Saturday, February 17, 2018

सूरह 62 : अल जुमा'/ al Jumuah [जुमे' की नमाज़/ The Congregation Prayer]

सूरह 62: अल-जुमा' 
[जुमे' की नमाज़/ The Congregation Prayer]



   01:   अल्लाह की महानता

2 4: ऐसे लोगों में रसूल को भेजना जिनके पास कोई (आसमानी) किताब नहीं थी 

5 - 8: यहूदियों की इस मान्यता की कड़ी निंदा कि केवल वही अल्लाह के दोस्त हैं 

9-11:  जुमे की नमाज़ 

 


ल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है, जो हर चीज़ को अपने नियंत्रण में रखनेवाला [बादशाह] है, बेहद पवित्र है, ज़बरदस्त ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (1)

वही है जिसने उन्हीं लोगों में से एक रसूल को उठाया जिनके पास कोई आसमानी किताब नहीं थी, ताकि वह उन्हें उसकी आयतें पढ़कर सुनाए, (मूर्तिपूजा से हटाकर) उनके मन को पवित्र करे, और उन्हें किताब और सही समझ-बूझ [हिकमत] की शिक्षा दे---- इससे पहले तो वे सचमुच खुली गुमराही में थे -----(2)

और उन्हीं में से (भविष्य में आने वाले) कुछ दूसरे लोगों को भी (किताब और हिकमत की शिक्षा दे) जो अभी उनसे आकर नहीं मिले हैं। वह बेहद ताक़तवाला, गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है: (3)

यह अल्लाह का ऐसा फ़ज़ल (favour) है कि वह जिसे चाहे, उसे [रसूल बना] देता है; और अल्लाह बड़े फ़ज़लवाला है। (4)

जिन लोगों पर तोरात [Torah] (की शिक्षाओं) को मानने का बोझ डाला गया था, वे उन (शिक्षाओं पर अमल करने की ज़िम्मेदारी) को निभा न सके, उनकी मिसाल उस गधे की-सी है जो बहुत सी किताबें लादे हुए हो (मगर उससे अज्ञान ही रहे)। कितनी बुरी मिसाल है उन लोगों की, जो अल्लाह की आयतों [निशानियों] को मानने से इंकार करते हैं! अल्लाह ऐसे लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता, जो ग़लत काम करने पर तुले रहते हैं। (5)
 
[ऐ रसूल!] आप कह दें, "ऐ यहूदी मत के माननेवालो! अगर तुम्हारा यह दावा सच्चा है कि दूसरे सारे लोगों को छोड़कर केवल तुम ही अल्लाह के दोस्त हो, तो फिर अपनी मौत की कामना करो।" (6)

मगर उन्होंने अपने हाथों अपने लिए जो (बुरे कर्मों का ढेर) जमा कर रखा है, इस कारण वे कभी भी अपनी मौत की कामना नहीं करेंगे----- और अल्लाह ज़ालिमों को अच्छी तरह जानता है---- (7)

अत: आप कह दें, “जिस मौत से तुम भागते हो, वह तो तुम से मिलने ज़रूर आएगी, फिर तुम्हें उसकी ओर लौटकर जाना होगा, जो हर छिपी चीज़ को भी जानता है और खुली चीज़ को भी: वह तुम्हें हर चीज़ बता देगा जो कुछ तुम किया करते थे।"  (8)

ऐ ईमानवालो, जब जुमे के दिन [Friday] नमाज़ के लिए पुकारा जाए, तो ख़रीदने-बेचने का काम बंद कर दो, और अल्लाह के ज़िक्र [नमाज़] की तरफ़ तेज़ी से चल पड़ो--- यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानो”---- (9)

फिर जब नमाज़ पूरी हो जाए, तो ज़मीन में फैल जाओ और अल्लाह की दी हुई रोज़ी [फ़ज़ल] तलाश करो। अल्लाह को बराबर याद करते रहो, ताकि तुम (दोनों जहान में) कामयाब हो सको।  (10)

