Thursday, March 31, 2022

Surah/सूरह 47: Muhammad/मुहम्मद [Muhammad/ अल्लाह के रसूल]

 सूरह 47: मुहम्मद 

[Muhammad/ अल्लाह के रसूल]

यह एक मदनी सूरह है जिसमें युद्ध से जुड़े मामले बयान किए गए हैं, और उन लोगों की बात की गई है जो दूसरे लोगों को इस्लाम अपनाने या अल्लाह के हुक्म को मानने से रोकते हैं (यह मदनी सूरह का एक आम विषय है), और इसमें पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] के अंजाम से भी परिचित कराया गया है। इसमें ख़ास तौर से उन लोगों का ज़िक्र आया है जिन्होंने अधर्म का रास्ता अपनाते हुए मुहम्मद साहब को मक्का से निकलने पर मजबूर किया, यह भी बताया गया है कि विश्वास न करने वाले अल्लाह और उसके रसूल के ख़िलाफ़ चाहे जितनी भी कोशिश कर लें, वे इसमें कामयाब नहीं होंगे। इसमें ज़ोर दिया गया है कि मुसलमानों को हर हाल में अल्लाह का हुक्म मानते हुए अल्लाह के रास्ते में संघर्ष करना चाहिए और ज़रूरतमंदों को ज़्यादा से ज़्यादा दान देना चाहिए, ताकि फ़ैसले के दिन विश्वास न करने वालों और पाखंडियों की तरह कहीं ऐसा न हो कि उनके सब अच्छे कर्म बेकार हो जाएं। आयत 2 में आए मुहम्मद साहब के ज़िक्र पर इस सूरह का नाम रखा गया है।

 

 

विषय:

01-03: ईम्मानवालों और विश्वास न रखनेवालों के साथ अल्लाह का रवैया 

04-14: विश्वास न रखने वालों के साथ (बचाव में) लड़ो 

   15: जन्नत की ख़ुशियाँ और जहन्नम की मुसीबतें 

16-19: रसूल को सलाह

20-38: युद्ध के लिए जाने से आना-कानी करने की निंदा 

 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जो लोग विश्वास नहीं रखते और (दूसरों को) अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं, अल्लाह ऐसे लोगों के (अच्छे) कर्मों को भी बर्बाद कर देगा,  (1)
मगर जो लोग ईमान रखते हैं, अच्छे कर्म करते हैं, और उस चीज़ पर विश्वास रखते हैं जो मुहम्मद (सल्ल.) पर उतारी गयी है--- यानी तुम्हारे रब की तरफ़ से भेजी गयी सच्चाई [क़ुरआन] पर, तो (याद रहे) अल्लाह ऐसे लोगों के बुरे कर्मों को भी अनदेखा कर देगा, और उनकी हालत सँवार देगा। (2)
ऐसा इसलिए है कि विश्वास न करनेवाले झूठ के पीछे चलते हैं, जबकि ईमानवाले अपने रब की तरफ़ से आयी हुई सच्चाई के पीछे चलते हैं, इस तरह अल्लाह लोगों को उनका असली रूप दिखा देता है। (3)

जब जंग में विश्वास न करनेवालों से तुम्हारी मुठभेड़ हो, तो उनकी गरदनों पर वार करो, और जब वे पूरी तरह (जंग में) हरा दिए जाएं, तो उन्हें क़ैद करके मज़बूती से बाँध दो------ बाद में या तो उन्हें एहसान करते हुए छोड़ दो या फिर उनकी जान की क़ीमत वसूल करके छोड़ दो, यहाँ तक कि युद्ध के बचे-खुचे प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाएं। यही सही तरीक़ा है। अगर अल्लाह चाहता, तो उसने ख़ुद ही उन्हें हरा दिया होता, मगर (इस जंग से) उसका मक़सद दूसरे लोगों के द्वारा तुममें से कुछ लोगों की परीक्षा लेना है। जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे जाते हैं, अल्लाह उनके कर्मों को कभी बेकार नहीं जाने देगा; (4)
वह उनको सही रास्ता दिखा देगा और उनको अच्छी हालत में डाल देगा;  (5)
वह उन्हें जन्नत में दाख़िल कर देगा, जिसके बारे में वह उन्हें पहले ही बता चुका है। (6)
तुम (लोग) जो ईमान रखते हो! अगर तुम अल्लाह की मदद करोगे, तो वह तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हारे क़दम जमा देगा। (7)

