Thursday, August 2, 2018

सूरह 13 : अर-रा'द/Ar Ra'd [बादल की गरज / Thunder]

सूरह 13: अर-रा'द 
[बादल की गरज / Thunder]



01 : यह किताब की आयतें हैं 

02-04: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

05-06: विश्वास न करने वाले दोबारा ज़िंदा उठाए जाने को नहीं मानते 

07     : चमत्कार दिखाने की माँग 

08-17: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

18     : इनाम और सज़ा 

19-29: ईमानवाले और इंकार करने वाले एक समान नहीं हो सकते 

30-32: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

33-34: विश्वास करने से इंकार करने वालों को दंड 

35     : बाग़ या आग 

36-43: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ रा॰

ये (अल्लाह की) किताब [क़ुरआन] की आयतें हैं। [ऐ रसूल], जो कुछ (आयतें) आपके रब की ओर से आप पर उतारी गयी हैं, वह सब सच हैं, फिर भी अधिकतर लोग (इस पर) विश्वास नहीं कर रहे। (1)

यह अल्लाह ही है जिसने आसमानों को इतना ऊँचा बनाया, और तुम देखते हो कि वह बिना किसी पाये के टिका हुआ है, और फिर अल्लाह ने अपने आपको सिंहासन पर स्थापित कर लिया (और आदेश जारी हो गए); उसने सूरज और चाँद को (इस तरह से) काम पर लगा रखा है कि हर एक अपने नियत समय तक (अपनी कक्षा में) चला जा रहा है; वह सारी चीज़ों को नियमित करता है, और वह अपनी आयतें [निशानियाँ] साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से बयान करता है ताकि तुम्हें यक़ीन हो जाए कि (एक दिन हिसाब देने के लिए) अपने रब से मिलना है;  (2)

वही है जिसने ज़मीन की सतह फैला दी, उसमें मज़बूत पहाड़ों को जमाया और नदियाँ बहा दीं, और उसमें हर तरह के फलों के दो-दो क़िस्म उगा दिए; वही है जो दिन की रौशनी पर रात की चादर ओढ़ा देता है। सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो सोच-विचार से काम लेते हैं। (3)

(और आसपास के इलाक़े को देखो!), धरती पर एक दूसरे से सटे हुए ज़मीन के टुकड़े हैं, उनमें अंगूरों के बाग़ हैं, (अनाज की) खेतियाँ हैं, खजूर के पेड़ हैं जिनमें कुछ तो झुंड में लगे होते हैं, कुछ अकेले खड़े होते हैं, सबको एक ही पानी से सींचा जाता है, फिर भी हम उनमें से कुछ फलों का मज़ा दूसरे फलों से बेहतर बना देते हैं: सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो बुद्धि से काम लेते हैं। (4)
 

[ऐ रसूल!], अगर कोई चीज़ आपको आश्चर्य में डालती हो, तो आपको इस बात पर ज़रूर आश्चर्य होना चाहिए जब वे [इंकार करनेवाले] पूछते हैं, "क्या? जब हम मरके (सड़-गलकर) मिट्टी हो जाएँगे, तो क्या हम फिर नये सिरे से पैदा किए जाएंगे?" यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब (की शक्ति को मानने से) इंकार किया, जिनकी गर्दनों मे लोहे के तौक़ [collars] पड़े होंगे और वही हैं जो (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं, जहाँ उन्हें हमेशा रहना है। (5)

[ऐ रसूल!], वे (दया या माफ़ी जैसे) अच्छे बदले की गुहार लगाने के बजाए आपसे (व्यंग्य करते हुए) यातना को जल्दी ले आने के लिए कहते हैं, हालाँकि उनसे पहले गुज़र चुकी कई क़ौमों की (बर्बादी की) मिसालें उनके सामने रही हैं----- आपका रब लोगों को उनकी ग़लतियों व गुनाहों के बावजूद माफ़ कर देता है, मगर (याद रहे!) वह सज़ा देने में भी सचमुच बहुत कठोर है। (6

विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] कहते हैं, "उस (रसूल) पर उसके रब की तरफ़ से कोई चमत्कार क्यों नहीं उतारा गया?" मगर आपका तो बस काम यही है कि आप लोगों को (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दें: (पहले ग़ुज़र चुकी) हर क़ौम के पास कोई रास्ता दिखानेवाला ज़रूर हुआ है। (7)
 
हर एक मादा की कोख में क्या (जन्म ले रहा) है, अल्लाह उसे जान रहा होता है, और यह भी कि उनके गर्भ कितने सिकुड़ते हैं या कितने फूल जाते हैं ---- उसके यहाँ हर चीज़ का एक अन्दाज़ा ठहराया हुआ है; (8)

वह उसे भी जानता है जो चीज़ दिखायी नहीं देती, और उसे भी जो दिखायी देती है; वह महान है, सबसे ऊँचा है। (9)

(अल्लाह को) इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुममें से कोई चुपके से कोई बात कहता हो या ज़ोर से, चाहे तुम रात के अंधेरे में छिपे हुए हो या दिन की रौशनी में चल-फिर रहे हो, उसके लिए सब (स्थितियाँ) बराबर हैं: (10

हर आदमी के आगे और पीछे देखभाल करनेवाले फ़रिश्ते लगे होते हैं, जो अल्लाह के हुक्म से (दिन और रात में) बारी-बारी उसकी निगरानी करते रहते हैं। अल्लाह किसी क़ौम के लोगों की हालत उस वक़्त तक नहीं बदलता, जब तक कि वे ख़ुद अपने हालात में बदलाव न ले आएं, लेकिन अगर वह किसी क़ौम को (उसके कुकर्मों के नतीजे में) नुक़सान पहुँचाना चाहे, तो कोई नहीं है जो इसे टाल सकता हो ------ उसके सिवा कोई नहीं, जो उनकी रक्षा कर सके।  (11)

वही है जो तुम्हें बिजली की चमक दिखाता है, जो दिलों में डर भी पैदा करती है और (बारिश की) आशा भी जगाती है; वह (पानी की बूंदों से) बोझिल बादलों को बनाता है; (12)

गरजते हुए बादल भी उसी का गुणगान करते हैं, और फ़रिश्ते भी जो उसके डर से सहमे रहते हैं; वही कड़कती हुई बिजलियाँ भेजता है, और जिस किसी पर चाहता है, गिरा देता है। इसके बावजूद इंकार करनेवाले [काफ़िर] अल्लाह (की क़ुदरत) के बारे में बहसें करते रहते हैं------ उसकी ताक़त बड़ी ज़बरदस्त और अटल है। (13)

सच्ची भक्ति से पुकारना हो, तो केवल वही है जिसे पुकारना चाहिए: अल्लाह को छोड़कर जिनको वे पुकारते हैं, वे उनकी पुकार का कोई जवाब नहीं देते। यह ऐसा ही है जैसे कोई (प्यासा) अपने दोनों हाथ पानी की ओर फैला भर दे और सोचे कि पानी उसके मुँह में (अपने आप) पहुँच जाएगा ------ ऐसा नहीं हो सकता: (सच्चाई से) इंकार करने वालों की दुआ व पुकार इसके सिवा कुछ नहीं कि बेकार रास्तों में भटकती फिरे।  (14

वह तमाम चीज़ें जो आसमानों और ज़मीन में हैं, केवल अल्लाह के ही आगे (सज्दे में) झुकती हैं, चाहे अपनी मर्ज़ी से झुकें या मजबूरी से, और यही हाल उनकी परछाइयों का भी है, जो सुबह में और शाम में (सज्दे में) झुक जाती हैं।  (15)
 
(ऐ रसूल) आप (इंकार करनेवालों से) पूछें, "आसमानों और ज़मीन का रब कौन है?" आप कहें, "वह अल्लाह है", कह दें, "फिर उसे छोड़कर तुमने दूसरों को क्यों अपना रखवाला बना रखा है, यहाँ तक कि जो न तो अपने आपको कोई फ़ायदा पहुँचा सकता है और न ही कोई नुक़सान?" कह दें, "क्या आँख से अंधा उन लोगों के बराबर हो सकता है जो देख सकते हों? और क्या गहरा अँधेरा और उजाला बराबर हो सकता है?" वे जिन्हें अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराते हैं, क्या उन्होंने भी अल्लाह की तरह किसी चीज़ की रचना की है जिसे देखकर दोनों (रचनाओं) में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया है?" कह दें, "अल्लाह ही हर चीज़ को पैदा करनेवाला है: वह अकेला है, सब पर छाया हुआ है!" (16)

वह आसमान से पानी बरसाता है जिससे नदी-नाले अपनी-अपनी समाई के अनुसार भरकर बह निकलते हैं। पानी के बहाव के साथ नदी की सतह पर झाग की परतें जमा हो जाती हैं, ऐसा ही झाग तब भी उठता है जब ज़ेवर और औज़ार बनाने के लिए किसी धातु को आग में पिघलाया जाता है: अल्लाह इस तरीक़े से सच और झूठ की मिसाल बयान करता है ---- जो झाग है वह तो सूखकर ग़ायब हो जाता है, मगर जो कुछ आदमी के फ़ायदे की चीज़ है, वह बची रह जाती है ---- अल्लाह ऐसी ही मिसालें दिया करता है। (17)