(इसके बावजूद, कुछ लोग) जब ख़रीदने-बेचने के सामान या खेल-तमाशे की ख़बर पाते हैं, तो (ज़रूरत के चलते मस्जिद से भागकर) उसकी ओर टूट पड़ते हैं, और (ऐ रसूल) आपको (ख़ुत्बे में बोलते हुए) खड़ा छोड़ जाते हैं। आप कह दें, "अल्लाह के पास जो (इसका इनाम) है, वह किसी भी खेल-तमाशे या व्यापार से कहीं अच्छा है: (याद रहे!), अल्लाह सबसे बेहतर रोज़ी देनेवाला है।" (11)
 
 
 
नोट:
2. लोगों को "पवित्र करने" का मतलब दूसरों को दान या ज़कात देने पर ज़ोर देना भी हो सकता है, देखें 2:129, 151; 3:164

3: मतलब यह है कि मुहम्मद (सल्ल) केवल अरब के लोगों के लिए रसूल बनाकर नहीं भेजे गए थे, बल्कि आप क़यामत तक आने वाले इंसानों के लिए पैग़म्बर बनाकर भेजे गए हैं चाहे वह किसी भी नस्ल से हों। 

 

4: यहूदी चाहते थे कि आख़िरी नबी इसराईल की संतानों में से हो, अरब के बहुदेववादी कहते थे कि अल्लाह को अगर रसूल भेजना ही था, तो वह उनके कोई बड़े सरदारों में से होना चाहिए था। मगर अल्लाह कहता है कि रसूल को चुनकर भेजना, तो उसका काम है और उसकी मर्ज़ी के आगे किसी का ज़ोर नहीं चलता। 

 

5: मतलब यह है कि यहूदियों को तोरात में आख़िरी नबी पर विश्वास करने का हुक्म दिया गया था, मगर वे उसकी शिक्षाओं पर ठीक से अमल नहीं करते थे, और उन्होंने आप पर विश्वास नहीं किया। 

 

6: इसी तरह का चैलेंज सूरह बक़रा (2: 94-95) में भी आया है कि अगर उन्हें लगता है कि वे ही अल्लाह के सबसे चुने हुए बंदे हैं (2:111; 5:18), और उनका जन्नत में जाना तय है, तो अपनी मौत की कामना करेंमगर किसी यहूदी ने डर के मारे ऐसा नहीं किया, शायद यह सोचकर कि कहीं यह सचमुच सही न हो जाए। 

 

10: मतलब यह है कि जुमे की नमाज़ पूरी हो जाने के बाद अपने-अपने धंधे में लग जाना चाहिए। 

 

11: इब्ने कसीर ने लिखा है कि शुरू में मुहम्मद (सल्ल) जुमे की नमाज़ के बाद ख़ुत्बा [भाषण] दिया करते थे, एक बार ऐसा हुआ कि नमाज़ के बाद जब आप ख़ुत्बा दे रहे थे, तभी शहर में एक क़ाफिला आ पहुँचा, और उसके आने की ख़बर ढोल-नगाड़ा बजाकर दी जाने लगी, उस समय चूँकि मदीने में खाने-पीने के सामान की बहुत कमी हो गई थी, इसलिए काफ़ी लोग मस्जिद से क़ाफिले की तरफ़ दौड़ पड़े, और मस्जिद में बहुत ही कम लोग बच गए। इस आयत में इस तरह ख़ुत्बा छोड़कर जाने से मना किया गया है।  

 

Friday, February 16, 2018

सूरह 61 : As-Saff / अस सफ़ [मज़बूत क़तारें, Solid Lines]

सूरह 61: अस-सफ़ 
[मज़बूत क़तारें, Solid Lines]


  1: अल्लाह की महानता

   2- 4:  जो कहो, वह करो

05-09:  इसराईल की संतानों की तरफ़ से विरोध 

10-13:  ईमानवालों का अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करना 

    14:  ईमान रखने वालों को अल्लाह (के दीन) का मददगार होना


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है--- वह बेहद ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (1)

ऐ ईमानवालो! तुम ऐसी बातें क्यों कहते हो, जिन्हें बाद में करते नहीं हो? (2)

यह बात अल्लाह को सख़्त नापसंद है कि तुम जो बात कहते हो, उन्हें करते नहीं हो; (3)

अल्लाह उन लोगों को सचमुच बहुत पसंद करता है जो उसकी राह में मज़बूत क़तारों में खड़े होकर लड़ते हैं, मानो वे सीसा पिलाई हुए (ठोस) दीवार हों। (4)

