Friday, January 15, 2016

सूरह 51 : अज़ ज़ारियात [उड़ाकर बिखेर देनेवाली हवा, Scattering winds]

सूरह 51: अज़-ज़ारियात 
[उड़ाकर बिखेर देने वाली हवा, Scattering winds]



1-19: जन्नत और जहन्नम का फ़ैसला होना पक्का है, और यह होकर रहेगा।

20-23: अल्लाह की ताक़त की निशानियाँ और जीने के लिए रोज़ी 

24-37: इबराहीम अलै. और उनके यहाँ आए हुए मेहमानों का क़िस्सा

38-40: मूसा (अलै.) और फ़िरऔन 

41-46: '', समूद और नूह' की क़ौम 

47-51: अल्लाह की क़ुदरत  निशानियाँ 

52-55: पहले के रसूलों की बात को भी ठुकराया गया था

56-58: जिन्नों और इंसानों को अल्लाह की बंदगी करने के लिए पैदा किया गया है

59-60: विश्वास न करने वालों को सज़ा मिलेगी





अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

क़सम है उन (हवाओं) की, जो दूर दूर तक फैल जाती हैं,  (1)

और उनकी, जो बारिश की बूंदों से लदी होती हैं,  (2)

जो आसानी से तेज़ गति के साथ चलती रहती हैं, (3)

जो उन (बारिशों) को बाँट देती हैं जैसा कि उन्हें हुक्म हुआ हो!   (4)

जिस चीज़ का तुम (लोगों) से वादा किया जा रहा है, वह बिल्कुल सच्चा है:   (5)

(कर्मों का) फ़ैसला ज़रूर होगा--- (6) 

आसमान की क़सम जहाँ (तारों से भरे) रास्ते हैं,  (7)

तुम [लोग] (मरने के बाद के जीवन पर) अलग-अलग व परस्पर विरोधी बातों में पड़े हुए हो ----  (8)

इस [परलोक की हक़ीक़त] से जो लोग मुँह मोड़ते हैं, वे सच्चाई को समझने में (पूरी तरह) धोखा खा चुके हैं।  (9)

तबाह हो जाएँ वे, (जो बिना किसी आधार के) यूँ ही अटकलें लगाते और झूठी बातें बनाया करते हैं; (10)

जो ग़लतियों में ऐसे डूबे हुए हैं कि सब कुछ भुलाए बैठे हैं और उन्हें कुछ ख़बर नहीं! (11)

वे (व्यंग्य से) पूछते है, "वह फ़ैसले का दिन कब आएगा?" (12)

(कह दें), उस दिन आएगा, जब वे (जहन्नम की) आग पर तपाए जाएँगे, (13)

"चखो मज़ा अब अपनी सज़ा का! यही है वह चीज़ जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।" (14)

अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचने वाले लोग (जन्नत के) बाग़ों और (बहते हुए) पानी के सोतों (springs) में (मज़े कर रहे) होंगे। (15)

उनका रब जो कुछ नेमत उन्हें देगा, वे उसे (ख़ुशी-ख़ुशी) ले रहे होंगे, क्योंकि वे इससे पहले (दुनिया में) अच्छे कर्म करने वाले थे: (16)

रातों को कम ही सोते थे, (17)

भोर के समय इबादत करते हुए अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते थे,  (18)

और अपनी दौलत में से माँगनेवाले और ठुकराए हुए लोगों को बाक़ायदा हिस्सा देते थे। (19)

पक्का विश्वास रखनेवालों के लिए इस धरती पर बहुत-सी निशानियाँ हैं---  (20) 

और स्वयं तुम्हारे अंदर भी! तो क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता?--- (21)

तुम्हारी रोज़ी [sustenance] आसमान में (तय होती) है, और वह चीज़ [अंतिम फ़ैसला] भी, जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है। (22)

क़सम है आसमान और ज़मीन के रब की! सचमुच यह बात ऐसी ही पक्की [Real] है जैसे तुम (अपने मुँह से) अभी बोल रहे हो।  (23)
 