जो लोग अपने रब की पुकार सुनकर उसके हुक्म मान लेते हैं, उनके लिए बेहतरीन इनाम होगा; मगर वे लोग जिन्होंने उसकी पुकार का कोई जवाब न दिया, तो (क़यामत के दिन) अगर उनके पास वह सब कुछ हो जो ज़मीन में है, बल्कि उसका दुगना भी हो, तब भी अपनी मुक्ति के बदले में वे ख़ुशी-ख़ुशी सब दे डालें, क्योंकि उनसे जो हिसाब लिया जाएगा, वह बड़ा भयानक होगा। जहन्नम ही उनका घर होगा, और उनके आराम करने के लिए दुःख भरा बिछौना होगा।   (18)
 
ला वह आदमी जो जानता है कि जो कुछ आप पर आपके रब की तरफ़ से उतरा है वह सच्चाई है, कभी उस जैसा हो सकता है जो अंधा हो? परन्तु समझते तो वही हैं जो बुद्धि और समझ रखते हैं; (19

जो लोग अल्लाह के नाम से किए गए क़रार (Agreement) को पूरा करते हैं, और अपनी की गयी प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ते;  (20)

जो ऐसे हैं कि अल्लाह नॆ जिन रिश्ते को जोड़ने का आदेश दिया, उन्हें जोड़े रखते हैं; जो अपनॆ रब से डरते रहते हैं और (होने वाले) हिसाब की कठोरता के ख़्याल से घबराये रहते हैं; (21)

जो लोग अपने रब की ख़ुशी की चाहत में अपनी (ग़लत) इच्छाओं को मारते हुए धीरज से काम लेते हैं; जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं; जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है, उसमें से ढँके-छिपे भी और सबके सामने भी ख़र्च करते हैं; जो भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते हैं। तो यही लोग हैं जिनके लिए (आख़िरत में असली) घर का इनाम मिलेगा: (22)

वे हमेशा रहने के बाग़ [जन्नत] में ख़ुद भी दाख़िल होंगे और साथ में उनके बाप-दादा, उनके पति/पत्नियों और उनकी सन्तानों में से जो नेक होंगे, वे भी (वहाँ जगह पाएंगे); वहाँ हर दरवाज़े से फ़रिश्ते उनके पास आएंगे, (23)

(और कहेंगे) "चूँकि तुमने (दुनिया में) धीरज व सब्र से काम लिया था, इसलिए (आज) तुम पर सलामती हो!" तुम्हारा घर तुम्हारे लिए क्या बेहतरीन इनाम है!  (24)

मगर जो लोग अल्लाह के नाम से किए गए पक्के क़रार को तोड़ डालते हैं, अल्लाह ने जिन रिश्तों को जोड़ने का आदेश दिया, उसे काट डालते हैं और जो ज़मीन में फ़साद पैदा करते हैं: वही हैं जिनके लिए (आख़िरत में) बहुत बुरा घर होगा ---- (25

अल्लाह जिसको चाहता है, भरपूर रोज़ी देता है, औऱ जिसकोे चाहता है बहुत थोड़ी देता है ---- और हालांकि वे इस दुनिया की ज़िन्दगी में मौज-मस्ती कर सकते हैं, मगर आने वाली ज़िन्दगी के मुक़ाबले में यह तो बस बहुत थोड़े समय का आराम है। (26)

(सच्चाई से) इंकार करनेवाले कहते हैं, "इन (रसूल) पर उनके रब की तरफ़ से कोई (चमत्कारिक) निशानी क्यों नहीं उतारी गयी?" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "अल्लाह जिसे चाहता है उसे (सही रास्ते से दूर) भटकता छोड़ देता है, और जो उसकी तरफ़ भक्ति-भाव से जाता है, उसे वह अपनी तरफ़ बढ़ने का रास्ता दिखा देता है,  (27)

वे लोग जो ईमान रखते हैं, और जिनके दिलों को अल्लाह की याद से शांति मिलती है ----- सचमुच अल्लाह का ज़िक्र व उसकी याद ही ऐसी चीज़ है जिससे दिलों को सुकून व शांति मिलती है ----- (28)

जो लोग ईमान रखते हैं, और नेक व अच्छे कर्म करते हैं: वहां उनके लिए ख़ुशियाँ हैं जो उनके इंतज़ार में हैं, और उनका आख़िरी पड़ाव बेहद शानदार होगा।" (29)

अत: [ऐ रसूल!], हमने आपको एक ऐसी उम्मत [समुदाय] में भेजा है ----- जहाँ दूसरी उम्मतें उनसे बहुत पहले गुज़र चुकी हैं----- ताकि जो कुछ हमने आप पर ('वही' द्वारा) उतारा है, उसे आप उन्हें पढ़कर सुना दें। फिर भी वे दया करनेवाले रब [रहमान] पर विश्वास नहीं करते। कह दें, "वही मेरा रब है: उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ ख़ुदा नहीं। उसी पर मैंने भरोसा किया है और उसी के पास मुझे लौटकर जाना है।" (30

अगर कोई ऐसी भी क़ुरआन उतरती जिससे पहाड़ चलाए जाते या ज़मीन फाड़ दी जाती या उसके द्वारा मुर्दों से बात कर ली जाती [तो वह यही क़ुरआन होती! मगर तब भी ये लोग ईमान नहीं लाते!], मगर हर चीज़ सचमुच अल्लाह के ही अधिकार में है। फिर क्या ईमान रखनेवाले इस बात को नहीं समझते कि अगर अल्लाह ने ऐसा ही चाहा होता, तो सारे ही इंसानों को सीधे मार्ग पर लगा देता? और (याद रखो!) इंकार करनेवालों पर, उनकी करतूतों के बदले में, कोई न कोई मुसीबत निरंतर आती ही रहेगी, या उनके घर के नज़दीक ही कहीं उस वक़्त तक (बलाएं) उतरती रहेंगी, जब तक कि अल्लाह का वादा पूरा न हो जाए: अल्लाह कभी भी अपने वादे के विरुद्ध नहीं जाता।" (31

[ऐ रसूल!], आपसे पहले भी कितने ही रसूलों की हँसी उड़ायी जा चुकी है, मगर मैंने विश्वास न करनेवालों को पहले मुहलत दी थी: अंत में, मैंने उन्हें अपनी पकड़ में ले लिया ----- तो (देखो!) मेरी सज़ा कितनी दर्दनाक थी! (32)

भला क्या वह हस्ती जो हर एक जान के हर अच्छे-बुरे कर्म पर नज़र रखती है (उसे अपनी ख़ुदायी में किसी साझेदार की ज़रूरत है)? फिर भी, वे लोग अल्लाह के साथ साझेदार [Partner] ठहराते हैं। आप कहें, "ज़रा उनके नाम तो बताओ", या क्या तुम उस (अल्लाह) को ज़मीन के बारे में कोई ऐसी बात बता सकते हो जिसके अस्तित्व की उसे ख़बर तक नहीं, या क्या यह बस शब्दों का दिखावा मात्र है?" मगर वे जो मक्कारी की बातें बनाते हैं, वह बातें (सच्चाई से) इंकार करनेवालों के लिए बड़ी लुभावनी बना दी गयी हैं और उन्हें सही मार्ग पर चलने से रोक दिया गया है: जिसे अल्लाह (ही) भटकता छोड़ दे, उसे कोई सही रास्ते पर नहीं ला सकता। (33)

उनके लिए इस दुनिया में भी सज़ा है, मगर आने वाली दुनिया [आख़िरत/Hereafter] में उनकी सज़ा बहुत ही कठोर होगी ---- अल्लाह (की यातना) से उन्हें बचाने वाला कोई न होगा। (34)
 
वे लोग जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए जिस जन्नत का वादा किया गया है, उसकी तस्वीर कुछ ऐसी है: एक बाग़ है, उसके नीचे बहती हुई नहरें हैं, उसके फल हैं जो कभी ख़त्म नहीं होते, और पेड़ों की छाँव है जो हर समय बनी रहती है। यह इनाम उन लोगों के लिए है, जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं; जबकि विश्वास न करनेवालों का बदला (जहन्नम की) आग है। (35)

[ऐ रसूल!], जिन लोगों को हमने (आसमानी) किताब दी है, वे (क़ुरआन की) उन बातों से ख़ुश होते हैं जो आप पर उतारी गयी है; उनमें कुछ (यहूदी व ईसाई) गिरोह के ऐसे लोग भी हैं जो उस (क़ुरआन) की कुछ बातों को मानने से इंकार करते हैं। आप कह दें, "मुझे तो बस यह हुक्म हुआ है कि मैं अल्लाह की बन्दगी करूँ, और किसी को भी उसकी ख़ुदायी में साझेदार [Partner] न ठहराऊँ: उसी की (बातों की) तरफ़ तुम्हें बुलाता हूँ और उसी की तरफ़ मुझे लौटकर जाना है।" (36)

