Saturday, September 9, 2017

सूरह 14/Surah 14 : इबराहीम [Abraham]

सूरह 14: इबराहीम [Abraham]



01-03: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है 

04     : रसूलों ने हमेशा अपनी क़ौम के लोगों की ज़बान बोली है

05     : मूसा (अलै) का मिशन 

06-08: मूसा (अलै) ने अपने लोगों से अपील की 

09-17: पहले भेजे गए रसूल

18     : विश्वास न करने वालों की मिसाल

19-20: अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है 

21-23: कर्मों के फ़ैसले का दृश्य 

24-27: अच्छे और बुरे पेड़ की मिसाल 

28-30: विश्वास करने से इंकार करने वालों का अंजाम 

31     : ईमानवालों के लिए पाबंदी से नमाज़ और ज़कात देना ज़रूरी 

32-34: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

35-41: इबराहीम (अलै) की दुआ  

42-51: विश्वास न करने वालों की सज़ा निश्चित है 

52     : अल्लाह का संदेश नसीहत के लिए है 

 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत  दयावान है

अलिफ़॰ लाम॰ रा॰
 [ऐ रसूल!] यह [क़ुरआन] एक किताब है जिसे हमने आप पर उतारी है, ताकि आप अपने रब के हुक्म से लोगों को गहरे अँधेरों से निकालकर रौशनी की तरफ़ ला सकें, उस रास्ते की तरफ़ ला सकें जो सबसे ज़्यादा ताक़तवाला और तमाम तारीफ़ों के योग्य (रब का) का बताया हुआ रास्ता है,  (1)

वह अल्लाह, कि जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, सबका मालिक है। और उन लोगों पर बहुत ही सख़्त यातना होगी जो उस (अल्लाह) को नहीं मानते, (2)

 वह लोग जो आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की ज़िंदगी के मुक़ाबले इस सांसारिक जीवन को ज़्यादा पसंद करते हैं, जो दूसरों को अल्लाह के रास्ते पर चलने से रोकते हैं, और उसे टेढ़ा बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं: ऐसे ही लोग हैं जो गुमराही में बहुत दूर जा पड़े हैं। (3)


 हमने कभी भी कोई रसूल ऐसा नहीं भेजा, जिसने लोगों के सामने (हमारे संदेशों को) स्पष्ट कर देने के लिए उन्हीं की भाषा का प्रयोग न किया हो, मगर इसके बावजूद (वे नहीं समझते), फिर अल्लाह जिसे चाहता है उसे भटकता छोड़ देता है, और जिसे चाहता है उसे सीधा मार्ग दिखा देता है: वह बड़ी ताक़तवाला, गहरी समझ-बूझवाला है। (4)



 और (देखो!) हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों के साथ भेजा था: "अपनी क़ौम के लोगों को गहरे अँधेरों से रौशनी की तरफ़ निकाल लाओ। और उन्हें अल्लाह के उन दिनों की याद दिलाओ (जब अल्लाह ने उन पर अपनी ख़ास कृपा की थी या जब उन्हें परेशानी में डालकर आज़माया था): सचमुच इन बातों में हर उस आदमी के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो (परेशानी में) धीरज से  काम लेता है और (अच्छे समय में) शुक्र अदा करता है। (5)


फिर जब मूसा ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था, "अल्लाह ने जो तुम पर मेहरबानियाँ की थी, उन्हें याद करो कि जब उसने तुम्हें फ़िरऔन [pharaoh] के लोगों (की ग़ुलामी) से बचाया था, जो तुम्हें कैसी भयानक यातनाएं दिया करते थे, तुम्हारे बेटों को मार डालते थे और केवल तुम्हारी औरतों को (दासियों के रूप में) ज़िंदा रहने देते थे--- वह तुम्हारे रब की ओर से अत्यंत कड़ी परीक्षा थी!" (6)

याद करो जब अल्लाह ने तुम से अपना नियम बताया था, अगर तुम शुक्र अदा करते रहे तो मैं तुम्हें और अधिक नेमतें दूँगा, लेकिन अगर तुमने शुक्र अदा करना छोड़ दिया, तो (याद रखो) मेरी यातना बहुत कठोर होती है।  (7) 

और मूसा ने कहा, "अगर तुम, और ज़मीन में रहने वाला हर एक आदमी एक साथ नाशुक्री करे, तब भी (अल्लाह को तो किसी की ज़रूरत नहीं) वह तो आत्म-निर्भर [self sufficient] है, सारी तारीफ़ों के लायक़ है।" (8)


क्या आपने उन लोगों के बारे में नहीं सुना जो आपसे पहले गुज़र चुके हैं, नूह [Noah] की क़ौम के लोग, आद, समूद और उनके बाद बसने वाले वे लोग जिनको अल्लाह के सिवा (अब) कोई नहीं जानता? उनके पास उनके रसूल साफ़-साफ़ प्रमाण लेकर आए थे, मगर उन लोगों ने उन (रसूलों) का मुँह बंद कराने की कोशिश की और कहने लगे, "तुम जिस संदेश के साथ भेजे गए हो, हम उसमें विश्वास नहीं करते। और तुम जो भी हमें करने के लिए कह रहे हो, उसके बारे में हम गहरे संदेह में हैं।" (9)

उनके रसूलों ने जवाब दिया, "क्या अल्लाह के बारे में कोई संदेह कर सकता है जिसने आसमानों और ज़मीन की रचना की है? वह तुम्हें अपनी तरफ़ बुलाता है, ताकि तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर दे और तुम्हें एक नियत घड़ी तक ज़िंदगी का मज़ा उठाने दे।" मगर उन लोगों ने कहा, "तुम तो बस हमारे ही जैसे एक (मामूली) इंसान हो तुम चाहते हो कि हमारे बाप-दादा जिनकी पूजा करते आए हैं, उनसे हमें रोक दो। (अच्छा, अगर तुम ला सकते हो, तो) हमारे सामने कोई स्पष्ट प्रमाण लेकर आओ।" (10)


उनके रसूलों ने जवाब दिया, "हम तो वास्तव में बस तुम्हारे ही जैसे आदमी हैं, मगर अल्लाह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उस पर अपना ख़ास एहसान [favour] करके चुन लेता है। हम अपनी तरफ़ से कोई प्रमाण नहीं ला सकते, जब तक कि अल्लाह इसकी इजाज़त न दे दे, इसलिए विश्वास [ईमान] रखनेवालों को अल्लाह ही पर पूरा भरोसा रखना चाहिए---- (11)