रहे वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, तो वे कितने दुख व निराशा की हालत में होंगे! अल्लाह ने उनके सब किए-धरे कर्मों को बेकार कर दिया है। (8)
अल्लाह के द्वारा उतारी गयी चीज़ [क़ुरआन] से नफ़रत करने की वजह से ऐसा हुआ कि अल्लाह ने उनके कर्मों को बेकार कर दिया है। (9)
क्या लोगों ने ज़मीन पर घूम-फिरकर देखा नहीं कि उन लोगों का क्या नतीजा हुआ जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं? अल्लाह ने उन्हें पूरी तरह तहस-नहस कर दिया: विश्वास करने से इंकार करनेवालों का नतीजा भी कुछ ऐसा ही होगा! (10)
यह इसलिए कि ईमान रखनेवालों की रक्षा तो अल्लाह करता है, जबकि विश्वास न करनेवालों का कोई नहीं जो उन्हें बचा सके:  (11)
जो लोग ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें अल्लाह (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती हैं; जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, वे इस दुनिया में भरपूर मज़े उड़ा लें, और खा-पी लें, जैसे पालतू जानवर खाते हैं, मगर (जहन्नम की) आग उनका (आखिरी) ठिकाना होगी।  (12)
कितने ही शहरों को हम तबाह-बर्बाद कर चुके हैं, जो [ऐ रसूल] आपके अपने शहर [मक्का] से भी ज़्यादा मज़बूत थे------ वह शहर जिससे आपको निकाल दिया गया----- और उनके पास कोई न था जो उनकी मदद कर पाता।  (13)

जो लोग अपने रब की तरफ़ से आए हुए स्पष्ट प्रमाण (को मानते हुए उस) के पीछे चलने वाले हैं, क्या उनकी तुलना ऐसे लोगों के साथ की जा सकती है, जिनके कुकर्मों को उनके लिए लुभावना बना दिया गया हो, और वे लोग जो अपनी इच्छाओं के पीछे चलते हों? (14)
बुराइयों से बचनेवाले नेक लोगों से, जिस (जन्नत के) बाग़ का वादा किया गया है, उसकी तस्वीर कुछ ऐसी होगी: हमेशा साफ़ व शुद्ध रहनेवाली पानी की नहरें, हमेशा ताज़ा रहनेवाली दूध की नहरें, पीनेवालों के मज़े व मस्ती के लिए शराब की नहरें, साफ़ किए गए शुद्ध शहद की नहरें, सब उसके अंदर बह रही होंगी; उन्हें वहाँ हर तरह के फल मिलेंगे; और उन्हें अपने रब की तरफ़ से गुनाहों की माफ़ी मिल जाएगी। इनकी तुलना उन लोगों के अंजाम के साथ आख़िर किस तरह की जा सकती है, जो (जहन्नम की) आग में फँस के रह गए हों, और जिन्हें पीने के लिए ऐसा खौलता हुआ पानी मिलेगा, जो उनकी आँतों को फाड़कर रख देगा? (15)

