वजह से पूरे अरब में उनकी इज़्ज़त है, और अगर उन लोगों ने इस्लाम अपना लिया तो उनकी इज़्ज़त, व्यापार आदि सब ख़त्म हो जाएगा और उन्हें वहाँ से निकाल बाहर किया जाएगा।

68: यहाँ रसूल या पैग़म्बर चुनने की बात हो रही है, मक्का के लोग यह भी कहते थे कि अल्लाह ने अगर चुना भी तो मुहम्मद को ही क्यों चुना, मक्का या तायफ़ के बड़े सरदारों को क्यों नहीं!

80: क़ुरआन में “सब्र” का मतलब यह है कि इंसान को चाहिए कि अपने मन की बेजा इच्छाओं को नियंत्रण में रखते हुए अपने आपको अल्लाह की आज्ञाओं को मानने वाला और उसपर जमे रहना वाला बनाना चाहिए।  

85: असली घर या “लौटने की जगह” से मतलब यहाँ मक्का बताया गया है। यह आयत उस समय उतरी जब मुहम्मद (सल्ल) मक्का से (हिजरत करके) मदीना जा रहे थे, जब आप “जुहफ़ा” पहुँचे जहाँ से मक्का का रास्ता अलग होता था, तो आपको अपना घर छोड़ने का दर्द हुआ, यहाँ आपको तसल्ली दी गयी है कि आपको आपके असली घर में पहुँचा दिया जाएगा। कुछ विद्वानों ने लौटने की जगह का मतलब जन्नत से लिया है जहाँ आपको अंत में पहुँचा दिया जाएगा।

 

 


Thursday, November 10, 2016

सूरह 32 : अस-सज्दा [नमाज़ में सर झुकाना, Bowing Down in Worship]

सूरह 32: अस-सज्दा
 [नमाज़ में सर झुकाना, Bowing Down in Worship]



01-03: किताब [क़ुरआन] और सावधान करने वाला 

04-09: अल्लाह को हर चीज़ पैदा करने की ताक़त 

10-14: विश्वास न करने वाले क़यामत के दिन दोबारा उठाए जाने को नहीं मानते 

15-22: इनाम और सज़ा 

23-25: मूसा की किताब और इसराईल की संतानें 

26-30: ईमानवालों को प्रमाण मिल जाना 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)

यह किताब [क़ुरआन], जो हर तरह के संदेह से परे है, सारे संसार के रब की ओर से उतारी जा रही है। (2)

इसके बावजूद, वे यही कहते हैं, "मुहम्मद ने इसे स्वयं ही गढ़ लिया है!" बिल्कुल नहीं!, यह तो वह सच्चाई (की बातें) हैं जो [ऐ रसूल], आपके रब की तरफ़ से आपके लिए हैं, जिससे आप उन (मक्का के) लोगों को सावधान कर दें जिनके पास इससे पहले सावधान करने वाला कोई नहीं आया था, ताकि उन्हें सही मार्ग दिखाया जा सके।  (3)

यह तो अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को और वह सारी चीज़ें जो दोनों के बीच में हैं, छह दिनों में पैदा किया। फिर उसने अपने आपको सिंहासन पर स्थापित किया। तुम (लोगों) के पास उस (अल्लाह) के सिवा कोई नहीं जो तुम्हारी रक्षा कर सके, और न कोई है जो तुम्हारे लिए सिफ़ारिश कर सके। तो फिर क्यों तुम (नसीहत पर) ध्यान नहीं देते? (4)

वह आसमान से लेकर ज़मीन तक, हर एक चीज़ को सही ढंग से चलाता है, और अंत में, एक दिन हर एक चीज़ चढ़कर उसके पास पहुँच जाएगी, और वह (क़यामत का) दिन तुम्हारे हिसाब से एक हज़ार साल के बराबर का होगा। (5)

वह ऐसा है जो सब जानता है --- वह चीज़ भी जो दिखायी नहीं देती हो और वह भी जो दिखायी देती हो, वह बहुत प्रभुत्वशाली व हर एक पर दयावान है,  (6)