और (देखो) जब मूसा [Moses] ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम मुझे क्यों दुख देते हो, हालांकि तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से (रसूल बनाकर) भेजा गया हूँ?" फिर जब वे सच्चाई के रास्ते से भटक गए, तो अल्लाह ने भी उनके दिलों को भटकता छोड़ दिया: अल्लाह बग़ावत करनेवालों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता। (5)

और (देखो) जब मरयम [Mary] के बेटे ईसा [Jesus] ने कहा, "ऐ इसराईल की संतानों! मैं अल्लाह की तरफ़ से तुम्हारे पास (रसूल बनाकर) भेजा गया हूँ, ताकि मैं तौरात [Torah] की (सच्चाई की) पुष्टि कर दूं, जो मुझसे पहले आयी थी, और मेरे बाद एक रसूल के आने की ख़ुशख़बरी भी दे दूं, जिसका नाम 'अहमद' होगा।" इसके बावजूद, जब वह [ईसा] उनके पास स्पष्ट निशानियों के साथ आए, तो वे लोग कहने लगे, "यह तो साफ़ तौर से जादूगरी है।" (6)

उस आदमी से ज़्यादा ग़लती पर कौन होगा, जो (लोगों को बहकाने के लिए) अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, जबकि उसे अल्लाह के आगे झुक जाने के लिए बुलाया जाए? ग़लत काम करने वालों को अल्लाह सीधा रास्ता नहीं दिखाता है: (7)

वे चाहते हैं कि अल्लाह की रौशनी [मार्गदर्शन/क़ुरआन] को अपने मुँह से फूँक मारकर बुझा दें। लेकिन अल्लाह अपनी रौशनी को पूरी (तरह फैला) कर रहेगा, भले ही (सच्चाई में) विश्वास न करनेवाले इससे कितनी ही नफ़रत करते हों; (8)

वही है जिसने अपने रसूल को सही मार्गदर्शन [क़ुरआन] और सच्चाई के दीन [धर्म] के साथ भेजा, ताकि यह दिखाया जा सके कि यह दूसरे सभी (झूठे) धर्मों से बढ़कर है, चाहे बहुदेववादियों को ये बात कितनी ही बुरी लगे। (9)

ऐ ईमानवालो! क्या मैं तुम्हें (एक चीज़ के बदले में) एक ऐसे फ़ायदे का काम [व्यापार] बताऊँ, जो तुम्हें दर्दनाक यातना से बचा ले? (10)
(वह यह है कि) अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] रखो, और अपनी जान व माल से अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करो----ये (ईमान व जिहाद) तुम्हारे लिए (जान व माल से) बेहतर है, अगर तुम समझ पाओ----- (11)

और वह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा, तुम्हें [जन्नत के] ऐसे बाग़ों में ले जाएगा जहाँ नहरें बह रही होंगी, और उन ख़ुशनुमा घरों में बसा देगा जो सदाबहार बाग़ों [Garden of Eternity] में होंगे। यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (12)

और (इसके अलावा इस दुनिया में) वह तुम्हें कुछ और भी देगा जिससे तुम सचमुच ख़ुश हो जाओगे: अल्लाह की ओर से मदद और जल्द ही मिलने वाली जीत! [ऐ रसूल] ईमानवालों को (इस बात की) ख़ुशख़बरी सुना दें! (13)

ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह के (दीन के) मददगार बन जाओ। जैसा कि मरयम के बेटे ईसा [Jesus] ने अपने ख़ास शिष्यों [Disciples] से कहा था, "कौन है जो अल्लाह के काम में मेरी मदद करेगा?" उनके शिष्यों ने कहा, "अल्लाह के काम में हम मददगार होंगे।" फिर इसराईल की संतान में से कुछ ने तो विश्वास कर लिया जबकि कुछ ने विश्वास नहीं किया: जो विश्वास [ईमान] रखनेवालों के दुश्मन थे, हमने उनके ख़िलाफ़ विश्वास रखनेवालों का साथ दिया, सो वही लोग थे जिनकी जीत हुई। (14)
 
 
 
नोट:

1: आसमान और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है, भले ही हम इंसान इसे समझ नहीं पाते। देखें 24:36; 59:24; 17:44. 

