सूरह 53: अन-नज्म
[चमकीला तारा, The Star (Sirius)]
यह एक मक्की सूरह है
जिसमें इस बात की पुष्टि की गई है कि पैग़म्बर द्वारा दिए जा रहे संदेश अल्लाह की
ही तरफ़ से उतारे गए हैं, और रात की उस यात्रा [मेराज, सूरह 17] की भी पुष्टि की गई है जिसमें मुहम्मद
सल्ल. पहले मक्का से येरुशलम और वहाँ से सातवें आसमान पर गए थे (आयत 1-18). यह सूरह विश्वास न करने वालों द्वारा अपनी इबादतों में उन देवियों और
फ़रिश्तों के बारे में किए जाने वाले दावों को रद्द करती है (19-28), और आगे अल्लाह की ताक़त की बहुत सी सच्चाइयों को इंगित करती है। सूरह
का अंत इस बात पर हुआ है कि फ़ैसले की घड़ी [क़यामत] हर हाल में आकर रहेगी। सूरह के
शुरू में तारे की क़सम खायी गई है, जिस पर इस सूरह का नाम पड़ा
है।
विषय:
01-18: दो ख़्वाब [Visions]19-25: मुश्रिकों [बहुदेववादियों] की देवियों की खुली निंदा
26-31: फ़रिश्ते देवियाँ नहीं हैं
32: अल्लाह सब जानता है
33-55: मूसा (अलै.) और इबराहीम (अलै.) की (आसमानी) किताबें
56-62: क़यामत की घड़ी आने ही वाली है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है चमकीले तारे की, जब वह डूबता है (1)
[ऐ मक्का-वासियो!] तुम्हारे ही साथ रहनेवाले [मुहम्मह] साहब न रास्ता भूले हैं, न उन्हें कोई धोखा हुआ है; (2)
और वह अपनी इच्छा से कुछ नहीं बोलते हैं; (3)
यह (क़ुरआन) तो बस एक "वही" [Revelation] है, जो (अल्लाह द्वारा) भेजी जाती है (4)
उन्हें बड़ी शक्तियोंवाले (फ़रिश्ते जिबरील/Gabriel) ने सिखाया है, (5)
जो ज़बरदस्त ताक़त रखता है। और (एक दिन) वह [फ़रिश्ता] सामने खड़ा था, (6)
क्षितिज [Horizon] के ऊँचे छोर पर, (7)
फिर वह उस (रसूल) की तरफ़ बढ़ा ---- और नीचे उतर आया (8)
यहाँ तक कि वह (रसूल से) दो कमानों के बराबर की दूरी या उससे भी नज़दीक हो गया ----- (9)
इस तरह, अल्लाह को अपने बन्दे की ओर जो 'वही' अवतरित [Reveal] करनी थी, वह उतार दी गयी। (10)
जो कुछ उस (रसूल) ने देखा, उनके दिल को इसे समझने में कोई धोखा नहीं हुआ; (11)
फिर भी क्या तुम उनसे उस चीज़ पर झगड़ा करोगे, जिसे उन्होंने अपनी आँखों से देखा था? (12)
(सच्चाई यह है कि) वह उस (फरिश्ते) को दूसरी बार भी (मेराज के सफ़र में) देख चुके हैं: (13)
उस बेर के पेड़ [Lote tree] के किनारे जिसकी सीमा के आगे कोई नहीं जा सकता है ['सिदरतुल मुन्तहा'], (14)
'जन्नतुल मावा' [सुकूनवाले बाग़] के नज़दीक, (15)
उस वक़्त बेर के पेड़ पर ऐसी अजीब चमक छाई हुई थी जिसकी न तो कल्पना की जा सकती है और न वर्णन! (16)
(रसूल की) निगाह न तो इधर उधर बहकी और न हद से आगे बढ़ी, (17)
और उन्होंने (वहाँ) अपने रब की कुछ बहुत बड़ी-बड़ी निशानियाँ देखीं। (18)
[विश्वास न करनेवालो!], भला क्या तुमने “लात” और “उज़्ज़ा”(नामक देवियों) (19)