 और हम अल्लाह पर भरोसा क्यों न करें, जबकि उसी ने हमें वह (सीधा) रास्ता दिखाया है जिन पर हम चलते हैं? तुम हमें चाहे जो भी तकलीफ़ पहुँचा लो, निश्चय ही हम इसे पूरे धैर्य के साथ सह लेंगे। और भरोसा करनेवालों को तो बस अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।"(12)




 इंकार करनेवालों [काफ़िरों] ने अपने रसूलों से कहा, "अगर तुम हमारे धर्म में लौटकर नहीं आए, तो हम तुम्हें अपने देश से निकाल बाहर करेंगे।" मगर तब उनके रब ने उन रसूलों की तरफ़ संदेश भेजे: "अब हम शैतानियाँ करनेवालों [ज़ालिमों] को बर्बाद कर देंगे, (13)


 और उनके बाद उस ज़मीन पर बसने के लिए तुम्हें छोड़ जाएंगे। यह उन लोगों के लिए इनाम होगा, जो मुझ से (हिसाब-किताब के दिन) मिलने से और मेरी चेतावनियों से डरे रहते हैं।" (14) 


उन (रसूलों) ने अल्लाह से (ज़ालिमों के ख़िलाफ़) फ़ैसले की माँग की, और (नतीजा यह हुआ कि सच्चाई के मुक़ाबले में) हर ज़िद्दी-अड़ियल और ज़ालिम बुरी तरह असफल हुआ---- (15)

 जहन्नम उनमें से हर एक के इंतज़ार में है; वहाँ उसे पीने के लिए गंदा, पीप-मिला पानी दिया जाएगा, (16)


 जिसे वह घूँट-घूँट पीने की कोशिश करेगा, मगर उसे गले के नीचे उतार न पाएगा; मौत उसे हर तरफ़ से घेर लेगी, मगर वह मरेगा भी नहीं; उसके आगे और अधिक कठोर यातना मौजूद होगी। (17)


 जिन लोगों ने अपने रब को मानने से इंकार [कुफ़्र] किया, उनके कर्मों का हाल उस राख के ढेर जैसा होगा, जिसे किसी तूफ़ानी दिन में हवा का तेज़ झोंका उड़ा ले जाता है: जो कुछ भी उन्होंने (अपने कर्मों से) हासिल किया होगा, उनमें से कुछ भी उनके हाथ न आएगा। यही है (असल में) गुमराही में बहुत दूर जा पड़ना! (18)


[ऐ रसूल!] क्या आपने देखा नहीं कि आसमानों और ज़मीन को अल्लाह ने एक ख़ास मक़सद के साथ पैदा किया है? अगर वह चाहे, तो तुम सबको सिरे से मिटा दे, और बदले में एक नई सृष्टि की रचना कर दे:  (19) 
 
और ऐसा करना अल्लाह के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है। (20)

जब सारे लोग (क़यामत के दिन) अल्लाह के सामने हाज़िर होंगे, तो (समाज में) अपनी ताक़त की धाक जमानेवालों से कमज़ोर लोग कहेंगे, "हम तो (दुनिया में) तुम्हारे पीछे चलते थे, तो क्या अब तुम अल्लाह की किसी भी यातना से हमें बचा सकते हो!?” वे जवाब में कहेंगे, "अगर अल्लाह ने हमें बच निकलने का कोई रास्ता दिखाया होता, तो हम भी तुम्हें वह रास्ता दिखा देते। अब चाहे हम चिल्ला-चिल्ली करें या धैर्य [सब्र] से बर्दाश्त कर लें, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला: बच निकलने का अब कोई उपाय नहीं है।" (21)

 (क़यामत के दिन) जब हर चीज़ का फ़ैसला हो चुका होगा, तब शैतान (लोगों से) कहेगा, "अल्लाह ने जो तुमसे वादा किया था वह सच्चा था, और मैंने भी तुमसे वादा किया था, मगर वह सब झूठा था: मेरे पास तो तुम्हें क़ाबू में रखने की कोई ताक़त न थी, सिवाए इसके कि मैं तुम्हें (ग़लत काम की तरफ़) बुलाता था, और तुम मेरा कहा मान लेते थे, अत: मुझ पर इल्ज़ाम न धरो; बल्कि (अपनी हालत के लिए) अपने आपको ही मलामत करो (आज के दिन) मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूँ और न ही तुम मेरी मदद कर सकते हो। पहले जिस तरह तुमने मुझे अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी) में साझेदार [Partner] बना रखा था, (आज) मैं उसे मानने से इंकार करता हूँ।" सचमुच ऐसे ज़ालिमों को बड़ी दर्दनाक यातना होगी,  (22)


 मगर जो लोग ईमान रखते थे और उन्होंने अच्छे कर्म किए थे, उन्हें ऐसे बाग़ों में लाया जाएगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, अपने रब के हुक्म से वे उनमें हमेशा के लिए रहेंगे: वहाँ (हर तरफ़ से) उनका अभिवादन 'तुम पर सलामती हो' की दुआ से होगा। (23)


 [ऐ रसूल!] क्या आपने देखा नहीं कि अल्लाह कैसी मिसालें पेश करता है? एक अच्छी बात उस पाकीज़ा पेड़ की तरह है जिसकी जड़ गहरी जमी हुई हो और उसकी टहनियाँ आसमान में फैली हुई हों, (24)


और वह (पेड़) अपने रब के हुक्म से हर मौसम में फल दे रहा हो---- अल्लाह लोगों के लिए ऐसी मिसालें इसलिए पेश करता है, ताकि वे इस पर सोच-विचार कर सकें--- (25)

 मगर एक बुरी (व गंदी) बात की मिसाल एक सड़े हुए पेड़ की तरह है (कि जड़ें खोखली हों और) जिसे ज़मीन की सतह से ही उखाड़ लिया जाए, जिसे स्थिरता व जमाव न मिला हो। (26)


 जो लोग मज़बूत जमी हुई बात [क़ुरआन] पर विश्वास रखते हैं, अल्लाह उन्हें मज़बूती से जमा देता है, इस दुनिया में भी और आनेवाली [आख़िरत/परलोक] दुनिया में भी, मगर शैतानियाँ करने वालों को अल्लाह भटकता छोड़ देता है: अल्लाह (अपनी समझ से) जो चाहता है, करता है। (27)


