Thursday, August 1, 2013

सूरह 75 : अल क़ियामह [क़यामत/ The Resurrection]

सूरह 75: अल-क़ियामह 
[क़यामत/ The Resurrection]



01-15: क़यामत के दिन दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाएगा

16-19: क़ुरआन को पढ़ने का तरीक़ा 

20-30: क़यामत का आना तय है 

31-40: एक विश्वास न करने वाले की कड़ी निंदा

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
मैं क़सम खाता हूँ क़यामत के दिन की  (1)
और मैँ कसम खाता हूँ (बुराइयों पर) कचोटने वाली आत्मा की!  (2)
क्या इंसान यह समझता है कि हम उसकी हड्डियों को (जो मरने के बाद चूर-चूर होकर बिखर जाएगी) कभी फिर से इकट्ठा नहीं करेंगे?  (3)
क्यों नहीं! हम तो यहाँ तक कर सकते हैं कि उसकी उंगलियों के पोर-पोर [fingertips] तक को (दोबारा) ठीक (वैसा ही) कर दें।  (4)
इसके बावजूद, आदमी उस (जीवन) से इंकार करना चाहता है, जो उसके आगे (आख़िरत/ Hereafter में) आने वाला है:  (5)
वह (व्यंग्य से) पूछता है,  “तो वह क़यामत का दिन कब होगा?” (6)
जब आँखें चौंधिया जाएंगी  (7)
और चाँद (अपनी) रौशनी खो देगा,   (8)
जब सूरज और चाँद इकट्ठे कर दिए जाएंगे,   (9)
उस दिन आदमी पुकार उठेगा, “भागकर जाएं तो कहाँ जाएं?”  (10)
नहीं! सचमुच, छिपने की कोई जगह नहीं होगी:  (11)
उस दिन तुम्हारे रब के पास ही ठिकाना होगा जहाँ लौटकर सबको जाना होगा।   (12)
उस दिन आदमी को बता दिया जाएगा, जो कुछ (दुनिया में कर्म करके) उसने आगे भेजा था और जो कुछ (कर्मों का असर मरने के बाद) उसने पीछे छोड़ा था।  (13)
बल्कि, सच तो यह है कि आदमी (अपने किए गए अच्छे-बुरे कर्मों पर) ख़ुद ही गवाह है, (14)
चाहे वह अपनी ओर से कितने ही बहाने पेश करे।  (15)
[ए रसूल!] आप (कुरआन  की) आयतों को याद करने की हड़बड़ी में, अपनी ज़बान को जल्दी-जल्दी न चलाया करें:  (16)
बेशक उसे (आपको) याद कराना और (आपकी ज़बान से) पढ़ाना हमारी ज़िम्मेदारी है।  (17)
तो जब हम उस आयत को (जिबरील की ज़बानी) पढ़कर सुना दें, तब आप भी उसे (उसी तरह) पढ़कर दोहरा लिया करें (18)
और फिर इन (आयतों) के मतलब समझाना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है।  (19)
सचमुच, तुम लोग बहुत थोड़े समय चलने वाली दुनिया (की ज़िंदगी) से बहुत लगाव रखते हो  (20)
और तुम इसके बाद आने वाली दुनिया [आख़िरत/ Hereafter] को भुलाए बैठे हो। (21)
(एक तरफ़) बहुत से चेहरे उस दिन खिले हुए और चमकते हुए होंगे,    (22)
और अपने रब (की नेमतों) को देख रहे होंगे,  (23)
और कितने ही चेहरे उस दिन बिगड़ी हुई हालत में (उदास और काले पड़ गये) होंगे।  (24)
वे समझ जाएंगे कि उनके ऊपर भारी मुसीबतों का पहाड़ टूटने ही वाला है।  (25)
सचमुच, जब जान [soul] (निकलती हुई) गले तक आ पहुँचेगी;  (26)
जब यह कहा जाएगा, "कि है कोई जो झाड़-फूंक करके जान बचा सके?";   (27)
जब वह समझ जाए कि (अब सबसे) जुदाई का समय आ गया है;  (28)
जब उसके पैरों को एक साथ (कफ़न लपेटने के लिए) लाया जाएगा:  (29)
उस दिन उसे अपने रब की तरफ़ हँकाकर ले जाया जाएगा।   (30)
उसने न (अल्लाह और रसूल की बातों पर) विश्वास किया और न नमाज़ पढ़ी,   (31)
बल्कि उसने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया और (ईमान से) मुँह मोड़ लिया,    (32)
फिर अकड़ता हुआ अपने लोगों की तरफ़ शान से चल दिया।  (33)
तुम से (क़यामत की घड़ी) नज़दीक से और नज़दीक आती जा रही है। (34)
  