और तीसरी एक और (देवी) “मनात” पर विचार किया? (20)
क्या तुम्हारे लिए तो बेटे हों और अल्लाह के लिए बेटियाँ? (21)
तब तो यह बहुत अन्यायपूर्ण बँटवारा हुआ! (22)
सच तो यह है कि ये तो बस कुछ नाम हैं जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं, अल्लाह ने उनके लिए कोई सनद नहीं उतारी। असल में, वे [काफ़िर] लोग तो केवल अटकल के सहारे अपने मन की इच्छा के पीछे चल रहे हैं, हालाँकि उनके पास उनके रब की ओर से मार्गदर्शन आ चुका है। (23)
(क्या उनकी देवियाँ उनके लिए सिफ़ारिश कर सकती हैं?) या आदमी वह सब कुछ पा लेगा, जिसकी वह कामना करता है, (24)
(नहीं!) क्योंकि इस दुनिया और आने वाली दुनिया का मालिक तो अल्लाह ही है? (25)
आसमानों में कितने ही फ़रिश्ते हैं, मगर उनकी सिफ़ारिश कुछ काम नहीं आएगी; हाँ, यह तभी काम आ सकती है जब ख़ुद अल्लाह जिसे चाहे इसके लिए अनुमति दे दे, और जिसकी बात को मान ले। (26)
जो लोग आने वाली दुनिया को नहीं मानते, वे फ़रिश्तों को देवियों के नाम से याद करते हैं, (27)
हालाँकि इस विषय में उन्हें कोई जानकारी नहीं जिसका कोई आधार हो: वे केवल अटकल के पीछे चलते है। हक़ीक़त यह है कि सच्चाई के मामले में केवल अंदाज़ा लगाने से कोई लाभ नहीं होता। (28)
अतः [ऐ रसूल!] आप ऐसे लोगों पर ध्यान न दें जो हमारी (उतारी हुई) नसीहतों से मुँह मोड़ता है, और जो इस सांसारिक जीवन के सिवा कुछ और चाहता ही नहीं। (29)
ऐसे लोगों के ज्ञान की पहुँच बस यहीं तक है। तुम्हारा रब उसे बहुत अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो उसके मार्ग से भटक गया और कौन है जिसने सीधा मार्ग पा लिया। (30)
अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है। तो जिन लोगों ने बुरे कर्म किए, वह उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा, और जिन लोगों ने नेक काम किए, उन्हें ख़ूब अच्छा बदला देगा; (31)
रहे वे लोग जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते हैं, हाँ अगर संयोगवश कोई छोटी-मोटी बुराई उनसे हो भी जाए, तो निश्चय ही तुम्हारा रब माफ़ करने में बहुत बड़ा है। वह तुम्हें उस समय से जानता है, जबकि उसने तुम्हें धरती से पैदा किया और जबकि तुम अपनी माओं के पेट में बच्चे के रूप में छुपे हुए थे। अतः अपने मन की पवित्रता का दावा न करो: वह अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता है। (32)
[ऐ रसूल!], क्या आपने उस आदमी को देखा जिसने (सच्चाई से) मुँह मोड़ लिया: (33)
उसने (भलाई के काम में) थोड़ा-सा ही ख़र्च किया और फिर हाथ रोक लिया। (34)
क्या उसके पास अनदेखी [Unseen] चीज़ों का ज्ञान है? क्या वह [आने वाली दुनिया को] देख सकता है? (35)
क्या उसे बताया नहीं गया है जो कुछ मूसा की (आसमानी) किताबों में लिखा हुआ था, (36)