 [ऐ रसूल!] क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जो, अल्लाह की मेहरबानियों (पर शुक्र करने के बजाए) उल्टा उसकी केवल नाशुक्री करते हैं और अपनी क़ौम के लोगों को बर्बादी के घर में ला उतारते हैं,  (28) 


यानी जहन्नम में, जिसमें वे जलाए जाएँगे? और रहने के लिए (जहन्नम) क्या ही बुरा ठिकाना है! (29)

 वे (झूठे ख़ुदाओं को) अल्लाह के बराबर ठहराते हैं ताकि लोगों को उसके सही मार्ग से भटका सकें। कह दें, "अभी थोड़े दिन मज़े कर लो, मगर तुम्हारा अंतिम पड़ाव तो (जहन्नम की) आग है।" (30)


 मेरे वह बन्दे जो ईमान लाए हैं उनसे कह दें कि इससे पहले कि वह [क़यामत का] दिन आ जाए जिस दिन न तो किसी सामान का लेन-देन हो सकेगा, न किसी से दोस्ती काम आएगी, (अत: इसके लिए तैयारी कर लें) वे नमाज़ को पाबन्दी से पढ़ा करें, और हमने जो कुछ उन्हें दे रखा है उसमें से (अच्छे कामों पर) छिपकर और सबके सामने भी ख़र्च किया करें  (31)


यह अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, आसमान से (ज़मीन पर) पानी बरसाया और  फिर उसके द्वारा तुम्हारे खाने-पीने के लिए तरह-तरह के फल (व फ़सलें) उगा दीं; उसने जहाज़ को तुम्हारे लिए उपयोगी बनाया, जो उसके हुक्म से समंदर में तैरती चलती है, और नदियों को भी (तुम्हारे फ़ायदे की चीज़ बनाया); (32)

उसने सूरज और चाँद को भी तुम्हारे लिए बहुत उपयोगी बनाया, वे अपने रास्ते पर (नियत चाल से) चलते रहते हैं;  उसने रात औऱ दिन को भी तुम्हारे लिए बड़े काम का बनाया है  (33)

और (अपनी ज़रूरत के लिए) जो भी तुमने उससे माँगा है, हर चीज़ में से कुछ हिस्सा तुम्हें ज़रूर  दिया गया है। अगर तुम अल्लाह की नेमतों [favours] को गिनना चाहो तो कभी भी उन्हें गिन नहीं सकोगे: इंसान सचमुच बड़ा ही ना-इंसाफ़ी करनेवाला [unjust] और ना-शुक्रा [ungrateful] है। (34


याद करो जब इबराहीम ने (दुआ में) कहा था, "मेरे रब! इस शहर [मक्का]  को अमन की जगह [safe] बना दे! और मुझे और मेरी सन्तान को इस बात से बचाते रहना कि मूर्तियों की पूजा करने लग जाएं,  (35)

मेरे रब! इन (मूर्तियों) नॆ बहुत से लोगों को (सच्चाई के) रास्ते से भटका दिया है! तो जो कोई मेरे पीछे चला तो वह मेरे साथ है, मगर जिस किसी ने मेरे तरीक़े को मानने से इंकार किया---तो (उसका फ़ैसला तेरे हाथ है) बेशक तू बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद  रहम करनेवाला है।   (36)

हमारे रब! (तू देख रहा है कि) मैंने अपनी कुछ संतानों को एक ऐसी घाटी में लाकर बसाया है जहाँ खेती-बाड़ी नहीं होती, वह जगह तेरे पवित्र घर [काबा] से नज़दीक है, हमारे रब! (यह इसलिए किया) ताकि वे वहाँ नमाज़ क़ायम करें। अत: लोगों के दिलों को तू उनकी ओर झुका दे, और उनके लिए फलों की पैदावार से रोज़ी प्रदान कर, ताकि वे तेरा शुक्र अदा करने वाले बन सकें।   (37)

हमारे रब! जो कुछ हम छिपाते हैं और जो कुछ हम ज़ाहिर करते हैं, उसे तू अच्छी तरह जानता है: कोई भी चीज़ ऐसी नहीं है जो अल्लाह से छिपी हो, न ज़मीन में और न आसमान में। (38)

(इबराहीम ने कहा:) प्रशंसा है उस अल्लाह की, जिसने बुढ़ापे की अवस्था में भी मुझे इसमाईल [Ishmael] और इसहाक़ [Isaac] (जैसे बेटे) प्रदान किए: मेरा रब सारी दुआएं सुनता है! (39)

मेरे रब! मुझे और मेरी सन्तानों को पाबंदी से नमाज़ पढ़नेवाला बना दे। ऐ हमारे रब! मेरी दुआओं को क़बूल कर ले। (40)

ऐ हमारे रब! जिस दिन (कर्मों का) हिसाब लिया जाएगा, उस दिन मुझे, मेरे माँ-बाप को और सब ईमान रखनेवालों को माफ़ कर देना।" (41)


[ऐ रसूल!] आप यह न समझें कि जो कुछ (मक्का के) ये इंकार करनेवाले [काफ़िर] कर रहे हैं, उसकी ख़बर अल्लाह को नहीं है: वह तो इन्हें बस उस दिन तक की मुहलत दे रहा है जिस दिन मारे डर के उनकी आँखे फटी-की-फटी रह जाएँगी, (42)

हैरान, घबराए हुए, अपनी गर्दनें उठाए हुए वे भागे चले जा रहे होंगे, नज़रें एक जगह से हटा भी न पाएंगे, और उनके दिल (डर के चलते विचारों से) ख़ाली हो रहे होंगे।  (43)

[ऐ रसूल! आप] लोगों को उस दिन से डराएं, जब यातना उनके पास आ पहुंचेगी, उस समय इंकार करनेवाले कहेंगे, "हमारे रब! हमें थोड़ा-सा समय और दे दे: हम तेरे संदेश की पुकार को ज़रुर मान लेंगे, और रसूलों का अनुसरण करेंगे।" (उनसे कहा जाएगा), "क्या तुम वही नहीं हो जो अब से पहले क़समें खा-खाकर कहा करते थे कि हमारी ताक़त तो कभी ख़त्म होनेवाली नहीं है?" (44)

तुम भी दूसरों की तरह उन्हीं बस्तियों में रह-बस चुके थे, जिन्होंने ख़ुद अपने ऊपर अत्याचार किया था, और तुम्हें साफ़ तौर से दिखाया गया था कि उनके साथ हमने कैसा सलूक किया----फिर हमने तुम्हें समझाने के लिए तरह-तरह की मिसालें बयान कर दीं (फिर भी तुमने शैतानी नहीं छोड़ी!)।" (45)

