Wednesday, March 30, 2022

Surah/सूरह 66: At-Tahreem/अत-तहरीम [अवैध करना/ रोक लगाना/Prohibition]

 सूरह 66: अत-तहरीम 

[अवैध करना/ रोक लगाना/Prohibition]

यह एक मदनी सूरह है जिसमें पैग़म्बर सल्ल. की घरेलू ज़िंदगी के एक पह्लू पर चर्चा की गई है। इस सूरह में पैग़म्बर साहब की दो बीवियों की एक घटना के सिलसिले में आलोचना की गई है, जबकि उन पर भरोसा करना थोड़ा मुश्किल हो गया था (आयत 3-5). और सभी ईमानवालों को ज़ोर देकर कहा गया है कि वे अल्लाह के सामने पूरी भक्ति से झुकें, और अपने आपको और अपने परिवार के लोगों को जहन्नम की आग से बचाएं (आयत 6-8). सूरह के अंत में ईमान रखनेवाली औरतों (जैसे मरयम और फिरऔन की बीवी आसिया) और विश्वास न करने वाली औरतों (जैसे नूह और लूत अलै. की बीवियों) का उदाहरण दिया गया है (आयत 10-12), ताकि उनसे सबक़ सीखा जा सके।  

विषय:


01-05रसूल और उनकी बीवियाँ 

06-07: ईमानवालों को कड़ी चेतावनी

08     : गुनाहों से तौबा करने का इनाम

09     : विश्वास न करने वालों और पाखंडियों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष 

10-12: (सच्चाई पर) विश्वास करने वाली और विश्वास न करने वाली औरतों के उदाहरण





अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ रसूल! आप अपनी बीवियों को ख़ुश करने की इच्छा से, ऐसी चीज़ को क्यों अपने लिए हराम (Prohibit) करते हैं, जिसे अल्लाह ने आपके लिए हलाल [वैध/Lawful] ठहराया है? फिर भी, अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है: (1)  

(ऐ ईमानवालो!) अल्लाह ने अपने आदेश से तुम लोगों को (ऐसी) क़समों को तोड़ने का रास्ता बता दिया है------ (असल में) अल्लाह ही तुम्हारा मददगार है: वह सब कुछ जानता है, बहुत ज्ञानी है। (2)
 

(एक बार ऐसा हुआ कि) रसूल ने अपनी एक बीवी [हफ़्सा] से कोई राज़ की बात कही, फिर जब उस (बीवी) ने वह बात [दूसरी बीवी, आयशा को] बता दी और (फिर) अल्लाह ने उस (रसूल) को इसकी जानकारी दे दी, तो रसूल ने (हफ़्सा को) उस (राज़ की) बात का कुछ हिस्सा सुना दिया (जो उसने आयशा को बताया था), और बाक़ी बातें टाल गए। फिर जब रसूल ने अपनी उस बीवी [हफ़्सा] से राज़ खोलने के बारे में पूछताछ की, तो वह बोली, "आपको इसकी ख़बर किसने दी?" रसूल ने कहा, "मुझे उसी ने ख़बर दी जो सब कुछ जाननेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है।" (3)

अगर तुम दोनों (बीवियाँ) अल्लाह के सामने तौबा कर लो---- क्योंकि तुम्हारे दिल सच्चाई की जगह से हट गए हैं-----(तो यह बहुत अच्छा होगा); किन्तु अगर तुम उन (रसूल) के विरुद्ध एक-दूसरे की मदद करोगी, तो फिर (याद रखना कि) अल्लाह उनकी मदद करेगा, और जिबरील [Gabriel] और नेक ईमानवाले भी, और सारे फ़रिश्ते भी उनकी तरफ़ हो जाएंगे। (4)

