सूरह 54: अल-क़मर
[चाँद, The Moon]
यह एक मक्की सूरह है
जिसमें मुख्यत: विश्वास न करने वालों की पिछली पीढ़ियों को उनके बुरे कर्मों के
नतीजे में जो सज़ाएं मिलीं, उनका वर्णन है। उन्हें मक्का के विश्वास
न करने वालों के लिए एक चेतावनी के रूप में पेश किया गया है, और एक वाक्य बार-बार पूरी सूरह के दौरान आया है: "तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे?" अंत में फ़ैसले के दिन विश्वास न करने वालों के साथ किए जाने वाले बर्ताव की तुलना उन ईमानवाले लोगों के कभी न ख़त्म होने वाले परम आनंद की स्थिति से की गई है। सूरह का नाम आयत 1 में आए फ़ैसले के दिन के हवाले पर रखा गया है, जब चाँद दो टुकड़े हो जाएगा।
विषय:
1- 8: क़यामत की घड़ी आकर रहेगी
9-17: नूह (अलै.) की क़ौम
18-22: 'आद' की क़ौम
23-32: 'समूद' की क़ौम
33-40: लूत (अलै.) की क़ौम
41-42: फिरऔन के लोग
43-55: विश्वास न करने वालों को धमकी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़यामत की घड़ी निकट आ पहुँची है; और चाँद दो टुकड़े हो गया। (1)
किन्तु उन (मक्का के काफ़िरों) का हाल यह है कि अगर वे कोई निशानी [चमत्कार] देखते हैं, तो मुँह मोड़ लेते हैं और कहते हैं, "यह तो वही पुराना जादू है जो पहले से चला आ रहा है!" (2)
उन्होंने सच्चाई [रसूल की निशानियों] को मानने से इंकार किया और अपनी इच्छाओं के पीछे चल पड़े ---- हर मामले (को लिख लिया जाता है और उस) का नतीजा तय है ------ (3)
हालाँकि उनके पास (पिछली क़ौमों की) ऐसी चेतावनी भरी घटनाओं की ख़बरें पहुँच चुकी थीं, जिनसे (सबक़ लेते हुए बुराइयों से) उन्हें बचना चाहिए था----- (4)
दिल में उतर जानेवाली गहरी समझ-बूझ की बातें ----- मगर इन चेतावनियों का उनपर कुछ असर नहीं होता: (5)
अतः [ए रसूल!] आप उनसे मुँह फेर लें (और उनकी परवाह न करें)। जिस दिन पुकारनेवाला [फरिश्ता] एक बेहद भयानक घटना [क़यामत] की ओर बुलाएगा, (6)
अपनी आँखें झुकाए हुए, वे अपनी क़ब्रों से इस तरह निकल पड़ेंगे, मानो वे चारों ओर फैली हुई टिड्डियाँ हों, (7)
वे दौड़े जा रहे होंगे उसी पुकारनेवाले की ओर। (क़यामत पर) विश्वास न करनेवाले पुकार उठेंगे, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है!" (8)
इनसे पहले नूह [Noah] की क़ौम ने भी सच को मानने से इंकार किया था: उन्होंने हमारे बन्दे को झूठा ठहराया और कहा, "यह तो दीवाना है!" और उन्हें बुरी तरह झिड़का गया, (9)
अन्त में उसने अपने रब को पुकारा कि "मैं बेबस हो चुका हूँ, अब आप ही बदला लीजिए!" (10)
तब हमने मूसलाधार बरसते हुए पानी के साथ आसमान के दरवाज़े खोल दिए, (11)
और ज़मीन के भीतर से पानी के सोते [gushing springs] बहा दिए: इस तरह (आसमान और ज़मीन का) सारा पानी उस काम के लिए एक साथ मिल गया जो (उनकी नियति में) तय हो चुका था। (12)
और हमने उन्हें [नूह व उनके साथियों को] एक तख़्तों और कीलोंवाली (नौका) पर सवार कर दिया, (13)
जो हमारी देख-रेख में (सुरक्षित) चल रही थी, यह भरपाई थी उस [नूह] के लिए जिसको मानने से इंकार कर दिया गया था। (14)
हमने इस [घटना या नौका] को एक निशानी के रूप में (यादगार बनाकर) छोड़ दिया: तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (15)
तो अब सोचो कि कैसी रही मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ! (16)
हमने क़ुरआन को (याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है: तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (17)
आद की क़ौम के लोगों ने भी (हमारे पैग़म्बर हूद के संदेश की) सच्चाई को ठुकरा दिया, तो फिर कैसी रही मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ! (18)