उन लोगों ने (अपनी शैतानी चालों से हर तरह का) जाल बिछाया था, मगर उनका जाल चाहे पहाड़ को भी अपनी जगह से क्यों न हटा देता, तब भी अल्लाह के पास तो उनकी हर चाल का जवाब था।  (46)
 

अतः (ऐ रसूल) आप यह न सोचें कि अल्लाह अपने रसूलों से किए हुए वादे को तोड़ देगा:  अल्लाह बेहद ताक़तवाला और सख़्त सज़ा देने की पूरी सलाहियत रखता है। (47)

एक दिन आएगा-- जब यह ज़मीन एक दूसरी ही ज़मीन में बदल जाएगी और आसमानों को भी दूसरे आसमान में बदल दिया जाएगा, और सब के सब  लोग हाज़िर हो जाएँगे उस अल्लाह के सामने--- जो अकेला है, (ताक़त में) सब पर भारी है----  (48)

उस दिन आप अपराधियों को देखेंगे कि ज़ंजीरों में जकड़े हुए होंगे,  (49)

उनके कपड़े तारकोल के होंगे और आग उनके चहरों को घेरे हुए होगी, (50)

(सबका फ़ैसला कर दिया  जाएगा) ताकि अल्लाह हर एक जान को (उसके कर्मों का) बदला दे सके जिसका वह हक़दार है: अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।   (51)


यह सभी इंसानों के लिए एक सन्देश है, और इसलिए भेजा गया है कि लोगों को इसके द्वारा सावधान कर दिया जाए, और वे जान लें कि वही अकेला अल्लाह है, और इसलिए भी कि जो समझ-बूझ रखते हैं, वे इससे नसीहत ले सकें। (52)





नोट: 

3: रास्ते को टेढ़ा बनाने का मतलब यह है कि दीन के तरीक़े में कोई न कोई कमी तलाश करना ताकि उस पर आपत्ति की जा सके, या क़ुरआन में कोई ऐसी बात खोजना जिससे उनकी झूठी धारणाओं को बल मिल जाए। 

 4: अरब के कुछ लोगों का कहना था कि क़ुरआन अरबी ज़बान के बदले किसी और ज़बान में उतरी होती, तब हम उसे चमत्कार मानते। ....... जो कोई सच्चाई की खोज के लिए इस किताब को पढ़ता है, उसे अल्लाह सीधा रास्ता दिखा देता है, मगर जो कोई इसे अपनी ज़िद्द और दुर्भावना के इरादे से पढ़ता है, उसे अल्लाह भटकता हुआ छोड़ देता है। 

 10/11: स्पष्ट प्रमाण से मतलब लोगों की माँग पर कोई "मोजज़ा" [चमत्कार] दिखाना जिससे लोग हैरान रह जाएं। 

 18: जो लोग अपने रब को नहीं पहचानते और सच्चाई को मानने से इंकार कर देते हैं [काफ़िर], वे भी दुनिया में कुछ अच्छे और भलाई के कर्म करते हैं, उनके अच्छे कर्मों का बदला उन्हें इस दुनिया में तो दे दिया जाता है, मगर परलोक में उन्हें कर्मों का कुछ भी बदला नहीं मिलेगा क्योंकि उन लोगों ने रब को मानने से ही इंकार कर दिया। 

 19: अल्लाह द्वारा इस कायनात को बनाने का ख़ास मक़सद यही है कि जो उसके हुक्म को मानते हुए इस दुनिया में ज़िंदगी गुज़ारे, उसे बदले में इनाम मिले, और जो उसके आदेशों को मानने से इंकार करता है और बुरे कामों में लगा रहता है, उसे बदले में दंड मिलना चाहिए। ...... अरब के लोग मरने के बाद दोबारा ज़िंदा किए जाने को भी नहीं मानते थे, हालाँकि जिस तरह अल्लाह ने सबको पहली बार बिना किसी चीज़ के पैदा कर दिया, तो दोबारा पैदा करना उसके लिए तो बहुत आसान है। 

24: "अच्छी बात" [कल्मा तैय्यबा] यानी एक अल्लाह के सिवा कोई ख़ुदा नहीं, की सही समझ जब इंसान में पैदा हो जाती है, तो चाहे उसे जिस तरह से भी बहकाया जाए या तकलीफ़ें दी जाएं, वह अपनी सोच पर एक मज़बूत पेड़ की तरह क़ायम रहता है, और उसकी नेकियाँ ऊपर अल्लाह तक पहुँचती हैं और क़बूल की जाती हैं। 

 29: यहाँ मक्का के बड़े-बड़े सरदारों की तरफ़ इशारा है जिन्हें अल्लाह ने हर तरह की नेमतें दे रखी थीं, मगर वे लोग उसका शुक्र अदा करने बजाए हमेशा नाशुक्री करते रहे, और इसके नतीजे में ख़ुद भी तबाही मोल ली और अपनी क़ौम को भी तबाही के रास्ते पर ले गए। 

35: इबराहीम (अलै.) ने जिस जगह अपनी बीवी हाजरा और बेटे इस्माईल को अल्लाह के हुक्म से छोड़ा था, वह तब रहने लायक़ नहीं थी, फिर वहाँ ज़मज़म का कुंआँ बन गया, उसके कुछ समय बाद पानी के चलते जुरहम नाम का क़बीला वहाँ आबाद हुआ, फिर धीरे-धीरे वहाँ मक्का शहर बस गया। ............... मक्का के विश्वास न करने वाले भी इबराहीम (अलै.) को अपना बड़ा मानते थे, इसीलिए यहाँ उनकी दुआ नक़ल की गई है जिसमें उन्होंने मूर्तिपूजा से अपनी संतानों को बचाए रखने की दुआ की थी, मगर उनकी संतानें उलटा उसी में लगी हुई थीं।

37: मक्का में हज के दिनों के अलावा भी सालों भर लोग बड़े शौक़ से जाते रहते हैं, और फलों की पैदावार की दुआ भी शायद इस तरह पूरी हुई कि मक्का के नज़दीक तायफ़ में खजूर काफ़ी मात्रा में पैदा होती है, इसके अलावा दुनिया भर से वहाँ हर तरह के फल आते रहते हैं।





