सूरह 79: अन-नाज़ियात
[वे (फ़रिश्ते) जो हवा में तैरते हुए जाते हैं / Those Who Fly Out]
01-14: दोबारा उठाए जाने का दिन
15-26: मूसा (अलै) का कहानी
27-33: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
34-41: सज़ा और इनाम
42-46: क़यामत घड़ी कब आएगी?
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
उन (फ़रिश्तों) की क़सम, जो (काफ़िरों की आत्मा) सख़्ती से खींच लेते हैं, (1)
और उन (फ़रिशतों) की क़सम, जो (ईमानवालों की रूह) आसानी से निकाल ले जाते हैं, (2)
जो (ज़मीन और आसमान के बीच) तेज़ी से तैरते हुए जाते हैं, (3)
और जो (आदेश को पूरा करने के लिए) दौड़ते हुए (दूसरों से) आगे बढ़ जाते हैं, (4)
ताकि उन कामों को पूरा कर दें, (जो उन्हें सौंपा जाता है), (5)
उस दिन जब (अचानक एक ज़ोरदार धमाके के साथ) भूँचाल आ जाएगा, (6)
उसके बाद एक और ज़ोर का झटका आएगा (और क़यामत आ जाएगी), (7)
लोगों के दिल (मारे डर और घबराहट के) बुरी तरह धड़क रहे होंगे (8)
और उनकी आँखें झुकी होंगी। (9)
(मक्का के विश्वास न करनेवाले लोग) कहते हैं: “क्या? हमें (पहले की तरह) फिर से ज़िंदगी दी जाएगी, (10)
जबकि हम सड़ी-गली हड्डियों में बदल चुके होंगे?" (11)
और वे कहते हैं, “(पुरानी हालत में लौटना मुमकिन नहीं!) अगर ऐसा हुआ, तो यह बड़े घाटे की वापसी होगी।" (12)
मगर (यह कोई मुश्किल नहीं), बस एक ही धमाका काफ़ी होगा, (13)
और वे सब खुले मैदान में (अपनी पुरानी हालत में) लौटकर इकट्ठा हो जाएंगे। (14)
(ऐ रसूल!) क्या आपने मूसा [Moses] की कहानी सुनी है? (15)
जब उनके रब ने (सीना/Sinai के रेगिस्तान में) तुवा [Tuwa] की पवित्र घाटी में उन्हें पुकारा था: (16)
(और आदेश दिया था कि) फ़िरऔन [Pharaoh] के पास जाओ कि उसने लोगों पर ज़ुल्म व अत्याचार करने की हर सीमा पार कर दी है, (17)
और (उससे) पूछो, “क्या तू चाहता है कि तू (गुनाहों से) पाक-साफ़ हो जाए? (18)
और क्या तू चाहता है कि मैं तेरे रब की तरफ तेरा मार्गदर्शन करूँ, ताकि तू (उसके सामने झुके और उससे) डरने लगे?” (19)
फिर मूसा ने उसे बड़ी ज़बरदस्त निशानी दिखाई (जब लाठी साँप में बदल गयी और उनका हाथ चमकने लगा), (20)
मगर फ़िरऔन ने इन (निशानियों) को ठुकरा दिया, और विश्वास करने से इंकार कर दिया। (21)
उसने (सच्ची बातों से) मुँह मोड़ लिया और जल्दी जल्दी (मूसा के विरोध में), (22)
उसने (लोगों को) जमा किया और पुकारकर कहने लगा, (23)
“मैं तुम्हारा सबसे बड़ा स्वामी हूँ,” (24)
नतीजा यह हुआ कि अल्लाह ने उसे दोहरी सज़ा में पकड़ लिया, आने वाली ज़िन्दगी में भी और इस ज़िंदगी में भी: (25)
सचमुच इस (घटना) में हर उस आदमी के लिए बड़ी शिक्षा है जो अल्लाह का डर रखता हो। (26)
किसे पैदा करना ज़्यादा कठिन काम है: तुम लोगों को या पूरे आसमान [ब्रह्मांड] को, जिसे उसने बनाया, (27)
उसने आकाश के सभी पिंडों को (पैदा करके) बुलंद किया, फिर (उनकी संरचना और चक्कर लगाने की गतियों में संतुलन पैदा करके) उन्हें ठीक-ठाक किया, (28)
फिर रात को अंधेरी बनाया और सुबह को चमकदार उजाले के साथ निकाला, (29)
