Tuesday, March 29, 2022

Surah/सूरह 89: Al-Fajr/अल-फ़ज्र [सुबह-सवेरे, Daybreak]

  

सूरह 89: अल-फ़ज्र 

[सुबह-सवेरे, Daybreak]


यह एक मक्की सूरह है जिसमें अल्लाह ने क़समें खाकर इस बात पर ज़ोर दिया है कि रसूल के ज़माने के अत्याचारी [ज़ालिम] भी वैसे ही हैं जैसे पिछले ज़मानों में ज़ालिम रहे थे। इस तरह, याद दिलाया गया है कि आद, समूद और फ़िरऔन के लोगों को जो भयानक सज़ाएं मिली, वैसी सज़ा अरब के लोगों को भी मिल सकती है। फ़ैसले के दिन शैतानी करने वाले लोग पछतायेंगे, और अच्छा काम करने वालों को इनाम दिया जाएगा। वैसे लोगों की निंदा की गई है जो अल्लाह की नेमतों को दूसरे लोगों को नहीं देते (17-20). सूरह में शुक्र अदा करने वालों के अंजाम की तुलना उन लोगों से की गई है जिनकी रूहें अल्लाह की याद से सुकून पा जाती हैं। 



विषय:

01-05: क़सम 

06-14: पिछली पीढ़ियों को मिलने वाली सज़ा: चेतावनी 

15-20: इंसानों को धन-दौलत की लालच 

21-30: जन्नत और जहन्नम का फ़ैसला 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

 क़सम है सुबह-सवेरे के समय की,  (1)

 और क़सम है दस रातों की,  (2)

 और क़सम है जोड़ेवाली [Even] (चीज़) की और बिना-जोड़ेवाली [Odd] चीज़ों की,   (3)

 और गुज़रती हुई रात की क़सम! (कि इंकार करने वालों को ज़रूर दंड दिया जाएगा) ------  (4)

 क्या एक समझदार (को विश्वास दिलाने) के लिए ये क़समें काफ़ी नहीं हैं? (5)

 

क्या आपने [ऐ रसूल] नहीं देखा कि आपके रब ने “आद” (की क़ौम) के साथ क्या सलूक किया?  (6)

(जो) ऊँचे-ऊँचे स्तंभोंवाले शहर, “इरम” (में बसते) थे, (7)

उनके जैसे (डील-डौल वाले) लोग इस धरती पर कहीं भी कभी पैदा नहीं किए गए, (8)

और "समूद" (के लोगों के साथ क्या सलूक हुआ) जिन्होंने (क़ुरा नाम की) घाटी में चट्टानों को काट (कर पत्थरों से घरों का निर्माण कर) डाला था, (9)

और फ़िरऔन [Pharaoh] (का क्या हश्र हुआ) जो बड़े ताक़तवर और मज़बूत लशकरोंवाला (या लोगों को खूंटों (Stakes) से दंड देनेवाला) था?  (10)

यह वे लोग थे जिन्होंने (अपने-अपने) इलाक़ों में ज़्यादतियाँ [सरकशी] कर रखी थीं,  (11)

और उनमें बड़े फ़साद मचा रखे थे:  (12)

तो आपके रब ने उन पर यातना का कोड़ा बरसा दिया।  (13)

बेशक आपका रब सब (ज़्यादती करनेवालों और आदेश न माननेवालों) पर हमेशा कड़ी नज़र रखता है।  (14)

 

मगर इंसान (ऐसा है) कि जब उसका रब उसे (आराम व ठाठ देकर) आज़माता है और इज़्ज़त और नेमतें [blessings] प्रदान करता हैतो वह (घमंडी हो जाता है) कहता है, “मेरे रब ने मुझे इज़्ज़त दी है,” (15)

लेकिन जब वह उसे (तकलीफ़ और मुसीबत देकर) आज़माता है और उसकी रोज़ी को सीमित कर देता हैतो वह कहता है, “मेरे रब ने मुझे अपमानित कर दिया।” (16)

हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! मगर (सच्चाई यह है कि सम्मान और धन-दौलत मिलने पर) तुम लोग अनाथों को मान नहीं देते, (17)

और न ही तुम (लोग) ग़रीबों को खाना खिलाने के लिए (समाज में) एक दूसरे को उभारते हो,  (18)

और विरासत का सारा माल (inherited wealth) समेटकर (स्वयं) खा जाते हो (और इसमें से अनाथों और ग़रीब लोगों का हिस्सा नहीं निकालते),  (19)

और तुम धन-दौलत से हद से ज़्यादा लगाव रखते हो।  (20)

 

हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! जब धरती कूट-कूटकर चूर-चूर कर दी जाएगी,  (21)

जब आपका रब और साथ में फरिश्ते क़तार-दर-क़तार लगाये हुए (हश्र के मैदान में) आएंगे,  (22)

और उस दिन जहन्नम [नरक] को सामने लाया जाएगा‌--- उस दिन इंसान को समझ आएगी,  मगर तब उसके चेतने से क्या (फ़ायदा) होगा?  (23)

वह कहेगा “ऐ काश! मैंने अपने (इस आने वाले) जीवन के लिए (कुछ नेकी) पहले भेज दी होती (जो आज मेरे काम आती!)” (24)