हमने उन लोगों पर, उस तबाही वाले मनहूस दिन, भयानक आवाज़वाली एक आँधी भेज दी थी; (19)
जो लोगों को (इस तरह) उखाड़ फेंकती थी मानो वे उखड़े हुए खजूर के तने हों। (20)
तो कैसी रही मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ! (21)
हमने क़ुरआन को (याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है: तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (22)
समूद की क़ौम ने भी (हमारे पैग़म्बर सालेह द्वारा दी गयी) चेतावनियों को ठुकरा दिया: (23)
वे कहने लगे, "क्या? (हमारे जैसा) एक आदमी? क्या हम उस अकेले आदमी के पीछे चलेंगे, जो हम में से ही है? यह तो भारी गुमराही होगी; एकदम पागलपन होगा!” (24)
"क्या हमारे बीच बस वही एक आदमी बचा था जिसे (अल्लाह की तरफ़ से) संदेश देकर भेजा गया है? नहीं, वह तो बड़ा झूठा और घमंडी है!" (25)
(हम ने सालिह से कहा), "कल ही उन्हें पता चल जाएगा कि कौन बड़ा झूठा, और घमंडी है, (26)
क्योंकि हम उनकी परीक्षा लेने के लिए एक ऊँटनी को उनके पास भेज रहे हैं: अतः आप उन्हें देखते जाएं और धीरज से काम लें। (27)
उन्हें बता दें कि उनके (और ऊँटनी के) बीच पानी का बँटवारा होगा: हर एक हिस्सेदार को उसकी बारी आने पर ही पानी मिलेगा।" (28)
मगर (अन्ततः) उन्होंने (क़दार नामक) अपने साथी को बुलाया, उसने हाथ (में तलवार को) उठाया और ऊँटनी के (अगले) पाँव की कूचें [Hamstrung] काटकर उसे मार डाला।" (29)
(तो सोचो!) कैसी थी मेरी (भयानक) सज़ा और कितनी (सच थीं) मेरी चेतावनियाँ! (30)
हमने उनपर केवल एक ही इतने ज़ोर का धमाका किया, और वे ऐसे हो गए जैसे किसी बाड़वाले [fence-maker] की सूखी लकड़ियाँ हों। (31)
हमने क़ुरआन को (याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है: तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (32)
लूत [Lot] की क़ौम के लोगों ने भी चेतावनियों को मानने से इंकार कर दिया था। (33)
सो हमने उन पर पत्थर बरसानेवाली तेज़ हवा छोड़ दी, (मगर) लूत के घरवालों को छोड़कर। उन्हें हमने भोर होने से पहले बचा लिया था, (34)
यह हमारी तरफ से ख़ास करम था: हम शुक्र अदा करनेवालों को ऐसा ही इनाम दिया करते हैं। (35)
(लूत) ने लोगों को हमारी पकड़ से सावधान कर दिया था, मगर उन लोगों ने चेतावनियों को मानने से सिरे से इंकार कर दिया---- (36)
यहाँ तक कि उन लोगों ने लूत के मेहमानों को भी उनके हवाले कर देने की माँग की ---- जिस पर हमने उनकी आँखों को अंधा कर दिया कि, "लो, अब चखो मज़ा मेरी (भयानक) सज़ा का और मेरी चेतावनियों (के पूरा होने) का!"--- (37)
और सुबह सवेरे ही एक ऐसी भयानक यातना ने उन्हें धर-दबोचा जो पहले से तय थी ---- (38)
"लो, चखो मज़ा मेरी (भयानक) सज़ा का और मेरी चेतावनियों (के पूरा होने) का!" (39)
हमने क़ुरआन को (याद करने और) सबक़ [lesson] सीखने के लिए आसान बना दिया है: तो क्या कोई है जो (इस पर ध्यान दे और) नसीहत हासिल करे? (40)
फ़िरऔन [Pharaoh] के लोगों के पास भी (मूसा द्वारा) चेतावनियाँ आयी थीं; (41)
उन लोगों ने हमारी सारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया, तो (इसके नतीजे में) हमने उन्हें अपनी पूरी ताक़त और प्रभुत्व के साथ दबोच लिया। (42)
"क्या तुम्हारे [मक्का के] विश्वास न करनेवाले, इन (पहले के) लोगों से किसी भी तरह अच्छे हैं? या (ख़ुदा की) किताबों में तुम्हारे लिए कोई छुटकारा लिखा हुआ है?" (43)
या शायद वे कहते हैं, "हम एक मज़बूत दल हैं और हम (रसूल के साथ मुक़ाबले में) जीत जाएंगे?" (44)
उनके सारे दल-बल को बुरी तरह कुचल दिया जाएगा और वे पीठ दिखाकर भाग खड़े होंगे। (45)