[ऐ रसूल!] क्या आपने इबराहीम के इज़्ज़तवाले मेहमानों का क़िस्सा सुना है? (24) 

जब वे [फ़रिश्ते] इबराहीम के पास आए, तो "सलाम” कहा, (जवाब में इबराहीम ने भी) “सलाम” कहा, (और मन में सोचा) "ये तो अजनबी लोग हैं।" (25)

फिर वह जल्दी से अपने घरवालों के पास गए, और एक मोटा-ताज़ा बछड़े (का भूना हुआ मांस) ले आए (26) 

और उसे मेहमानों के सामने पेश किया। कहने लगे, "क्या आप लोग नहीं खाएंगे?" (27) 

(इबराहीम को) उनसे डर महसूस होने लगा, मगर उन लोगों ने कहा, "डरिए नहीं", और उन्हें एक लड़के [इसहाक़] के होने की ख़ुशख़बरी दी, और कहा कि वह बड़े ज्ञानवाला होगा, (28)

इस पर उनकी बीवी [सारा] चिल्लाती हुई वहाँ आयीं, और वह (चकित व झेंपते हुए) अपने मुँह पर हाथ मारते हुए कहने लगीं, "एक बूढ़ी बाँझ औरत (बच्चा जनेगी!)!" (29) 

मेहमानों ने कहा, "ऐसा ही होगा, तेरे रब ने यही कहा है, और वह गहरी समझ-बूझ रखनेवाला [Wise], सब कुछ जाननेवाला है।" (30)

इबराहीम ने कहा, "ऐ (अल्लाह के भेजे हुए) फ़रिश्तो, आप लोगों के यहाँ (धरती पर) आने का क्या मक़सद है?" (31) 

उन्होंने कहा, "हमें ऐसे लोगों [लूत की क़ौम] के पास भेजा गया है जो गुनाहों में डूबे हुए हैं; (32)

"ताकि हम उनके ऊपर पकी हुई मिट्टी के पत्थर (कंकड़) बरसाएँ, (33)

जिनपर (गुनाहों की) सीमा पार कर जाने वालों के लिए आपके रब की तरफ़ से ख़ास निशान भी लगा होगा।" (34) 

फिर ऐसा हुआ कि उस बस्ती में जो ईमानवाले थे, उन्हें हमने वहाँ से बाहर निकाल लिया; (35) 

किन्तु हमने वहाँ केवल (लूत का) एक ही घर ऐसा पाया जिसमें रहने वाले अल्लाह पर पूरी भक्ति से झुकनेवाले थे ----  (36) 

इस तरह, हमने वहाँ (हमेशा के लिए) एक निशानी छोड़ दी, उन लोगों के लिए जो दर्दनाक यातना से डरते हों। (37)


मूसा [Moses] (की घटना) में भी ऐसी ही निशानियाँ हैं: हमने उन्हें फ़िरऔन [Pharaoh] के पास स्पष्ट प्रमाण [Clear Authority] के साथ भेजा था, (38) 

किन्तु उस [फ़िरऔन] ने अपने सहायकों समेत सच्चाई से मुँह फेर लिया और (अपनी ताक़त के घमंड में) कहने लगा, (यह मूसा) "जादूगर है या कोई दीवाना," (39)

अतः हमने उसे और उसकी सेना को धर-दबोचा और उन्हें समंदर में फेंक दिया: दोष भी उसी का था।  (40)

और आद (की क़ौम की तबाही) में भी तुम्हारे लिए निशानी है जबकि हमने उनपर ज़िंदगी तबाह करने वाली आँधी भेजी,  (41) 

वह हवा जिस चीज़ के सामने से गुज़री, उसे उसने चूर-चूर करके भूंसा बना डाला। (42)

और समूद (की क़ौम की तबाही) में भी (तुम्हारे लिए ऐसी ही निशानी है): जबकि उनसे कहा गया था, "थोड़े समय तक मज़े कर लो!" [न सुधरे, तो तबाही आएगी] (43)

