सूरह 52: अत-तूर
[तूर पहाड़ / Mountain Tur/ Sinai]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें मक्का के विश्वास न करने वालों द्वारा
पैग़म्बर साहब के सामने दी जाने वाली कई सारी दलीलों का जवाब दिया गया है (29-49). विश्वास
करने वालों को जन्नत में जो परम आनंद का मज़ा मिलेगा, उसकी
तुलना जहन्नम में मिलने वाली भयानक यातना से की गई है, और
पैग़म्बर साहब से कहा गया है कि वह शांति से सही समय का इंतज़ार करें, और अल्लाह के संदेश को लोगों तक पहुँचाते रहें, और
अल्लाह के फ़ैसले का पूरे यक़ीन से इंतज़ार करें। अल्लाह ने इस सूरह में कई चीज़ों की
क़समें खायी हैं, जिनमें तूर पहाड़ की क़सम भी शामिल है,
जिस पर इस सूरह का नाम पड़ा है, कि फ़ैसले के
दिन [क़यामत] का आना बिल्कुल तय है।
विषय:
01-16: कर्मों का फ़ैसला होना ही है
17-28: जन्नत की नेमतें और ख़ुशियाँ
29-47: विश्वास न करने वालों की कड़ी निंदा
48-49: पैग़म्बर को दी गई अंतिम बात
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है तूर पहाड़ [Mountain Sinai] की, (1)
और क़सम है उस लिखी हुई किताब की (2)
(जो) खुले हुए झिल्ली के पन्नों [Unrolled parchment] में (लिखी हुई है), (3)
और उस घर [काबा] की क़सम जहाँ (लोगों का) बराबर जाना-आना लगा रहता है; (4)
और ऊँची की हुई छत [आसमान] की; (5)
और भरे हुए समुंदर की क़सम, (6)
[ऐ रसूल!] आपके रब की यातना अवश्य आ कर रहेगी--- (7)
कोई नहीं है जो इसे टाल सके--- (8)
जिस दिन आसमान थरथराहट के साथ बुरी तरह डगमगा उठेगा (9)
और पहाड़ (अपनी जगह छोड़कर बिखरने लगेंगे और बादलों की तरह) उड़ते फिरेंगे। (10)
तो उस दिन तबाही होगी उनकी जो सच्चाई (को मानने) से इंकार करते हैं, (11)
जो बेकार की बातों में डूबे हुए खेल तमाशे में लगे रहते हैं: (12)
उस दिन वे धक्के दे-देकर जहन्नम की आग में ढकेले जाएँगे। (13)
(कहा जाएगा), "यही है वह आग जिसे तुम झुठलाया करते थे, (14)
अब (बताओ) यह कोई जादू है? क्या तुम्हें अब भी दिखायी नहीं देता? (15)
जाओ, आग के अंदर (झुलसो!) --- तुम इसे सहन करने में धीरज से काम लो या न लो, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता --- तुम्हें तो उन्हीं कामों का बदला दिया जाएगा, जो तुम करते रहे थे।" (16)
अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचनेवाले बाग़ों [जन्नत] में और परम आनंद [Bliss] में होंगे, (17)
उनके रब के दिए हुए तोहफ़े का मज़ा ले रहे होंगे: उस [रब] ने उन्हें भड़कती हुई आग की यातना से बचा लिया, (18)
(उनसे कहा जाएगा), "ख़ूब मज़े से खाओ-पियो और मौज करो, ये इनाम है उन अच्छे कर्मों का जो तुम करते रहे थे।" (19)
वे एक क़तार में लगे हुए तख़्तो पर तकिया लगाए हुए बैठे होंगे; हम बड़ी-बड़ी आँखोंवाली ख़ूबसूरत कुँआरी औरतों [हूरों] से उनका विवाह कर देंगे; (20)
हम ईमान रखनेवाले लोगों के साथ उनकी सन्तान को भी (जन्नत में) साथ मिला देंगे, अगर संतान ने भी ईमान में अपने माँ-बाप का रास्ता अपनाया होगा (चाहे उनकी संतान के कर्म अपने माँ-बाप के कर्मों के स्तर के न भी हों) ---- हम उनके कर्मों के इनाम में से कुछ भी कमी नहीं करते: हर आदमी की जान अपने (अच्छे/ बुरे) कर्मों के बदले में गिरवी रखी हुई है ---- (21)
हम उन्हें कोई भी फल (मेवे) या गोश्त, जिसकी भी वे इच्छा करेंगे, देते रहेंगे। (22)
