Wednesday, March 30, 2022

Surah/सूरह 64: At-Taghabun/अत-तग़ाबुन [एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करना/ Mutual Neglect]

 सूरह 64: अत-तग़ाबुन 

[एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करना/ Mutual Neglect]

यह एक मदनी सूरह है जिसका नाम आयत 9 में आए फ़ैसले के दिन यानी "जीत और हार के दिन" [या एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करने के दिन] के ज़िक्र पर रखा गया है। यह सूरह अल्लाह की ताक़त, उसकी गहरी समझ-बूझ और उसके बेपनाह ज्ञान के वर्णन से शुरू होती है (आयत 1-4). विश्वास न करने वालों को याद दिलाया गया है कि कैसे उनसे पहले के विश्वास न करने वालों का अंत हुआ (आयत 5-6), और दोबारा ज़िंदा उठाए जाने से इंकार करने की सोच को ज़ोरदार ढंग से ग़लत साबित किया गया है (आयत 7). ईमानवालों को होशियार रहने पर ज़ोर दिया गया है, मगर उन्हें अपने उन दुश्मनों को माफ कर देने को कहा गया है क्योंकि हो सकता है कि वे उसके ही ख़ानदान से हों (आयत 14-15), और मुसलमानों को चेतावनी दी गई है कि वे अपने क़दम धीरज से जमाए रखें, और अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करते रहें। 

विषय:
01-04: अल्लाह की महानताउसकी ताक़त और उसका ज्ञान 

05-06:  चेतावनी पिछली पीढ़ियों को मिलने वाली सज़ा से 

07-10: (सच्चाई पर) विश्वास करने वाले और विश्वास न करने वालों का अंजाम 

11-18: ईमानवालों की आज़माइश और उन्हें ग़लत चीज़ करने पर उकसाना 

 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हर चीज़ जो आसमानों और ज़मीन में है, अल्लाह की बड़ाई बयान करती है; सारा नियंत्रण [बादशाही], और सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं; उसके पास हर चीज़ की ताक़त है।  (1)

वही है जिसने तुम्हें पैदा किया, फिर भी तुममें से कुछ (लोग) विश्वास नहीं करते [काफ़िर] हैं, और कुछ (लोग) विश्वास करनेवाले [मोमिन] हैं: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह हर चीज़ को देख रहा होता है। (2)

उसने आसमानों और ज़मीन को सही मक़सद के साथ पैदा किया; उसने तुम्हारा रूप बनाया, और (देखो) कितना अच्छा रूप बनाया: तुम सबको (अंत में) उसी के पास लौटकर जाना होगा।  (3)

जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, वह उसे जानता है; वह उसे भी जानता है जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ तुम सामने बता देते हो; अल्लाह तो हर दिल के अंदर छिपे हुए राज़ तक को अच्छी तरह जानता है! (4)


[विश्वास न करनेवाले, काफ़िरो!] क्या तुमने उन लोगों के बारे में नहीं सुना, जिन्होंने तुम से पहले (सच्चाई को मानने से) इंकार किया था? उन्होंने (दुनिया में) अपने काम के बुरे नतीजे का मज़ा चखा, और (आख़िरत में) एक दर्दनाक यातना उनके इंतज़ार में है। (5)

वह इसलिए हुआ कि उनके रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाण लेकर आते रहे, मगर इसके बावजूद, वे कहते थे, "क्या (मर-खप जानेवाले मामूली) आदमी हमें मार्ग दिखाएँगे?", उन्होंने (हमारे संदेश को) मानने से इंकार किया, और मुँह फेर लिया। मगर अल्लाह को तो उनकी कोई ज़रूरत नहीं थी: वह तो हर तरह से आत्मनिर्भर है, सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (6)


विश्वास न करनेवाले यह दावा करते थे कि मरने के बाद वे दोबारा नहीं उठाए जाएँगे। (ऐ रसूल) आप कह दें, "हां, क़सम है मेरे रब की! तुम ज़रूर उठाए जाओगे, और तब तुम्हें वे सारी चीज़ें बता दी जाएंगी, जो कुछ तुमने किया होगा: अल्लाह के लिए यह बहुत आसान काम है।" (7)


अतः ईमान रखो अल्लाह पर, उसके रसूल पर, और (रास्ता दिखानेवाली) उस रौशनी [क़ुरआन] पर, जिसे हमने भेजा है: तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (8)

