Wednesday, March 30, 2022

Surah/सूरह 62: Al-Juma'/अल-जुमा' [जुमे' की नमाज़/ The Congregation Prayer]

 सूरह 62: अल-जुमा' 

[जुमे' की नमाज़/ The Congregation Prayer]

यह एक मदनी सूरह है जिसका नाम आयत 9-11 में आए निर्देशों पर रखा गया है जिनमें ईमानवालों को अदेश दिया गया है कि जब जुमा की नमाज़ के लिए पुकारा जाए तो अपना काम-काज छोड़कर पूरी लगन से नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद आ जाया करो। सूरह में आगे मुसलमानों को याद दिलाया गया है कि यह अल्लाह का फ़ज़ल है कि उन्हें रास्ता दिखानेवाला एक रसूल मिला और उन्हें आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ने का मौक़ा मिला (आयत 2-4). जो यहूदी लोग ऐसे हैं जिन्हें सही ज्ञान दिए जाने के बावजूद, वे उस ज्ञान के अनुसार कार्रवाई नहीं कर रहे हैं, तो वे सचमुच निंदा के पात्र हैं (5-8). 



विषय:

   01:  अल्लाह की महानता

2 4: ऐसे लोगों में रसूल को भेजना जिनके पास कोई (आसमानी) किताब नहीं थी 

5 - 8: यहूदियों की इस मान्यता की कड़ी निंदा कि केवल वही अल्लाह के दोस्त हैं 

9-11:  जुमे की नमाज़ 

 

ल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है, जो हर चीज़ को अपने नियंत्रण में रखनेवाला [बादशाह] है, बेहद पवित्र है, ज़बरदस्त ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (1)

वही है जिसने उन्हीं लोगों में से एक रसूल को उठाया जिनके पास कोई आसमानी किताब नहीं थी, ताकि वह उन्हें उसकी आयतें पढ़कर सुनाए, (मूर्तिपूजा से हटाकर) उनके मन को पवित्र करे, और उन्हें किताब और सही समझ-बूझ [हिकमत] की शिक्षा दे---- इससे पहले तो वे सचमुच खुली गुमराही में थे -----(2)

और उन्हीं में से (भविष्य में आने वाले) कुछ दूसरे लोगों को भी (किताब और हिकमत की शिक्षा दे) जो अभी उनसे आकर नहीं मिले हैं। वह बेहद ताक़तवाला, गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है: (3)

यह अल्लाह का ऐसा फ़ज़ल (favour) है कि वह जिसे चाहे, उसे [रसूल बना] देता है; और अल्लाह बड़े फ़ज़लवाला है। (4)

जिन लोगों पर तोरात [Torah] (की शिक्षाओं) को मानने का बोझ डाला गया था, वे उन (शिक्षाओं पर अमल करने की ज़िम्मेदारी) को निभा न सके, उनकी मिसाल उस गधे की-सी है जो बहुत सी किताबें लादे हुए हो (मगर उससे अज्ञान ही रहे)। कितनी बुरी मिसाल है उन लोगों की, जो अल्लाह की आयतों [निशानियों] को मानने से इंकार करते हैं! अल्लाह ऐसे लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता, जो ग़लत काम करने पर तुले रहते हैं। (5)
 
[ऐ रसूल!] आप कह दें, "ऐ यहूदी मत के माननेवालो! अगर तुम्हारा यह दावा सच्चा है कि दूसरे सारे लोगों को छोड़कर केवल तुम ही अल्लाह के दोस्त हो, तो फिर अपनी मौत की कामना करो।" (6)

मगर उन्होंने अपने हाथों अपने लिए जो (बुरे कर्मों का ढेर) जमा कर रखा है, इस कारण वे कभी भी अपनी मौत की कामना नहीं करेंगे----- और अल्लाह ज़ालिमों को अच्छी तरह जानता है---- (7)

अत: आप कह दें, “जिस मौत से तुम भागते हो, वह तो तुमसे मिलने ज़रूर आएगी, फिर तुम्हें उसकी ओर लौटकर जाना होगा, जो हर छिपी चीज़ को भी जानता है और खुली चीज़ को भी: वह तुम्हें हर चीज़ बता देगा जो कुछ तुम किया करते थे।"  (8)