Saturday, August 26, 2017

सूरह 15 : अल-हिज्र [पत्थर का शहर, Stone City]

सूरह 15: अल-हिज्र
 [पत्थर का शहर/ Stone City]



01 : क़ुरआन की आयतें 

02-05: सज़ा मिलना तय है 

06-15: रसूलों का हमेशा लोगों ने मज़ाक़ उड़ाया है 

16-25: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

26-27: इंसानों और जिन्नों को पैदा किया जाना 

28-48: इबलीस [शितान] की कहानी 

49-60: इबराहीम (अलै) और उनके मेहमानों का क़िस्सा 

61-77: लूत (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी 

78-84: जंगलों में रहने वाले, और पत्थर के शहर में बसने वाले लोग 

85-86: फ़ैसले की घड़ी का आना तय है 

87-99: रसूल का उत्साह बढ़ाया गया 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


अलिफ़॰ लाम॰ रा॰।
यह आयतें हैं आसमानी किताब--- क़ुरआन की, जो बातों को साफ़ व स्पष्ट कर देती है। (1)

जिन लोगों ने (इस किताब की सच्चाई को मानने से) इंकार किया है, एक समय आएगा जब वे कामना करेंगे कि क्या ही अच्छा होता कि हम इसको मानते और अल्लाह के सामने झुकनेवालों में होते! (2)

सो [ऐ रसूल!] आप उनको उनके हाल पर छोड़ दें कि खाएँ-पिएँ और मज़े उड़ाएँ, और (झूठी) आशाओं के भुलावे में मगन रहें: लेकिन बहुत जल्द उन्हें मालूम हो जाएगा (कि वे किस धोखे में पड़े हुए थे)! (3)

हमने कभी किसी बस्ती के रहनेवालों को (उस समय तक) बर्बाद नहीं किया, जब तक कि (हालात के अनुसार) उनकी बर्बादी का तय किया हुआ समय नहीं आ गया; (4)

किसी समुदाय के लोग न (तय किए हुए) समय को पहले ला सकते हैं और न तो (तय) समय को पीछे ढकेल सकते हैं। (5)

[ऐ रसूल!] वे (आपके बारे में) कहते हैं, "ऐ वह, कि तुम पर नसीहत [क़ुरआन] उतरी है! (हमारे ख़्याल से) तुम निश्चय ही दीवाने हो! (6)

अगर तुम सच बोल रहे हो, तो हमारे सामने फ़रिश्तों को क्यों नहीं ले आते?" (7)

मगर हम फ़रिश्तों को (ज़मीन पर) तभी उतारते हैं जब हमें न्याय (स्थापित) करना होता है, और तब इन लोगों को (बचने की) कोई मुहलत नहीं मिलेगी। (8)

हमने ख़ुद इस क़ुरआन को उतारा है, और हम ख़ुद ही इसकी हिफ़ाज़त करेंगे।  (9)

आपसे पहले भी [ऐ रसूल], हम बहुत सारी पुरानी क़ौमों के बीच अपने (संदेशों के साथ) रसूलों को भेज चुके हैं,  (10)

मगर कोई भी रसूल ऐसा नहीं हुआ, कि जो लोगों के बीच गया हो और उन लोगों ने उसकी हँसी न उड़ायी हो:  (11)

इस तरह हम अपराधियों के दिलों को ऐसा बना देते हैं जिनसे होकर हमारे संदेश (बिना उन पर असर डाले हुए) निकल जाते हैं। (12)

वे इस पर विश्वास नहीं करेंगे। पुराने ज़माने के लोगों ने भी ऐसा ही किया था,  (13)

और यहाँ तक कि अगर हम उनके लिए आसमान तक जाने का कोई दरवाज़ा खोल दें, और वे इतनी ऊँचाई पर चढ़कर वहाँ तक पहुँच भी जाएं, (14)

तब भी वे यही कहेंगे, "(असल में यह कुछ नहीं), बस नज़र का धोखा है। हम लोगों पर तो जादू कर दिया गया है!" (15)


हमने आसमान में तारों के समूहों (को ख़ास-ख़ास डिज़ाइन का) बनाया है जो देखनेवालों को बहुत ख़ूबसूरत लगता है,  (16)

और उसे हर दुत्कारे हुए [मरदूद] शैतान से सुरक्षित रखा है:  (17)

अगर कोई (शैतान) चोरी-छिपे कुछ सुनने की ताक में रहता है, तो एक चमकता हुआ शोला उसका पीछा करता है। (18)

और (देखो!) हमने धरती (की सतह) को (फ़र्श की तरह) फैला दिया, उसमें मज़बूत पहाड़ों को गाड़ दिया और हर एक चीज़ (सही संतुलन के साथ) नपे-तुले अन्दाज़ में उगा दी। (19)

और उसमें तुम्हारे गुज़र-बसर के सामान पैदा किए, और उन सब जीवों के लिए भी किया जिनको रोज़ी देनेवाले तुम नहीं हो। (20)

कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जिसके भंडार हमारे पास न हों, फिर भी हम उसे सही व उचित मात्रा में उतारते हैं: (21)

और (देखो!) हम ऐसी हवाएं चलाते हैं जो बादलों को पानी से भर देती हैं, और फिर हम तुम्हारे पीने के लिए आसमान से पानी बरसाते हैं---- जहाँ से पानी निकल के आता है, उस पर तुम्हारा कोई नियंत्रण नहीं है। 22)

यह हम हैं जो ज़िंदगी और मौत देते हैं; और हम ही हैं जो (हर चीज़) के वारिस हैं। (23)

हमें एकदम ठीक-ठीक मालूम है कि कौन है जो पहले आया है, और कौन है जो बाद में आनेवाला है। (24)

[ऐ रसूल] यह आपका रब है जो (क़यामत के दिन) उन सबको एक साथ इकट्ठा करेगा: वह बेहद ज्ञानी और सब कुछ जाननेवाला है। (25)

हमने इंसान को सड़ी हुई मिट्टी के गारे से बनाया है जो सूखकर बजने लगता है---- (26

और जिन्न को इससे पहले, हम जलती हुई हवा की गर्मी से पैदा कर चुके थे। (27

[ऐ रसूल] जब ऐसा हुआ कि आपके रब ने फ़रिश्तों से कहा था, "मैं सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से एक आदमी पैदा करनेवाला हूँ। (28)

तो जब मैं उसे पूरा बना लूँ और उसमें अपनी रूह फूँक दूँ, तो तुम सब उसके आगे झुक जाना," (29)

