Wednesday, March 30, 2022

Surah/सूरह 69: Al-Haaqqa/अल-हाक़्क़ा [वह सच्चाई जिससे इंकार न किया जा सके/ ज़रूर आनेवाली घड़ी, The Sure Reality/ The inevitable Hour]

 सूरह 69: अल-हाक़्क़ा


 [वह सच्चाई जिससे इंकार न किया जा सके/ ज़रूर आनेवाली घड़ी, The Sure Reality/ The inevitable Hour]

यह एक मक्की सूरह है जिसमें पिछली पीढ़ियों के लोगों (आद, समूद, फिरऔन, लूत आदि) को इस दुनिया में मिलने वाली सज़ाओं का भी वर्णन है (आयत 4-12) और आने वाली दुनिया की सज़ाओं का भी उल्लेख है (13-18). ईमानवालों को जन्नत में मिलने वाले परम आनंद की तुलना जहन्नम की भयानक यातनाओं से की गई है (आयत 19-37). आयत 38 से 52 तक अल्लाह ने क़ुरआन और पैग़म्बर साहब की सच्चाई की पुष्टि करते हुए उन लोगों की दलीलों को रद्द किया है।

विषय:

01-12: विश्वास करने से इंकार करने वाले लोगों की बर्बादी

13-18: आख़िरी दिन [क़यामत] की दहशत

19-37: जन्नत और जहन्नम का दृश्य 

38-52: क़ुरआन की सच्चाई


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

वह घड़ी [Inevitable Hour] जो ज़रूर आकर रहेगी (जिसकी सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता)! (1)

यह कौन सी घड़ी है जो ज़रूर आकर रहेगी? (2)

और [ऐ रसूल], आप क्या जानें कि वह ज़रूर आने वाली घड़ी क्या है? (3)

समूद [Thamud] और आद ['Ad] की क़ौम के लोगों ने इस बात को मानने से इंकार किया था कि (एक दिन तोड़-फोड़कर रख देनेवाली) धमाकेदार टक्कर की घटना [क़यामत] होगी: (4)

समूद की क़ौम के लोग तो एक कान फाड़ देने वाले धमाके से मार डाले गए (जिससे उनके कलेजे फट गये थे); (5)

आद की क़ौम के लोग एक ऐसी तेज़ और बेक़ाबू आंधी से मार दिए गए  (6)

जिसे अल्लाह ने उन पर सात रातों और आठ दिनों तक लगातार चलाए रखा, सो तुम (अगर वहाँ होते तो) उन लोगों को (उस अवधि) में (इस तरह) मरे पड़े देखते जैसे वे खजूर के गिरे हुए पेड़ों की खोखली जड़ें हों। (7)

क्या तुम इनमें से किसी को भी अब बाक़ी बचा हुआ देखते हो? (8)

फ़िरऔन ने भी, और जो उसके पहले थे, और (लूत के लोगों की) खंडहर हुई बस्तियों (में रहनेवाले): इन लोगों ने बड़े भारी गुनाह किए थे (9)

और अपने रब के रसूल का कहना नहीं माना, सो अल्लाह ने उन्हें बहुत सख़्त पकड़ में ले लिया। (10)

मगर जब (नूह के सामने) बहुत ज़ोर का सैलाब [flood] उठा, तो हमने तुम्हें एक तैरती हुई नाव में सवार करके बचा लिया, (11)

और इस (घटना) को तुम्हारे लिए (याद रखनेवाली) नसीहत [Reminder] बना दिया: ध्यान से सुनने वाले कान उसे (सुनकर) याद रखें। (12)


जब नरसिंघे [trumpet] में एक बार फूँक मारकर बजा दिया जाएगा, (13)

जब ज़मीन और उसके पहाड़ों को ऊँचा उठाया जाएगा और फिर एक ही झटके में चूर-चूर कर दिया जाएगा, (14)

सो उस दिन (क़यामत की) वह महान घटना सामने आ खड़ी होगी। (15)