जिसने हर एक चीज़ को बिल्कुल सही [Perfect] रूप दिया है। उसने आदमी को पहले मिट्टी से बनाया,  (7

फिर उसकी नस्लों को मामूली से तरल पदार्थ [वीर्य, Semen] के सत [extract] से बनाया।  (8)

फिर उसके (शरीर के आकार को) ठीक-ठाक किया; और फिर उसमें अपनी रूह (आत्मा) फूँकी; उसने तुम्हें सुनने की, देखने की, और सोचने की क्षमता दी। मगर, तुम बदले में बहुत कम ही (मेरा) शुक्र अदा करते हो!  (9)

वे कहते हैं, "क्या? जब हम (मर के) मिट्टी में मिल चुके होंगे, तो फिर क्या सचमुच हम नए सिरे से पैदा किए जाएंगे?” असल में, वे अपने रब से होने वाली मुलाक़ात को मानने से इंकार करते हैं।  (10)

कह दें, "मौत का फ़रिश्ता जो तुम पर नियुक्त है, वह तुम्हें फिर से अपने क़ब्ज़े में ले लेगा, और फिर तुमको अपने रब के पास लाया जाएगा।" (11)

[ऐ रसूल] काश आप शैतानी करने वालों को देख पाते जो अपने रब के सामने सिर झुकाए हुए (खड़े) होंगे (और कहेंगे): "हमारे रब! अब हमने देख भी लिया और सुन भी लिया, हमें वापस (दुनिया में) भेज दे ताकि हम अच्छे कर्म कर सकें। अब हमें पूरा विश्वास हो गया है।" (12

अगर हमने ऐसा चाहा होता, तो हमने ज़रूर हर आदमी को (पहले से ही) सच्चे व सही रास्ते पर चलाया होता, मगर मेरी कही हुई बात ही सच हुई है, (जब मैंने कहा था) कि "मैं जहन्नम को अवश्य ही जिन्नों और इंसानों— सब से भर दूँगा।" (13

“जिस तरह तुम उस (क़यामत के) दिन हम से होने वाली मुलाक़ात को भुलाए बैठे थे, अब हम भी तुम्हें (उसी तरह) भुला देंगे: जो कुछ भी तुम किया करते थे, उसके बदले में अब चखो मज़ा कभी न ख़त्म होने वाली यातनाओं का!” (14)
 

हमारी आयतों [संदेशों] पर तो बस वही लोग सच्चा ईमान रखते हैं, जिन्हें उन (आयतों) के द्वारा जब नसीहत दी जाती है, तो वे हमारे सामने (सज्दे में) अपनी गर्दन झुका देते हैं, अपने रब की बड़ाई का गुणगान करते हैं, और घमंड में अपने आपको बड़ा नहीं समझते।  (15)

(रात में सोते हुए) वे अपने बिस्तरों को छोड़कर उठ जाते हैं, डर और उम्मीद (के मिले-जुले भाव) के साथ अपने रब की इबादत करते हैं; और जो भी हमने उन्हें दिया है, उसमें से कुछ दूसरों को भी देते हैं।  (16

किसी (जान) को भी मालूम नहीं कि जो कुछ (अच्छे कर्म) वे करते हैं, उसके बदले इनाम में उन्हें कितनी ख़ुशी मिलेगी जो छुपाकर ख़ास तौर से रखी गयी है।  (17)

भला जो आदमी (अल्लाह पर) ईमान रखता हो, वह उस आदमी के बराबर कैसे हो सकता है जो अल्लाह को मानता ही न हो? नहीं, वे बराबर नहीं हो सकते!  (18)

जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, उनके लिए बाग़ों [जन्नत] में हमेशा रहने का घर होगा, और यह इनाम होगा उन (नेक) कर्मों का जो उन्होंने किया होगा।  (19)

रहे वे लोग जो अल्लाह के हुक्म को नहीं मानते, उनका घर (जहन्नम की) आग होगा। जब कभी वे वहाँ से भागने की कोशिश करेंगे, उन्हें पकड़कर फिर उसी (आग) में डाल दिया जाएगा और उनसे कहा जाएगा, "चखो उस आग की यातना का मज़ा, जिसे तुम हमेशा झूठ समझते थे।" (20)