ऐ ईमानवालो, जब जुमे के दिन [Friday] नमाज़ के लिए पुकारा जाए, तो ख़रीदने-बेचने का काम बंद कर दो, और अल्लाह के ज़िक्र [नमाज़] की तरफ़ तेज़ी से चल पड़ो--- यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानो”---- (9)

फिर जब नमाज़ पूरी हो जाए, तो ज़मीन में फैल जाओ और अल्लाह की दी हुई रोज़ी [फ़ज़ल] तलाश करो। अल्लाह को बराबर याद करते रहो, ताकि तुम (दोनों जहान में) कामयाब हो सको।  (10)

(इसके बावजूद, कुछ लोग) जब ख़रीदने-बेचने के सामान या खेल-तमाशे की ख़बर पाते हैं, तो (ज़रूरत के चलते मस्जिद से भागकर) उसकी ओर टूट पड़ते हैं, और (ऐ रसूल) आपको (ख़ुत्बे में बोलते हुए) खड़ा छोड़ जाते हैं। आप कह दें, "अल्लाह के पास जो (इसका इनाम) है, वह किसी भी खेल-तमाशे या व्यापार से कहीं अच्छा है: (याद रहे!), अल्लाह सबसे बेहतर रोज़ी देनेवाला है।" (11)
 
 
 
नोट:
2. लोगों को "पवित्र करने" का मतलब दूसरों को दान या ज़कात देने पर ज़ोर देना भी हो सकता है, देखें 2:129, 151; 3:164

3: "जो अभी आकर नहीं मिले हैं" का मतलब है अरब से बाहर के लोग या बाद की पीढ़ियाँ, क्योंकि मुहम्मद (सल्ल) केवल अरब के लोगों के लिए रसूल बनाकर नहीं भेजे गए थेबल्कि आप क़यामत तक आने वाले इंसानों के लिए पैग़म्बर बनाकर भेजे गए हैं चाहे वह किसी भी नस्ल से हों। 

 

4: यहूदी चाहते थे कि आख़िरी नबी इसराईल की संतानों में से हो, अरब के बहुदेववादी कहते थे कि अल्लाह को अगर रसूल भेजना ही था, तो वह उनके कोई बड़े सरदारों में से होना चाहिए था। मगर अल्लाह कहता है कि रसूल को चुनकर भेजना, तो उसका काम है और उसकी मर्ज़ी के आगे किसी का ज़ोर नहीं चलता। 

 

5: मतलब यह है कि यहूदियों को तोरात में आख़िरी नबी पर विश्वास करने का हुक्म दिया गया था, मगर वे उसकी शिक्षाओं पर ठीक से अमल नहीं करते थे, और उन्होंने आप पर विश्वास नहीं किया। 

 

6: इसी तरह का चैलेंज सूरह बक़रा (2: 94-95) में भी आया है कि अगर उन्हें लगता है कि वे ही अल्लाह के सबसे चुने हुए बंदे हैं (2:111; 5:18), और उनका जन्नत में जाना तय है, तो अपनी मौत की कामना करेंमगर किसी यहूदी ने डर के मारे ऐसा नहीं किया, शायद यह सोचकर कि कहीं यह सचमुच सही न हो जाए। 

 

10: मतलब यह है कि जुमे की नमाज़ पूरी हो जाने के बाद अपने-अपने धंधे में लग जाना चाहिए। 

 

11: इब्ने कसीर ने लिखा है कि शुरू में मुहम्मद (सल्ल) जुमे की नमाज़ के बाद ख़ुत्बा [भाषण] दिया करते थे, मगर एक समय ऐसा हुआ कि लगातार तीन जुमे की नमाज़ के बाद जब आप ख़ुत्बा दे रहे होते थे, तभी शहर में ढोल-नगाड़े की आवाज़ के साथ कोई क़ाफ़िला आ जाता, और उस समय अकाल के कारण चूँकि मदीने में खाने-पीने के सामान की बहुत कमी हो गई थी, इसलिए काफ़ी लोग मस्जिद से क़ाफ़िले की तरफ़ दौड़ पड़ते, और मस्जिद में बहुत ही कम लोग बच जाते। इस आयत में इस तरह ख़ुत्बा छोड़कर जाने से मना किया गया है।  

 

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