2: बताया जाता है कि कुछ मुसलमानों ने मदीना में यह इच्छा जतायी थी कि "अगर उन्हें मालूम हो जाए कि अल्लाह को सबसे ज़्यादा पसंद क्या काम है, तो वे वही काम करेंगे!" उस समय जंग का माहौल था, अल्लाह का आदेश आया कि "उसकी राह में जो मज़बूत क़तारों में खड़े होकर लड़ते हैं, अल्लाह उन्हें बहुत पसंद करता है" (आयत 4), मगर जब उहुद की जंग (625 ई) में लड़ने की बारी आयी, तो इसमें से कुछ लोग भाग खड़े हुए, देखें 3:121; 3:155. इसीलिए, यहाँ उन्हें ऐसी बात कहने से मना गया है जो वे करते नहीं हैं।

5: मूसा (अलै) की क़ौम ने उन्हें बहुत दुख़ दिए (33:69)। कभी लोगों ने कहा कि हमें सामने-सामने अल्लाह को दिखा दो (4:153), कभी बछड़े की पूजा करने लगे (2: 92-93), कभी आसमान से उतरने वाले "मन व सलवा" खाने से मना कर दिया (2:61), और तो और जब इसराईल में दाख़िल होने के लिए लड़ने को कहा गया तो उससे भी इंकार कर दिया (5:24). 

6: अल्लाह के पैग़म्बरों का तरीक़ा रहा है कि उन्होंने अपने से पहले की उतरी किताबों की सच्चाई की पुष्टि की है और आने वाले पैग़म्बरों के बारे में ख़बर दी है। सो ईसा (अलै) ने भी तौरात की सच्चाई की पुष्टि की और 'अहमद' नाम के आने वाले पैग़म्बर [Paraclete] की ख़बर बाइबल में दी (देखें John 14:16; 26; 15:26; 16:7)। "अहमद" और मुहम्मद नाम का मतलब "तारीफ़ के लायक़" होता है, और आपके कई नामों में से अहमद नाम भी मशहूर है, और इसकी पहचान विद्वानों ने शुरू से ही मुहम्मद (सल्ल) से की है।

 ...... ईसा (अलै) ने स्पष्ट निशानियाँ दिखायी थीं, जैसे मिट्टी की चिड़िया में साँस फूँककर उड़ा देना, अंधे और कोढ़ी आदमी को ठीक कर देना, मुर्दे को ज़िंदा कर देना [5:110], मगर फिर भी इसराइली लोगों ने इसे जादूगरी माना और ठुकरा दिया।

7: जब कोई पैग़म्बर लोगों को अल्लाह के सामने झुक जाने के लिए बुलाए, और लोग उसकी बात न सुनें और उसे पैग़म्बर मानने से इंकार कर दें, तो यह एक तरह से अल्लाह के बारे में झूठ गढ़ने जैसा है। 

8: लोग चाहते हैं कि अल्लाह की रौशनी [क़ुरआन] को कभी जादूगरी, या शायरी या तांत्रिक की बातें कहकर बुझा दें। यह बात 9:32 में भी कही गई है। 

10: व्यापार में जैसे कोई सामान देकर उसकी क़ीमत वसूल की जाती है, उसी तरह एक मुसलमान अपनी जान और माल अल्लाह के हवाले करता है, तो अल्लाह इसके बदले में जन्नत और यातना से उसे रिहाई दे देता है। देखें सूरह तौबा (9:111) 

13: जल्दी ही मिलने वाली जीत से मतलब मक्का की जीत है, या मुहम्मद (सल्ल) की मृत्यु के कुछ साल बाद मिलने वाली बाइज़ेंटाइन और फ़ारस पर जीत। 

 

Tuesday, December 12, 2017

सूरह 1 : अल फ़ातिहा [The Opening]

     सूरह 1: अल-फ़ातिहा 
 [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]


01   : अल्लाह के नाम से शुरू  

02-07: दुआ 


 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है (1)
सारी तारीफ़ें अल्लाह की हैं, जो सारे संसारों का रब है, (2)

सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है, (3)

(और) जो फ़ैसले के दिन का मालिक है। (4)

[ऐ अल्लाह!] हम तेरी ही इबादत करते हैं; और तुझसे ही (ज़रूरत पड़ने पर) मदद माँगते हैं (5)