मगर उनसे असल वादा उस (क़यामत की) नियत घड़ी का है ---- और वह घड़ी कहीं अधिक सख़्त और बेहद कड़वी होगी: (46)
सचमुच, शैतानी करनेवाले लोग भारी गुमराही और पागलपन में पड़े हुए हैं ----- (47)
जिस दिन उनको मुँह के बल आग में घसीटा जाएगा (उस दिन उन्हें होश आ जायेगा, उनसे कहा जाएगा), "(जहन्नम की) आग को छूकर महसूस करो!" (48)
हमने सारी चीज़ों को उसके सही अनुपात में पैदा किया है; (49)
जब हम किसी चीज़ के होने का आदेश देते हैं, तो वह बस पलक झपकते ही (पूरा) हो जाता है; (50)
हम तुम्हारे जैसे बहुत लोगों को (पहले) तबाह-बर्बाद कर चुके हैं। तो फिर क्या कोई है जो इस पर ध्यान दे (और नसीहत हासिल करे)? (51)
जो कुछ भी वे करते हैं, सब कुछ (उनके कर्मों की बही में) लिख लिया जाता है: (52)
छोटा हो या बड़ा, हर एक काम का हिसाब लिख लिया जाता है। (53)
हाँ, सच्चे व बुराइयों से बचनेवाले लोग (सुकून से) बाग़ों और नहरों के बीच रहेंगे, (54)
सच्चाई की जगह में निश्चिंत होकर, उस बादशाह [अल्लाह] के सामने (रहेंगे), जिसके क़ब्ज़े में सब तरह की शक्तियाँ हैं। (55)
नोट:
1: चांद का फटकर दो टुकड़े हो जाना क़यामत की निशानियों में से है। एक दूसरा मतलब मुहम्मद (सल्ल.) से जुड़ी हुई एक मशहूर घटना से है। मक्का शहर से थोड़ी दूर मिना के मैदान में एक शाम मुहम्मद साहब मुसलमानों के एक गिरोह और मक्का के कुछ लोगों को जो सच्चाई पर विश्वास नहीं करते थे, सम्बोधित कर रहे थे, वे कई दिन से मुहम्मद साहब से बहस कर रहे थे और उन्हे6 रसूल मानने को तैयार न थे, फिर वे कहने लगे कि हम उस वक्त तक आपको अल्लाह का रसूल नहीं मानेंगे जब तक आप कोई चमत्कार (मोज्ज़ा) न दिखा दें। मुहम्मद साहब ने अल्लाह के हुक्म से चांद को अंगुली के इशारे से दो टुकड़े कर दिया, चांद का एक हिस्सा सामने के हिरा पहाड़ के पूर्वी हिस्से में चला गया और दूसरा हिस्सा पहाड़ के पश्चिमी भाग में। मुहम्मद साहब ने कहा कि लोगो तुम गवाह रह्रना! वहाँ मौजूद सारे लोगों ने जब इस नज़ारे को देख लिया तो यह दोनों टुकड़े आपस में मिल गए। इस घटना को अपनी आँखों से देखने के बावजूद उन लोगों ने यही कहा कि यह नज़र का धोखा था, जो जादू से पैदा किया गया था और उन लोगों ने विश्वास नहीं किया। कुछ बाद में जब व्यापारिक कारवाँ के लोग आए तो उन्होंने भी चाँद के टुकड़े होते हुए देखने की पुष्टि की।
12: इस घटना का विस्तार से उल्लेख सूरह हूद (11: 40) और सूरह मोमिनीन (23: 27) में आया है।
19: विस्तार से वर्णन सूरह अ'राफ़ (7: 65) में देखें।
28: यह ऊँटनी उन्हीं लोगों की माँग पर पैदा की गयी थी, और उनसे कहा गया था कि बस्ती के कुंएं से एक दिन वह पानी पियेगी, और एक दिन बस्ती वाले। देखें सूरह अ'राफ़ (7: 73).
37: इसका विवरण सूरह हूद (11:78) में आया है कि हज़रत लूत (अलै.) के पास फ़रिश्ते खूबसूरत नौजवानों की शक्ल में आए थे ताकि उनकी क़ौम के लोगों को दंड दे सकें। वहाँ के लोग समलैंगिकता की बीमारी से ग्रसित थे, वे ख़ूबसूरत जवानों को देखकर लूत (अलै.) से माँग करने लगे कि उन्हें उनके हवाले कर दिया जाए, मगर अल्लाह ने उन बदमाश लोगों को अंधा कर दिया ताकि वे उन फ़रिश्तों तक न पहुँच पाएं।
45: यह भविष्यवाणी तब की गई थी जब मक्का के मुसलमान वहाँ के बहुदेववादियों की तुलना में बहुत कमज़ोर थे और ख़ुद अपना बचाव भी नहीं कर पाते थे। लेकिन कुछ ही साल के बाद बद्र के मैदान में दोनों दलों के बीच लड़ाई हुई जिनमें मक्का के विश्वास न करनेवालों की बड़ी हार हुई और वे पीठ दिखाकर भागने पर मजबूर हुए।
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