मगर उन्होंने अपने रब के आदेश की अवहेलना की; फिर एक धमाकेदार कड़क ने उन्हें आ दबोचा और वे देखते ही रह गए: (44)

हाल यह हुआ कि अपना बचाव करना तो दूर, वे तो खड़े तक न रह पाए।  (45)

और इससे भी पहले, नूह [Noah] की क़ौम को भी हमने अपनी पकड़ में लेकर तबाह किया था। वे सचमुच बड़े गुनाहगार लोग थे! (46) 

हमने अपने हाथों (की क़ुदरत) से आसमानों को बनाया है और उसे बहुत विस्तार से फैलाया है, (47)

और धरती को हमने (रहने के लिए) बिछा दिया --- तो क्या ही अच्छे ढंग से हमने इसे सँवारा और बिछाया है! (48) 

और हमने हर चीज़ के जोड़े बनाए, ताकि तुम [लोग] ध्यान दो और समझो। (49) 


[अतः ऐ रसूल, आप उन लोगों से कह दें कि], “अल्लाह के आगे (गुनाहों की माफ़ी के लिए) जल्दी से झुक जाओ---- (यक़ीन करो), मैं उसकी तरफ़ से तुम्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देने के लिए भेजा गया हूँ --- (50) 

और किसी भी दूसरे देवता को अल्लाह के साथ बराबरी का न ठहराओ। मैं उसकी तरफ़ से तुम्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देने के लिए भेजा गया हूँ!” (51) 

इसी तरह, उनसे पहले गुज़र चुके लोगों के पास भी जब कभी कोई रसूल आया, तो उन्होंने भी (रसूलों को) "जादूगर या दीवाना कहा!" (52)

क्या उन्होंने एक-दूसरे को ऐसा कहने के लिए पहले से तय कर रखा था? नहीं! बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने सारी हदें पार कर दी हैं, (53)

अतः [ऐ रसूल] उनकी तरफ़ ध्यान न दें --- अब आपका कोई दोष नहीं, (54) 

और आप (लोगों को) बराबर नसीहतें देते रहें, क्योंकि याद दिलाते रहना ईमानवालों के लिए अच्छा होता है। (55)


मैंने तो जिन्नों और इंसानों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी ही बन्दगी [worship] करें:  (56) 

मैं उनसे किसी तरह की रोज़ी (कमाई) तो नहीं चाहता, और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे (खाना) खिलाएँ ---   (57)
  
अल्लाह तो ख़ुद ही है रोज़ी देनेवाला, बेहद ताक़तवाला, सबसे मज़बूत! (58) 

जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है, और (उन जैसे) उनके साथी जो पहले गुज़र चुके हैं, उनके लिए तो यातनाओं का हिस्सा तय किया हुआ है ---- वे मुझसे जल्दी (यातनाओं) की माँग न करें --- (59)

सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए उस दिन के कारण बड़ी ख़राबी होगी, जिसका उनसे वादा किया जा रह है। (60)




नोट:

4: यहाँ क़समें खाकर जो बात बयान की गई है, वह यह है कि क़यामत ज़रूर आएगी और कर्मों   के अनुसार इनाम और सज़ा का फ़ैसला ज़रूर होगा।हवाओं की क़सम खाकर इस ओर ध्यान  खींचा गया है कि जो अल्लाह इन हवाओं और उनके नतीजे में बरसने वाले पानी को नई ज़िंदगी का ज़रिया बनाता हैवह इस बात पर ज़रूर   सक्षम है कि मुर्दा पड़े इंसानों को दोबारा ज़िंदा करके उठाए।  

 

7: यहाँ उन रास्तों के बारे में कहा गया है जो हमें दिखाई नहीं देतेलेकिन फ़रिश्तों का आना जाना इन्हें  रास्तों से होता है। कुछ विद्वानों का यह भी कहना है कि कभी कभी आसमान शब्द का प्रयोग हर ऊपर वाली चीज़ के बारे में होता हैऔर यहाँ ऊपर की वह   जगह बतायी गई है जिनमें तारों के नियत रास्ते बने  हुए हैं।