इनमें से कुछ लोग ऐसे हैं, जो [ऐ रसूल] आपकी बातें सुनते तो हैं, मगर जैसे ही वे आपके पास से उठकर जाते हैं, तो उन लोगों से जिन्हें ज्ञान दिया गया है, मज़ाक़ उड़ाते हुए पूछते हैं, "उस (रसूल) ने अभी-अभी क्या कहा था?" यही वे लोग हैं जिनके दिलों को अल्लाह ने ठप्पा लगाकर बंद कर दिया है (कि अब उन पर कोई असर होने वाला नहीं है), वे तो बस अपनी इच्छाओं के पीछे चलते हैं।  (16)
जो लोग सीधे रास्ते पर चलते हैं, अल्लाह ने अपना मार्गदर्शन बढ़ाते हुए उनका (सही रास्ते पर) चलना और आसान कर दिया है, और उन्हें बुराइयों से बचने की तौफ़ीक़ दी है।  (17)
विश्वास न करनेवाले लोग अब और किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं, सिवाय (क़यामत की) घड़ी का, जो उन पर इस तरह (अचानक) आ जाएगी कि उन्हें पता तक न होगा? उस (क़यामत) की निशानियाँ तो आ चुकी हैं, मगर जब वह घड़ी सचमुच आ जाएगी, उस वक़्त नसीहत मान लेने का भला क्या फ़ायदा होगा? (18)
अतः [ऐ रसूल!] आप जान लें कि अल्लाह के सिवा कोई नहीं है जो पूजा के लायक़ हो, सो आप अपनी भूल-चूक की माफ़ी के लिए भी दुआ करें, और ईमान रखनेवाले मर्द और औरतों के गुनाहों की माफ़ी के लिए भी दुआ करें। अल्लाह सब जानता है---- तुम्हारे चलने-फिरने को भी और तुम्हारे एक जगह ठहरे रहने को भी।  (19)

जो लोग ईमान रखते हैं, वे पूछते हैं कि (दुश्मनों से युद्ध के बारे में) कोई सूरह क्यों नहीं उतारी गयी है? मगर जब (युद्ध करने के बारे में) कोई स्पष्ट सूरह उतारी जाती है, तो [ऐ रसूल] आप देखते हैं कि जिनके दिलों में रोग है, वे आपकी तरफ़ इस तरह देखते हैं मानो मरने के डर से उन पर बेहोशी छा गई हो ----- उनके लिए बेहतर यही होगा (20)
कि (अल्लाह की) आज्ञा को मानें और (रसूल के लिए) उचित बात कहें; जब युद्ध करने का फ़ैसला हो चुका है, तो उनके लिए यह और भी बेहतर होगा अगर वे अल्लाह के प्रति सच्चे बने रहें।  (21)
"अब अगर तुम (युद्ध करने से) मुँह मोड़ते हो, तो शायद ऐसा हो सकता है कि तुम सारी ज़मीन पर फ़साद [corruption] फैलाते फिरो और अपने रिश्ते-नातों को तोड़ डालो?" (22)
ये वे लोग हैं जिन्हें अल्लाह ने (अपनी रहमत से) ठुकरा दिया है, और उन्हें कानों से बहरा और आँखों से अंधा कर दिया है।  (23)
तो क्या वे क़ुरआन पर सोच-विचार नहीं करेंगे? क्या उनके दिलों पर ताले लगे हैं? (24)
सही मार्ग दिखाने के बाद भी जो लोग पीठ-फेरकर चल देते हैं, वे ऐसे ही लोग हैं जो शैतान के धोखे व बहकावे में आ जाते हैं, और उन्हें झूठी उम्मीदें दिलाते हैं। (25)
वे [पाखंडी] लोग, उन लोगों से जो अल्लाह की भेजी गयी (आयतों से) नफ़रत करते हैं, कहते हैं, "हम कुछ मामलों में तुम्हारी बात मान लेंगे।" अल्लाह उनकी ख़ुफ़िया चालों को अच्छी तरह जानता है। (26)

