Saturday, July 11, 2015

सूरह 112 : अल इख़्लास [ईमान की शुद्धता, Purity of Faith]

सूरह 112: अल-इख़्लास

[ईमान की शुद्धता, Purity of Faith] 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल] आप कह दें, “अल्लाह हर तरह से एक है, (1)     

अल्लाह ही ऐसा है कि उसे किसी की ज़रूरत नहीं [self sufficient], मगर सब अपनी ज़रूरतों के लिए उस पर निर्भर हैं (और वह हमेशा बाक़ी रहनेवाला [eternal] है  (2) 

न उसका कोई बाल-बच्चा हैऔर न ही उसको किसी ने पैदा किया है।  (3)

और उसके जोड़ का कोई नहीं है [Unique]।”  (4)

 

 

नोट:

1: कुछ काफ़िरों ने मुहम्मद (सल्ल.) से पूछा था कि आप जिस ख़ुदा की इबादत करते हैं, वह कैसा है? उसके ख़ानदान का परिचय कराएं। इसके जवाब में यह सूरह उतरी।

अल्लाह का “हर तरह से एक होने” का मतलब यह है कि वह अपनी ज़ात में भी एक है, और अपनी विशेषताओं में भी एक है।

3: अरब के काफिर लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ कहते थे, या ईसाई और यहूदी लोग हज़रत ईसा (अलै.) या उज़ैर (अलै.) को अल्लाह का बेटा मानते थे।

4: इस सूरह की चार छोटी आयतों में अल्लाह के बारे में बहुत ही सुंदर और ठोस तरीक़े से वर्णन  किया गया है। पहली आयत में उन लोगों की सोच को रद्द किया गया है जो एक से ज़्यादा ख़ुदा को मानते हैं, दूसरी आयत में उन लोगों की सोच को रद्द किया गया है जो अल्लाह को मानने के बावजूद किसी और को भी अपनी ज़रूरतों को पूरा करने वाला मानते हैं, तीसरी आयत में उन लोगों  की सोच रद्द की गई है जो अल्लाह के लिए औलाद मानते हैं, और चौथी आयत में उन लोगों का रद्द किया गया है जो अल्लाह की किसी भी विशेषता में किसी और की बराबरी के क़ायल हैं, जैसे कुछ मजूसियों [Magians] का कहना यह था कि रौशनी को पैदा करने वाला कोई और है, और अँधेरे को बनाने वाला कोई और है। इस तरह इस छोटी सी सूरह में अल्लाह की ख़ुदायी में किसी भी साझेदारी [Partnership] को पूरी तरह रद्द करके शुद्ध तौहीद पर ज़ोर दिया गया है। एक हदीस में इस सूरह को क़ुरआन का एक-तिहाई हिस्सा क़रार दिया है।  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Friday, July 10, 2015

सूरह 111 : अल-लहब/ अल-मसद [आग में जलने वाला, Flame Man / खजूर की छाल, Palm-fibre]

सूरह 111: अल-लहब/ अल-मसद

[आग में जलनेवाला, Flame Man / खजूर की छाल, Palm-fibre]

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

अबु लहब के दोनों हाथ बर्बाद हो जाएँ! और वह ख़ुद भी बर्बाद हो जाए! (1) 

न तो (विरासत में मिली हुई) दौलत ही उसके काम आएगी और न वह धन जो उसने कमाया:  (2)

वह जल्द ही (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में जा पड़ेगा----  (3)

और साथ में उसकी (बदमाश) पत्नी (भी), जो (काँटेदार) लकड़ियों का बोझा उठाए फिरती है(और हमारे रसूल को सताने के लिए रास्तों में बिछा देती है)  (4)

(क़यामत के दिन) उसकी गर्दन में खजूर की छाल का (वही) रस्सा होगा (जिससे वह काँटों का गट्ठर बाँधती है)।  (5)

 

 

नोट: 

1: अबु लहब, यानी "अब्दुल उज़्ज़ा" मुहम्मद (सल्ल) का चचा था, वह आपका उस समय से घोर विरोधी हो गया था जब से आपने लोगों के बीच अल्लाह का संदेश पहुँचाना शुरू किया, और फिर वह आपको तरह-तरह से तकलीफ़ें पहुँचाता था। जब मुहम्मद (सल्ल) ने पहली बार अपने ख़ानदान के लोगों को “सफ़ा” पहाड़ पर जमा करके उनको अल्लाह का संदेश सुनाया, तो अबु लहब ने कहा था: “बर्बादी हो तुम्हारी! क्या इसी काम के लिए तुमने हमें जमा किया था?” इसके जवाब में यह सूरह उतरी, और इसमें पहले तो अबु लहब को बद-दुआ दी गई है कि वह बर्बाद हो जाए! उसके बाद आगे कहा गया है कि उसकी बर्बादी हो ही गई! चुनांचे बद्र की जंग के सात दिन बाद वह महामारी का शिकार हो गया, अरब के लोग छूत-छात मानते थे और जिसे यह बीमारी होती थी, उसे हाथ भी नहीं लगाते थे, फिर वह इसी हाल में मर गया और उसकी लाश सड़कर महकने लगी, यहाँ तक कि लोगों ने किसी लकड़ी के सहारे से उसे एक गड्ढे में गाड़ दिया।

3: भड़कते शोले को अरबी में “लहब” कहते हैं, अबु लहब उसको इसीलिए कहते थे कि उसका चेहरा शोले की तरह लाल था। क़ुरआन ने यहाँ जहन्नम के शोलों के लिए भी यही शब्द प्रयोग किया है। इसी से इस सूरह का नाम भी सूरह अल-लहब है।

 

 

 








 

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

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