  

8: यानी एक तरफ़ यह मानते हो कि अल्लाह ने ही सारी सृष्टि की रचना की हैऔर दूसरी   तरफ़  उसकी यह क़ुदरत मानने से इंकार करते हो कि वह मरने के बाद इंसन को दोबारा ज़िंदा कर सकता है। 

 

19: माँगनेवाला तो वह है जो कि अपनी ज़रूरतों के लिए किसी से मुँह खोलकर माँगता हो,   और  ठुकराए हुए वे हैं जो ज़रूरतमंद होने के बावजूद किसी से कुछ नहीं माँगते। आदमी इनको जो कुछ          देता  हैवह कोई एहसान नहीं करताबल्कि यह असल में उनका हक़ है जो उन्हें मिलना ही चाहिए थाक्योंकि अल्लाह ने धनदौलत में ज़रूरतमंदों का   हिस्सा देने का हुक्म दिया है।

 

28: फ़रिश्ते कुछ खातेपीते नहीं हैंइसलिए जब इबराहीम (अलै.) ने देखा कि वे कुछ                 खा  नहीं रहेतो उन्हें डर महसूस हुआ कि हो सकता है कि ये कोई दुश्मन हों। 

 

32: हज़रत लूत (अलै.) की क़ौम पर जो भारी यातना आयीउसका  विवरण                          सूरह हूद (11: 69-83) और सूरह हिज्र (15: 51--77) में भी आया है।  

 

41: आद की क़ौम का विवरण सूरह 'राफ़ (7:65) में और समूद की क़ौम का विवरण            सूरह 'राफ़ (7: 73) में विस्तार से हुआ है। 

 

46: इस घटना का विस्तार से वर्णन सूरह हूद (11: 25--48) में आया है। 

 

सूरह 50 : क़ाफ़ [Qaf]

सूरह 50: क़ाफ़ [Qaf]


01-11: विश्वास न करने वालों ने क़यामत के दिन दोबारा उठाए जाने को ठुकराया

12-14: पहले के विश्वास न करने वालों की मिसालें

15-19: मौत आना और मरने के बाद एक दिन दोबारा उठाया जाना निश्चित है

20-35: क़यामत और उसके बाद होने वाले फ़ैसले का मंज़र 

36-37: पुरानी पीढ़ियों को सज़ा मिली: एक चेतावनी 

38-45: रसूल मुहम्मद (सल्ल.) को आगे की कार्रवाई के लिए सलाह 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़ाफ़॰;
क़ुरआन मजीद की क़सम! (कि मुर्दा आदमियों को ज़रूर दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा)   (1)
मगर विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को इस बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनके पास‌ सावधान करनेवाला, उन्हीं में से एक आदमी (कैसे) आ गया है, सो वे कहने लगे, "यह तो हैरानी की बात है! (2)
कि जब हम मर जाएँगे और मिट्टी में मिल जाएँगे, तो फिर हम वापस (ज़िंदा होकर) उठ खड़े होंगे? यह (ज़िंदा होकर) वापसी तो समझ से बहुत दूर की बात है!" (3)
धरती (मरे हुए शरीर का हिस्सा खाकर) उसमें जितनी भी कमी कर देती है, हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं: हम एक किताब में इसका पूरा हिसाब रखते हैं।  (4)

मगर विश्वास न करनेवालों के सामने जब सच्चाई पहुँचती है, तो वे उसे मानने से इंकार कर देते हैं; असल में वे उलझन की हालत में पड़े हुए हैं।  (5)
अच्छा तो क्या उन लोगों ने अपने ऊपर आसमान को नहीं देखा ---- कि हमने उसे कैसा बनाया और किस तरह उसे सजाया है कि उसमें कोई दरार तक नहीं है; (6)