हम उन्हें (परलोक की) बड़ी यातना से पहले, (इसी दुनिया में) छोटी यातना का मज़ा चखाएँगे, ताकि शायद वे (विचार करें और) सही मार्ग पर (वापस) आ जाएं।  (21)

उस आदमी से बढ़कर ग़लत काम [ज़ुल्म] करने वाला कौन होगा जिसके सामने जब उसके रब की आयतों को पढ़कर सुनाया जाता है, तो वह उनसे मुँह मोड़कर चला जाए? निश्चय ही हम अपराधियों को कड़ी सज़ा देंगे।  (22)


हमने मूसा [Moses] को (आसमानी) किताब [तोरात/Torah] दी थी --- अतः [ऐ मुहम्मद] आपको इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि आपको भी (आसमानी) किताब दी जा रही है---- और हमने इसराईल की सन्तान के लिए उस (किताब) को सही रास्ता दिखाने वाली बनाया था।  (23)

जब वे धीरज रखते हुए (सच्चाई पर) जम गए, और हमारी आयतों पर पक्का विश्वास करने लगे, तब हमने उनमें से नायकों [leaders] को उठाया, जो हमारे आदेश से (लोगों को) मार्ग दिखाते थे। (24)

[ऐ रसूल], आपका रब है जो क़यामत के दिन उनके बीच उन बातों का फ़ैसला कर देगा, जिनमें वे मतभेद करते रहे हैं।  (25)


क्या उनके लिए यह सी़ख लेने की चीज़ नहीं कि (वे देखते कि) उनसे पहले, कितनी ही नस्लों को हम बर्बाद कर चुके हैं, जिनके रहने-बसने की जगहें (अब खंडहर बन चुकी हैं), जिनके बीच से वे चलते-फिरते हैं? सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं---- फिर क्या वे सुनते नहीं? (26)

क्या उन्होंने देखा नहीं कि हम किस तरह बारिश को सूखी बंजर ज़मीन की ओर खींचकर ले जाते हैं। फिर उसके द्वारा खेती उगाते हैं, जिसमें से उनके चौपाए भी खाते है और वे ख़ुद भी खाते हैं? तो क्या उन्हें सूझता नहीं? (27)

वे कहते हैं कि "यह फ़ैसला कब होगा, बताओ अगर तुम सच्चे हो?" (28

कह दें कि "(सच्चाई से) इंकार करने वाले अगर फ़ैसले के दिन, विश्वास कर भी लें, तब भी उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होगा; उन्हें कोई ढील नहीं दी जाएगी।" (29)

सो [ऐ रसूल], आप उनसे मुंह मोड़कर अलग हो जाएं, और इंतज़ार करें: वे भी इंतज़ार कर रहे हैं।  (30)



नोट:

3: मक्का के इलाक़े में जब से मूर्तियों की पूजा शुरू हुई और ज़्यादातर लोग बहुदेववादी हो गए,  उस समय से वहाँ कोई नबी नहीं आया था जो अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुँचाता। हाँ, कुछ लोग ज़रूर निजी स्तर पर एक अल्लाह की सच्चाई का संदेश देते रहते थे।

4: अरब के लोग देवी-देवताओं की पूजा इसलिए करते थे कि वे उनकी ज़रूरतों के लिए अल्लाह से सिफ़ारिश करेंगे, जैसा कि सूरह यूनुस (10:18) में आया है।

13: जिन्नों और इंसानों को पहली बार बनाने का मक़सद ही यह था कि उन्हें दुनिया में भेजकर आज़माया जाए। उसी समय यह बात तय कर दी गई थी कि अगर वे नबियों के मार्गदर्शन को मानते हुए सही रास्ते पर चलते हैं तो उन्हें जन्नत मिलेगी, और जो कोई सच्चाई को मानने से इंकार करेगा, उसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा।

26: अरब के व्यापारियों का कारवाँ अक्सर पुरानी क़ौमों के खंडहरों से होकर गुज़रता था, जैसे समूद की क़ौम के टूटे-फूटे खंडहर इन्हीं रास्तों में पड़ते थे।