उस दिन आसमान (सारे पिंडों के साथ) फट जाएगा, और वह बहुत कमज़ोर पड़ जाएगा।  (16)

और फरिश्ते उसके सभी किनारों पर खड़े होंगे और, उनमें से आठ फ़रिश्ते आपके रब के सिंहासन को उस दिन, अपने ऊपर उठाए हुए होंगे। (17)

उस दिन तुम (अपने कर्मों के) फ़ैसले के लिए अल्लाह के सामने पेश किए जाओगे, और तुम्हारी कोई भी राज़ की बात, छुपी नहीं रहेगी। (18)

फिर जिस किसी को उसके कर्मों का लेखा-जोखा उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा तो वह (खुशी से) कहेगा, “लोगो, यह मेरे कर्मों का हिसाब है, आओ इसे पढ़ लो।  (19)

मैं तो पहले से जानता था कि मुझे (अपने कर्मों के) हिसाब का सामना करना होगा,” (20)

और इस तरह वह सुखी व मनपसंद ज़िंदगी गुज़ारेगा (21)

(जन्नत के) उस ऊँचे बाग़ में, (22)

जिसके फलों के गुच्छे (लदे होने के कारण) झुके पड़े होंगे। (23)

(उनसे कहा जाएगा): "खूब मज़े से खाओ और पियो उन (अच्छे कर्मों) के बदले, जो तुमने गुज़रे हुए (जीवन के) दिनों में किए थे।" (24)

रहा वह आदमी जिसके कर्मों का हिसाब उसके बाएं हाथ में दिया जाएगा, तो वह कहेगा, “काश! मुझे मेरे कर्मों का हिसाब दिया ही न जाता (25)

और मैं अपने हिसाब-किताब के बारे में कुछ नहीं जानता। (26)

काश! कि मेरी मौत पर ही मेरा काम तमाम हो चुका होता! (27)

(आज) मेरी दौलत मेरे किसी काम की न रही,  (28)

और मेरी शक्ति (और सत्ता भी) खो चुकी है।” (29)

(आदेश होगा), “पकड़ो उसे, और उसके गले में तौक़ [Collar] पहना दो,  (30)

और उसे ले जाकर जहन्नम (की भड़कती हुई आग) में झोंक दो,  (31)

और उसे ऐसी ज़ंजीर में जकड़ दो जिसकी लम्बाई सत्तर हाथ हो : (32)

वह बड़ी महिमावाले अल्लाह पर ईमान नहीं रखता था, (33)

वह कभी भी ग़रीब मुहताज को खाना खिलाने पर नहीं उभारता था, (34)

सो आज के दिन यहाँ उसका कोई भी असली दोस्त व मददगार नहीं है, (35)

और खाने के लिए उसके पास सिवाय पीप के और कुछ नहीं  (36)

जिसे केवल गुनाहगार खाते हैं,” (37)


सो मैं क़सम खाता हूँ उन चीज़ों की, जो तुम देख सकते हो, (38)

और उन चीजों की (भी) जिन्हें तुम नहीं देख सकते:  (39)

बेशक यह (क़ुरआन) एक बहुत इज़्ज़तवाले व महान रसूल पर (अल्लाह द्वारा उतारी गयी) वाणी है,  (40)

ये किसी कवि के शब्द नहीं हैं ---- (मगर अफ़सोस!) तुम कितना कम विश्वास करते हो! ---- (41)

न ही किसी भविष्य-वक्ता की कही हुई बातें हैं ---- (मगर) तुम सोच-विचार कितना कम करते हो!  (42)

यह (क़ुरआन) सारे जहाँनों के रब की तरफ से भेजा गया संदेश है:  (43)

अगर (मान लो कि) यह पैग़म्बर [Prophet] हमारी वाणी में कोई (एक) बात भी झूठी गढ़कर कह देते,  (44)

तो (याद रखो!) हम ज़रूर उनका दाहिना हाथ पकड़ लेते,  (45)

और उनकी मुख्य रग [life artery] काट डालते,  (46)