और इबराहीम की (किताबों में) भी, जिन्होंने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया: (37)
कि कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा; (38)
और यह कि आदमी को (बदले में) बस वही कुछ मिलेगा जिसके लिए उसने कोशिश की होगी; (39)
और यह कि उसकी हर कोशिश देखी जाएगी (40)
फिर अंत में (उसकी हर कोशिश का) उसे पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा; (41)
और यह कि अन्त में (सबको) आपके रब के पास पहुँचना है; (42)
और यह कि वही है जो हँसाता और रुलाता है; (43)
और यह कि वही है जो मौत भी देता है और ज़िंदगी भी; (44)
और यह कि उसी ने नर और मादा के जोड़े पैदा किए, (45)
(वह भी बस) एक बूँद [Sperm] से, जब वह (मादा के अंदर) टपकाई जाती है; (46)
और यह कि (मरने के बाद) दोबारा ज़िंदा उठाना भी उसी के ज़िम्मे है; (47)
और यह कि वही है जो धनवान बनाता है और पूँजी को सुरक्षित बनाता है; (48)
और यह कि वही है जो “शेअरा” [Sirius, नाम का तारा जिसे अरब के लोग पूजते थे] का रब है (49)
और यह कि वही है जिसने पुराने ज़माने में आद की क़ौम को पूरी तरह से तबाह व बर्बाद कर दिया; (50)
और समूद को भी। फिर किसी को बाक़ी न छोड़ा। (51)
और उससे पहले नूह की क़ौम को भी (तबाह कर दिया), बेशक वे ज़ालिम और हद से बढ़े हुए थे। (52)
और (लूत के क़ौम की) जो बस्तियाँ औंधी पड़ी थीं, उनको भी उसी ने उठाकर नीचे दे पटका था, (53)
तो फिर (पत्थरों की बारिश ने) उन्हें ढँक लिया, और वह उन्हें ढँक कर ही रही; (54)
तो फिर [ऐ इंसान] तू अपने रब की कौन कौन सी नेमतों में संदेह करेगा? (55)
यह (रसूल के द्वारा दी जानेवाली) एक चेतावनी है, ठीक वैसी ही चेतावनी [Reminder] जैसी पिछले ज़मानों में भी भेजी जा चुकी हैं। (56)
(क़यामत की) वह घड़ी जो आनी ही है, निकट आ पहुँची है (57)
और अल्लाह के सिवा कोई नहीं है जो उस [क़यामत] को सामने ला खड़ा करे। (58)
अब क्या तुम [लोग] इसी बात पर आश्चर्य करते हो; (59)
और (उसका मज़ाक़ बनाकर) हँसते हो, जबकि तुम्हें रोना चाहिए! (60)
तुम क्यों (घमंड में चूर होकर खेल-तमाशे में ऐसे मगन हो कि) इस ओर ध्यान नहीं देते? (61)
अब (भी) झुक जाओ अल्लाह के सामने और उसकी बन्दगी करो। (62)
नोट:1: यहाँ डूबते तारे की क़सम खायी गई है। जब तारा बीच आसमान में काफ़ी ऊँचाई पर होता है तो उससे सही दिशा का अंदाज़ा नहीं होता, मगर जब वह डूबने लगता है तो साफ़ दिखता है और उससे रात के समय चारों दिशाओं का पता लगाना आसान हो जाता है, और अरब के लोग रात में यात्रा के दौरान इसी की मदद से सही दिशा का पता लगाते थे और रास्ता भटकने से बचते थे (देखें 6:97; 16:16), तो जिस तरह से तारे का काम अंधेरी रात में यात्रियों को सही रास्ता दिखाना है, उसी तरह रसूल का मार्गदर्शन अल्लाह द्वारा भेजी गई "वही" [Revelation] से होता है, और फिर रसूल का काम लोगों को सही रास्ता दिखाना है (42:52). इसके अलावा तारों की यात्रा के लिए अल्लाह ने जो रास्ते निर्धारित कर दिए हैं, वे उससे थोड़ा भी इधर-उधर नहीं होते, और न उससे भटकते हैं, इसी तरह आगे कहा गया है कि मुहम्मद साहब न रास्ता भूले हैं, न भटके हैं, और जो संदेश वह देते हैं वह अल्लाह की तरफ़ से ही 'वही' के रूप में उतारा जाता है।
2: मुहम्मद साहब मक्का में ही बीच बचपन से रहे थे, वह कहीं बाहर से नहीं आ गए थे। उनकी ज़िंदगी वहाँ के लोगों के सामने खुली किताब की तरह थी और वे उन्हें
हमेशा सच बोलनेवाले के रूप में जानते थे।
7: मक्का के कुछ लोगों का कहना था कि मुहम्मद साहब के पास जो फ़रिश्ता अल्लाह का संदेश लेकर आता है, वह इंसान की शक्ल में आता है, इसलिए आपको कैसे पता चला कि वह कोई फ़रिश्ता ही है! इसी के जवाब में कहा गया है कि आपने उस फ़रिश्ते को कम से कम दो बार उसके असली रूप में भी देखा है। इनमें से एक घटना का ज़िक्र तो इस आयत में है जबकि मुहम्मद साहब ने उस फ़रिश्ते [हज़रत जिबरील] से आग्रह किया था कि वह अपनी असली सूरत में आपके सामने आएं, सो वह क्षितिज पर आपको दिखायी दिए।
9: “दो कमानों की दूरी” अरबी में एक मुहावरा है, जब दो आदमी आपस में दोस्ती का क़रार करते, तो अपनी कमानें एक दूसरे से मिला लेते थे, इसी कारण अधिक नज़दीक आने के लिए इसे प्रयोग किया जाता है।
15: यहाँ दूसरी बार फ़रिश्ते को असली रूप में देखने का बयान है, जब मुहम्मद साहब मेराज के सफ़र में ऊपर के आसमान ले जाए गए। वहाँ बेर का एक बहुत बड़ा पेड़ है और इसी के पास जन्नत स्थित है जो ईमानवालों का ठिकाना होगा [जन्नत-उल-मावा]। कुछ विद्वानों का मानना है कि इस आयत में मुहम्मद साहब ने बेर के पेड़ के पास फ़रिश्ते जिबरील को नहीं, बल्कि अल्लाह को देखा था, और वह भी दो कमानों की दूरी से जिसका वर्णन यहां किया गया है।
20: “लात, उज़्ज़ा और मनात” तीनों अरब के अलग-अलग क़बीलों की देवियाँ
थी जिन्हें वे लोग पूजते थे। यहाँ बताया दिया गया कि वे बेजान पत्थर के सिवा कुछ नहीं हैं।
21: लोग फ़रिश्तों को ख़ुदा की बेटियाँ मानते थे, जबकि ख़ुद बेटियों को पसंद नहीं करते थे।
33: इस आयत के बारे में कहा जाता है कि एक काफिर आदमी ने क़ुरआन सुनकर उसपर विश्वास कर लिया था, उसके एक दोस्त ने पूछा कि तुम अपने बाप-दादा का दीन क्यों छोड़ रहे हो? उसने कहा कि वह आख़िरत [परलोक] की यातना से डरता है, इस पर उसके दोस्त ने कहा कि अगर वह मुझे कुछ पैसे दे तो मैं यह ज़िम्मेदारी लेता हूँ कि अगर आख़िरत में तुम्हें यातना हुई तो वह गुनाह अपने सर ले लेगा। इस आयत में बताया गया है कि यह बेकार की बातें हैं, कोई आदमी किसी दूसरे के गुनाहों का बोझ नहीं उठायेगा।
37: देखें सूरह बक़रा (2: 123).