 



Friday, November 4, 2016

सूरह 31 : लुक़मान [हकीम लुक़मान / Sage Luqman]

सूरह 31: लुक़मान 
[हकीम लुक़मान / Sage Luqman]



01-09: एक किताब जो रास्ता दिखाने वाली है, उसका मज़ाक़ उड़ाया गया 

10-11: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

12-19: अपने बेटे को हकीम लुक़मान की सलाह

20-26: विश्वास न करने वाले शुक्र अदा नहीं करते, और हठधर्म हैं 

   27: अल्लाह का भेजा संदेश ख़त्म नहीं होने वाला 

   28: पैदा करना और दोबारा ज़िंदा करके उठाना दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं है 

29-32: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

33-34: क़यामत की घड़ी का आना पक्का है   

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)
(जो आयतें उतर रही हैं) यह गहरी समझ-बूझ से भरी हुई किताब [क़ुरआन] की आयतें हैं,  (2)
मार्ग दिखानेवाली हैं, और उनके लिए रहमत [mercy] है जो अच्छा कर्म करते हैं, (3)
जो नमाज़ को पाबंदी से अदा करते हैं, ज़कात [दान] देते हैं और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] पर पक्का विश्वास रखते हैं:  (4)
वही हैं जिनको रब ने सही मार्ग दिखाया है, और वही हैं जो कामयाब होंगे।  (5)
लोगों में एक ऐसा आदमी है जो (क़ुरआन से लोगों के) ध्यान को दूर हटा देने वाली चीज़ों [कहानी, खेल तमाशे] पर पैसे ख़र्च करता है, बिना किसी जानकारी के, इस इरादे से कि दूसरों को अल्लाह के रास्ते से भटका सके, और उस (अल्लाह के रास्ते का व उसकी निशानियों) का मज़ाक़ उड़ा सके। उसके लिए अपमानित करने वाली यातना होगी!  (6)
जब उसे हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, तो वह नफ़रत व उपेक्षा से पीठ फेरकर चल देता है, मानो उसने कुछ सुना ही नहीं, या मानो कानों से वह बहरा हो। यह ख़बर उसे सुना दें कि उसे बड़ी दर्दनाक यातना होगी!  (7)