हमें सीधे रास्ते पर चला: (6)

उन लोगों के रास्ते पर (चला) जिन पर तूने करम [Bless] किया है, उनके (रास्ते पर) जिन पर न तो ग़ुस्सा उतरा हो, और न जो सीधे रास्ते से भटके हुए हों। (7)


नोट:

1: क़ुरआन में जब-जब "रहमान" शब्द आया है, वह इस संदर्भ में है कि अल्लाह बहुत ताक़तवाला और महान होने के साथ-साथ बहुत दयावान भी है। इसका मतलब वह हस्ती जिसकी रहमत बहुत व्यापक [Extensive] हो, यानी दुनिया का हर अच्छा-बुरा आदमी उसकी दी हुई नेमतों से फ़ायदा उठाता है, इसलिए अल्लाह 'रहमान' यानी सब पर मेहरबान है। यह शब्द केवल अल्लाह के लिए ही इस्तेमाल होता है कि बड़े प्यार और दया [loving mercy] से उसने सृष्टि की हर चीज़ को पैदा किया है|  

अल्लाह "रहीम" भी है, इसका मतलब यह है कि रहम [दया] करना उसकी प्रकृति में रचा-बसा हुआ है, और वह जिसे चाहता है, उस पर रहम [दया] करता है।

“रहमान" और "रहीम" का संबंध इस तरह का है कि जैसे 'रहमान' सूरज की रौशनी है जो  सारे आसमान को रौशन कर देती है, और 'रहीम' सूरज की रौशनी की एक ख़ास किरण है जो किसी जीव पर पड़ती है।   


2: अरबी में "रब" का मतलब मालिक के साथ-साथ परवरिश करना और देखभाल करना भी होता है। तो जहाँ-जहाँ भी क़ुरआन में "रब" का शब्द आया है, इसका ये मतलब भी ध्यान में रखना चाहिए।

"आ'लमीन" का मतलब सारे जहानों का यानी इंसानों का, जानवरों का, फ़रिश्तों का, पौधों का, इस दुनिया का, आने वाली दुनिया का, इत्यादि। 

इस कायनात की हर चीज़ अल्लाह की बनायी हुई है। अगर किसी चीज़ की तारीफ़ की जाए, तो वह असल में उसके बनाने वाले की ही तारीफ़ होगी, इस तरह सारी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं, जो सारे जहानों का रब है। 


4: अल्लाह "फ़ैसले के दिन" का मालिक है, जिस दिन हर आदमी के कर्मों का हिसाब-किताब होगा और इसके नतीजे में किसी को इनाम मिलेगा और किसी को सज़ा। दुनिया में इंसानों को थोड़े समय के लिए कुछ-कुछ चीज़ों का मालिक बनाया गया है, मगर क़यामत के दिन यह अधिकार ख़त्म हो जाएगा।


5: यहाँ से बंदों को अल्लाह से दुआ करने का तरीक़ा सिखाया गया है। केवल अल्लाह की ही इबादत [पूजा] करना और केवल उसी से ज़रूरत पड़ने पर मदद माँगने को ही "तौहीद" [एकेश्वरवाद] कहते हैं। अल्लाह को छोड़कर किसी और को मदद के लिए पुकारना या अल्लाह के साथ किसी और (ख़ुदा) को भी अल्लाह का साझेदार मानना बिल्कुल ग़लत है।    

6: यहाँ सीधा रास्ता दिखाने की दुआ की गई है जो हमेशा से नेक और सच्चे लोगों का रास्ता रहा है, जिन पर अल्लाह ने अपना करम किया है। 


7: वैसे लोगों पर गुस्सा उतरा है, जो सच्चाई जानने के बावजूद अपने घमंड और अपने बाप-दादा की परम्परा के मोह में अटके रहे या अपनी बड़ाई के समाप्त हो जाने के डर से सच्चाई से मुँह मोड़ते रहे। 

सीधे रास्ते से गुमराह वे हो गए जो सच्चाई सामने होते हुए भी झूठे ख़ुदाओं के जाल में फंस गए और उन्हें अल्लाह का साझेदार मानकर अपनी ज़रूरतों के लिए पुकारने लगे। 

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...