फिर तुम में से कोई भी उनका बचाव नहीं कर पाता।  (47)

यह (क़ुरआन) अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचने वालों के लिए एक नसीहत [Reminder] है।  (48)

हम जानते हैं कि तुम में से कुछ लोग इस (सच्चाई) को झुठ मानते हैं ---- (49)

विश्वास न करनेवालों के लिए यह (क़ुरआन) एक दुखद पछतावे (का कारण) है ---- (50)

मगर असल में यह एकदम सच है।  (51)

सो (ए रसूल!) आप महानता वाले रब के नाम का गुणगान करते रहें। (52)




नोट:

5: सूरह अ'राफ़ (7: 73-79) में समूद की क़ौम के बारे में वर्णन आया है। हज़रत सालेह (अलै.) को झुठलाने के कारण उन पर ज़बरदस्त यातना आई थी। 

 

7: आद की कौम के बारे में भी सूरह अ'राफ़ (7: 65-72) में वर्णन हुआ है। चूँकि ये लोग बड़े डील-डौल वाले थे, इसलिए जमीन पर गिरी हुई उनकी लाशों को खजूर के तनों से उपमा दी गई है।


9: खंडहर हुई बस्तियों से मतलब शायद सदोम और गोमोरह [Sodom & Gomorrah] नाम की बस्तियाँ हैं जो लूत (अलै) के ज़माने में तबाह की गईं।

 

11: हज़रत नूह (अलै.) पर ईमान रखने वालों को भयानक बाढ़ से बचाने के लिए अल्लाह ने उन्हें नौका में सवार कर दिया था, जिसका वर्णन सुरह हूद (11: 36-48) में आया है।


13: क़यामत के दिन की घोषणा एक बार नरसिंघे [सूर] में फूँक मारकर की जाएगी (देखें 6: 73; 18: 99; 20: 102), फिर दूसरी बार सूर फूँका जाएगा (देखें 39:68)


38-43: क़यामत और उस दिन होने वाले फ़ैसले के संदर्भ में यह सूरह है (13-27). इसके बाद जो क़समें खायी गई हैं , वह असल में इस बात की पुष्टि के लिए हैं कि क़यामत और होने वाले फ़ैसले की बातें कोई काल्पनिक बातें नहीं हैं, बल्कि यह अल्लाह की 'वही' है। यहाँ जो क़सम है, "जो कुछ तुम देख सकते हो और जो कुछ तुम नहीं देख सकते" इसके अंदर हर तरह की चीज़ें समाहित हो गयी हैं, यानी अल्लाह, यह दुनिया, आने वाली दुनिया, शरीर और आत्माएं, आदमी और जिन्न, छिपे और ज़ाहिर आशीर्वाद [blessings] इत्यादि। इन क़समों का असल मक़सद आदमी को यह याद दिलाना है कि वह हर चीज़ को नहीं देख सकता! वह उस फ़रिश्ते (जिबरील) को नहीं देख सकता जो अल्लाह की तरफ़ से क़ुरआन [वही/revelation] लेकर मुहम्मद (सल्ल) पर उतरते हैं (जिसे बहुत ही "सम्मानित संदेशवाहक' कहा गया है, देखें 81: 19-20)..

अल्लाह द्वारा विभिन्न चीज़ों की क़सम खाने का ज़िक्र कई जगह आया है (देखें 56:75; 75: 1, 2; 81: 15-18; 84: 16-18; 90: 1, 3)

 

42: भविष्य-वक्ता [काहिन] उसे कहते थे जो भविष्य में घटने वाले धार्मिक मामले के सवालों का जवाब जादू-मंतर और दिव्य शक्ति के माध्यम से दिया करता था, और उसके लिए पैसे भी वसूल करता था।  

 

50: आख़िरत [परलोक] में जब यातना उनके सामने आएगी, तो उन्हें पछतावा होगा कि काश हमने क़ुरआन पर विश्वास किया होता।

No comments:

Post a Comment

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...