मगर जो लोग (सच्चाई में) विश्वास [ईमान] रखते हैं, और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो उनके लिए नेमत-भरे बाग़ [जन्नत, Garden of bliss] हैं, (8)
जहाँ वे (हमेशा) रहेंगे: यह अल्लाह का सच्चा वादा है, और वह बहुत प्रभुत्वशाली, और गहरी समझ-बूझ रखने वाला है।  (9)
उसने आसमानों को ऐसा बनाया है कि तुम देख सकते हो कि वह बिना किसी सहारे के थमा हुआ है, और उसने ज़मीन में मज़बूत पहाड़ों को जमा दिया ताकि तुम्हारे नीचे (की ज़मीन) हिले-डुले नहीं---- और उसमें हर प्रकार के जानवर चारों ओर फैला दिए। और हमने आसमान से पानी बरसाया, जिससे हमने धरती पर हर प्रकार की अच्छी वनस्पतियाँ उगा दीं: (10)
यह सभी चीज़ें अल्लाह की रची हुई हैं। अब तुम ज़रा मुझे दिखाओ कि (अल्लाह को छोड़कर) जिन्हें तुम पूजते हो, उन्होंने क्या पैदा कर दिया है! नहीं, यह (सच्चाई में) विश्वास न करने वाले साफ़ तौर से भटके हुए हैं। (11)
और हमने लुक़मान को गहरी समझ-बूझ दी थी: “अल्लाह का शुक्र अदा करते रहो: जो कोई उसका शुक्र अदा करता है, वह अपने ही फ़ायदे के लिए ऐसा करता है, और वे लोग जो उसके एहसानों को नहीं मानते ---- (तो वे जान लें कि अल्लाह तो आत्मनिर्भर है) उसे किसी की ज़रूरत नहीं, वही सारी प्रशंसा के लायक़ है।”  (12)
लुक़मान ने अपने बेटे को समझाते हुए कहा था, "ऐ मेरे बेटे! किसी को भी अल्लाह का साझेदार [Partner] मत ठहराना। अल्लाह के साथ (उसके अधिकारों में किसी को) साझेदार ठहराना सचमुच बहुत भारी ग़लती है।" (13)
हमने लोगों को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करने पर बहुत ज़ोर दिया है: तकलीफ़-पे-तकलीफ़ सह के, उनकी माँ उन्हें अपने पेट में लिए फिरी, और दो वर्ष लगते हैं (बच्चों को) दूध छुड़ाने में। सो तुम मेरा शुक्र अदा करो और साथ में अपने माँ-बाप का भी---- (अंत में) सबको मेरी ही पास लौटकर आना है। (14)
अगर तब भी, वे [माँ-बाप] तुझ पर दबाव डालें कि तू मेरे साथ किसी और को (मेरी ख़ुदायी में) साझेदार [partner] ठहराए, जिसका तुझे (कोई किताबी) ज्ञान नहीं, तो उनकी बात मत मानना। मगर इसके बावजूद, अपनी ज़िंदगी में तुम उनके साथ भले तरीक़े से रहना, और उन लोगों के रास्ते पर चलना जो (पूरी भक्ति से माफ़ी के लिए) मेरी ओर झुकते हैं। और अंत में, तुम सबको मेरे ही पास लौटकर आना है, और फिर मैं तुम्हें वह सब कुछ बता दूँगा जो तुम ने किया होगा। (15)
[लुक़मान ने यह भी कहा], "ऐ मेरे बेटे! (याद रखो) अगर राई के दाने के बराबर भी कोई चीज़ चट्टान के बीच में छिपी हो या आसमानों और ज़मीन में कहीं भी हो, अल्लाह उसे सामने हाज़िर कर देगा, क्योंकि अल्लाह छोटी से छोटी चीज़ को देखनेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (16)
"ऐ मेरे बेटे! नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो; लोगों को अच्छाई की तरफ़ प्रेरित करो; बुराई से रोको; जो मुसीबत भी तुम पर पड़े उस पर धीरज से काम लो: यही वे काम हैं जिन्हें करने का पक्का इरादा करना चाहिए।  (17)
लोगों की उपेक्षा करते हुए उनसे मुँह न मोड़ो, न ज़मीन पर अकड़कर चला करो, क्योंकि अल्लाह किसी अहंकारी और डींग मारने वाले को पसन्द नहीं करता। (18)
जब चलो तो एक अंदाज़ की चाल [न धीमी, न तेज़] से चला करो, और अपनी आवाज़ धीमी रखा करो, सचमुच आवाज़ों में सबसे बुरी आवाज़ गधों के रेंकने की होती है।" (19)
[लोगो] क्या तुम देखते नहीं कि जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन पर है, उन सबको अल्लाह ने किस तरह से तुम्हारे फ़ायदे के लिए बनाया है, और उसने तुम पर अपनी नेमतें [blessings] न्योंछावर कर दी हैं--- तुम्हारे भीतर भी और तुम्हारे बाहर भी? तब भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अल्लाह के विषय में बहस करते हैं, जबकि न तो उन्हें कोई जानकारी है, न कोई मार्गदर्शन है और न उनके पास ऐसी कोई (आसमानी) किताब है जो सही रौशनी दिखा सके‌‌। (20)