और सब के सब फ़रिश्तों ने ऐसा ही किया।  (30)

मगर इबलीस न माना: उसने दूसरे फ़रिश्तों की तरह (आदमी के आगे) झुकने से इंकार कर दिया। (31)

अल्लाह ने कहा, "ऐ इबलीस! तुम दूसरे फ़रिश्तों की तरह (आदमी के आगे) क्यों नहीं झुके?" (32)

और उसने जवाब दिया, "मैं ऐसे मामूली आदमी के आगे नहीं झुक सकता जिसको तूने सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से पैदा किया है।" (33)

अल्लाह ने कहा, "चला जा यहाँ से! तुझे ज़ात-बाहर [Outcast] किया जाता है,  (34)

और फ़ैसले के दिन तक तुझ पर फिटकार रहेगी।" (35)

इबलीस ने कहा, "मेरे रब! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए (ज़िंदा रहने की) मुहलत दे दे, जब मरे हुए लोग दोबारा (ज़िंदा करके) उठाए जाएँगे।" (36)

अल्लाह ने कहा, "ठीक है, तुझे मुहलत दी जाती है, (37)

मगर (यह मुहलत) एक तय किए हुए समय के दिन तक (ही होगी)।" (38

इबलीस ने फिर अल्लाह से कहा, "चूँकि तूने मेरे लिए सीधे मार्ग से भटकना तय कर दिया है, अतः मैं भी धरती पर इंसानों को इस तरह बहकाऊंगा (कि उन्हें बुरी चीज़ें बहुत भली लगने लगेंगी) और उन सबको (सीधे मार्ग से) भटका कर रहूँगा, (39)

सिवाए उनके, जो सचमुच तेरे नेक व भक्ति में डूबे हुए बन्दे होंगे (जो मेरे बहकावे में आने वाले नहीं)।" (40)

अल्लाह ने कहा, "बस यही सीधा रास्ता है जो मुझ तक पहुँचने वाला है: (41

मेरे (असल) बन्दों पर तो तेरा कोई ज़ोर चलने वाला नहीं है, तेरा ज़ोर तो केवल उन पर चलेगा जो राह से भटक गए हों और तेरे पीछे-पीछे चलते हों। (42)

जहन्नम उनका ठिकाना होगा, इस बात का उन सबसे वादा है, (43

उसके सात दरवाज़े हैं, उनकी हर टोली के हिस्से में एक दरवाज़ा आएगा (जिससे होकर वे जहन्नम में दाख़िल होंगे)। (44)

मगर जो सच्चे व अच्छे [मुत्तक़ी] लोग हैं, वे तो बाग़ों और बहते हुए पानी के सोतों [spring] के बीच (आराम से) होंगे---- (45)

(उनसे कहा जाएगा), "सलामती के साथ बेधड़क (इन बाग़ों में) दाख़िल हो जाओ---- " (46)

उनके दिलों से हम उनके मन-मुटाव निकाल देंगे: वे तख़्तों पर भाइयों की तरह आमने-सामने बैठे होंगे। (47) 

न तो वहाँ उन्हें कभी कोई थकान महसूस होगी और न उन्हें कभी वहाँ से बाहर निकाला जाएगा।”  (48)

[ऐ रसूल!] मेरे बन्दों को बता दें कि मैं (गुनाहों का) बड़ा माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान हूँ,  (49)

मगर मेरी यातना भी सचमुच बहुत ही दर्दनाक होती है। (50)


उन्हें इबराहीम [Abraham] के मेहमानों [फ़रिश्तों] का क़िस्सा भी बता दें:  (51)

जब वे इबराहीम के यहाँ आए और कहा, “तुम पर सलाम हो”, इबराहीम ने (अजनबियों को देखकर) कहा, "हमें तो तुमसे डर मालूम होता है।" (52)

"डरो नहीं”, वे बोले, “हम तो तुम्हें एक बेटे के पैदा होने की ख़ुशख़बरी देने आए हैं जो बड़ा ज्ञानी होगा।" (53)

इबराहीम ने कहा, "तुम मुझे किस तरह ऐसी ख़बर सुना सकते हो जबकि पता है कि मुझ पर बुढ़ापा आ चुका है? यह भला कैसी ख़बर हुई?" (54

उन्होंने कहा, "हमने जो बात बतायी है वह सच है, इसलिए तुम निराश न हो", (55)

इबराहीम ने कहा, "गुमराहों को छोड़कर कौन है जो अपने रब की रहमत [Mercy] से निराश हो सकता है?" (56)

और फिर उनसे पूछा, "ऐ फ़रिश्तों, तुम किस अभियान पर आए हो?" (57)

वे बोले, "हम तो एक अपराधी [लूत की] क़ौम की ओर (उनकी तबाही के लिए) भेजे गए हैं।” (58)

मगर हाँ, लूत [Lot] के घरवालों को हम बचा लेंगे,  (59)

सिवाए उसकी पत्नी के: हम यह बात तय कर चुके हैं कि वह उन लोगों में से होगी जो (तबाह होने के लिए) पीछे रह जाएंगे।" (60)


फिर जब वे भेजे हुए दूत [फ़रिश्ते] लूत के घरवालों के पास पहुँचे, (61)

तो लूत ने कहा, "तुम (लोग) तो अजनबी मालूम होते हो।" (62)

उन्होंने जवाब दिया, "हम तुम्हारे पास वह (यातना) लेकर आ गए हैं, जिसके बारे में ये लोग कहा करते थे कि ऐसा कभी होने वाला नहीं है। (63

और हम तुम्हारे पास सच्चाई लेकर आए हैं, और हम बिलकुल सच कहते हैं,  (64)

तुम अपने घरवालों को लेकर रात के पिछले पहर निकल जाना, और स्वयं उन सबके पीछे-पीछे चलना। और (ध्यान रहे!) तुममें से कोई भी पीछे मुड़कर न देखे। बस चुप-चाप चलते जाना, जहाँ जाने का तुम्हें आदेश हुआ है।" (65)

हमने इस फ़ैसले की जानकारी लूत को दे दी: सुबह होते ही उस शहर के लोगों के आख़िरी अवशेष [remnants] तक पूरी तरह से मिटा दिए जाएंगे। (66)

इतने में शहर के लोग नाच-गाना करते हुए (लूत के पास) आ पहुँचे,  (67)