तुम से और नज़दीक, और ज़्यादा नज़दीक!  (35)

क्या इंसान यह समझता है कि उसे यूँ ही (बिना हिसाब-किताब लिए) छोड़ दिया जाएगा?  (36)
क्या वह (अपने जीवनकाल के शुरू में) वीर्य [sperm] की एक टपकी हुई बूँद मात्र न था, (37)
जो कि (कोख में) जोंक की तरह चिपका हुआ एक लोथड़ा बन गया, फिर अल्लाह ने उसे (इंसानी) शक्ल-सूरत दे दी, फिर सभी अंगों को (सही अनुपात में) ठीक-ठाक किया, (38)
फिर उसी से दो तरह के लिंग [Gender] बनाए: मर्द और औरत?  (39)
तो क्या वह [अल्लाह] जो यह सब कर सकता है, उसे इस बात की ताक़त नहीं कि मुर्दों को फिर से ज़िंदा कर दे? (40)
 
 
 
नोट: 
1: अल्लाह ने क़ुरआन में कई चीज़ों की क़समें खाई हैं.... (देखें 56:75; 69:38-39; 81:15-18; 84:16-18;  90:1, 3)

2: "कचोटने वाली आत्मा" से मतलब इंसान का वह ज़मीर है जो उसे गलत कामों पर कचोटता है। अल्लाह ने हर इंसान के अस्तित्व के अंदर यह एहसास [ज़मीर] रखा है। इंसान को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आख़िर इस ज़मीर को क्यों रखा गया है? अगर आने वाली आख़िरत [परलोक] की जिंदगी न होती, जहाँ इंसान को उसके अच्छे बुरे कर्मों का बदला मिलने वाला है, तो भला, बुराई से रोकने के लिए इस ज़मीर की क्या आवश्यकता थी!

 

4: अंगुलियों के पोरों का ख़ास करके ज़िक्र इसलिए किया गया है कि इन पोरों मेंं जो महीन-महीन लकीरें होती हैं, वह हर इंसान की दूसरे से अलग होती हैं, यहाँ तक कि करोड़ों लोगों की अंगुलियों की लकीरें भी एक दूसरे से नहीं मिलती। इनकी लकीरों के अंतर को याद रखकर दोबारा वैसी ही लकीरें बना देना अल्लाह के सिवा किसी से संभव नहीं है। 

 

13: यानी कौन से काम वह दुनिया में कर आया है जो उसके कर्मों के लेखा-जोखा में दर्ज हो चुके हैं और कौन से काम वह छोड़ आया है जो उसे करने चाहिए थे लेकिन उसने नहीं किए।


14: आदमी ख़ुद अपने किए गए अच्छे-बुरे कर्मों की गवाही देगा ..... इस बात को समझने के लिए देखें 24:24; 36:65; 41:20.

 

29: या (मरने के क़रीब) जब एक पैर दूसरे से मिल जाएगा....


34: इसका एक अनुवाद यह भी हो सकता है "तबाही है तुम्हारे लिए (मरते समय), फिर तबाही है (मरने के बाद की हालत में)।


35: या यह भी अनुवाद हो सकता है, " फिर तबाही है तुम्हारे लिए (क़यामत के दिन), फिर तबाही है तुम्हारे लिए (जहन्नम की)।

 

36: इंसान बनने के सभी चरणों का वर्णन सूरह मोमिनून (23:14) में भी आया है।

 



 

Wednesday, July 31, 2013

सूरह 74 : अल मुदस्सिर [चादर ओढ़े हुए / Wrapped In His Cloak]

सूरह 74: अल-मुदस्सिर
[चादर ओढ़े हुए / Wrapped In His Cloak]



01-10: उठें और सावधान कर दें 

11-26: विरोधियों से अल्लाह निबट लेगा 

27-31: जहन्नम के पहरेदार 

32-37: एक चेतावनी

38-48: गुनाहगारों का अंजाम 

49-56: नसीहत [Reminder] को ठुकरा देना 

  