उसी ने ज़मीन को भी (रहने लायक़ बनाने के लिए) बिछा दिया, (30)
ज़मीन (के अंदर) से उसका पानी और चारा [pastures] निकाला, (31)
और ज़मीन में ठोस पहाड़ों को जमा दिया, (32)
(ये सब कुछ) तुम्हारे और तुम्हारे चौपायों के फ़ायदे के लिए किया। (33)
फिर जब हर चीज़ पर छा जाने वाली आफ़त [क़यामत] आ जाएगी, (34)
उस दिन आदमी अपना सब किया-धरा याद करेगा, (35)
और हर देखने वाले के लिए जहन्नम ज़ाहिर कर दी जाएगी। (36)
फिर जिस आदमी ने सारी सीमाएं तोड़ी [सरकशी की] होंगी (37)
और इसी संसार की ज़िंदगी को (आख़िरत/परलोक के मुक़ाबले) ज़्यादा पसंद किया होगा, (38)
तो जहन्नम ही (उसका) ठिकाना होगा; (39)
और जो आदमी अपने रब के सामने खड़े होने से डरता रहा, और उसने (अपने) मन को (बुरी) इच्छाओं से रोके रखा, (40)
तो जन्नत ही (उसका) ठिकाना होगा। (41)
(विश्वास न करने वाले लोग) आप [पैग़म्बर] से क़यामत के बारे में पूछते हैं कि, “वह घड़ी कब आएगी?”, (42)
मगर आप उन्हें यह कैसे बता सकते हैं? (43)
उस (क़यामत) के आने का ठीक समय तो केवल आपके रब को ही मालूम है; (44)
आप तो केवल इसलिए भेजे गए हैं ताकि आप उन लोगों को सावधान कर दें, जो इस (क़यामत) से डरते हों। (45)
जिस दिन वे उसको देख लेंगे, तो उन्हें ऐसा लगेगा मानो वे (दुनिया में) एक शाम या उसकी सुबह से अधिक ठहरे ही नहीं थे। (46)
नोट:
1: अरबी भाषा में किसी बात में ज़ोर पैदा करने के लिए क़सम खायी जाती थी। यहाँ शायद फ़रिश्तों की क़सम खाई गई है जिसका मतलब यह है कि वे इस बात के गवाह हैं कि जिस
तरह अल्लाह फ़रिश्तों के द्वारा इंसानों की आत्माओं को
निकाल लेता है, उसी तरह फ़रिश्तों से नरसिंघा बजवाकर इंसानों को दोबारा ज़िंदा भी कर सकता है।
6: यह पहली बार नरसिंघे को फूँक मारकर बजाने के बारे में है, इससे हर जीव को मौत आ जाएगी, और सारा संसार उलट-पलट जाएगा।
12: यानी अगर हमें सचमुच दोबारा ज़िंदा किया गया तो यह हमारे लिए तो घाटे का सौदा होगा, क्योंकि इस दूसरी
ज़िंदगी के लिए हमने कोई तैयारी नहीं कर रखी है।
16: "तूर" पहाड़ के नीचे जो घाटी है, उसका नाम "तुवा" आया है (देखें 20:12), जहाँ पहली बार हज़रत मूसा (अलै.) को पैग़म्बर बनाया गया, इसका विवरण विस्तार से
सूरह ताहा (20: 9-36) में देखें।
20: देखें सूरह ताहा (20: 17-22)
25: इस ज़िंदगी की यातना तो यह हुई कि उसे और उसके पूरे लश्कर को अल्लाह ने डुबो दिया, देखें सूरह शुअरा
(26: 16--64) और आनेवाली ज़िंदगी की यातना जहन्नम होगी।
27: अरब के काफ़िर लोग मरने के बाद दोबारा ज़िंदा किए जाने की बात पर विश्वास नहीं करते थे, क्योंकि उन्हें यह असंभव काम लगता था। अल्लाह पूछता है कि ब्रह्मांड की दूसरी चीज़ों जैसे ज़मीन और आसमान को पैदा करना ज़्यादा मुश्किल है या मरे हुए इंसान को दोबारा ज़िंदा करना? (इसे भी देखें 37:11; 40:57)
32: "पहाड़ों को मज़बूती से जमा दिया".... ज़मीन असल मेंं समंदर की सतह पर तैरती है, और उसे हिलने-डुलने से रोकने के लिए अल्लाह ने ज़मीन पर पहाड़ों को मज़बूती से गाड़ दिया (देखें 16:15; 21:31; 31:10)