उस समय उन्हें कैसा लगेगा जब फ़रिश्ते उनके चेहरों और उनकी पीठों पर मारते हुए उनकी जान निकालकर ले जाएंगे, (27)
यह इसलिए कि वे ऐसे तरीक़े के पीछे चले जिस पर अल्लाह सख़्त नाराज़ हुआ, और उन लोगों ने उसे ख़ुश करने की ज़रूरत भी नहीं समझी? सो उसने उनके सारे किए-धरे कर्मों को बेकार कर दिया। (28)
क्या भ्रष्ट दिलवाले लोग यह मान कर चल रहे हैं कि (रसूल के प्रति) उनके अंदर की नफ़रत व दुश्मनी [malice] को अल्लाह कभी सबके सामने ज़ाहिर नहीं करेगा? (29)
(ऐ रसूल!) अगर हम चाहते, तो आपको उन [पाखंडी/मुनाफ़िक़ लोगों] के बारे में बता देते, और फिर आप उन्हें उनके लक्षणों से पहचान सकते थे, मगर आप वैसे भी उनकी बातचीत के ढंग से उन्हें पहचान ही लेंगे। जो कुछ तुम (लोग) करते हो, अल्लाह सब जानता है। (30)
हम तुम्हारी जांच-परख ज़रूर करेंगे, यह देखने के लिए कि तुममें से कौन है जो सबसे जमकर (अपनी जान-माल से) संघर्ष [जिहाद] करता है और अपने क़दम धीरज से जमाए रखता है; हम यह भी परखेंगे कि तुम अपने दावे में कितने सच्चे थे। (31)
जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया, और दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोका, और रसूल का विरोध किया जबकि उन्हें सही मार्ग दिखाया जा चुका था, तो ऐसे लोग अल्लाह को किसी भी तरह का कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकते। वह उनके सब किए-कराए कर्मों को बेकार कर देगा------(32)
ऐ ईमान रखनेवालो! अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो: अपने कर्मों को यूँ बर्बाद न होने दो-----  (33)
जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया, दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोका, और बिना विश्वास किए ही मर गए, तो अल्लाह ऐसे लोगों को कभी माफ़ नहीं करेगा। (34)

अतः (ऐ ईमानवालो!) हिम्मत न हार बैठो और तुरंत सुलह [संधि] करने में न लग जाओ। तुम तो उन पर भारी पड़ रहे हो: अल्लाह तुम्हारे साथ है। वह तुम्हारे (अच्छे) कर्मों के इनाम को कभी कम नहीं करेगा: (35)
इस दुनिया की ज़िन्दगी तो बस एक खेल-तमाशा है, लेकिन अगर तुम विश्वास [ईमान] रखो, और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, तो वह तुम्हें इसका पूरा-पूरा बदला देगा। वह तुमसे अपनी (सारी) संपत्ति दे देने को नहीं कहता ----- (36)
अगर अल्लाह ने तुमसे ऐसा कहा होता, और तुम्हें (अपनी दौलत) दे देने पर ज़ोर दिया होता, तो तुम कंजूसी करने लगते, और वह तुम्हारे मन के खोट को उजागर कर देता ------ (37)
हालाँकि अब तुम्हें अल्लाह की राह में (थोड़ा-बहुत) देने के लिए बुलाया जा रहा है, मगर तुममें से कुछ लोग हैं जो देने में कंजूसी कर रहे हैं। हालाँकि जो कोई भी कंजूसी करता है तो वह असल में अपने आप से ही कंजूसी करता है: अल्लाह ही तो सारे धन-दौलत का स्रोत [source] है, और तुम तो ज़रूरतमंदों में से हो। अगर तुमने मुंह मोड़ा, तो वह तुम्हारी जगह दूसरे लोगों को ले आएगा, और वे तुम्हारे जैसे (कंजूस) न होंगे। (38)



नोट:

1: जो लोग सच्चाई पर विश्वास नहीं करतेउनके द्वारा किए गए भलाई के कामों का बदला उन्हें दुनिया में ही अल्लाह दे देता हैमगर आख़िरत [परलोक] में उनके सारे अच्छे काम अकारत हो जाएंगेक्योंकि उन्होंने अल्लाह की सच्चाई पर विश्वास करने से इंकार कर दिया था। 

4: इस कार्रवाई का आदेश शांति के समय किसी व्यक्ति या समूह के लिए नहीं है, बल्कि उस स्थिति के लिए है जब कोई दुश्मन सेना किसी मुस्लिम राज्य पर हमला करे, तो जवाब में जंग करने से भाग जाना या बीच में युद्ध बंद कर देना मना है।.......