और किस तरह हमने धरती को फैलाया और उसमें मज़बूत पहाड़ों को जमा दिया, और उसमें हर प्रकार की सुन्दर वनस्पतियाँ उगा दीं,  (7)
(और यह सब) आँखें खोलने और याद दिलाते रहने के मक़सद से है --- हर उस बन्दे के लिए जो पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकनेवाला हो;  (8)
और कैसे हमने आसमान से बरकत से भरी [blessed] बारिश भेजी और उससे बाग़ और अनाज की फ़सलें उगाईं; (9)
और खजूरों के गुच्छों से लदे हुए ऊँचे-ऊँचे खजूर के पेड़ ----  (10)
हर एक आदमी की रोज़ी के रूप में; तो देखो कैसे पानी के द्वारा बेजान पड़ी हुई धरती को हम नया जीवन दे देते हैं? ठीक इसी तरह, मरे हुए लोग (अपनी क़ब्रों से) उठ खड़े होंगे।   (11)
इन (मक्का के) विश्वास न करनेवाले [काफ़िरों] से बहुत पहले, नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, इसी तरह 'अर्-रस' [यमामा के अंधे कुँएवाले], समूद [सालेह की क़ौम], (12)
आद [हूद की क़ौम], फ़िरऔन [मिस्र के राजा], लूत के भाई [सदूम व अमूरह के लोग], (13)
'अल-ऐका' [जंगलों में रहनेवाली शोऐब की क़ौम] और तुब्बा [यमन के बादशाह अलहमैरी] के लोग भी थे: इन सभी लोगों ने अपने-अपने पैग़म्बरों [messengers] की बातों में विश्वास नहीं किया, अन्ततः जिस सज़ा की चेतावनी मैंने दे रखी थी वह सच होकर रही।  (14)
तो क्या हम पहली बार सारी सृष्टि को पैदा करने में असमर्थ रहे? बिल्कुल नहीं! मगर तब भी वे दोबारा पैदा किए जाने के बारे में सन्देह में पड़े हैं।  (15)
हमने आदमी को पैदा किया है--- हम उसके दिल में पैदा होनेवाली बातों को भी जानते हैं: हम उसके गर्दन की रग [Jugular vein] से भी ज़्यादा उससे नज़दीक हैं--- (16)
क्योंकि (हर अच्छे बुरे कर्म की जानकारी) प्राप्त करनेवाले दो (फ़रिशते), लिखने के लिए बैठे रहते हैं, एक उस आदमी के दायीं तरफ़, और दूसरा उसके बायीं तरफ़: (17)
आदमी हर वक़्त उन (फ़रिश्तों) की निगरानी में होता है, कोई एक शब्द मुँह से निकला नहीं कि उसे लिख लिया जाता है। (18)
और मौत की बेहोशी अपने साथ सच्चाई को साथ ले आएगी: “यही वह चीज़ है जिससे तू भागने की कोशिश करता था।”  (19)
और नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा: “यही है वह (क़यामत का) दिन, जिसकी (तुम्हें) धमकी दी गई थी।”  (20)
हर आदमी इस हाल में आएगा कि उसके साथ एक (फ़रिश्ता) हँकाकर लानेवाला होगा और दूसरा गवाही देनेवाला:  (21)
“तुम ने इस (दिन) की हक़ीक़त पर कभी ध्यान नहीं दिया; तुम पर एक पर्दा पड़ा हुआ था, और आज हमने तुमसे वह पर्दा हटा दिया, सो आज तुम्हारी निगाह बड़ी तेज़ हो गई है।”   (22)
उसके साथ रहनेवाला (फ़रिश्ता) कहेगा, "यह है (इसके कर्मों का लेखा-जोखा) जो मैंने तैयार कर रखा है---- (23)
(दोनों फ़रिश्तों को हुक्म होगा), "फेंक दो, जहन्नम में! ज़िद पर अड़े हुए हर उस विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] को, (24)
जो हर एक को भलाई से रोकता था, मर्यादा की सीमाएं तोड़ता था और (सच्चाई की बातों में) लोगों को सन्देह में डालता था,   (25)
जिसने अल्लाह के साथ दूसरे देवताओं को अपना ख़ुदा बना रखा था। फेंक दो उसे कठोर यातना में!"---  (26)
उसका (शैतान) साथी कहेगा, "ऐ हमारे रब! मैंने इसे नहीं बहकाया था, बल्कि वह ख़ुद पहले से ही बहुत ज़्यादा भटका हुआ था।" (27)
अल्लाह कहेगा, "मेरे सामने झगड़ा मत करो। मैंने तो तुम्हें (यातना की) चेतावनी भेजी थी  (28)