यह एक मक्की सूरह है जिसमें इस बात की पुष्टि की गई है कि पैग़म्बर द्वारा दिए जा रहे संदेश अल्लाह की ही तरफ़ से उतारे गए हैं, और रात की उस यात्रा [मेराज, सूरह 17] की भी पुष्टि की गई है जिसमें मुहम्मद सल्ल. पहले मक्का से येरुशलम और वहाँ से सातवें आसमान पर गए थे (आयत 1-18). यह सूरह विश्वास न करने वालों द्वारा अपनी इबादतों में उन देवियों और फ़रिश्तों के बारे में किए जाने वाले दावों को रद्द करती है (19-28), और आगे अल्लाह की ताक़त की बहुत सी सच्चाइयों को इंगित करती है। सूरह का अंत इस बात पर हुआ है कि फ़ैसले की घड़ी [क़यामत] हर हाल में आकर रहेगी। सूरह के शुरू में तारे की क़सम खायी गई है, जिस पर इस सूरह का नाम पड़ा है।
विषय:
19-25: मुश्रिकों [बहुदेववादियों] की देवियों की खुली निंदा
26-31: फ़रिश्ते देवियाँ नहीं हैं
32: अल्लाह सब जानता है
33-55: मूसा (अलै.) और इबराहीम (अलै.) की (आसमानी) किताबें
56-62: क़यामत की घड़ी आने ही वाली है
[ऐ मक्का-वासियो!] तुम्हारे ही साथ रहनेवाले [मुहम्मह] साहब न रास्ता भूले हैं, न उन्हें कोई धोखा हुआ है; (2)
और वह अपनी इच्छा से कुछ नहीं बोलते हैं; (3)
यह (क़ुरआन) तो बस एक "वही" [Revelation] है, जो (अल्लाह द्वारा) भेजी जाती है (4)
उन्हें बड़ी शक्तियोंवाले (फ़रिश्ते जिबरील/Gabriel) ने सिखाया है, (5)
जो ज़बरदस्त ताक़त रखता है। और (एक दिन) वह [फ़रिश्ता] सामने खड़ा था, (6)
क्षितिज [Horizon] के ऊँचे छोर पर, (7)
फिर वह उस (रसूल) की तरफ़ बढ़ा ---- और नीचे उतर आया (8)
यहाँ तक कि वह (रसूल से) दो कमानों के बराबर की दूरी या उससे भी नज़दीक हो गया ----- (9)
इस तरह, अल्लाह को अपने बन्दे की ओर जो 'वही' अवतरित [Reveal] करनी थी, वह उतार दी गयी। (10)
जो कुछ उस (रसूल) ने देखा, उनके दिल को इसे समझने में कोई धोखा नहीं हुआ; (11)
फिर भी क्या तुम उनसे उस चीज़ पर झगड़ा करोगे, जिसे उन्होंने अपनी आँखों से देखा था? (12)
'जन्नतुल मावा' [सुकूनवाले बाग़] के नज़दीक, (15)
उस वक़्त बेर के पेड़ पर ऐसी अजीब चमक छाई हुई थी जिसकी न तो कल्पना की जा सकती है और न वर्णन! (16)
(रसूल की) निगाह न तो इधर उधर बहकी और न हद से आगे बढ़ी, (17)
और उन्होंने (वहाँ) अपने रब की कुछ बहुत बड़ी-बड़ी निशानियाँ देखीं। (18)
[विश्वास न करनेवालो!], भला क्या तुमने “लात” और “उज़्ज़ा”(नामक देवियों) (19)
और तीसरी एक और (देवी) “मनात” पर विचार किया? (20)
क्या तुम्हारे लिए तो बेटे हों और अल्लाह के लिए बेटियाँ? (21)
तब तो यह बहुत अन्यायपूर्ण बँटवारा हुआ! (22)
(क्या उनकी देवियाँ उनके लिए सिफ़ारिश कर सकती हैं?) या आदमी वह सब कुछ पा लेगा, जिसकी वह कामना करता है, (24)
(नहीं!) क्योंकि इस दुनिया और आने वाली दुनिया का मालिक तो अल्लाह ही है? (25)
आसमानों में कितने ही फ़रिश्ते हैं, मगर उनकी सिफ़ारिश कुछ काम नहीं आएगी; हाँ, यह तभी काम आ सकती है जब ख़ुद अल्लाह जिसे चाहे इसके लिए अनुमति दे दे, और जिसकी बात को मान ले। (26)