इस तरह, हमने इस (क़ुरआन) को अरबी ज़बान में फ़ैसला कर देने के लिए उतार भेजा है। [ऐ रसूल!], अब वह ज्ञान जो आपके पास आ चुका है, इसके बाद भी, अगर आप उन लोगों की इच्छाओं के पीछे चलें, तो कोई न होगा जो आपकी मदद कर सके या आपको अल्लाह से बचा सके। (37

[ऐ रसूल!], हमने आपसे पहले (अपने संदेश के साथ) कई रसूल भेजे और हमने उन्हें बीवियाँ और बच्चे भी दिए थे; किसी भी रसूल को यह शक्ति नहीं दी गयी थी कि वह बिना अल्लाह की अनुमति के, कोई चमत्कार (या एक आयत) लाकर दिखा सके। हर ज़माने (में रास्ता दिखाने) के लिए एक आसमानी किताब [Scripture] रही है: (38)

(अपने हुक्म में से) अल्लाह जो चाहता है मिटा देता है, और जो चाहता है, उसकी पुष्टि कर देता है, और मूल किताब तो उसी के पास है। (39)

हमने (विश्वास न करनेवालों को) जिस (बुरे) नतीजे की धमकी दे रखी है, हो सकता है कि उसमें से कुछ हिस्सा, [ऐ रसूल] आपको (आपकी ज़िंदगी में ही) दिखा दें, या (उससे पहले ही) आपको दुनिया से उठा लें, मगर आपका कर्तव्य तो बस (सच्चाई का) सन्देश पहुँचा देना है: हिसाब लेने का काम तो हमारा है। (40)

क्या वे [मक्का के इंकार करनेवाले] नहीं देखते कि हम (उनकी) सरज़मीन पर किस तरह चले आ रहे हैं, और कैसे उनकी सीमाएं सिकुड़ती जा रही हैं? और अल्लाह ही फ़ैसला करता है ---- कोई नहीं है जो उसके फ़ैसले टाल सके ---- और वह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (41)

जो लोग इनसे पहले गुज़र चुके हैं, वे भी (सच्चाई के ख़िलाफ़) चालें चला करते थे, मगर (याद रहे!) सारी चालें तो अल्लाह ही के क़ब्ज़े में हैं: हर एक आदमी जो कुछ भी करता है, अल्लाह सब जानता है। अंत में, (सच्चाई से) इंकार करनेवालों को मालूम हो जाएगा कि (परलोक में) किसके हिस्से में सबसे बेहतर घर आया। (42)

[ऐ रसूल!], (सच्चाई से) इंकार करनेवाले कहते हैं, "तुम अल्लाह की तरफ़ से भेजे हुए नहीं हो।" आप कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह की गवाही काफ़ी है: आसमानी किताबों [Scripture] का सारा ज्ञान उसी के पास से आता है।" (43)





नोट:

2: अल्लाह ने अपने आपको "सिंहासन पर स्थापित कर लिया", इसका मतलब दुनिया की तरह किसी गद्दी पर बैठ जाना ठीक नहीं होगा, बल्कि इसका मतलब यह है कि अल्लाह ने हर चीज़ की व्यवस्था संभाल ली और आदेश जारी होने लगे। 

3: हर वनस्पति यानी पौधों के भी जोड़े (नर और मादा) होते हैं।

5: जब अल्लाह ने पहली बार कायनात की रचना की थी, तब कुछ भी नहीं था, तो जो अल्लाह बिना किसी चीज़ के ऐसी रचना कर सकता है, तो उसके लिए मुदों को फिर से ज़िंदा करना क्या मुश्किल हो सकता है, सचमुच यह बात आश्चर्य करने की है। जैसे कि अगर किसी के गले में लोहे का तौक़ [Iron-collar] पड़ा हो तो वह इधर-उधर नहीं देख पाता, इसी तरह ये लोग अल्लाह की ताक़त और उसकी क़ुदरत को न ठीक से देख पाए और न समझ पाए।

7: मुहम्मद (सल्ल) को यूँ तो कई निशानियाँ दी गई थीं, मगर मक्का के विश्वास न करनेवाले उनसे बराबर नए चमत्कार दिखाने की माँग किया करते थे, मगर क़ुरआन ने यह

बात साफ कर दी है कि जब तक अल्लाह न चाहे, कोई रसूल अपनी तरफ़ से चमत्कार नहीं दिखा सकता, वैसे भी उनका काम लोगों को (सच्चाई से) इंकार और बुरे कर्मों के नतीजे से सावधान करना है। 

8: अल्लाह सब जानता है कि माँ की कोख में जो बच्चा है, वह लड़का होगा या लड़की, लम्बा होगा या नाटा, स्वस्थ होगा या बीमार, और सबसे अहम बात कि बच्चे की तक़दीर में क्या है, इत्यादि। गर्भ [womb] के घटने और बढ़ने से मतलब यह है कि वह यह भी जानता है कि बच्चा कितने दिनों तक कोख में रहेगा। 

13: गरजते हुए बादल भी अल्लाह की बड़ाई का गुणगान करते रहते हैं, इसे literal अर्थ में भी लिया जा सकता है जिसे आम लोग नहीं समझते, देखें 17: 44. और इसका मतलब यह भी हो सकता है कि जो भी आदमी बादलों के गरज-चमक के कारणों पर और उसके होने वाले नतीजे पर ध्यान देगा कि किस तरह दुनिया के कोने-कोने में पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई है, तो वह हैरत में पड़कर उसके पैदा करने वाले की बड़ाई और गुणगान करने पर मजबूर हो जाएगा और समझ जाएगा कि उस मालिक को अपनी ख़ुदायी के लिए किसी साझेदार [Partner] की ज़रूरत नहीं है।   

16: चूँकि मक्का के बहुदेववादियों [Idolaters] के बारे में पता था कि अगर उनसे पूछा जाए कि आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया, तो सिवाए "अल्लाह" कहने के उनके पास कोई और जवाब न था, इसीलिए उनसे यह पूछने को कहा गया। एक बार जब वे इस बात को मान गए तो फिर तो यह बेतुकी बात हुई कि अल्लाह को छोड़कर जिन देवताओं को उन्होंने अपना रखवाला बना रखा है, असल में उन्हें तो अपने आपको भी फ़ायदा या नुक़सान पहुँचाने की ताक़त नहीं है, तो वे दूसरों को क्या फ़ायदा पहुँचाएंगे। 

17: "झूठ" चाहे थोड़ी देर के लिए हावी भी हो जाए, मगर वह झाग की तरह गंदा व बेकार होता है और मिट जाता है, जबकि "सच्चाई" उस साफ़ पानी या शुद्ध धातु की तरह है जो फ़ायदामंद है और बाक़ी रहने वाला है। देखें 17:81. 

21: अल्लाह ने इंसानों से रिश्ता बनाए रखने पर ज़ोर दिया है, जिसमें अपने ख़ानदानी रिश्तेदारों के साथ और ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के साथ रिश्ता निभाना ज़रूरी है। 

26: किसी को बहुत रोज़ी देना और किसी को तंगी देना, यह पूरी तरह से अल्लाह के हाथ में है, मगर अच्छी रोज़ी और ख़ुशहाली मिलने से यह शक नहीं होना चाहिए कि उसके कर्म को भी अल्लाह ने पसंद कर लिया हो, क्योंकि यह ज़रूरी नहीं है। इस तरह विश्वास न करनेवाले दुनिया की ज़िंदगी में मस्त रह सकते हैं मगर आनेवाली ज़िंदगी के मुक़ाबले यह थोड़ी देर का ही आराम है! 

