Tuesday, March 29, 2022

Surah/सूरह 81: At-Takwir/अत-तकवीर [अँधेरों में लिपटा हुआ/ Shrouded in Darkness]

 सूरह 81: अत-तकवीर 

[अँधेरों में लिपटा हुआ/ Shrouded in Darkness]


यह एक मक्की सूरह है जिसमें इस सच्चाई पर ज़ोर दिया गया है कि फ़ैसले के दिन लोगों को अपने कर्मों के नतीजे के साथ जूझना पड़ेगा, साथ में क़ुरआन की सच्चाई पर और लोगों को सही रास्ते की तरफ़ बुलाने पर भी ज़ोर डाला गया है। इस सूरह की शुरुआत में क़यामत के दिन की भयानक घटनाओं को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया गया है, और सूरह का नाम इसी विवरण से लिया गया है। अंत में बताया गया है कि क़ुरआन सचमुच अल्लाह के उतारे हुए शब्द हैं, और रसूल कोई दीवाने नहीं हैंजैसा कि बुतपरस्तों का दावा है।


विषय:

01-14: क़यामत का दिन 

15-29: रसूल का फ़रिश्ते को देखना




अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

जब सूरज लपेटकर अँधेरा कर दिया जाएगा,  (1)

जब सितारे मद्धिम पड़ जाएंगे (और टूट-टूटकर गिर पड़ेंगे),  (2)

जब पहाड़ (धूल बनाकर वातावरण में) चला दिए जाएंगे, (3)

जब (दस महीने की) गर्भवती ऊँटनियाँ बेकार मारी फिरेंगी (क़ीमती होते हुए भी कोई उनको पूछनेवाला न होगा),  (4)

जब जंगली जानवर (डरके मारे बदहवास हो जाएंगे और फिर अल्लाह के सामने) इकट्ठा कर दिए जाएंगे,  (5)

जब समंदर उबल पड़ेंगे (और अपनी हदें तोड़ देंगे),  (6)

जब आत्माओं को (बुरे और अच्छे लोगों के) जोड़े में अलग-अलग छाँटकर रखा जाएगा,  (7)

जब ज़िंदा गाड़ दी गयी लड़की से पूछा जाएगा  (8)

कि वह किस गुनाह के कारण मार दी गई थी,  (9)

जब कर्मों के बही-खाते (record of deeds) खोल दिए जाएंगे,  (10)

जब आसमान से पर्दा हटा दिया जाएगा,  (11)

और जब जहन्नम (की आग) भड़कायी जाएगी  (12)

और जब जन्नत नज़दीक कर दी जाएगी:  (13)

(लोगो! तुम में से) हर आदमी जान लेगा जो कुछ (कर्मों का लेखा जोखा) वह लेकर आया है।  (14)

 

तो मैं कसम खाता हूँ उन [ग्रहों/Planets] कीजो (अपने नियत पथ पर चलते हुए) दूर चले जाते हैं,  (15)

जो (एक ख़ास गति से) चलते रहते हैंऔर (फिर कभी इतने दूर चले जाते हैं कि नज़रों से) ओझल हो जाते हैं,  (16)

और रात की क़सम जब उसका अंधेरापन जाने लगे,  (17)

और सुबह की क़सम जब (हल्की सी रौशनी में) वह साँस ले:  (18)

यह [कुरआन] संदेश लानेवाले बड़े सम्मानीय फरिश्ते [जिबरईल/ Gabriel] द्वारा (पढ़ी हुई) वाणी [speech] है,  (19)

जो बड़ी ताक़त रखता हैऔर सिंहासन के मालिक [अल्लाह] के यहाँ उसका बड़ा सम्मान और रूतबा है ------ (20)

(साथी फरिश्तों में) उसका आदेश माना जाता हैऔर वह (अल्लाह के नज़दीक) बहुत भरोसे के लायक़ [trustworthy] है। (21)

और (ऐ मक्का के लोगो!) तुम्हारे साथी [मुहम्मद]कोई दीवाने नहीं हैं:  (22)

उन्होंने सचमुच उस (जिबरईल नामी) फरिश्ते को साफ-खुले हुए आसमान के किनारे (क्षितिज/ horizon) पर देखा था। (23)

और (जो भी संदेश 'वही' [Revelation] के द्वारा भेजा जाता है)वह [मुहम्मद] उन चीज़ों को बताने में कोई कमी नहीं करते हैं (और न किसी बात को अपने तक छुपाकर रखते हैं)।  (24)