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ (मेरे) चादर ओढ़े हुए (रसूल!),  (1)

उठें और (लोगों को अल्लाह की) चेतावनी सुना दें!  (2)

और अपने रब की बड़ाई (और महानता) की घोषणा कर दें;  (3)

अपने आपको (मन के भीतर की और बाहर की गंदगियों से) साफ़-सुथरा रखें;   (4) 

और हर तरह (के पापों) की गंदगी से दूर रहें;  (5)

किसी को (केवल इस नीयत से) न दें, कि उससे ज़्यादा पाने की चाहत हो;  (6)

और आप अपने रब के काम में धीरज [सब्र] से काम लिया करें।  (7)
 

फिर जब (क़यामत की घोषणा के लिए) नरसिंघे [trumpet] में फूंक मारी जाएगी,  (8)

सो वह [क़यामत का दिन] बहुत ही परेशानी का दिन होगा।  (9)

(सच्चाई पर) विश्वास न करने वालों के लिए (वह दिन) कोई आसान न होगा।  (10)

[ऐ रसूल], आप उस आदमी का मामला मुझ पर छोड़ दें, जिसे मैंने अकेला (व बेसहारा) पैदा किया था,  (11)

फिर उसे दूर-दूर तक फैली हुई ढेर सारी धन-संपत्ति दी थी,  (12)

उसे बेटे दिए थे जो (उसके सामने) हाज़िर रहते थे,  (13)

और उसके लिए हर काम के रास्ते आसान बना दिए थे ----- (14)

इसके बावजूद, वह अब भी यह उम्मीद रखता है कि मैं उसे और अधिक दूँगा।  (15)

(अब और) नहीं!, वह हमारी (भेजी गयी) आयतों [revelation] का कट्टर विरोधी रहा है:  (16)

बहुत जल्द मैं उसे बेहद थका देने वाली (चढ़ाई की) यातना दूंगा,  (17)

उसने सोच-विचार किया और एक साज़िश तैयार कर ली ----  (18)

लानत हो उस पर, उसने कैसी शैतानी साज़िश रची!  (19)

इस पर लानत हो, उसने (यह) कैसी क्रूरता से भरी साज़िश की! ----- (20)

फिर उसने (आसपास) देखा,  (21)

और त्योरी चढ़ाई और मुंह बिचकाया,   (22)

फिर (सच्चाई की बातों से) पीठ फेर ली और घमंड में अकड़ गया,  (23)

और कहने लगा, “यह [क़ुरआन] कुछ नहीं, बस पुराने ज़माने से चला आ रहा जादू है, (24)

“बस इंसान की कही हुई बात है” (अल्लाह का कलाम नहीं है)।  (25)

में उसे (जहन्नम की) भड़कती आग [सक़र] में झोंक दूंगा।  (26)

और आपको किसने बताया है कि "सक़र" [जहन्नम की आग] क्या है?  (27)

वह (ऐसी आग है जो) न किसी को बाक़ी बचा रखती है न (तरस खाकर) छोड़ती है;  (28)

(वह) आदमी के बदन की खाल को झुलसाकर काला कर देने वाली है;  (29)

उस पर उन्नीस पहरेदार नियुक्त हैं। ----  (30)

और हमने जहन्नम की पहरेदारी के लिए किसी और को नहीं, बल्कि फरिश्तों को ही नियुक्त किया है ----- और हमने इनकी संख्या [Number] विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को केवल परखने के लिए निर्धारित की है। अत: जिन लोगों को (आसमानी) किताब दी गयी हैं, उन्हें इस बात पर विश्वास हो जाएगा, और जो लोग ईमान रखते हैं उनका विश्वास और बढ़ जाएगा: न तो उन्हें जिनको किताब दी गयी है और न ही ईमानवालों को इसकी (सच्चाई में) कोई संदेह होगा, मगर वे जिनके दिलों में रोग है और जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, वे लोग यह कहेंगे, "भला इस (ख़ास संख्या के) उदाहरण से अल्लाह का क्या मतलब हो सकता है?"
इस तरह, अल्लाह (एक ही बात से) जिसे चाहता है गुमराह कर देता है, और जिसे चाहता है सीधा रास्ता दिखा देता है ----- आपके रब के लशकरों को उसके सिवा कोई नहीं जानता, और यह (वर्णन) आदमी को सावधान करने के लिए ही है।  (31)