31: यहाँ उन चमत्कारों का ज़िक्र किया गया है जिसकी मांग मक्का के विश्वास न करनेवाले लोग बराबर किया करते थे, वे मुहम्मद साहब को कहते थे कि अगर तुम मक्का के आसपास के जो पहाड़ हैं उनको हटा दो, या ज़मीन को फाड़कर उसमें से दरिया बहा दो या हमारे बाप-दादाओं को ज़िंदा करके उनसे हमारी बात करवा दो, तब हम तुम्हारी बातों पर ज़रूर ईमान लाएंगे। यहाँ अल्लाह ने बताया है कि अगर ये सारी मांगें पूरी कर भी दी जाएं, तब भी ये लोग हठधर्मी के चलते विश्वास नहीं करने वाले। इसी तरह की मांगों का ज़िक्र सूरह अल-इसरा (17: 90-93) में भी आया है। 

कभी-कभी ईमान रखनेवाले भी ऐसा सोचते थे कि अगर ये चमत्कार दिखा दिए जाते तो वे लोग विश्वास कर लेते। मगर उन्हें समझना चाहिए कि अल्लाह नहीं चाहता कि हर आदमी ज़बरदस्ती ईमान लाए, बल्कि दुनिया को एक इम्तिहान की जगह बनाया गया है जहाँ हर आदमी अपनी मर्ज़ी से सोच-समझकर फ़ैसला करे, उसे रास्ता दिखाने के लिए नबी और किताबें हैं, अब अगर वह सच्चाई पर विश्वास करके अच्छे काम करता है, तो उसे इनाम मिलेगा, और अगर वह अविश्वास पर अड़ा रहता है और बुरे कर्म करता है, तो उसे दंड झेलना होगा। 

33: जब कोई आदमी इस ज़िद्द पर अड़ा रहे कि जो कुछ भी वह कर रहा है, वही अच्छा काम है, और उसके मुक़ाबले में बड़ी से बड़ी दलील को भी सुनने और मानने के लिए तैयार न हो, तो अल्लाह उसको गुमराही में भटकता छोड़ देता है. और फिर उसके बाद कोई उसे सीधे रास्ते पर लाने वाला नहीं है।  

36: जिन लोगों को किताब [क़ुरआन] दी गई यानी मुहम्मद (सल्ल) के सहाबी [companions] और वे लोग जिन्होंने इसकी सच्चाई पर विश्वास कर लिया था, ऐसे लोग तो क़ुरआन की बातों से ख़ुश होते थे, मगर यहूदियों और ईसाइयों में कुछ गिरोह ऐसे थे जो क़ुरआन की उन बातों को तो मानते थे जो कि तोरात और बाइबिल के आदेशों से मिलती-जुलती थी, पर जो बातें ख़ासकर इस्लाम से जुड़ी हुई थीं, उन्हें इन लोगों ने मानने से इंकार कर दिया था, जैसे मुहम्मद (सल्ल) का पैग़म्बर [Prophet] होना।  

37: क़ुरआन अरबों की ज़बान में सच और झूठ के बीच फ़ैसला कर देनेवाली किताब है या यह कहें कि यह नियम-क़ायदे [Rulings] बताने वाली है। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि मुहम्मद (सल्ल) केवल अरबों के लिए या जो अरबी [Arabic] जानते हैं, उन्हीं के लिए रसूल बनाकर भेजे गए थे, बल्कि वह सारे इंसानों के लिए रसूल बनाए गए थे (34:28).

क़ुरआन अरबी ज़बान में इसलिए उतरी, क्योंकि अल्लाह ने अपना संदेश लोगों तक पहुँचाने के लिए एक अरब के आदमी [मुहम्मद सल्ल] को रसूल बनाया, और हर रसूल अपनी क़ौम की ज़बान में ही संदेश देता है ताकि वह लोगों को बात ठीक ढंग से समझा सके (14:4). 

38: कुछ लोगों ने यह आपत्ति जतायी थी कि यह कैसा रसूल है जिसके बीवी-बच्चे हैं? क़ुरआन में दूसरी जगहों पर यह भी आया है कि यह कैसा रसूल है "जो खाता-पीता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है!" (25:7) 

39: मूल किताब यानी "लौह ए महफ़ूज़" [Preserved Tablet] शुरू से अल्लाह के पास है, उसमें से हर ज़माने में लोगों के मार्गदर्शन के लिए किताबें उतरती रही हैं, और चूँकि हर ज़माने में हालात थोड़े बहुत बदलते रहते हैं, इसलिए पुराने हुक्मों में से कुछ को मिटा दिया जाता है और कुछ को वैसा ही छोड़ दिया जाता है। 

41: अरब में विश्वास न करने वालों का धीरे-धीरे प्रभाव घटता जा रहा था, पहले मदीना में मुसलमानों की आज़ाद हुकूमत बनीं और फिर आहिस्ता-आहिस्ता आसपास के इलाक़ों पर उनका दबदबा बढ़ता चला गया, इस तरह, मक्का के उन विश्वास न करने वालों की सीमाएं सिकुड़ती चली गईं।

 

 


Saturday, July 14, 2018

सूरह 22 : अल-हज्ज [हज / The Pilgrimage]

सूरह 22: अल-हज्ज 
[हज/The Pilgrimage]


01-04: आख़िरी दिन 

05-07: दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है 

08-13: कुछ लोगों के ईमान में स्थिरता नहीं होती 

14-16: विश्वास करने वाले और विश्वास से इंकार करने वाले की तुलना 

17-18: धार्मिक समुदायों के बीच अल्लाह फ़ैसला कर देगा 

19-24: विश्वास रखनेवालों और इंकार करने वालों के अंजाम की तुलना 

25  : पवित्र मस्जिद [काबा] से रोकने वालों को दंड 

26-29: इबराहीम (अलै) ने हज की घोषणा 

30-33: हज से जुड़े नियम-क़ायदे 

34-38: जानवरों की क़ुर्बानी 

39-41: विश्वास न करने वालों के ख़िलाफ़ लड़ने की अनुमति 

42-51: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी 

52-54: रसूलों के काम में शैतान की फ़ितना डालने की कोशिश 

55-57: फ़ैसले का दिन 

58-60: घर छोड़कर मदीना आने वाले [मुहाजिर] 

61-66: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

67-70: हर मज़हब में इबादत [पूजा] करने का तरीक़ा अलग-अलग 

71-72: विश्वास करने से इंकार करने वालों का अंजाम 

73-74: झूठे ख़ुदाओं में कोई ताक़त नहीं 

75-76: अल्लाह अपने संदेश भेजने के लिए रसूलों को चुनता है 

77-78: ईमानवालों का उत्साह बढ़ाया गया 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है
ऐ लोगो! अपने रब की यातना से डरो, क्योंकि (क़यामत की) अंतिम घड़ी में जो भूचाल होगा वह बड़ी ज़बरदस्त घटना होगी: (1)
(जिस दिन वह घड़ी आ जाएगी) उस दिन तुम देखोगे: हर एक दूध पिलानेवाली माँ अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाएगी, हर एक गर्भवती औरत अपना गर्भ (समय से पहले) गिरा देगी। लोगों को देखकर तुम्हें लगेगा कि वे नशे में मदहोश हैं जबकि वे नशे में न होंगे, अल्लाह की यातना इतनी दिल दहला देने वाली होगी। (2)
इसके बावजूद कुछ ऐसे भी हैंं जो बिना जाने-बूझे अल्लाह के बारे मेंं झगड़ा करते हैं, और हर बाग़ी शैतान के पीछे चल पड़ते हैं, (3)
जबकि शैतान के लिए यह बात लिख दी गयी है कि जो कोई उसका दोस्त हुआ, उसे वह ज़रूर सीधे रास्ते से भटका देगा, और उसे (जहन्नम की) भड़कती आग तक पहुँचा कर रहेगा। (4)

लोगो! अगर तुम्हें (मर के) दोबारा जी उठने के बारे में कोई सन्देह हो तो (याद रखो!), कि हमने तुम्हें (पहले) मिट्टी से पैदा किया, फिर वीर्य [sperm] की बूंद से, जो फिर जोंक की तरह सटी हुई चीज़ बन जाती है, फिर गोश्त का लोथड़ा बन जाता है जिसमें (कभी) पूरी शक्ल बन जाती है और (कभी) पूरी नहीं बनती: यह इसलिए कि हम चाहते हैं कि हमारी शक्ति व क़ुदरत (के करिश्मे) तुम्हारी समझ में ठीक से आ जाएं। फिर जिस वीर्य को हम चाहते हैं, उसे (औरत के) गर्भ में एक नियत समय तक ठहराए रखते हैं, फिर तुम्हें एक बच्चे के रूप में बाहर लाते हैं और फिर तुम बड़े होते हुए अपनी जवानी की अवस्था को पहुँच जाते हो। तुममें से कुछ लोग तो (बुढ़ापे से) पहले ही मर जाते हैं, और कुछ लोग (बुढ़ापे की) इतनी उम्र तक ज़िंदा बचे रहते हैं कि जो कुछ वे जानते थे, सब भुला बैठते हैं। कभी कभी तुम देखते हो कि ज़मीन सूखी-बेजान पड़ी है, फिर जब हम उसपर पानी बरसा देते हैं, तो अचानक लहलहाने और उभरने लगती है और उसमें हर क़िस्म की ख़ुशनुमा चीज़े उग आती हैं:   (5)
ऐसा इसलिए है कि अल्लाह ही सच्चाई है; वह मुर्दों को फिर से ज़िंदा करता है; उसे हर चीज़ करने की ताक़त है। (6)

इस बात में कोई संदेह नहीं कि क़यामत की घड़ी आकर रहेगी, और न इसमें कोई शक है कि अल्लाह मुर्दों को उनकी क़ब्रों से उठा खड़ा करेगा,  (7)
कुछ लोग ऐसे हैं कि न तो उनके पास ज्ञान है, न किसी तरह का मार्गदर्शन है, और न ही ज्ञान की रौशनी देने वाली किताब है, तब भी वे अल्लाह के बारे में झग़ड़ा करते हैं, (8)
घमंड से अपने पहलू मोड़ लेते हैं, ताकि दूसरों को अल्लाह के मार्ग से भटका दें। ऐसे आदमी के लिए दुनिया में भी बेइज़्ज़ती है, और क़यामत के दिन हम उसे आग में जलने का मज़ा चखाएँगे। (9)
(उनसे कहा जाएगा), "यह सब तेरे उन करतूतों का नतीजा है जो ख़ुद तेरे हाथों ने जमा कर रखा है: अल्लाह अपने बंदों पर कभी ज़ुल्म करने वाला नहीं है। (10)