जब उनसे कहा जाता है कि "जो चीज़ अल्लाह ने उतारी है, उसको मानते हुए उस रास्ते पर चलो”, तो वे कहते हैं, "नहीं, हम तो उस रास्ते पर चलेंगे जिसपर हमने अपने बाप-दादा को चलते हुए देखा है।" क्या! यहाँ तक कि शैतान उनको भड़कती हुई (जहन्नम की) आग की यातना की ओर बुला रहा हो तब भी (वे बाप-दादा के रास्ते पर ही चलेंगे)?  (21)
जो कोई अपने आपको अल्लाह के सामने पूरी भक्ति के साथ समर्पित करता हो, और वह अच्छे कर्म भी करता हो, तो सचमुच उसने बड़ा मज़बूत सहारा थाम लिया है, क्योंकि सारे मामलों का नतीजा तो अल्लाह ही के हाथ में है।  (22)
और जो कोई ऐसा करने से इंकार कर दे, तो [ऐ रसूल] उसका (आपकी बातों को मानने से) इंकार कर देना कहीं आपको बहुत दुखी न कर दे---- वे सब हमारे ही पास लौटकर आएंगे और फिर जो कुछ वे किया करते थे, हम उन्हें सब बता देंगे---- निस्संदेह अल्लाह दिलों के अंदर की बात तक जानता है----- (23)
हम उन्हें (दुनिया में) कुछ समय के लिए थोड़ा मज़ा उड़ाने का मौक़ा देते हैं, मगर फिर हम उन्हें एक कठोर यातना की ओर खींचकर ले जाएँगे। (24)
अगर आप उनसे पूछें कि आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया, तो वे अवश्य कहेंगे, "अल्लाह ने।" कह दें, "तारीफ़ें भी सब अल्लाह के लिए हैं," मगर अधिकांश लोग नहीं समझते हैं।  (25)
हर एक चीज़ जो आसमानों में और ज़मीन पर है, सब अल्लाह की है। निस्संदेह अल्लाह तो आत्मनिर्भर है (जिसे किसी की ज़रूरत नहीं), और सारी प्रशंसा के लायक़ भी वही है। (26)
ज़मीन पर जितने पेड़ हैं, अगर वे क़लम बन जाएँ और सारे समंदर स्याही बन जाएं, और फिर उसके साथ सात समंदर और भी मिल जाएं, (और वह अल्लाह की तारीफ़ें लिखें) तब भी अल्लाह की बातें समाप्त न हो सकेंगी: अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझ रखने वाला है।  (27)
तुम सबको पैदा करना और फिर दोबारा ज़िंदा करके उठाना (अल्लाह के लिए) तो बस ऐसा है, जैसे किसी एक आदमी को पैदा करना और फिर ज़िंदा उठाना: अल्लाह सब कुछ सुनता और हर चीज़ देखता है। (28)
क्या आपने [ऐ रसूल] देखा नहीं कि अल्लाह रात को दिन से मिला देता है और दिन को रात से मिला देता है; और यह कि उसने सूरज और चाँद को काम पर लगा रखा है, हर एक अपने नियत समय तक अपनी कक्षा में चलता रहता है; और क्या तुम नहीं जानते कि जो कुछ भी तुम (लोग) करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है? (29)
और यह सब कुछ इस कारण से है कि अल्लाह ही सत्य है, और उसे छोड़कर जिन (बुतों) को भी वे पुकारते हैं, वे झूठ हैं। और अल्लाह ही सबसे ऊँचा, सबसे महान है। (30)
क्या [ऐ रसूल] आपने देखा नहीं कि समंदर में नौकाएं अल्लाह की मेहरबानी से चलती हैं, ताकि वह तुम (लोगों) को अपनी कुछ निशानियाँ दिखाए? सचमुच इसमें हर उस आदमी के लिए निशानियाँ हैं जो धीरज [सब्र] से काम लेता है, और शुक्र अदा करता है।  (31)
(पानी के जहाज़ों पर) जब समंदर की लहरें किसी विशाल परछायीं की तरह छा जाती हैं, तो (उसमें बैठे हुए) लोग पूरी भक्ति से अपने आपको केवल अल्लाह के सामने समर्पित करते हुए (मदद के लिए) पुकारते हैं, फिर जब वह उन्हें बचाकर किनारे तक पहुँचा देता है, तो उनमें से कुछ लोगों की सोच डगमगा जाती है (और वे अल्लाह को छोड़कर अपने बनाए हुए ख़ुदाओं को याद करने लगते हैं) ---- हमारी निशानियों को मानने से इंकार केवल वही करता है जो एक नम्बर का विश्वासघाती, और नाशुक्रा [Ungrateful] हो।  (32)
ऐ लोगो! अपने रब से डरते हुए बुराइयों से बचो, और उस दिन से डरो जब किसी भी तरह से न कोई माँ-बाप (मदद के लिए) अपने बच्चे की जगह ले पायेगा और न ही कोई बच्चा अपने माँ-बाप की जगह ले पायेगा। अल्लाह का वादा सच्चा है, अतः देखना कि यह सांसारिक जीवन तुम्हें धोखे में न डाल दे, और न ही अल्लाह के बारे में कोई (शैतान) धोखेबाज़ तुम्हें धोखे में डाल सके। (33)