अगर रसूल तुममें से किसी को तलाक़ देने का फ़ैसला करें, तो उनका रब बड़ी आसानी से, (तुम्हारे बदले) तुम से अच्छी बीवियाँ, उन्हें दे सकता है: बीवियाँ जो पूरी तरह अल्लाह पर समर्पित हों, पक्की ईमानवाली, आज्ञा मानने वाली, तौबा करने वाली, इबादत करने वाली और अल्लाह के रास्ते में सफ़र करने वाली (या रोज़ा रखनेवाली) हों, चाहे उनकी पहले शादी हो चुकी हो या कुँवारी हों। (5)
 

ऐ ईमान रखनेवालो! अपने आपको और अपने घरवालों को उस आग से बचाओ जिसका ईधन आदमी और पत्थर होंगे, जिस पर कठोर स्वभाव के मज़बूत फ़रिश्ते नियुक्त होते हैं जो अल्लाह के हुक्म को मानने से कभी इंकार नहीं करते, और वही करते हैं जिसका उन्हें आदेश दिया जाता है: (6)

“तुम (लोग) जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, आज [क़यामत के दिन] कोई बहाने न बनाओ: तुम्हें तो उन्हीं कर्मों का बदला दिया जा रहा है जो कुछ तुम किया करते थे।" (7)
 

ऐ ईमानवालो! अल्लाह के सामने सच्चे मन से (अपनी ग़लतियों की) तौबा करो, बहुत सम्भव है कि तुम्हारा रब तुम्हारी बुराइयों को तुम से दूर हटा दे और तुम्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर दे, जहां बहती हुई नहरें हों------- उस दिन अल्लाह अपने रसूल को और उनको जिन्होंने (रसूल की) बातों पर विश्वास किया, उन्हें अपमानित नहीं करेगा। और उनकी रौशनी [नूर] उनके आगे-आगे और उनके दाहिने तरफ़ फैल रही होगी, और वे कह रहे होंगे, "ऐ हमारे रब! हमारी रौशनियों को हमारे लिए पूरा कर दे और हमें माफ़ कर दें: तुझे तो हर चीज़ करने की ताक़त है।" (8
 

ऐ रसूल! (सच्चाई से) इंकार करने वालों और (मदीना के) पाखंडियों [Hypocrites] के ख़िलाफ़ जमकर संघर्ष करें, और उनके साथ सख़्ती से पेश आएं। उनका घर जहन्नम होगा, और वह कितना बुरा ठिकाना है! (9)

अल्लाह ने (सच्चाई से) इंकार करने वालों का उदाहरण पेश किया है: नूह [Noah] और लूत [Lot] की बीवियों ने हमारे दो बहुत ही नेक बंदों से शादी की थी, फिर उनके साथ विश्वासघात किया। मगर अल्लाह के मुक़ाबले में उनके पति उनकी कोई मदद नहीं कर सके: (उन बीवियों से) कह दिया गया, "दूसरों के साथ तुम दोनों भी (जहन्नम की) आग में दाख़िल हो जाओ।" (10)  

और ईमान रखनेवालों के लिए अल्लाह ने फ़िरऔन [Pharaoh] की बीवी की मिसाल पेश की है, जबकि उसने कहा, "ऐ मेरे रब! तू मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना दे, और मुझे फ़िरऔन और उसके कर्मों से छुटकारा दे दे, और मुझे शैतानियाँ करने वालों से बचा ले।" (11)

और इमरान की बेटी मरयम [Mary] का उदाहरण भी है, जिसने अपनी इज़्ज़त बचाकर रखी थी, तो फिर हमने उसके अंदर अपनी रूह [Spirit] फूँक दी, उसने अपने रब की बातों और उसकी किताबों की (सच्चाई की) पुष्टि की: वह सचमुच पूरी भक्ति से (अल्लाह की) आज्ञा माननेवालों में शामिल थी। (12)



नोट:

1: इस आयत के बारे में दो तरह की बातें बतायी जाती हैं। पहली यह कि मुहम्मद (सल्ल) ने मारिया नाम की अपनी एक दासी (जो उन्हें मिस्र से तोहफ़े में मिली थी) के साथ संबंध क़ायम किए थे, जिसके बारे में उनकी एक बीवी हफ़्सा (रज़ि) को पता चल गया जिससे वह नाराज़ हो गईं, मुहम्मद (सल्ल) ने यह क़सम खा ली कि अब वह उस दासी के साथ कोई संबंध नहीं रखेंगे और आपने यह बात राज़ रखने के लिए कहा था, लेकिन उनकी बीवी हफ्सा (रज़ि) ने उनकी दूसरी बीवी आयशा (रज़ि) को यह बात बता दी थी।

दूसरी बात यह कही जाती है कि आप (सल्ल) अपनी एक बीवी (ज़ैनब) के यहाँ शहद पिया करते थे, उस बीवी से जलन के कारण उनकी दूसरी बीवी हफ़्सा ने जान-बूझकर यह कहा कि आपके मुँह से गंदी महक आ रही है, फिर यह बात हफ़्सा (रज़ि) ने उनकी एक और बीवी आयशा (रज़ि) को भी बता दी, और उन्होंने भी मुँह महकने की झूठी बात कही। इस पर उन्होंने आगे शहद नहीं खाने की क़सम खा ली थी। 

मगर यह दोनों ही चीज़ें उनके लिए वैध [हलाल] थीं जिसे उन्होंने अपनी बीवियों को ख़ुश करने के लिए अपने ऊपर हराम [अवैध] करने की क़सम खा ली थी। 


2. ऐसी क़समों को तोड़ने का तरीक़ा सूरह मायदा में यह बताया गया है कि इसकी भरपाई के तौर पर 10 ग़रीबों को खाना खिलाना है, या उन्हें कपड़ा देना है, या एक ग़ुलाम को आज़ाद करना है। अगर किसी के पास इतना पैसा नहीं है, तो उसे तीन दिन लगातार रोज़ा रखना चाहिए,  देखें 5: 89. 


6: जहन्नम की आग का ईंधन पत्थर भी होंगे, यानी वे पत्थर की मूर्तियाँ जिनकी पूजा की जाती थी। 


8: रौशनी [नूर] उनके आगे-आगे और दाहिनी तरफ़ फ़ैलने का वर्णन सूरह हदीद ( 57: 12)  में आया है, जो शायद उस समय होगा जब अंतिम फ़ैसले के लिए लोग पुल-सिरात से गुज़र रहे होंगे, वहाँ हर आदमी का ईमान उसके सामने रौशनी बनकर उसे रास्ता दिखाएगा। ..... रौशनी को पूरा कर देने की दुआ से मतलब है कि रौशनी अंत तक बनी रहे। 


9: यह आयत 9: 73 से मिलती-जुलती है, सच्चाई से इंकार करने वालों के साथ जमकर संघर्ष करने को कहा गया है, यह दोनों तरह का हो सकता है, यानी बातचीत के द्वारा उन्हें अल्लाह का संदेश पहुँचाकर भी, और अगर वे लड़ें तो फिर लड़कर भी। मदीना के पाखंडियों के साथ भी कड़ी क़ानूनी कार्रवाई करने को कहा गया है। 


10: बताया जाता है कि नूह (अलै) की बीवी अपने पवित्र पति को दीवाना कहती थी और उनके राज़ दुश्मनों को बताया करती थीं। उसी तरह, लूत (अलै) की बीवी भी उनके दुश्मनों से मिली हुई थी, और उसी ने उनके घर आए हुए मेहमानों का पता बताया था। इस तरह दोनों ने अपने पतियों को धोखा दिया था।  


11: इसके विपरीत, जब मूसा (अलै) ने जादूगरों को चैलेंज में हरा दिया था, तो उस समय जादूगरों के साथ फ़िरऔन की बीवी, हज़रत आसिया भी ईमान ले आयी थीं जिसके नतीजे में फ़िरऔन ने उन पर भी बहुत ज़ुल्म किए थे, यहाँ उनके द्वारा की हुई दुआ को लिखा गया है। 


12: उसी "रूह" के फूँकने से ईसा (अलै) पैदा हुए थे, इसलिए उन्हें "रूहुल्लाह" कहा जाता है। 


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