और (देखो!), कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह की बंदगी तो करते हैं, मगर उनके ईमान में स्थिरता नहीं होती: अगर उन्हें (दुनिया में) कोई फ़ायदा पहुँच गया, तो वे उससे सन्तुष्ट हो गए, लेकिन अगर उनकी परीक्षा ली गयी, तो उल्टे पाँव (इंकार करने की) हालत पर लौट आएं, (इस तरह) दुनिया भी हार बैठे और आने वाली दुनिया भी हाथ से निकल गयी---- यह बात साफ़ है कि यही बहुत बड़ा घाटा है।  (11)
वे अल्लाह को छोड़कर (ज़रूरत के समय) उसे पुकारते हैं, जो न उन्हें नुक़सान पहुँचा सके और न उनकी मदद कर सके------ सही रास्ते से बहुत दूर भटक जाना यही है-----  (12)
या वे ऐसे (झूठे ख़ुदा) को पुकारते हैं जिससे फ़ायदा होने के बजाए कहीं अधिक नुक़सान होना तय है। कितना बुरा मददगार है और कितना बुरा साथी है वह! (13)
मगर जिन लोगों ने विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए, उन्हें अल्लाह ऐसे बाग़ों में दाखिल करेगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। अल्लाह जो चाहता है, करता है।  (14)
जो कोई (निराश होकर) ऐसा सोचता है कि अल्लाह दुनिया और आख़िरत [परलोक] में उसकी कोई मदद करने वाला नहीं, तो उसे चाहिए कि वह छत से एक रस्सी तान ले और (अपने आपको फाँसी लगाकर) ज़मीन से अपना रिश्ता काट दे, फिर देखे कि उस उपाय से उसका ग़ुस्सा दूर होता है कि नहीं।  (15)
(देखो), इस तरह हम इस (क़ुरआन) को स्पष्ट संदेशों के रूप में उतार भेजते हैं, और अल्लाह जिसे चाहता है, सही रास्ते पर लगा देता है। (16)

रहे वे लोग जो ईमान रखते हैं, जो यहूदी मत के मानने वाले हैं, जो साबी [Sabians] हैं, जो ईसाई हैं, जो मजूसी [Magians] हैं, और जो मुशरिक [बहुदेववादी /Idolaters] हैं, अल्लाह क़यामत के दिन इन सबके बीच फ़ैसला कर देगा; अल्लाह सब कुछ देखता है। (17)
[ऐ रसूल] क्या आप नहीं समझते कि आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह (के हुक्म) के सामने झुकी रहती है: सूरज, चाँद, तारे, पहाड़, पेड़, और जानवर? और बहुत सारे आदमी भी (सज्दे में झुके रहते हैं), मगर हाँ, बहुत-से आदमी ऐसे भी हैं जो इसी लायक़ हैं कि उन्हें सज़ा मिलनी ही चाहिए। और जिसे अल्लाह बेइज़्ज़त कर दे, तो उसे इज़्ज़त देने वाला कोई नहीं: अल्लाह जो चाहता है, करता है। (18)
ये (ईमानवाले और काफ़िर) दो तरह के आदमी हैं जो अपने रब के बारे में मतभेद रखते हैं। जो लोग विश्वास नहीं करते, उनके पहनने के लिए आग का कपड़ा होगा; उनके सिरों पर खौलता हुआ पानी डाला जाएगा, (19)
इससे उनके पेट के अंदर की चीज़ें भी गल उठेंगी और उनके बदन के चमड़े भी; (20)
उन्हें क़ाबू में रखने के लिए लोहे की छड़ियाँ होंगी; (21)
जब कभी वे परेशान होकर उससे निकल भागना चाहेंगे, तो वे उसी में वापस धकिया दिये जाएंगे और कहा जाएगा, "अब आग में जलने का मज़ा चखो!" (22)
मगर जो लोग ईमान रखते हैं और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो अल्लाह उन लोगों को ऐसे बाग़ों में दाखिल करेगा जिनके नीचें नहरें बह रही होंगी; वहाँ वे सोने के कंगनों और मोतियों से सजाए जाएँगे; उनके पहनने के लिए वहाँ रेशमी कपड़ा होगा।  (23)
उन्हें ऐसी बात की तरफ़ ले जाया गया था जो अच्छी व पाकीज़ा बात थी, और उन्हें ऐसे रास्ते पर चलाया गया था जो उस (ख़ुदा) का रास्ता है जो सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (24)

रहे वे लोग जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, जो दूसरों को अल्लाह के मार्ग से और पवित्र मस्जिद [काबा] से रोकते हैं---- जिसे हमने सारे लोगों (की इबादत) के लिए एक समान बनाया है, चाहे वहाँ का निवासी हो या बाहर से आया हो ---- और (याद रहे कि) जो कोई ज़ुल्म करके इन (नियमों) को तोड़ने की कोशिश करेगा, उसे हम दर्दनाक सज़ा का मज़ा चखाएँगे। (25)
(याद करो!) जब हमने इबराहीम को उस (पवित्र) घर [काबा] की जगह दिखायी और कहा था, "मेरे साथ किसी चीज़ को (मेरी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] न ठहराना। मेरे घर को उन लोगों के लिए पाक-साफ़ रखना जो इसके गिर्द फेरा [तवाफ़] लगाते हैं, जो इबादत के लिए खड़े होते हैं, और जो रुकू [bow] और सज्दे [prostrate] में झुकते हैं। (26)
(और हुक्म दिया था कि) लोगों के बीच हज करने की घोषणा कर दो। वे (दूर दूर से) गहरे पहाड़ी दर्रों से होते हुए तेरे पास आया करेंगे, पैदल भी और हर तरह की तेज़ सवारियों पर भी,   (27)
ताकि वे यहाँ आने का फ़ायदा उठा सकें, और निर्धारित दिनों में, जो चौपाए अल्लाह ने उन्हें दे रखे हैं, उनपर अल्लाह का नाम लें (और उनकी क़ुर्बानी कर) सकें ------- फिर उस (क़ुर्बानी के गोश्त) में से ख़ुद भी खाओ और ग़रीब-बदहाल लोगों को भी खिलाओ---- (28)
फिर (हज में आए हुए) लोगों को चाहिए कि साफ़-सुथरे हो जाएं, अपनी मन्नतें पूरी करें और इस पुराने घर [काबा] का (सात बार) चक्कर [तवाफ़] लगाएं।" (29)
ये सारी चीज़ें [अल्लाह ने आदेश की हैं]: जो कोई अल्लाह द्वारा तय की गयी मर्यादाओं का आदर करेगा, तो वह अपने रब से इसका बहुत अच्छा बदला पायेगा।

तुम्हारे लिए सारे चौपाए हलाल [lawful] कर दिए गए हैं, सिवाए उनके जिनके बारे में ख़ास तौर से मना किया गया है। मूर्तिपूजा से जुड़ी धारणाओं और रीतियों (जैसे चौपाया जानवरों को मूर्तियों पर बलि चढ़ाए जाने) की गन्दगी से बचकर रहो, और झूठी बातों से भी बचते रहो। (30)
पूरी भक्ति से अल्लाह के ही सामने झुको और उसके साथ किसी को (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] न ठहराओ, क्योंकि जिस किसी ने ऐसा किया, तो उसका हाल ऐसा होगा जैसे उसे आसमानों से नीचे फेंक दिया गया हो और उसे (हवा में) कोई पक्षी उचक ले जाए, या हवा का झोंका उसे किसी दूर-दराज़ इलाक़े में ले जाकर फेंक दे।  (31)
ये सारी चीज़ें (अल्लाह के हुक्म से होती हैं): जो लोग अल्लाह की रीतियों [rituals] को मानते हुए उसका आदर करते हैं, तो ये (चीज़ें) उनके दिलों में बुराइयों से बचने की भावना को दिखाती हैं।  (32)
एक नियत समय तक चौपाये तुम्हारे लिए बहुत फ़ायदे के हैं। उसके बाद उन्हें पुराने घर [काबा] के पास क़ुर्बानी के लिए ले जाना है: (33)
(और देखो!) हर समुदाय के लिए हमने भक्ति का तरीक़ा तय कर दिया कि जब वे हमारे दिए हुए पालतू चौपायों (को काटकर खाना चाहें, तो उन) पर अल्लाह का नाम ले लें: तुम्हारा अल्लाह तो एक ही है, अत: पूरी भक्ति से उसी के हो रहो, (ऐ रसूल!), आप विनम्र लोगों को (कामयाबी की) अच्छी ख़बर दे दें, (34)
जब कभी ऐसे (नेक) लोगों के सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल दहल उठते हैं, जो भी मुसीबत उन पर आती है, उस पर धीरज से काम लेते हैं, जो नमाज़ को पूरी पाबंदी से पढ़ने में लगे रहते हैं, और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दे रखी है उसे (सही रास्ते में) ख़र्च करते रहते हैं। (35)