निस्संदेह उस [क़यामत की] घड़ी का ज्ञान तो बस अल्लाह ही को है; वही पानी बरसाता है और वह जानता है कि माँ की कोख में क्या छुपा है, कोई भी आदमी नहीं जानता कि कल उसके कर्मों का क्या फल मिलेगा, और कोई आदमी नहीं जानता है कि उसकी मौत ज़मीन के किस हिस्से में होगी; वह तो अल्लाह है जो सब जाननेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (34)



नोट:

6: मक्का में जिन लोगों ने अभी तक अल्लाह के संदेश को क़बूल नहीं किया था, वे भी जब कभी क़ुरआन पढ़कर सुनायी जाती, तो उसे छुप-छुपकर सुना करते थे, और इसके नतीजे में कुछ लोग इससे प्रभावित होकर मुसलमान बन जाते थे। इस सूरत में मक्का के सरदारों ने सोचा कि लोगों को किसी तरह क़ुरआन से दूर रखा जाए। मक्का में “नज़र बिन हारिस” नाम का एक व्यापारी था जो व्यापार के सिलसिले में दूर के देशों में जाया करता था, वह ईरान [फारस] से वहाँ के बादशाहों के क़िस्सों पर आधारित एक किताब लाया था, और कुछ के अनुसार एक नाचने-गानेवाली लौंडी भी लाया था। उसने लोगों से कहना शुरू किया कि मुहम्मद साहब जो पुराने क़िस्से बताते हैं, उससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प क़िस्से और गाने मैं तुम्हें सुनाउंगा।

12: हज़रत लुक़मान के बारे में माना जाता है कि वह नबी नहीं थे, बल्कि एक बहुत ही गहरी समझ-बूझवाले आदमी थे। कुछ लोग मानते हैं कि वह यमन के रहनेवाले थे, और हज़रत हूद (अलै.) के जो साथी यातना से बच गए थे, उसमें वह भी शामिल थे, कुछ लोग कहते हैं कि वह हब्शा [इथोपिया] के रहनेवाले थे। बहरहाल, अरब के लोग उन्हें बहुत क़ाबिल व समझदार मानते थे, और उनके बीच उनकी अक़्लमंदी की बहुत सी बातें मशहूर थीं।  

13: “भारी ग़लती” के लिए यहाँ "ज़ुल्म" शब्द आया है, ज़ुल्म का मतलब किसी का हक़ छीनकर दूसरे को दे देना होता है। चूँकि इबादत किए जाने का अधिकार [हक़] केवल अल्लाह को ही है, इसलिए जब अल्लाह के साथ उसकी ख़ुदायी में दूसरों को साझेदार बनाया जाता है, तो इसे ज़ुल्म कहा गया है।

15: मक्का में जब लोग आहिस्ता-आहिस्ता मुसलमान होने लगे, तो उनके साथ यह समस्या थी कि उनके माँ-बाप तो अपने पुराने धर्म पर अड़े हुए थे और अपने बच्चों पर दबाव बना रहे थे कि वे भी इस्लाम छोड़ दें। यहाँ यह बात साफ़ कर दी गयी कि माँ-बाप के साथ तो हर हाल मे अच्छा व्यवहार करना है, लेकिन अगर वे सच्चाई को छोड़ने की बात पर ज़ोर दें, तो उनकी बात नहीं माननी चाहिए और नर्मी से मना कर देना चाहिए।

25: मक्का के लोग यह मानते थे कि ज़मीन और आसमान को अल्लाह ने ही पैदा किया है, मगर यह बात नहीं समझ पाते थे कि फिर इबादत [पूजा] किए जाने के लायक़ भी केवल अल्लाह ही है।

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...