(एक दिन) जब वह तुम (सब) को जमा करेगा, उस ‘इकट्ठा किए जानेवाले दिन' [क़यामत] पर, जो "एक-दूसरे के मुक़ाबले में हार-जीत का दिन (या एक दूसरे को नज़रअंदाज़ करने का दिन)" [तग़ाबुन] होगा, तो जिसने अल्लाह पर ईमान रखा होगा, और अच्छे कर्म किए होंगे, उनके गुनाहों को वह मिटा देगा: वह उन्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, वहाँ वे हमेशा के लिए रहेंगे---- यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (9)

मगर वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, और हमारी निशानियों को ठुकरा दिया, वे (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं, उसी में वे (हमेशा) रहेंगे---- वह कितना बुरा ठिकाना है!  (10)


मुसीबतें बिना अल्लाह की अनुमति के नहीं आ सकती हैं ---- जो कोई अल्लाह पर ईमान रखता है, तो अल्लाह उसके दिल को सही रास्ता दिखा देगा: अल्लाह हर चीज़ जानता है----(11)

अतः अल्लाह और रसूल की आज्ञा का पालन करो। अगर तुम उससे मुँह मोड़ते हो, तो याद रखो, हमारे रसूल की ज़िम्मेदारी बस हमारे संदेशों को साफ़-साफ़ पहुँचा देने की है। (12)

अल्लाह! कि उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं है, अतः ईमानवालों को अल्लाह पर ही भरोसा करना चाहिए। (13)

ऐ ईमानवालो, यहाँ तक कि तुम्हारे पति/ पत्नियों और तुम्हारे बच्चों में से कुछ ऐसे हैं जो तुम्हारे दुश्मन हैं ----- उनसे होशियार रहो----- लेकिन अगर तुम उनकी ग़लतियों को अनदेखा करो, उन पर ग़ुस्सा न करो, और उन्हें माफ़ कर दो, तो फिर अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (14)


तुम्हारी धन-दौलत और तुम्हारे बाल-बच्चे, तुम्हारे लिए केवल एक आज़माइश हैं। और वह अल्लाह है जिसके पास बड़ा इनाम है: (15)
 
जहाँ तक तुम से हो सके, अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो; सुनो और आज्ञा का पालन करो; और (ज़रूरतमंदों पर) ख़र्च करो---- यह तुम्हारे ख़ुद के लिए अच्छा होगा। जो अपने मन के लोभ से बचा रहा, वही कामयाब लोगों में से होगा:  (16)

अगर तुम साफ़ दिल से अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दो, तो वह उसे तुम्हारे लिए कई गुना बढ़ा देगा और तुम्हें माफ़ कर देगा। अल्लाह हमेशा अच्छाई की क़द्र करनेवाला, और सहनशील है, (17)

अल्लाह उसे भी जानता है, जो चीज़ दिखायी नहीं देती, और उसे भी जो चीज़ दिखायी देती है; वह बहुत ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (18)




नोट:

9: क़यामत के दिन को "तग़ाबुन" का दिन कहा गया है। तग़ाबुन के कई मतलब हैं, एक-दूसरे को नुक़सान में डाल देना, एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाना, किसी चीज़ के न मिलने का दुख होना, एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करना आदि। चूंकि क़यामत के दिन लोगों को अपनी-अपनी पड़ी होगी, इसलिए यह एक दूसरे को नज़रअंदाज़ करने का दिन होगा, फिर यह कि जहन्नम में जाने वाले लोग जन्नतियों को देखकर अफ़सोस करेंगे कि काश उन्होंने भी अच्छे काम किए होते, तो यह एक-तरह से हार-जीत का भी दिन होगा। 


11: ईमानवालों को इस बात पर यक़ीन होना चाहिए कि कोई भी मुसीबत बिना अल्लाह के हुक्म के नहीं आती, इसलिए हर मुसीबत को धीरज [सब्र] के साथ बर्दाश्त करना चाहिए। इसे भी देखें 57:22


14: जो बीवी-बच्चे आदमी को अल्लाह के हुक्म के ख़िलाफ़ काम करने पर उकसाएं, वे आदमी के एक तरह से दुश्मन हैं, हाँ, अगर वे अपने ग़लत काम से तौबा करते हुए माफ़ी माँग लें,  तो उन्हें माफ़ कर देना चाहिए।


15: धन-दौलत और बाल-बच्चों के मोह में अल्लाह के हुक्म को भूल नहीं जाना चाहिए।


17: अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ देने का मतलब यह है कि नेक कामों में पूरे दिल से ख़र्च करना, बिना नाम कमाने की चाहत या दिखावा किए हुए। 


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