उसने लोगों से कहा, "ये लोग मेरे मेहमान हैं, (इनके सामने) मेरा अपमान न करो।  (68)

अल्लाह से डरो और मुझे शर्मिंदा न करो।" (69

उन लोगों ने जवाब दिया, "क्या हमने तुम्हें किसी दूसरे आदमी (की इज़्ज़त) को बचाने से या ऐसे लोगों को अपने यहाँ ठहराने से रोका नहीं था?" (70)

लूत ने कहा, "तुम को अगर (सेक्स) करना ही है, तो (छोड़ो मेहमान मर्दों को), इसके लिए ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ मौजूद हैं।" (71)

[तब फ़रिश्तों ने लूत से कहा], आपकी ज़िंदगी की क़सम! वे अपनी मौज-मस्ती के नशे में धुत हैं।” (आपकी बात सुननेवाले नहीं!) (72)

और सुबह का सूरज निकलते ही एक भयानक धमाके ने उन्हें धर दबोचा:  (73)

हमने उस शहर को ऐसा उलट दिया कि सब ऊपर का नीचे और नीचे का ऊपर हो गया, और उन पर पकी हुई मिट्टी के पत्थर बरसाए। (74)

सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो इससे सीख लेना चाहते हैं----(75)

यह (खंडहर बनी) जगह अब भी मुख्य रास्ते पर मौजूद है----(76)

सचमुच इसमें उन लोगों के लिए एक निशानी है जो ईमान रखते हैं। (77)

(इसी तरह) जंगलों में रहनेवाले [ऐका यानी मदयन के क़बीले के लोग] भी अत्याचारी थे, (78)

उन्हें भी हमने (उनके अत्याचार की) सज़ा दी थी; और ये (लूत व मदयन के लोगों की) दोनों बस्तियाँ मुख्य मार्ग पर अब भी स्थित हैं जिसे देखा जा सकता है। (79)

अल-हिज्र [पत्थर का शहर] में (समूद की क़ौम) के लोगों ने भी हमारे रसूलों को मानने से इंकार किया था:  (80

हमने उन्हें अपनी निशानियाँ दी थीं, मगर वे उनसे मुँह मोड़े रहे। (81)

वे पहाड़ों को काट-काटकर अपने घर बनाते थे कि उसमें सुरक्षित रह सकें----  (82)

मगर एक दिन सुबह-सवेरे उठे तो उन्हें एक ज़ोरदार धमाके ने धर दबोचा।  (83)

फिर जो कुछ उन्होंने कमाया था, वह उनके कुछ काम न आ सका। (84)

हमने आसमानों और ज़मीन को और वे सारी चीज़ें जो उनके बीच में हैं, उन्हें बिना किसी सही मक़सद के यूँ ही नहीं बना दिया है: और (क़यामत की) वह घड़ी तो अवश्य आकर रहेगी, अतः [ऐ रसूल!] आप (उनके विरोध के बावजूद) उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हुए उन्हें झेल लें। (85)

आपका रब  हर चीज़ को पैदा करनेवाला, और सब (की हालत) जाननेवाला है। (86)

हमने आपको बार-बार दोहरायी जाने वाली सात आयतें दी हैं [सूरह फ़ातिहा], और इसके साथ पूरी क़ुरआन दी है जो महानता से भरी है। (87)

हमने उनमें से कुछ लोगों को (इस दुनिया में) थोड़ा मौज करने के लिए कुछ सुख-सामग्री दे रखी है, आप उन चीज़ों को चाहत की नज़र से न देखें। और न ही आप उन (काफ़िरों) के लिए बेकार ही दुखी हों। बल्कि ईमानवालों के लिए अपने बाज़ू फैलाए रखें (और उन पर हमेशा ध्यान दें), (88)

और कह दें, "मैं तो बस तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के लिए) साफ़-साफ़ चेतावनी देनेवाला हूँ," (89)

जिस तरह हमने (अपनी चेतावनी) उन लोगों के लिए भेजी थी जिन लोगों ने अपने आपको कई समूहों में बाँट रखा था (और वे तीर्थ-यात्रियों को क़ुरआन के ख़िलाफ़ भड़काते रहते थे), (90)

और क़ुरआन को बुरा-भला कहते थे ---- (91)

आपके रब की क़सम! हम अवश्य ही उन सबसे पूछताछ करेंगे, (92)

जो कुछ (कर्म) वे करते रहे थे। (93)

अतः जिस बात को कहने का आदेश हुआ है, उसकी खुले-आम घोषणा कर दें, और बहुदेववादियों [idolaters] की ओर कोई ध्यान न दें। (94)

वे लोग जो आपके संदेश का मज़ाक़ उड़ाते हैं, उनके ख़िलाफ़ हम काफ़ी हैं। (95)

जो अल्लाह के साथ दूसरों को भी पूजने के लायक़ ठहराते हैं, तो शीघ्र ही उन्हें (सच्चाई) मालूम हो जाएगी! (96)

हम अच्छी तरह जानते हैं कि वे जो कुछ कहते हैं, उन बातों से (तकलीफ़ के मारे) आपका दिल रुकने लगता है। (97)

सो अपने रब की महानता का (दिन-रात) गुणगान करें और उन लोगों में शामिल हो जाएं जो उसके आगे झुके रहते हैं:  (98)

और अपने रब की इबादत में उस समय तक लगे रहें, जब तक कि वह (मौत) न आ जाए जिसका आना निश्चित है। (99)





नोट:

3: विश्वास न करने वाले दुनिया की ज़िंदगी में मगन रहते हैं, जबकि मुसलमान दुनिया में रहता ज़रूर है और इसमें अल्लाह की नेमतों से फ़ायदा भी उठाता है, मगर इस दुनिया को अपनी ज़िंदगी का मक़सद नहीं बनाता, बल्कि उसे परलोक [आख़िरत] की भलाई के लिए इस्तेमाल करता है। 

8: जिस क़ौम के पास रसूल भेजे जाते हैं और जब वह क़ौम अल्लाह के संदेशों को मानने से इंकार कर देती है और आदेश तोड़ने में हदें पार कर जाती है, तब फ़रिश्तों को भेज दिया जाता है, ताकि बिना कोई मुहलत दिए हुए पूरी क़ौम को तबाह-बर्बाद कर दिया जाए। 