(और देखो, क़ुर्बानी के) ऊँटों को हमने तुम्हारे लिए अल्लाह की पवित्र निशानियों में से बनाया है। तुम्हारे लिए उनमें बहुत सी अच्छाइयाँ हैं। अतः जब वे कुर्बानी के लिए क़तार में खड़े किए जाएं, तो उनपर अल्लाह का नाम लो, फिर जब वे (ज़बह होकर) गिर पड़ें, तो उनके गोश्त में से ख़ुद भी खाओ औऱ साथ में उनको भी खिलाओ, जो चाहे मांगते हों या न मांगते हों। इस तरह हमने इन (जानवरों) को तुम्हारे वश में कर दिया है, ताकि तुम शुक्र अदा करने वाले बन जाओ।  (36)
(याद रहे! क़ुर्बानी के जानवर का) न तो गोश्त और न ही ख़ून अल्लाह तक पहुँचता है, वहां अगर कुछ पहुंचता है तो वह तुम्हारे दिल की नेकी [तक़वा /paiety] है! उसने इन (जानवरों) को इस तरह तुम्हारे वश में कर दिया है कि जो सही रास्ता अल्लाह ने तुम्हें दिखाया है, उस पर शुक्र अदा करो, और अल्लाह की बड़ाई बयान करो।

जो लोग अच्छा काम करते हैं, उन्हें (सच्चाई क़बूल करने की) ख़ुशख़बरी सुना दो: (37)
ईमान रखनेवालों को अल्लाह (ज़ालिमों से) बचा लेगा; अल्लाह ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता जो न विश्वास करने योग्य हों और न ही (नेमतों के लिए) शुक्र अदा करते हों। (38)
जिन (ईमानवाले) लोगों पर हमला किया गया है, उन्हें हथियार उठाने की अनुमति दी जाती है, क्योंकि उन पर साफ़ तौर से ज़ुल्म किया गया है ----- अल्लाह उनकी मदद करने की पूरी ताक़त रखता है।  (39)
वे लोग जो अपने घरों से बिना किसी हक़ के, केवल इसलिए भगा दिए गए कि वे कहते थे, "हमारा रब अल्लाह है।" अगर अल्लाह एक-दूसरे के द्वारा कुछ लोगों को हटाता न रहता तो बहुत सारी मठें [Monasteries], गिरजाघर [churches], यहूदियों की इबादतगाहें [Synagogues] और मस्जिदें, जिनमें अल्लाह के नाम का ज़िक्र बार-बार किया जाता है, सब बर्बाद कर दी जातीं। अल्लाह ऐसे लोगों की मदद ज़रूर करेगा, जो उसकी (सच्चाई के पक्ष में) मदद करते हैं ---- अल्लाह बड़ा मज़बूत, बेहद ताक़तवाला है ---- (40)
ये वह लोग हैं, जिनके क़दम जब हम ज़मीन पर मज़बूती से जमा (कर हुकूमत दे) देते हैं, तो वे नमाज़ का आयोजन करते हैं, निर्धारित ज़कात [alms] देते हैं, भलाई के कामों का हुक्म देते हैं, बुराई से रोकते हैं: सारे मामलों का नतीजा अल्लाह के ही हाथ में है। (41)

[ऐ रसूल], अगर वे आपको झूठा कहकर ठुकराते हैं, तो आपसे पहले नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी ऐसा किया था, और ऐसा ही आद [Aad], समूद [Thamud],  (42)
इबराहीम [Abraham], लूत [Lot], मदयन [Midian] की क़ौम के लोग भी कर चुके हैं। (43)
मूसा [Mose] को भी झूठा कहा गया था। मैंने विश्वास न करने वालों को थोड़े समय के लिए ढील दी, मगर अंत में मैंने उन्हें सज़ा दी। तो (देखो) मेरी पकड़ उनके लिए कैसी थी कि बेकार होकर रह गए! (44)
कितनी ही बस्तियाँ हम बर्बाद कर चुके हैं जो ज़ुल्म करने वाली थीं, हम ने उन्हें पूरी तरह खंडहर बना के छोड़ दिया; कितने ही वीरान पड़े हुए कुएँ; कितने ही ऊँचे-ऊँचे महल! (45)
क्या ये (मक्का के) लोग ज़मीन पर एक जगह से दूसरी जगह चले फिरे नहीं कि सीख ले पाते? उनके पास दिल होते और समझते-बूझते, कान होते और कुछ सुन पाते? असल में लोगों की आँखें अंधी नहीं हुई हैं, बल्कि उनके सीनों में जो दिल हैं, वे अंधे हो गए हैं। (46)

(ऐ रसूल), वे आपसे यातना जल्दी ले आने की चुनौती दे रहे हैं। ऐसा हो नहीं सकता कि अल्लाह अपना वादा पूरा न करे ----- मगर आपके रब के यहाँ एक दिन, तुम लोगों की गिनती में एक हजार साल जैसा है। (47)
कितनी ही बस्तियाँ थीं जो ग़लत कामों में डूबी हुई थीं जिनको मैंने कुछ और मुहलत दी, फिर उन्हें (पकड़ लिया और) मिटाकर रख दिया: अंत में उन सबको मेरी ही पास लौटकर आना है। (48)

[ऐ रसूल!] आप कह दें, "ऐ लोगो! मैं केवल इसीलिए भेजा गया हूँ कि तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) साफ़ व स्पष्ट ढंग से सावधान कर दूँ।" (49)
फिर जिन लोगों ने विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, उनकी ग़लतियों को माफ़ कर दिया जाएगा और उनके लिए इज़्ज़त की रोज़ी होगी। (50)
लेकिन जो लोग हमारे संदेशों का विरोध करने में लगे रहे और उन्होंने हमें हरा देने की बेकार कोशिश की, उनके भाग्य में (जहन्नम की) आग में जाना लिखा है।  (51)
[ऐ रसूल], हमने आपसे पहले कभी कोई रसूल और नबी [Prophet] ऐसा नहीं भेजा कि जब भी उसने (सुधार करने की) कामना की हो, और शैतान ने उसमें कोई फ़ितना डालने की कोशिश न की हो। मगर अल्लाह शैतान के फ़ितनों [insinuations] को दूर कर देता है, और फिर अल्लाह अपने संदेशों [निशानियों] को और मज़बूत बना देता है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, और बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है। (52)
शैतान के फितनों को अल्लाह केवल उन लोगों के लिए आज़माइश बना देता है, जिनके दिलों में रोग है और जिनके दिल (सच्चाई के विरोध में) कठोर हो गये हैं--- ज़ुल्म करने वाले (सच्चाई के) ज़बरदस्त विरोधी हैं----- (53)
और जिन्हें ज्ञान मिला है, अल्लाह चाहता है कि वे जान लें कि जो आयतें उतरी हैं, ये सच्चाई हैं जो तुम्हारे रब की तरफ़ से आयी हैं, ताकि वे इस पर विश्वास कर सकें और उसके सामने उनके दिल झुक जाएँ: अल्लाह ईमान रखने वालों को सीधा मार्ग दिखा देता है। (54)
विश्वास न करने वाले उस वक्त तक संदेह मे ही डूबे रहेंगे, जब तक कि क़यामत की घड़ी अचानक उनपर न आ जाए या एक ऐसे दिन की यातना उनपर न आ पहुँचे जिस दिन सारी आस टूट जाए। (55)
उस दिन सारा नियंत्रण व बादशाही अल्लाह ही की होगी: वह उन सब के बीच फ़ैसला कर देगा। जिन लोगों ने विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, वे ख़ुशियों भरे बाग़ों (जन्नतों) में दाख़िल किए जाएंगे,  (56)
और जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया और हमारी आयतों कोे झूठ समझते हुए ठुकरा दिया, उनके लिए अपमानित कर देने वाली यातना होगी। (57)

अल्लाह उन लोगों को (परलोक में) दिल खोलकर रोज़ी देगा, जो अल्लाह के रास्ते में घर-बार छोड़कर (मदीना) चले आए, फिर मारे गए या जिनकी मौत हो गयी। और अल्लाह ही सबसे बेहतर रोज़ी देने वाला है। (58)
वह उन्हें ऐसी जगह पहुँचा देगा जिससे वे ख़ुश हो जाएँगे: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बेहद सहनशील है। (59)
ये बात तय है कि अगर एक आदमी किसी (दुश्मन) के आक्रामक रवैये का ठीक वैसा ही बदला ले जैसा उसके साथ किया गया हो, और उसके बाद (उसका दुश्मन) उस पर फिर ज़ुल्म करने लग जाए, तो अल्लाह उस (निर्दोष) की ज़रूर मदद करेगा: अल्लाह (बुराइयों को) अनदेखा करने वाला, बहुत माफ़ करने वाला है। (60)
ऐसा इसलिए है कि अल्लाह ही है जो रात को दिन से मिला देता है और दिन को रात से मिला देता है, और यह कि अल्लाह सब कुछ सुनता, सब कुछ देखता है। (61)
ऐसा इसलिए भी है कि अकेला अल्लाह ही है जो सच्चाई है, और उसके सिवा वे जिस किसी को पुकारते हैं, निरा झूठ व मिथ्या हैं: वह अल्लाह है जो सबसे ऊँचा, सबसे महान है। (62)