वे वहाँ आपस में (शराब ए तहूर के) प्याले हाथों-हाथ ले रहे होंगे, जिसके पीने से न कोई बेहूदा बातें होंगी और न कोई गुनाह। (23)
और उनकी सेवा में तन-मन से ऐसे नौजवान लगे हुए होंगे जो देखने में ऐसी मोतियों की तरह लगेंगे जिन्हें छुपाकर रखा गया हो, (24)
और वे एक दूसरे से मिलकर हाल पूछेंगे, (25)
कहेंगे, "जब हम पहले अपने घरवालों के साथ (दुनिया में) रहते थे, तो (अल्लाह की यातना से) डरे-सहमे रहा करते थे --- (26)
अल्लाह ने हम पर बड़ा एहसान किया और हमें (जहन्नम की) झुलसा देने वाली हवा की यातना से बचा लिया --- (27)
(इससे पहले भी) हम उससे दुआएं माँगा करते थे: वह बहुत अच्छा, बेहद दयावान है।" (28)
अतः (ऐ रसूल) आप (लोगों को) नसीहत देते रहें।
अपने रब के फ़ज़ल [Grace] से (ऐ रसूल), न आप काहिन [ढोंगी भविष्यवक्ता/Oracle] हैं और न दीवाने। (29)
अगर वे लोग कहते हैं, "वह [मुहम्मद] तो केवल एक कवि हैं: हम उनके अंत होने का इंतज़ार करेंगे," (30)
आप कह दें, "अगर तुम इंतज़ार करना चाहते हो तो करो; मैं भी इंतज़ार कर रहा हूँ"----- (31)
क्या उनकी बुद्धि [अक़्ल] उन्हें सचमुच यही सब करने को कहती है, या वे हैं ही बाग़ी [insolent] लोग? (32)
क्या वे कहते हैं, "उस [रसूल] ने इस (क़ुरआन) को स्वयं ही गढ़ लिया है" ---- वे सचमुच (ज़िद के कारण) विश्वास नहीं करते ----- (33)
अच्छा अगर वे अपने दावे में सच्चे हैं, तो इस (क़ुरआन) जैसी आयत (गढ़कर) ले आएँ। (34)
क्या वे लोग बिना किसी ज़रिए [Agent] के अपने आप पैदा हो गए? या उन्होंने ख़ुद ही अपनी सृष्टि कर ली? (35)
या क्या उन्होंने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है? नहीं! असल में वे (सच्चाई पर) ईमान [faith] नहीं रखते। (36)
क्या उनके पास तुम्हारे रब के खज़ाने हैं या वही (उनके दारोग़ा बनकर) उसे अपने नियंत्रण में लिए हुए हैं? (37)
या क्या उनके पास कोई सीढ़ी है जिस पर चढ़कर वे (ऊपर की दुनिया की गुप्त बातें) सुन लेते हैं? फिर उनमें से जिसने सुन लिया हो तो, वह ले आए स्पष्ट प्रमाण! (38)
क्या अल्लाह के पास (फ़रिश्तों के रूप में) तो बेटियाँ हैं, जबकि तुम्हारे पास बेटे हैं? (39)
या क्या [ऐ रसूल!] आप उनसे कोई मज़दूरी माँगते हैं कि वे क़र्ज़ के बोझ से दबे जा रहे हैं? (40)
या क्या उनके पास अनदेखी चीज़ों की जानकारी है, जिसे ये लिख लेते हों? (41)
या क्या वे समझते हैं कि वे आपको अपने जाल में फँसा लेंगे? असल में तो (सच्चाई पर) विश्वास न करने वाले लोग हैं जो जाल में फँसा दिए गए हैं। (42)
क्या अल्लाह के अतिरिक्त सचमुच उनका कोई और ख़ुदा [प्रभु] है? वे जिसे भी अल्लाह के बराबरी का ठहराते हैं, अल्लाह ऐसी तमाम चीज़ों से कहीं अधिक ऊँचा व महान है। (43)
अगर वे आसमान का कोई टुकड़ा भी अपने ऊपर गिरता हुआ देख लें, तो कहेंगे, "यह तो बस परत-दर-परत (गहरे) बादल हैं", (44)
अतः (ऐ रसूल) आप उन्हें (उनके हाल पर) छोड़ दें, यहाँ तक कि वे उस दिन का सामना करें जिस दिन उनके होश जाते रहेंगे, (45)
जिस दिन उनकी कोई चाल उनके कुछ भी काम न आएगी, जब उन्हें कोई सहायता नहीं मिलेगी। (46)
बेशक जो लोग ज़ुल्म कर रहे हैं, उन (बदमाशों) के लिए एक और यातना इंतज़ार कर रही है, मगर उनमें से अधिकतर लोग इसे नहीं जानते। (47)