हां ---- चाँद की क़सम!  (32) 

और रात की क़सम जब वह पीठ फेरकर विदा होने लगे!  (33)

और सुबह की क़सम जब वह रौशन हो जाए!  (34)

बेशक यह (जहन्नम) बहुत बड़ी आफ़तों में से एक है,   (35)

इंसानों को सावधान करने वाली,  (36)

तुममें से हर उस आदमी के लिए जो (भलाई में) आगे बढ़ना चाहे या जो (बुराई में फंसकर) पीछे रह जाए।  (37)
 

हर आदमी अपने (कर्मों द्वारा) की गयी कमाई के बदले (अल्लाह के पास) गिरवी है,  (38)

दाएँ हाथ वालों [Companions of the right] को छोड़कर,  (39)

जो बाग़ों [जन्नत] में होंगे और वे पूछते होंगे,  (40) 

अपराधियों से,  (41)

(वे पूछेंगे): ”तुम्हें क्या चीज़ जहन्नम (की भड़कती आग) में ले गई?”  (42)

वे जवाब देंगे, “हम नमाज़ पढ़ने वालों में नहीं थे”;  (43)

“और हम ग़रीबों को खाना नहीं खिलाते थे”;  (44)

“हम दूसरे लोगों के साथ (मिलकर) मौज-मस्ती करते (और ईमानवालों का मज़ाक़ उड़ाया करते थे)”;  (45)

“और हम फ़ैसले के दिन को झूठ बताया करते थे”,  (46)

“(और हम यूँ ही रहे) यहाँ तक ​​कि हम पर वह (मौत) आ पहुँची जिसका आना निश्चित था”,  (47)

सो (उस समय) सिफ़ारिश करने वालों की सिफ़ारिश, उनके कोई काम नहीं आएगी। (48)
 

तो उन (काफ़िरों) को क्या हो गया है? क्यों वे इस चेतावनी से बिदककर मुँह मोड़ लेते हैं,   (49)

मानो वे घबराए हुए (जंगली) गधे हों,  (50)

जो शेर से (डरकर) भाग खड़े हुए हों?  (51)

उनमें से हर एक आदमी यह चाहता है कि उस पर सीधे (आसमानी) किताब उतार दी जाए जो उसकी आँख के सामने खोली जाए ---- (52)

नहीं! बल्कि (सच यह है कि) वे (आने वाली) परलोक (की ज़िंदगी) से डरते ही नहीं।  (53)

मगर सचमुच यह [क़ुरआन] एक नसीहत [Reminder] है।  (54)

अब जिसका जी चाहे, इस (नसीहत) पर ध्यान दे और याद रखे:   (55)

वे लोग तभी इसे याद रखने पर ध्यान देंगे, अगर अल्लाह ऐसा चाहे। सचमुच वही इस योग्य है कि उसकी चेतावनी पर ध्यान दिया जाए, और वही है जो माफ़ी देने वाला है।  (56)
 
 
 
नोट: 

1: ह्दीसों से साबित है कि सबसे पहले मुहम्मद (सल्ल.) पर सूरह अलक़ (96: 1--5) की पहली 5 आयतें उतरी थीं। उसके बाद कुछ अवधि तक "वही" [Revelation] उतरने का सिलसिला बंद रहा, फिर यह सूरह उतरी। 

 

7: जब मुहम्मद (सल्ल.) को लोगों के बीच अल्लाह का संदेश पहुँचाने का आदेश हुआ, तो इस बात की आशंका थी कि विश्वास न करनेवाले आपको सताएंगे। इसलिए बिना लड़ाई-झगड़ा किए हुए धीरज से काम लेने की सलाह दी गई है। उनके अत्याचारों की असल सज़ा उन्हें क़यामत में दी जाएगी।

 

