सूरह 105: अल-फ़ील
[हाथीवाले, The Elephant]
इस सूरह में एक घटना का हवाला दिया गया है जो 570 ई. में घटी थी, उसी साल मुहम्मद सल्ल. की पैदाइश हुई थी। हुआ यूँ था कि अबरहा नाम का एक ईसाई राजा था जो यमन के शहर "सना" में रहता था, वह मक्का पर चढ़ायी करने के लिए एक बहुत बड़ी सेना लेकर निकला जिसमें बहुत सारे हाथी भी थे। उसका असल मक़सद "काबा" को ध्वस्त करना था ताकि उस क्षेत्र के बहुत सारे लोग जो हर साल तीर्थयात्रा के लिए काबा जाते थे, वे वहाँ न जाकर "सना" जाएं जहाँ उसने बहुत भव्य चर्च बनवाया था। यहाँ उसकी सेना की बर्बादी का क़िस्सा सुनाया गया है ताकि ईमानवालों का उत्साह बढ़ सके और विश्वास न करनेवालों को चेतावनी दी जा सके।
विषय:
01-05: अल्लाह द्वारा काबा की हिफ़ाज़त
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल] क्या आपने नहीं देखा कि आपके रब ने हाथीवालों [यमन से आए अबरहा के लश्कर] के साथ क्या किया (जो काबा को तहस-नहस करने के इरादे से आए थे)? (1)
क्या उस [अल्लाह] ने उनकी तमाम चालों को पूरी तरह से बेकार नहीं कर दिया था? (2)
और उसने उन पर (हर तरफ़ से) चिड़ियों के झुंड-के-झुंड भेज दिये थे, (3)
जो उन पर ठोस पकी-मिट्टी की कंकरियाँ फेंक रही थीं: (4)
(अल्लाह ने) उन्हें ऐसा कर डाला जैसे चबाया हुआ भूसा! (5)
नोट:
1: अबरहा जो कि यमन का बादशाह था, वह अपने लशकर के साथ हाथियों पर सवार होकर “काबा” पर चढ़ायी करने के लिए आया था। उसने यमन में आलीशान चर्च का निर्माण करवाकर यमन के लोगों में यह घोषणा कर दिया था कि आगे से कोई आदमी हज के लिए मक्का न जाए, बल्कि इसी चर्च को अल्लाह का घर समझे। अरब के लोग हालाँकि मूर्तिपूजक थे, लेकिन हज़रत इबराहीम (अलै.) की शिक्षा से काबा की शान व गौरव उनके दिलों में रच-बस गई थी। इस घोषणा से उनमें दुख और ग़ुस्से की लहर दौड़ गई और उनमें से किसी ने रात के समय उस चर्च में जाकर गंदगी फैला दी और कुछ लोग कहते हैं कि उसके कुछ हिस्सों में आग भी लगा दी। अबरहा को जब यह मालूम हुआ तो वह एक बड़ा लशकर तैयार करके मक्का की तरफ़ चल पड़ा। रास्ते में कई क़बीलों ने उसके साथ युद्ध किया, मगर उनकी हार हुई, अंत में यह लशकर मक्का के बहुत क़रीब तक पहुँच गया, लेकिन अगली सुबह उसने काबा की तरफ़ बढ़ना चाहा तो उसके हाथी ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया और उसी समय समंदर की तरफ़ से अजीब क़िस्म के परिंदों का एक बड़ा झुंड आया और पूरे लशकर के ऊपर छा गया। हर चिड़िये की चोंच में तीन-तीन कंकर थे जो उन चिड़ियों ने फौज पर बरसाए, जिस पर भी यह कंकरी लगती, उसके पूरे जिस्म को छेदती हुई ज़मीन में घुस जाती थी, यह यातना देखकर सारे हाथी भाग खड़े हुए। लशकर के सिपाहियों में कुछ तो वहीं मारे गए, और कुछ भाग निकले, वे रास्ते में मरे, और अबरहा के शरीर में ज़हर ऐसा घुल गया कि उसका एक-एक जोड़ सड़-गलकर गिरने लगा, इसी हालत में उसे यमन लाया गया, और वहीं उसकी मौत हो गई।
यह घटना मुहम्मद सल्ल.) के पैदा होने के कुछ ही दिन पहले की है। इस घटना का वर्णन करके मुहम्मद साहब को तसल्ली दी गयी है कि अल्लाह की क़ुदरत बहुत बड़ी है, इसलिए जो लोग आपकी दुश्मनी पर कमर बाँधे हुए हैं, अंत में वह भी हाथीवालों की तरह मुँह की खाएंगे।
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