(ऐ रसूल!), क्या आपने ध्यान नहीं दिया कि कैसे हम आसमान से पानी बरसाते हैं और अगले दिन (सूखी) ज़मीन हरी-भरी होकर लहलहाने लगती है? अल्लाह सचमुच बहुत बारीक नज़र रखने वाला, हर चीज़ की ख़बर रखने वाला है; (63 )
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ उसी की है; केवल अल्लाह ही है जो किसी पर निर्भर नहीं, हर तरह की तारीफ़ों के लायक़ है। (64)
क्या तुमने ध्यान नहीं दिया कि कैसे अल्लाह ने ज़मीन की हर एक चीज़ को तुम्हारे काम में लगा रखा है? कि उसी के हुक्म से समंदर में जहाज़ चलते हैं? उसने आसमानों को इस तरह रोक रखा है कि बिना उसकी अनुमति के वे ज़मीन पर नहीं गिर सकते। अल्लाह इंसानों के लिए बड़ा तरस खानेवाला, बेहद दयावान है----- (65)
वही है जिसने तुम (लोगों) को ज़िन्दगी दी, वही तुम्हें मौत देगा, और फिर वही तुम्हें दोबारा ज़िंदा करने वाला है---- मगर आदमी सचमुच शुक्र अदा करने वाला नहीं है। (66)

हर समुदाय के लिए हमने इबादत (पूजा-पाठ) करने का तरीक़ा तय कर रखा है, जिसका पालन उसके लोग करते है, अतः इस मामले में उन्हें (ऐ रसूल) आपसे झगड़ने की ज़रूरत नहीं है। आप उन्हें अपने रब की ओर बुलाएं---- आप बिल्कुल सीधे मार्ग पर हैं---- (67)
और अगर (इस पर भी) वे आपसे झगड़ा करें तो कह दें, "तुम जो कुछ कर रहे हो अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है।” (68)
तुम जिन बातों में आपस में एक दूसरे से झगड़ा करते रहते हो, क़यामत के दिन अल्लाह तुम्हारे बीच फ़ैसला करके हक़ीक़त साफ़ कर देगा। (69)
(ऐ रसूल), क्या आपको मालूम नहीं कि वे सारी चीज़ें जो आसमानों और ज़मीन में हैं, उन्हें अल्लाह जानता है? ये सारी चीज़ें एक किताब में लिखी हुई हैं; यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है। (70)

तब भी ये लोग अल्लाह को छोड़कर उन चीज़ों की बंदगी करते हैं जिनके लिए न तो उसने कोई प्रमाण [authority] भेजा, और न तो उनके पास (आसमानी) ज्ञान की कोई रौशनी है: (याद रहे) कोई न होगा जो शैतानी करने वालों की मदद कर सके।  (71)
[ऐ रसूल!], जब हमारे संदेश उनके सामने साफ़-साफ़ पढ़कर सुनाए जाते हैं, तो विश्वास न करने वालों के चेहरों पर आप दुश्मनी के भाव साफ़ देख सकते हैं: ऐसा लगता है मानो हमारी आयतों को सुनाने वालों पर ये हमला कर बैठेंगे। कह दें, "क्या मैं तुम्हें बता दूँ कि तुम जैसा अभी महसूस कर रहे हो, इससे कहीं बुरी चीज़ क्या है? 'आग' है वह! जिसका वादा अल्लाह ने विश्वास न करने वालों के लिए कर रखा है! क्या दुख भरा अंत है यह!"  (72)
ऐ लोगों! एक मिसाल पेश की जाती है, उसे ध्यान से सुनो: अल्लाह को छोड़कर तुम (ज़रुरत के समय) जिन्हें पुकारते हो, वे एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते चाहे वे अपनी सारी ताक़तें एक साथ जोड़ भी लें, और अगर मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले जाए तो वे उसके चंगुल से उसको छुड़ा भी नहीं सकते। कितने बेबस और असहाय हैं मदद मांगने वाले और कितने कमज़ोर हैं ये जिनसे मदद माँगी जाती है! (73)
उन्होंने असल में अल्लाह के सही मक़ाम [True measure] को पहचाना ही नहीं: अल्लाह सचमुच बहुत मज़बूत, बेहद प्रभुत्वशाली है। (74)

अल्लाह फ़रिश्तों में से भी संदेश पहुँचाने वाले को चुनता है और इंसानों में से भी। अल्लाह हर बात सुनता है, हर चीज़ देखता है:  (75)
वह जानता है जो कुछ उनके आगे होने वाला है और जो कुछ उनके पीछे हो चुका है। और सारे मामले अल्लाह ही की ओर लौटकर आते हैं। (76)
ऐ ईमानवालो! (अल्लाह के सामने) रुकू में झुको, (माथा टेकते हुए) सज्दे में झुको, और अपने रब की बंदगी करो, और अच्छा व नेक काम करो ताकि तुम कामयाब हो सको। (77)
अल्लाह के रास्ते में जान लड़ा दो, (उसके रास्ते में) जान लड़ाने का जो हक़ है, उसे पूरा करो: उसने तुम्हें चुन लिया है और उसने तुम्हारे दीन [धर्म] में कोई तंगी और कठिनाई नहीं रखी, वह तरीक़ा तुम्हारा हुआ जो तुम्हारे बाप इबराहीम का तरीक़ा था। अल्लाह ने तुम्हें मुस्लिम [आज्ञाकारी] के नाम से पुकारा है----- पहले भी और इस (क़ुरआन) में भी------ ताकि यह रसूल तुम पर (सच्चाई के) गवाह रहें और तुम दूसरे लोगों पर गवाह रहो। अतः नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो, तय किया हुआ ज़कात [alms] दिया करो, और अल्लाह का सहारा मज़बूती से पकड़े रहो: वही तुम्हारा रखवाला है---- तो क्या ही अच्छा रखवाला है वह और कितना अच्छा मददगार! (78)



नोट:

6: अल्लाह का ही वजूद ऐसा है जो किसी का मुहताज नहीं, बाक़ी सारी चीज़ें उसी की क़ुदरत से वजूद [अस्तित्व] में आती हैं, चाहे एक बच्चे का पैदा होना हो या ज़मीन से पौधा उगाना हो। अत: वह मुर्दों को भी दोबारा ज़िंदा करने की ताक़त रखता है। 

7: मरे हुए आदमियों को दोबारा ज़िंदा उठाने का मक़सद यही है कि दुनिया में जिस किसी ने अच्छे और भलाई के काम किए, उन्हें इसका इनाम दिया जाए और जिस किसी ने बुरे कर्म किए, उसे सज़ा दी जाए। अगर ऐसा न किया गया तो लोगों के साथ सही इंसाफ़ नहीं होगा।

11:  अरब के कुछ देहाती लोग [बद्दू] और मदीना के पाखंडी लोग ऐसे थे कि उन्होंने इस्लाम तो अपना लिया था, मगर उनका ईमान पक्का नहीं था और यह अभी तक उनके दिल में ठीक से उतरा नहीं था। वे हमेशा एक संदेह की हालत में रहते थे, जब तक उन्हें कुछ आर्थिक फ़ायदा पहुँचता रहता, वे संतुष्ट रहते, मगर जैसे ही किसी संकट में डाले जाते जहाँ उन्हें कोई नुक़सान होता, वे फिर से अपने पुराने धर्म में वापस चले जाते, जबकि ईमानवालों का तरीक़ा यह होता है कि जब ख़ुशहाली हो, तो अल्लाह का शुक्र अदा करे और जब कोई नुक़सान हो, तो सब्र और धीरज से काम ले। 

15: "अल्लाह 'उसकी' कोई मदद करने वाला नहीं है", यहाँ "उसकी" का मतलब कुछ विद्वानों ने मुहम्मद (सल्ल) से लिया है, इस तरह पूरे वाक्य का मतलब यह है कि कुछ लोग सोचते थे कि अल्लाह मुहम्मद (सल्ल) की कोई मदद नहीं करेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, अब वे सख़्त ग़ुस्से और झुंझलाहट में या तो अपना गला घोंट लें या आसमान तक रस्सी तानकर ऊपर जाएं और वहाँ से मुहम्मद साहब का संपर्क तोड़ दें।

17: साबी [Sabeans] कौन थे, इनकी पहचान कई लोगों से की गई है। ये एक अल्लाह को मानने वाले [monotheistic] लोग थे, मगर इन लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का रसूल नहीं माना। कुछ लोग कहते हैं कि इनके पास अलग से कोई किताब या रसूल नहीं था, कुछ कहते हैं कि ये नूह (अलै) या यह्या अलै [John, the Baptist] के बताए हुए तरीक़े पर चलते थे, कुछ लोग कहते हैं कि ये तारों और ग्रहों को मानते थे। ये लोग  सीरिया या ईरान व इराक़ के दक्षिणी हिस्से में बसे हुए थे। 