सो उस दिन वह [अल्लाह] ऐसा दंड देगा कि वैसा दंड दूसरा कोई नहीं दे सकता, (25)

और न उसके जकड़ने की तरह कोई दूसरा जकड़नेवाला होगा।  (26)

(मगर अल्लाह की याद में सुकून पाने वाले लोगों से कहा जाएगा कि) “ऐ संतुष्ट आत्मा:  (27)

तू अपने रब की तरफ इस हाल में लौट आ कि तू उससे खुश हो और वह तुझ से राज़ी हो;  (28)

और तू शामिल हो जामेरे (नेक) बन्दों में;  (29)

और दाख़िल हो जा मेरी जन्नत [Garden] में।"  (30) 

 

 


नोट:

1-4: सुबह-सवेरे की क़सम इसलिए खायी गई है कि रात के लम्बे अंधेरे के बाद सुबह आते ही तुरंत एक राहत सी महसूस होती है और हर चीज़ में एक नई ऊर्जा आ जाती है। आगे आयत 4 में रसूल को फिर से आश्वस्त किया गया है कि रात अंधेरी है मगर गुज़रती जा रही है। 

"10 रातों की क़सम" के कई मतलब बताए गए हैं, जैसे कि ये रमज़ान की आख़िरी 10 रातें हैं  या  बक़रीद के महीने की पहली 10 रातें जो बड़ी बरकतवाली मानी जाती हैं, मगर दोनों बातें सूरह के संदर्भ से मेल नहीं खाती हैं। यह सूरह मक्का के शुरुआती काल की है जबकि रमज़ान के रोज़े बहुत साल बाद मदीना में शुरू हुए थे, इसी तरह ज़ुल-हिज्जा यानी बक़रीद का महीना वहाँ पहले से ही पवित्र माना जाता था जिनमें हर तरह की हिंसा या मारपीट पर रोक थी, मगर आगे आयत 6-13 के संदर्भ से पता लगता है कि यहाँ इस दुनिया में  दी जानेवाली सज़ा के बारे में बात कही जा रही है। बहरहाल, ये दस रातें नये साल यानी मुहर्रम की पहली 10 रातें मानी जा सकती हैं जिनमें शायद यह आश्वासन है कि नये साल आने पर कुछ बदलाव होगा। आयत 4 में 10 रातों के गुज़रते जाने में शायद यह ख़बर दी गई है कि मक्का के लोगों को सज़ा देने के लिए  हालाँकि 10 रातें हैं मगर ये गुज़र जाएंगी और सज़ा के लिए थोड़ा इंतज़ार करना होगा। 

जफ़्त [सम या जोड़ा] और ताक़ [विषम या अकेले] की क़सम खायी गई है। 10 की गिनती में सम और विषम दोनों संख्या होती है जो एक के बाद एक जल्दी-जल्दी आती रहती है। यहाँ शायद रसूल को तसल्ली दी गई है कि उनके विरोधियों को सज़ा देने में अभी समय लगेगा मगर यह समय भी जल्दी ही गुज़र जाएगा। 

7: कुछ लोगों का मानना है कि "इरम" आद के दादा का नाम था, और उस क़ौम के लोग बड़े लम्बे डील-डौल वाले होते थे। अरब की प्रचलित क़िस्सों में है कि "इरम" 'आद' की क़ौम का एक मशहूर शहर था जिसे आद के बेटे शद्दाद ने सोने-चांदी और जवाहिरात से बनवाया था। कुछ लोग कहते हैं कि 'इरम' बाइबिल के "अरम" से मिलता है जो कि दक्षिणी सीरिया के आरमियाई साम्राज्य (11वीं --8वीं सदी ई.पूर्व) का हिस्सा था, जिसकी राजधानी दमश्क़ थी जिसको असीरियन फौज ने 732 ई.पूर्व में बर्बाद कर दिया था। इस क़ौम के पास हज़रत हूद (अलै) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था। देखें सूरह अ'राफ़ (7: 65-72) और सूरह हूद (11: 50)

9: समूद के लोगों के पास हज़रत सालिह (अलै) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था। देखें सूरह अ'राफ़ (7: 73-79) 

10: फ़िरऔन को "खूंटोंवाला" इसलिए कहा गया है कि वह लोगों को सज़ा देने के लिए उनके हाथ-पांव में खूंटें गाड़ दिया करता था। 

17: अल्लाह ने रोज़ी का बंटवारा अपनी गहरी समझ-बूझ के अनुसार किया है, अत: अगर रोज़ी में कमी हो, तो उसे अपनी तौहीन समझना भी ग़लत है, और रोज़ी में अगर बढ़ोत्तरी हो, तो उसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लेना भी ग़लत है, क्योंकि इस दुनिया में अल्लाह ने बहुत से ऐसे लोगों को धन-दौलत दी है जो अच्छे व नेक नहीं हैं। 

23: मरने से पहले ही या क़यामत से पहले तक अगर किसी ने (असल) सच्चाई पर विश्वास कर लिया, तब तो उसका ईमान रखना लाभदायक होगा, क्योंकि क़यामत हो जाने के बाद विश्वास करने का कोई फ़ायदा नहीं है।









 

 

 

 

 

 

 

 

No comments:

Post a Comment

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...