11: बताया जाता है कि यह 'वलीद बिन मुग़ीरा' के बारे में आया है जो मक्का का बड़ा धनी सरदार था जिसकी सम्पत्ति मक्का से तायफ़ शहर तक फैली हुई थी। उसने एक बार क़ुरआन सुनी और उसके कलाम से इतना प्रभावित हुआ कि बोल उठा कि यह किसी इंसान का नहीं हो सकता। मक्का के सरदार और मुहम्मद साहब के प्र्मुख विरोधी अबु जहल को यह जानकर डर हुआ कि कहीं वलीद भी मुसलमान न हो जाए। उसने वलीद को ताव दिलाया कि जब तक तुम क़ुरआन के विरोध में नहीं बोलोगे, तब तक लोग तुम्हें धन का लालची समझेंगे। वलीद कहने लगा कि मैं क़ुरआन को न तो शायरी कह सकता हूँ, न ही काहिनों का कलाम कह सकता हूँ और न ही मुहम्मद को दीवाना कह सकता हूँ, क्योंकि यह बातें चल नहीं पाएंगी। फिर कुछ सोचते हुए कहने लगा कि उस कलाम को "जादू" कह सकते हैं, क्योंकि जिस तरह जादूगर मियाँ-बीवी के बीच झगड़े लगा देता है, उसी तरह यह कलाम घरों में माँ-बाप के बीच, बाप-बेटे के बीच, भाई-भाई के बीच मतभेद पैदा कर देता है।

 

18: मतलब यह है कि क़ुरआन के बारे में सोच समझकर एक बात बनाई गई कि यह एक जादू है। 

 

31: जब यह आयत उतरी कि जहन्नम की पहरेदारी के लिए 19 फ़रिश्ते नियुक्त हैं, तो मक्का के काफ़िरों ने इसका मज़ाक़ उड़ाना शुरू किया, और एक ने यहाँ तक कहा कि "19 में से 17 के लिए तो मैं ही काफ़ी हूँ, बाक़ी 2 से तुम निपट लेना।" मगर यहाँ एक ख़ास संख्या बताने का मक़सद भी लोगों को आज़माना था कि क्या वे उसे सही समझते हुए मान लेते हैं या उसका मज़ाक़ बनाते हैं।

 

36: जहन्नम जैसी बड़ी आफ़त का ज़िक्र लोगों को होश में लाने के लिए है, जो मरने के बाद की ज़िंदगी को भुलाए बैठे थे। यह बताने के लिए पहले चाँद की क़सम खाई गई है कि जिस तरह चाँद पहले हर दिन थोड़ा-थोड़ा बढ़ता है, फिर रोज़ थोड़ा-थोड़ा घटते -घटते महीने के अंत में ग़ायब हो जाता है, इसी तरह इंसान की ताक़त पहले बढ़ती है, फिर बुढ़ापे में घटनी शुरू हो जाती है, यहाँ तक कि इंसान एक दिन मर जाता है, और दुनिया की हर चीज़ का यही हाल है। फिर अल्लाह ने उस समय की क़सम खाई है जब रात ढलने लगती है, और सुबह का उजाला हो जाता है, यह शायद इस तरफ़ इशारा है कि अभी सच्चाई से इंकार करनेवालों के सामने बेफ़िक्री का अंधेरा छाया हुआ है, फिर एक समय आएगा जब यह अंधेरा दूर होगा और सच्चाई सबके सामने ज़ाहिर होकर माहौल को रौशन कर देगी।

 

38: जिस तरह क़र्ज़ की गारंटी के तौर पर कोई चीज़ गिरवी रखी जाती है कि अगर क़र्ज़ चुकता नहीं हुआ तो उस गिरवी रखे हुए सामान को बेचकर असल क़ीमत वसूल की जा सकती है, उसी तरह सच्चाई से इंकार करनेवाला भी गिरवी रखा होता है कि या तो वह सही रास्ता अपना ले, नहीं तो उसका पूरा अस्तित्व जहन्नम [नरक] का ईंंधन बनेगा।

 

52: यहाँ उन काफ़िरों का बयान है जो यह कहते थे कि क़ुरआन मुहम्मद (सल्ल.) पर ही क्यों उतारी गई, अगर अल्लाह को मार्गदर्शन के लिए कोई किताब उतारनी थी, तो हममें से हर आदमी पर अलग किताब आनी चाहिए थी!

 

53: इसमें साफ़ बता दिया गया कि किताब तो केवल पैग़म्बर पर ही उतारी जाती है ताकि वह किताब का सही मतलब लोगों को बता सके, और उसमें बतायी गई बातों पर अमल करने का तरीक़ा भी बता सके।










 
















Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...