मजूसी [Magians] एक ख़ुदा पर विश्वास रखने वाले प्राचीन फ़ारसी धर्म [Persian and Median religion] को मानने वाले थे जिनकी पहचान आम तौर से पारसी धर्म [ Zoroastrianism] से की जाती है।

25: पवित्र मस्जिद [काबा] और उसके आसपास की वे जगहें जो हज की रीतियों से जुड़ी हुई हैं, जैसे सफ़ा व मर्वा की पहाड़ियों के बीच दौड़ने की जगह, मिना, अरफ़ात, मुज़दलिफ़ा आदि पर दुनिया भर के मुसलमानों का समान अधिकार है। ..... जो कोई अल्लाह को छोड़कर किसी और को अपना ख़ुदा बना बैठा या इस पवित्र मस्जिद के अहाते में धन का लेनदेन करने लगा, तो वह ज़ुल्म करेगा और वहाँ के नियमों को तोड़ेने वाला होगा। 

26: जैसा कि सूरह बक़रा (2: 127) में आया है कि जहाँ अल्लाह के घर [काबा] के अवशेष बचे थे, वह जगह अल्लाह ने हज़रत इबराहीम (अलै) को दिखायी और वहाँ इसे नये सिरे से बनाने का हुक्म दिया। काबा के गिर्द सात (7) बार चक्कर लगाने [तवाफ़] को हज और उमरा [छोटा हज] की ज़रूरी रीतियों में माना जाता है। 

28: हज के लिए "निर्धारित दिन" इस्लामी कैलेंडर के बारहवें महीने [ज़ुल-हिज्जा] की दस तारीख़ से तेरह तारीख तक माना जाता है। हज की रीतियों में जानवरों की क़ुर्बानी भी एक ज़रूरी काम है। 

29: हज के दौरान बाल या नाख़ुन काटना मना होता है, जब हज की रीतियाँ पूरी करके जानवर की क़ुर्बानी कर दी जाती है, उसके बाद ही सिर के बाल मुंडवाना /काटना और नाख़ुन काटना आदि कर सकते हैं, इसे ही "साफ़-सुथरे" होना कहा गया है। इसके बाद काबा का सात बार चक्कर [तवाफ़ ए ज़ियारत] लगाया जाता है। लोगों के इबादत करने के लिए बनाया गया सबसे पहला घर "काबा" को माना जाता है (3: 96), इसलिए इसे "पुराना घर" [बैत ए अतीक़] कहा गया है।

30: सभी जानवरों को क़ुर्बानी के लिए और खाने के लिए हलाल [वैध/lawful] कर दिया गया है, सिवाए मुर्दा जानवर (का सड़ा गोश्त), ख़ून, सूअर का गोश्त और वह जानवर जिसको काटते समय अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो, इसके अलावा इस बारे में विस्तार से देखें सूरह मायदा (5: 3).

31: अल्लाह की ख़ुदायी में किसी को साझेदार [Partner] बनाना ऐसा है जैसे कि उसे आसमान से नीचे गिरा दिया गया हो यानी उसके ईमान में बहुत गिरावट आ गई हो, नतीजा यह होता है कि वह अपने मन की इच्छाओं के चलते इधर-उधर भटकता फिरता है जैसे कि उसे किसी पक्षी ने हवा में उचक लिया हो और यहाँ-वहाँ लिए फिरता हो, फिर वह शैतान के बहकावे में आकर सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़ता है जैसे कि हवा ने उसे किसी दूर जगह फेंक दिया हो।

32: रीतियों [शुआएर] का मतलब वह निशानियाँ जिनको देखकर कोई दूसरी चीज़ याद आए। हज के दौरान की जाने वाली रीतियाँ [rituals/rites] और जिन जिन जगहों पर इन रीतियों को करना है, सब पवित्र और आदर की चीज़ें हैं। 

33: जब तक किसी चौपाए जानवर को हज की क़ुर्बानी के लिए मान न लिया हो, तब तक उससे हर क़िस्म का फ़ायदा उठाया जा सकता है, जैसे सवारी करना, दूध निकालना, ऊन निकालना आदि, लेकिन एक बार इसे क़ुर्बानी करने के लिए मान लिया, तब उससे कोई फ़ायदा उठाना सही नहीं होगा।     

36: अनुवाद में ऊँट लिखा गया है, मगर असल शब्द "बुद्न" है जो गाय के लिए भी बोला जाता है। 

38: मक्का में विश्वास न करनेवालों ने मुसलमानों पर क़रीब 13 साल ज़ुल्म किया और उन्हें घर-बार छोड़कर जाने को मजबूर किया, मगर मक्का की ज़िंदगी के दौरान क़ुरआन में मुसलमानों को सब्र व धीरज से काम लेने के लिए कहा गया था। यहाँ अल्लाह ने वादा किया है कि वह मुसलमानों को ज़ालिमों से बचा लेगा, इसलिए अगली आयत 39 में अब उन ज़ालिमों के ख़िलाफ़ पहली बार हथियार उठाने की इजाज़त दी जा रही है। 

40: हथियार उठाने की अनुमति क्यों दी गई? यहाँ बताया गया है कि ईमानवालों पर केवल इस बात के लिए इतना ज़ुल्म किया गया और घरों से निकाला गया कि उन्होंने अपना रब अल्लाह को मान लिया था। जितने भी नबी [Prophets] दुनिया में आए, सब ने अल्लाह की इबादत करने का संदेश दिया, और इबादतगाहें बनायीं जहाँ अल्लाह को बराबर याद किया जाता है, मगर हर दौर में विश्वास न करनेवालों ने उन इबादतगाहों को मिटाना चाहा, इसीलिए ज़रूरी है कि उनसे लड़ा जाए और उन्हें बुरे काम से रोका जाए।  

41: यहाँ बताया गया है कि जब ईमानवालों की अल्लाह की मदद से जीत हो जाए और उनकी हुकूमत क़ायम हो जाए तो उन्हें क्या करना चाहिए। नमाज़ पढ़ने और ज़कात देने के अलावा अहम काम यह है कि भलाई व नेकी के काम करने का हुक्म देना है और बुराई से रोकना है। 

47: अल्लाह के यहाँ का एक दिन दुनिया के एक हज़ार साल जैसा है, इस बात के कई मतलब बताए जाते हैं। अल्लाह ने छ: दिनों में आसमान, ज़मीन और पूरी कायनात बनायी थी (25: 59; 32: 4; 50: 38). वहाँ का एक दिन उसी छ: दिनों में से एक दिन के बराबर है। दूसरा मतलब यह भी बताया जाता है कि काफ़िरों के लिए क़यामत का दिन डर और बदहवासी के कारण एक हज़ार साल जैसा लगेगा।  

52: चूँकि नबी/रसूल कोई फ़रिश्ते नहीं थे, बल्कि इंसान थे, इसलिए उनके भी जज़्बात थे, उन पर भी शैतानों द्वारा डाले गए शक व संदेह का कुछ समय के लिए थोड़ा असर हो सकता था, मगर चूँकि उनकी हिफ़ाज़त अल्लाह करता था, इसलिए उन पर ऐसे फ़ितनों का कोई असर नहीं पड़ता था। 

60: यहाँ इशारा उन मुसलमानों की तरफ़ है जिनके साथ मक्का में ज़ुल्म किया गया, उन्हें उनके घरों से निकाला गया, तो जितना ज़ुल्म उन मक्का वालों ने किया, ठीक उतना ही बदला उनसे लिया जा सकता है। ध्यान रहे कि मक्का में उतरी हुई सूरतों में हमेशा ज़ुल्म के जवाब में सब्र और धीरज रखने का हुक्म दिया गया था, मगर जैसा आयत 39 में है, उन्हें ज़ुल्म के ख़िलाफ हथियार उठाने की अनुमति दे दी गई।  

61: जिस तरह मौसम बदलने पर दिन और रात के समय में बदलाव आता रहता है, उसी तरह कभी अल्लाह जिन लोगों पर ज़ुल्म हो रहा हो, उन्हें जीत दिला देता है, और जो ज़ालिम और ताक़तवाले हैं उन्हें नीचा दिखा देता है। 

78: अल्लाह के रास्ते में जान लड़ा देने [जिहाद] का मतलब संघर्ष करना और कोशिश करना होता है। अल्लाह के रास्ते में हर तरह का संघर्ष चाहे हथियारों से लड़ना हो, या शांतिपूर्ण तरीक़े से कोशिश करना हो या अपने आपको सुघारने के लिए की गई कोशिश हो, सभी शामिल है।

मुहम्मद (सल्ल) अपनी उम्मत के लोगों के लिए गवाही देंगे कि ये लोग ईमानवाले थे, देखें 2: 147. 







Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...