(याद रहे)यह [कुरआन] किसी दुत्कारे हुए शैतान की लायी हुई बात (वाणी) नहीं है।  (25)

 

फिर तुम (लोग इतनी बड़ी चीज़ को छोड़कर) कहाँ चले जा रहे हो?  (26)

यह [कुरआन] तो सारे लोगों के लिए एक संदेश है;  (27)

हर उस आदमी के लिए जो सीधी राह चलना चाहता हो। (28)

मगर तुम ऐसा तभी चाहोगेजब अल्लाह की मर्ज़ी होजो सारे जहाँनों का रब है।  (29)

 

 

नोट:


1: आयत से लेकर 14 तक क़यामत और परलोक [आख़िरत/ Hereafter] के हालात का बयान है।

 

4: ऊंंटनी उस समय के अरब के लोगों के लिए सबसे बड़ी दौलत समझी जाती थीऔर अगर दस महीने की गर्भवती होतो उसे और भी क़ीमती समझा जाता था। 

 

7यानी एक प्रकार के लोग एक जगह जमा कर दिए जाएंगेजैसे ईमान रखनेवाले एक जगह और काफ़िर एक जगहअच्छे लोग एक जगह और बुरे लोग एक जगह। 

 

9: इस्लाम आने से पहले अरब में कुछ कबीले ऐसे थे जिसमें बेटी पैदा होती तो उसे शर्म के मारे लोग जिंदा जमीन में गाड़ देते थे (देखें 16:58-59; 6: 137, 140, 151; 17:31; 60:12). क़यामत में उस बच्ची को लाकर पूछा जाएगा कि तुम्हें किस जुर्म में मार दिया गया थाइसका मकसद उन ज़ालिमों को सज़ा देना है जिन्होंने उस बच्ची के साथ ऐसा किया था।


15-21: यहाँ ग्रहों की क़सम खायी गई है जो अपने नियत रास्ते पर चलते हुए कभी-कभी ज़्यादा दूर चले जाने के कारण ग़ायब हो जाते हैं, फिर क़सम खायी गई है रात की जब वह ख़त्म होने लगती है और सुबह की जब वह शुरू ही होती है। इन सारी घटनाओं पर आदमी विश्वास करता है भले ही वह इन्हें हमेशा नहीं देख पाता क्योंंकि समय-समय पर ये दिखाई नहीं पड़ते। इसी तरह, हालाँकि इंसान "वही"[Revelation] लाने वाले फ़रिश्ते को नहीं देख सकता, मगर इसका मतलब यह नहीं है कि वह उसके अस्तित्त्व से इंकार दे और इस बात से भी कि क़ुरआन उस फ़रिश्ते (जिसे "सम्मानित संदेशवाहक" कहा है) के माध्यम से उतारी जाती है। 

सूरह 69 में स्पष्ट किया गया है कि जो आयतें फ़रिश्ते के माध्यम से उतारी जाती हैं, उनमें और शायरी में बहुत साफ़ अंतर है। जबकि इस सूरह में अल्लाह द्वारा उतारी गई आयतों और उनलोगों की बातों में स्पष्ट अंतर है जिन पर जिन्नों का असर हो गया हो (मजनूँ/ दीवाना). 

और जगह ऐसी क़समों के लिए देखें 56:75; 69:38-39; 75:1-2; 84:16-18; 90:1,3) 

 

22: तुम्हारे "साथी" यानी मुहम्मद (सल्ल) कोई "मजनूँ" नहीं हैं। अरबी में 'मजनूँ' उसको कहते हैं जिस पर जिन्न सवार हो जाता है। (देखें 7:184) 


23एक बार मुहम्मद साहब ने जिबरील फरिश्ते को क्षितिज पर अपने असली रूप में देखा थाशायद इस आयत में उसी की तरफ इशारा है। इसका वर्णन सूरह नजम (53: 7) में भी आया है। 


24इस्लाम आने से पहले (जाहिलियत के) ज़माने में जो लोग "काहिन" कहलाते थेवे भी आसमानी बातें बताने का दावा करते थेऔर शैतानों से दोस्ती करके उनसे कुछ झूठी-सच्ची बातें सुन लिया करते थेलेकिन जब लोग उनसे पूछते तो वे बिना फ़ीस लिए कुछ भी बताने से मना कर देते थे। यहाँ काफ़िरों से कहा जा रहा है कि तुम मुहम्मद साहब को "काहिन" कहते होमगर वह तो सारी सच्ची आसमानी बातें बिना किसी पैसे के बताने में कभी कंजूसी नहीं करते हैं।

 



 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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