यह सूरह बद्र की जंग के बाद उतरी थी। यहाँ कहा जा रहा है कि जब दुश्मन लड़ाई में पूरी तरह से हरा दिए जाएं, और उनकी ताक़त कुचल दी जाए, तो फिर जंग में जो दुश्मन के क़ैदी गिरफ़्तार हो गए हों, उन पर एहसान करते हुए या तो उन्हें छोड़ दिया जाए, या फिर उनकी जान की क़ीमत वसूल करके छोड़ देना चाहिए, साथ में यहाँ अपने क़ैदियों के बदले [exchange] में छोड़ना भी शामिल है। मगर उन पर रहम करते हुए छोड़ देना ही ज़्यादा पसंदीदा तरीक़ा माना जाता है। 

 इससे पहले बद्र की जंग में मक्का के 70 जंगी सिपाहियों को क़ैदी  बनाया गया था, जिन्हें उनकी जान की क़ीमत वसूल करके रिहा कर दिया गया था, मगर इस फ़ैसले को अल्लाह ने पसंद नहीं किया था, देखें सूरह अंफ़ाल (8: 67-68), जहाँ यह बताया गया था कि अभी दुश्मनों की ताक़त पूरी तरह कुचली नहीं गई थी, इसलिए उनको छोड़ देने से फिर से दुश्मनों को मज़बूत हो जाने का डर था। 

इस तरह, उस ज़माने में मुस्लिम हाकिमों के पास कई विकल्प थे जिसे उसको हालात के मुताबिक़ फ़ैसला करना होता था: चाहे तो उन्हें सीधे-सीधे रिहा कर दे, या जान की क़ीमत लेकर छोड़ दे, या उन्हें अपने क़ैदियों के बदले में रिहा करे, या अगर युद्ध की हालत बनी हुई हो तो क़त्ल कर दे, या कुछ को ग़ुलाम बना ले। 

जंग के द्वारा अल्लाह ईमानवालों की भी परीक्षा लेता है ताकि पता चल जाए कि अल्लाह के दीन के लिए कौन अपनी जान-माल जोखिम में डालता है। 

16: यहाँ मदीना के पाखंडी [मुनाफ़िक़/Hypocrites] लोगों के बारे में बताया गया है। 

19: अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) को मासूम बनाया था जिनसे गुनाह होने की कोई संभावना नहीं थी, मगर इंसान होने के नाते छोटी-मोटी भूल-चूक हो जाती थी जिसके लिए वह हमेशा माफ़ी माँगते रहते थे, मुसलमानों को भी अपने हर छोटे-बड़े गुनाह के लिए अल्लाह से माफ़ी माँगते रहना चाहिए। 

20: जो पक्के ईमानवाले लोग थे, वे तो इस इंतज़ार में रहते थे कि कब अल्लाह की राह में लड़ने का मौक़ा मिल जाए, मगर जो मुसलमानों के बीच पाखंडी लोग थे, वे भी कभी-कभी दिखावा करने के लिए कह देते थे कि अगर सच्चाई के लिए लड़ना पड़े, तो वे भी तैयार रहेंगे, मगर जब उनसे लड़ने के लिए कहा जाता, तो लगता कि वे बेहोश हो जाएंगे। 

22: अल्लाह के रास्ते में लड़ने का मक़सद यह है कि ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी ख़त्म हो जाए, तो अगर कोई इस फ़साद को ख़त्म करने के लिए नहीं उठता, तो एक तरह से वह भी इस ज़ुल्म और फ़साद फैलाने वालों में शामिल है, और इसके नतीजे में एक सूरत रिश्ते-नाते का टूटना भी हो सकता है क्योंकि उनके हक़ भी मारे जाएंगे। 

35: युद्ध में किसी से डर के सुलह नहीं करनी है, हाँ अगर दुश्मन सुलह करना चाहे, तो सुलह कर लेनी चाहिए, देखें सूरह अंफ़ाल [8: 61] 

38: अल्लाह के रास्ते में देने से कंजूसी करने का मतलब यह है कि उससे होने वाले फ़ायदे से अपने आपको वंचित करना। 

 


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