9: क़यामत तक के लिए क़ुरआन आख़िरी आसमानी किताब है, और इसकी हिफ़ाज़त का ज़िम्मा ख़ुद अल्लाह ने लिया है। अल्लाह ने इसकी हिफ़ाज़त इस तरह की है कि यह छोटे-छोटे बच्चों को याद हो जाती है, और पूरी दुनिया में लाखों लोग हैं जिन्हें पूरी किताब याद है, इस तरह, इसमें मामूली फेरबदल भी मुमकिन नहीं है।

 17: देखें सूरह जिन्न (72: 8-9)  

 18: शैतान आसमान के ऊपर जाकर ऊपर की दुनिया की ख़बरें लेना चाहते हैं, ताकि वह ख़बरें काहिनों [तांत्रिकों] और भविष्यवक्ताओं [नजूमियों] तक पहुँचाएं, और उनके द्वारा वे लोगों को यह बताएं कि उन्हें छिपी हुई बातें भी मालूम होती हैं। लेकिन आसमान में उनके घुसने पर रोक लगी हुई है, वैसे ये शैतान आसमान के क़रीब जाकर चोरी-छिपे फ़रिश्तों की बातें सुनने की कोशिश करते थे, और वहाँ से कोई बात कान में पड़ जाती, तो उसमें नमक-मिर्च लगाकर काहिनों को बता देते थे। लेकिन मुहम्मद (सल्ल.) के दुनिया में आने के बाद जब कभी शैतान आसमान के नज़दीक जाने की कोशिश करते हैं, तो एक शोला उनका पीछा करता हुआ उन्हें मार भगाता है। देखें सूरह जिन्न. 

26: इंसान का मतलब यहाँ पर आदम (अलै.) की रचना से है, देखें सूरह बक़रा (2: 30-34) 

 27: जिन्नों में सबसे पहले जिस जिन्न को पैदा किया गया, उसका नाम जान था। 

38: शैतान को जो मुहलत दी गयी है, वह शायद पहली बार नरसिंघे [सूर] में फूँक मारने तक दी गई है, जिसके बाद शैतान समेत सारे जीवों को मौत आ जाएगी। 

42: असल बंदे वे होंगे जो अल्लाह के हुक्म पर चलने का पक्का इरादा रखते हैं, और उसी से मदद माँगते हैं, उनकी नेकी और अल्लाह की सच्ची भक्ति उन्हें बहकने से बचा लेगी। 

 52: मेहमानों के लिए इबराहीम (अलै.) ने भुना गोश्त पेश किया, जब उन्होंने देखा कि वे खा नहीं रहे, तो उन्हें लगा कि ये कोई दुश्मन हैं, और ज़रूर किसी बुरे इरादे से आए हैं। देखें सूरह हूद (11: 69-83) 

62: लूत (अलै.) की क़ौम के मर्द सेक्स के लिए दूसरे मर्दों के पास जाते थे, यानी [Homo-sexual] थे, और वे अपने यहाँ आए हुए अजनबियों को भी नहीं छोड़ते थे। देखें सूरह अ'राफ़ [7: 80] 

 67: ये फ़रिश्ते ख़ूबसूरत नौजवान की शक्ल में आए थे, और उन्हें वहां के लोगों ने देख लिया था, इसलिए वे ख़ुशी मनाते हुए अपनी हवस पूरी करने के लिए आए थे।

 76: लूत अलै के क़ौम की बस्तियां जॉर्डन (Jordan) में मृत सागर (Dead Sea) के आसपास के इलाकों में फैली हुई थी, और उनके खंडहर अरब से सीरिया जाते समय व्यापारिक मार्ग पर ही पड़ते थे।

78: "ऐका" यानी घना जंगल, हज़रत शोएब (अलै.) की क़ौम घने जंगल के पास रहती थी। कुछ लोग कहते हैं कि इस बस्ती का नाम मदयन था, जोकि जार्डन में है, और यह भी सीरिया जाने के रास्ते में पड़ता था।  कुछ लोग इसे कोई दूसरी बस्ती बताते हैं। इनका वर्णन सूरह आराफ़ (7:85-93) में थोड़े विस्तार से आया है। देखें 26: 176-191; 38: 13; 50: 14

 80: "हिज्र" यानी "पत्थर का शहर", जो कि मदीने के उत्तर में था, और जार्डन के पेट्रा जैसा होगा, यह समूद के क़ौम की उन बस्तियों का नाम था जिनके पास हज़रत सालेह (अलै.) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था, इसका वर्णन भी सूरह आराफ़ (7: 73-79) में आया है। 

 85: इस कायनात को पैदा करने का असल मक़सद यह है कि नेक लोगों को परलोक [आख़िरत] में इनाम दिया जाए, और बुरे कर्म करने वालों को सज़ा दी जाए, अत: मुहम्मद (सल्ल.) को यहाँ तसल्ली दी जा रही है कि आप इन विश्वास न करने वालों के कर्मों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं, बल्कि उनका फ़ैसला ख़ुद अल्लाह करेगा। .... ध्यान देने की बात यह है कि मक्का के लोगों द्वारा तकलीफ़े पहुँचाने के बावजूद उनसे बदला न लेते हुए उनसे अच्छा व्य्वहार और बर्दाश्त करने को कहा गया है। 

87: "सात आयतों" का मतलब "सूरह फ़ातिहा" है जो हर नमाज़ में बार-बार दोहरायी जाती है, यहाँ उसके ज़िक्र का मतलब शायद यह है कि मुसीबत और तकलीफ़ में हमेशा अल्लाह से ही मदद माँगनी चाहिए और सीधे रास्ते पर चलते रहने की दुआ करनी चाहिए। 

 90: मक्का के विश्वास न करने वालों ने अपने कुछ समूह बना रखे थे जो कि मक्का में आने वाले तीर्थ-यात्रियों [हाजियों] को क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल) के ख़िलाफ़ भड़काते रहते थे। 

 91: मक्का के कुछ लोग क़ुरआन के बारे में तरह-तरह की झूठी बातें कहते थे, जैसे कि यह जादू है, या शायरी है, या पुराने ज़माने की कहानियाँ है आदि। कुछ लोग इसकी कुछ बातों को मान लेते थे और कुछ बातों को अपनी मर्ज़ी से नहीं मानते थे, इसे ही क़ुरआन को बुरा-भला [Abuse] कहना कहा गया है।  

94: कहा जाता है कि इस आयत के बाद मुहम्मद (सल्ल.) लोगों के सामने अल्लाह का संदेश खुले-आम पहुँचाने लगे, इससे पहले तक वह लोगों से अलग-अलग बातें करते थे। 




Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...