जो लोग आने वाली दुनिया को नहीं मानते, वे फ़रिश्तों को देवियों के नाम से याद करते हैं, (27)
हालाँकि इस विषय में उन्हें कोई जानकारी नहीं जिसका कोई आधार हो: वे केवल अटकल के पीछे चलते है। हक़ीक़त यह है कि सच्चाई के मामले में केवल अंदाज़ा लगाने से कोई लाभ नहीं होता। (28)
अतः [ऐ रसूल!] आप ऐसे लोगों पर ध्यान न दें जो हमारी (उतारी हुई) नसीहतों से मुँह मोड़ता है, और जो इस सांसारिक जीवन के सिवा कुछ और चाहता ही नहीं। (29)
ऐसे लोगों के ज्ञान की पहुँच बस यहीं तक है। तुम्हारा रब उसे बहुत अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो उसके मार्ग से भटक गया और कौन है जिसने सीधा मार्ग पा लिया। (30)
[ऐ रसूल!], क्या आपने उस आदमी को देखा जिसने (सच्चाई से) मुँह मोड़ लिया: (33)
उसने (भलाई के काम में) थोड़ा-सा ही ख़र्च किया और फिर हाथ रोक लिया। (34)
क्या उसके पास अनदेखी [Unseen] चीज़ों का ज्ञान है? क्या वह [आने वाली दुनिया को] देख सकता है? (35)
क्या उसे बताया नहीं गया है जो कुछ मूसा की (आसमानी) किताबों में लिखा हुआ था, (36)
और इबराहीम की (किताबों में) भी, जिन्होंने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया: (37)
कि कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा; (38)
और यह कि उसकी हर कोशिश देखी जाएगी (40)
फिर अंत में (उसकी हर कोशिश का) उसे पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा; (41)
और यह कि अन्त में (सबको) आपके रब के पास पहुँचना है; (42)
और यह कि वही है जो हँसाता और रुलाता है; (43)
और यह कि वही है जो मौत भी देता है और ज़िंदगी भी; (44)
और यह कि उसी ने नर और मादा के जोड़े पैदा किए, (45)
(वह भी बस) एक बूँद [Sperm] से, जब वह (मादा के अंदर) टपकाई जाती है; (46)
और यह कि वही है जो धनवान बनाता है और पूँजी को सुरक्षित बनाता है; (48)
और यह कि वही है जो “शेअरा” [Sirius, नाम का तारा जिसे अरब के लोग पूजते थे] का रब है (49)
और यह कि वही है जिसने पुराने ज़माने में आद की क़ौम को पूरी तरह से तबाह व बर्बाद कर दिया; (50)
और समूद को भी। फिर किसी को बाक़ी न छोड़ा। (51)
और (लूत के क़ौम की) जो बस्तियाँ औंधी पड़ी थीं, उनको भी उसी ने उठाकर नीचे दे पटका था, (53)
तो फिर (पत्थरों की बारिश ने) उन्हें ढँक लिया, और वह उन्हें ढँक कर ही रही; (54)
तो फिर [ऐ इंसान] तू अपने रब की कौन कौन सी नेमतों में संदेह करेगा? (55)
यह (रसूल के द्वारा दी जानेवाली) एक चेतावनी है, ठीक वैसी ही चेतावनी [Reminder] जैसी पिछले ज़मानों में भी भेजी जा चुकी हैं। (56)
(क़यामत की) वह घड़ी जो आनी ही है, निकट आ पहुँची है (57)
और अल्लाह के सिवा कोई नहीं है जो उस [क़यामत] को सामने ला खड़ा करे। (58)
अब क्या तुम [लोग] इसी बात पर आश्चर्य करते हो; (59)
और (उसका मज़ाक़ बनाकर) हँसते हो, जबकि तुम्हें रोना चाहिए! (60)
तुम क्यों (घमंड में चूर होकर खेल-तमाशे में ऐसे मगन हो कि) इस ओर ध्यान नहीं देते? (61)