और मेरी कही हुई बात बदला नहीं करती: मैं अपने किसी बंदे पर कोई अन्याय नहीं करता।" (29)
उस दिन हम जहन्नम से कहेंगे, "क्या तू भर गई?" और वह कहेगी, "क्या अब और कोई (इसमें आने वाला) नहीं है?" (30)
लेकिन नेक लोगों के लिए जन्नत नज़दीक लायी जाएगी, इतनी नज़दीक कि अब कुछ भी दूरी न रहेगी: (31)
"यही है वह चीज़ जिसका तुमसे वादा किया जाता था--- यह हर उस आदमी के लिए है, जो पूरे मन से अक्सर अल्लाह की तरफ़ (तौबा के लिए) झुकता हो और उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचता हो;  (32)
"जो बेहद दयालु रब से डरता हो, हालाँकि उसे देखा नहीं जा सकता, और जब उसके सामने आता हो, तो उसका दिल पूरी भक्ति-भाव से उसके आगे झुकता हो--- (33)
"तो अब सलामती के साथ दाख़िल हो जाओ इस (जन्नत) में, वह दिन कभी ख़त्म न होने वाली ज़िंदगी का दिन होगा।” (34)
उनके लिए वहाँ (जन्नत में) वह सब कुछ होगा जिस चीज़ की भी वे इच्छा करेंगे, और हमारे पास (देने के लिए) उससे अधिक भी है।  (35)
इन (मक्का के काफ़िरों) से पहले हम काफ़िरों की इनसे भी अधिक मज़बूत नस्लों को तहस-नहस कर चुके हैं, वे धरती के बड़े हिस्से पर मारे फिरे--- मगर क्या भागने की कोई जगह थी?  (36)
सचमुच इसमें हर उस आदमी के लिए सीखने और याद रखने का सामान है जिसके पास दिल हो, और जो कोई ध्यान लगाकर सुनता हो।  (37)
हमने आसमानों, ज़मीन और जो कुछ उनके बीच में है, सब कुछ छः दिनों [कालों] में पैदा कर दिया और हमें कोई थकान नहीं हुई। (38)
अतः [ऐ रसूल] जो कुछ वे कहते हैं, उस पर आप धीरज [सब्र] से काम लें; और सूरज के निकलने से पहले भी और सूरज के निकलने के बाद भी अपने रब की प्रशंसा का गुणगाण करते रहें;  (39)
और रात की घड़ियों में भी उसकी बड़ाई का बखान करें, और हर नमाज़ [सज्दों] के बाद भी;  (40
 
और ध्यान से सुनो उस दिन की बात, जिस दिन एक पुकारनेवाला बहुत पास से पुकारेगा, (41)
वे लोग उस दिन (अपनी क़ब्रों से) बाहर निकल आएंगे, और उस दिन लोग भयानक धमाके की आवाज़ सचमुच सुनेंगे। (42)
हम ही तो हैं जो ज़िंदगी भी देते हैं और मौत भी, और अंत में सबको हमारी ही पास लौटकर आना है।  (43)
जिस दिन धरती को फाड़ दिया जाएगा, वे [मुर्दा लोग] बहुत तेज़ी से बाहर निकल पड़ेंगे--- यह इकट्ठा करना हमारे लिए बेहद आसान है।  (44)
जो कुछ भी वे [मक्का के काफ़िर] कहते हैं, हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं। [ऐ रसूल] आप उन्हें ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाने के लिए तो हैं नहीं। अतः आप क़ुरआन के द्वारा नसीहत करें, हर उस आदमी को जो हमारी चेतावनी से डरता हो। (45)