अपने रब का फ़ैसला आने तक [ऐ रसूल], आप धीरज रखते हुए इंतज़ार करें: आप हमारी निगरानी में हैं। जब आप उठें, तो अपने रब की तारीफ़ों का गुणगान करें। (48)
और रात की कुछ घड़ियों में भी उसका गुणगान [glorify] करें, और सितारों के डूबने के समय (सुबह-सवेरे) भी। (49)
नोट:
1-10: यहाँ अल्लाह ने पाँच चीज़ों की क़सम खायी है, पहले तूर पहाड़ की, जहाँ मूसा (अलै.) को तौरात दी गयी थी, इसे 'एक पहाड़' के मतलब में भी लिया जा सकता है जो बहुत ठोस और मज़बूती से जमा होता है, मगर क़यामत के दिन वह टूटकर चूर-चूर हो जाएगा। दूसरी क़सम एक किताब की खायी गयी है, यह वह किताब हो सकती है जिसमें फ़रिश्ते आदमी के कर्मों का लेखा-जोखा लिखते रहते हैं, जो बदला नहीं जा सकता है, और 'फ़ैसले के दिन' इसी के मुताबिक कर्मों का बदला मिलेगा। इन दोनों क़समों का संबंध क़यामत और फ़ैसले के लिए दोबारा उठाए जाने से है। तीसरी क़सम उस घर की खायी गयी है जहाँ लोगों का जाना-आना लगा रहता है, इसका मतलब 'काबा' है जहाँ इस्लाम आने से पहले भी अरब के लोग पूरी भक्ति से जाते-आते थे। चौथी क़सम आसमान की है, जिसे लोगों पर करम करते हुए ऊँची छत जैसा बनाया गया है, मगर साथ में धमकी भी दी गई है कि क़यामत के दिन यह गिर पड़ेगा, टूटकर बिखर जाएगा (22:65, 17:92, 82:1) और पाँचवीं क़सम भरे हुए समंदर की खायी गयी है, इससे भी धमकी दी गई है कि क़यामत के दिन समुंदर में उबाल आ जाएगा और वह किनारे तोड़ डालेगा, देखें (10:22, 17: 67-69, 24:40)।
21: गिरवी उस सामान को कहते हैं, जो किसी उधार देने वाले ने अपने उधार की अदायगी की ज़मानत के तौर पर क़र्ज़दार से लेकर अपने पास लेकर रख लिया हो। अल्लाह ने हर इंसान को जो सलाहियतें दी हैं, वह इंसान के पास उधार हैं। यह उधार इसी सूरत में उतर सकता है जब इंसान अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ इन सलाहियतों को इस्तेमाल करे यानी दुनिया में वह सच्चाई पर ईमान रखे और नेक अमल करके दिखाए। अगर वह ऐसा करता है तो वह दुनिया में अपना उधार चुका देगा और परलोक [आख़िरत] में उसकी जान को आज़ादी मिल जाएगी। यहाँ यह बात वैसे ईमानवालों के लिए कही गयी है जिन्होंने नेक कर्म किए और वे तो जन्नत में जाएंगे ही, साथ में उनकी ईमानवाली औलाद भी उनके साथ जाएगी, इस तरह, उन्होंने अपना उधार उतार दिया। याद रहे कि बाप की नेकी की वजह से उसकी ईमानवाली औलाद का दर्जा भी बढ़ जाएगा, लेकिन औलाद के बुरे कर्मों की सज़ा बाप को नहीं मिलेगी, क्योंकि हर आदमी की जान खुद अपने कर्मों की कमाई के लिए गिरवी है, दूसरे की कमाई के लिए नहीं।
30: मुहम्मद (सल्ल) के बारे में कुछ क़ुरैश के लीडरों ने यह कहा था कि जिस तरह दूसरे कवियों की शायरी उनके मरने के साथ ही समाप्त हो गई, इसी तरह ये साहब भी मर जाएंगे तो फिर इनकी बातें भी इन्हीं के साथ ख़त्म हो जाएंगी।
34: क़ुरआन ने ऐसा चैलेंज कई जगह पर किया है, जैसे देखें सूरह बक़रा (2: 23), सूरह यूनुस (10: 38), सूरह अल-इसरा (17: 88), लेकिन इस चैलेंज को किसी ने स्वीकार नहीं किया।
37: मक्का के लोग यह कहा करते थे कि अगर अल्लाह को पैग़म्बर भेजना ही था, तो मक्का या तायफ़ के किसी बड़े सरदार को पैग़म्बर क्यों नहीं बनाया। देखें सूरह ज़ुख़रुफ़ (43: 13) अल्लाह जिसको चाहे अपना पैग़म्बर बना दे, उसकी रहमत के ख़ज़ाने किसी इंसान की इच्छाओं के अधीन नहीं है।
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