सूरह 99: अज़-ज़िलज़ाल
[अंतिम भूकंप/ The Earthquake]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें फ़ैसले के दिन के कई दृश्य दिखाए गए हैं, जब कर्मों के बही-खाते खोल दिए जाएंगे और उनका हिसाब-किताब होगा। सूरह 81, 82, 101 और दूसरी सूरतों से भी तुलना करें।
विषय:
01-08: फ़ैसले के दिन की दहशत
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ (आख़िरी) भूकंप से झिंझोड़ दी जाएगी, (1)
जब धरती अपने अन्दर के (सब) बोझ [मुर्दे] निकाल बाहर कर डालेगी, (2)
जब आदमी पुकार उठेगा, “इस [धरती] को आख़िर क्या हो गया है”? (कि इतनी ज़ोर से काँप रही है); (3)
उस दिन, वह [धरती] अपने सब हालात ख़ुद बता देगी, (4)
क्योंकि तुम्हारा रब उसको (ऐसा ही करने का) हुक्म देगा। (5)
उस दिन, लोग अलग-अलग टोली में (अपनी क़ब्रों से) निकलकर आएंगे, ताकि उन्हें उनके किए गए कर्मों को दिखाया जाए: (6)
जिस किसी ने कण-भर भी अच्छाई की होगी, वह इसे देख लेगा, (7)
और जिस किसी ने कण-भर भी बुराई की होगी, तो वह उसे (भी) देख लेगा। (8)
नोट:
2: यानी सारे मुर्दे, और साथ में सारे खनिज-पदार्थ और ख़ज़ाने जो ज़मीन के अंदर गड़े हुए हैं, सब बाहर आ जाएंगे। एक हदीस में है कि जिस किसी ने दौलत के चलते किसी को क़त्ल किया होगा, या रिश्तेदारों का हक़ मारा होगा, या चोरी की होगी, वह सारे माल को देखकर कहेगा कि ये है वह माल जिसके चलते मैंने ये गुनाह किए थे। फिर कोई उस सोने-चाँदी की तरफ़ ध्यान नहीं देगा।
8: यहाँ बुराई का मतलब ऐसी बुराइयों से है जिसके लिए तौबा न की गई हो, क्योंकि सच्ची तौबा से गुनाह माफ़ हो जाते हैं। सच्ची तौबा में यह बात भी शामिल है कि जिस गुनाह की भरपाई मुमकिन हो, उसकी भरपाई कर दी जाए, उदाहरण के लिए किसी का हक़ मारा था, तो उसे दे दिया जाए, या उससे माफ़ करा लिया जाए, या कोई फ़र्ज़ नमाज़ छूटी हुई थी, उसे पढ लिया जाए आदि।
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