नोट:

4: अल्लाह कहता है कि शरीर के जिन-जिन हिस्सों को मिट्टी खाती है, उसकी पूरी जानकारी उसके पास होती है, इसीलिए उनको दोबारा उसी हाल में बहाल करना कोई मुश्किल नहीं है। और सारी बात एक सुरक्षिर स्लेट[लौह-ए-महफ़ूज़/Preserved Tablet] में लिखी हुई है।

5: यानी कभी कहते हैं कि क़ुरआन जादू है, या यह काहिनों’ [तांत्रिकों] की बातें हैं,  कभी इसे शायरी बताते हैं, और कभी मुहम्मद (सल्ल) को दीवाना कहते हैं।

12: अर-रस के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि ये समूद की क़ौम का कोई शहर था। कुछ लोगों का मानना है कि इसका मतलब अंधा कुआँ है, जहाँ के रहने वालों ने अल्लाह के भेजे हुए पैग़म्बर को कुएं में धकेल दिया था। शायद इन्हीं लोगों का ज़िक्र सूरह यासीन (36: 13-27) में आया है।

17: फ़रिश्ते हर आदमी के कर्मों का हिसाब इसलिए लिखते रह्ते हैं ताकि क़यामत के दिन उसके सामने प्रमाण के रूप में पेश किया जा सके।

21: हर आदमी के साथ शायद ये वही दो फ़रिश्ते होंगे जो दुनिया में उसके कर्मों को लिखा करते थे।

24: दोनों फरिश्ते वही हो सकते हैं जो कर्मों का लेखा-जोखा तैयार करते हैं, या ये दो फ़रिश्ते जहन्नम के पहरेदार भी हो सकते हैं।

27: काफ़िर लोग यह चाहेंगे कि अपने हिस्से की सज़ा यह कहकर अपने सरदारों पर और ख़ासकर शैतान पर डालें कि इसने हमें गुमराह किया था, मगर शैतान जवाब में कहेगा कि मैंने इसे गुनाहों की तरफ़ लुभाया ज़रूर था,  मगर गुमराही में तो यह ख़ुद ही अपनी इच्छा से पड़ा था। देखें सूरह इबराहीम (14: 22).

35: जन्नत की नेमतों की कुछ झल्कियाँ तो क़ुरआन में कई आयतों में बयान हुई हैं, लेकिन जैसा कि एक हदीस में है, असल में वहाँ की नेमतें ऐसी होंगी जो किसी आँख ने देखी नहीं, किसी कान ने सुनी नहीं और किसी आदमी के दिल में इसका विचार तक नहीं आया होगा। अंत में यह इशारा किया गया है कि हमारे पास देने के लिए कुछ और ज़्यादा भी है, इन्हीं में से एक नेमत होगी अल्लाह का दीदार! देखें सूरह यूनुस (10: 26).

39: सूरज निकलने से पहले से मतलब सुबह की नमाज़ [फ़ज्र], और सूरज के निकलने के बाद का मतलब दोपहर और शाम की नमाज़ें [ज़ुहर, असर और मग़रिब] हैं।

40: रात की घड़ियों में गुणगान का मतलब रात की नमाज़ें [इशा और तहज्जुद] हैं। हर (फ़र्ज़) नमाज़ के बाद सज्दे से मतलब नफ़िल नमाज़ेंहैं।

41: पुकारनेवाले का मतलब यहाँ (फ़रिश्ता) हज़रत इसराफ़ील (अलै.) से है जो मुर्दों को क़ब्रों से बाहर निकल आने के लिए आवाज़ देंगे, और यह आवाज़ बहुत पास से आती हुई महसूस होगी।


Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...