अब (भी) झुक जाओ अल्लाह के सामने और उसकी बन्दगी करो। (62)
1: यहाँ डूबते तारे की क़सम खायी गई है। जब तारा बीच आसमान में काफ़ी ऊँचाई पर होता है तो उससे सही दिशा का अंदाज़ा नहीं होता, मगर जब वह डूबने लगता है तो साफ़ दिखता है और उससे रात के समय चारों दिशाओं का पता लगाना आसान हो जाता है, और अरब के लोग रात में यात्रा के दौरान इसी की मदद से सही दिशा का पता लगाते थे और रास्ता भटकने से बचते थे (देखें 6:97; 16:16), तो जिस तरह से तारे का काम अंधेरी रात में यात्रियों को सही रास्ता दिखाना है, उसी तरह रसूल का मार्गदर्शन अल्लाह द्वारा भेजी गई "वही" [Revelation] से होता है, और फिर रसूल का काम लोगों को सही रास्ता दिखाना है (42:52). इसके अलावा तारों की यात्रा के लिए अल्लाह ने जो रास्ते निर्धारित कर दिए हैं, वे उससे थोड़ा भी इधर-उधर नहीं होते, और न उससे भटकते हैं, इसी तरह आगे कहा गया है कि मुहम्मद साहब न रास्ता भूले हैं, न भटके हैं, और जो संदेश वह देते हैं वह अल्लाह की तरफ़ से ही 'वही' के रूप में उतारा जाता है।
2: मुहम्मद साहब मक्का में ही बीच बचपन से रहे थे, वह कहीं बाहर से नहीं आ गए थे। उनकी ज़िंदगी वहाँ के लोगों के सामने खुली किताब की तरह थी और वे उन्हें
हमेशा सच बोलनेवाले के रूप में जानते थे।
7: मक्का के कुछ लोगों का कहना था कि मुहम्मद साहब के पास जो फ़रिश्ता अल्लाह का संदेश लेकर आता है, वह इंसान की शक्ल में आता है, इसलिए आपको कैसे पता चला कि वह कोई फ़रिश्ता ही है! इसी के जवाब में कहा गया है कि आपने उस फ़रिश्ते को कम से कम दो बार उसके असली रूप में भी देखा है। इनमें से एक घटना का ज़िक्र तो इस आयत में है जबकि मुहम्मद साहब ने उस फ़रिश्ते [हज़रत जिबरील] से आग्रह किया था कि वह अपनी असली सूरत में आपके सामने आएं, सो वह क्षितिज पर आपको दिखायी दिए।
9: “दो कमानों की दूरी” अरबी में एक मुहावरा है, जब दो आदमी आपस में दोस्ती का क़रार करते, तो अपनी कमानें एक दूसरे से मिला लेते थे, इसी कारण अधिक नज़दीक आने के लिए इसे प्रयोग किया जाता है।
15: यहाँ दूसरी बार फ़रिश्ते को असली रूप में देखने का बयान है, जब मुहम्मद साहब मेराज के सफ़र में ऊपर के आसमान ले जाए गए। वहाँ बेर का एक बहुत बड़ा पेड़ है और इसी के पास जन्नत स्थित है जो ईमानवालों का ठिकाना होगा [जन्नत-उल-मावा]। कुछ विद्वानों का मानना है कि इस आयत में मुहम्मद साहब ने बेर के पेड़ के पास फ़रिश्ते जिबरील को नहीं, बल्कि अल्लाह को देखा था, और वह भी दो कमानों की दूरी से जिसका वर्णन यहां किया गया है।
20: “लात, उज़्ज़ा और मनात” तीनों अरब के अलग-अलग क़बीलों की देवियाँ
थी जिन्हें वे लोग पूजते थे। यहाँ बताया दिया गया कि वे बेजान पत्थर के सिवा कुछ नहीं हैं।
21: लोग फ़रिश्तों को ख़ुदा की बेटियाँ मानते थे, जबकि ख़ुद बेटियों को पसंद नहीं करते थे।
33: इस आयत के बारे में कहा जाता है कि एक काफिर आदमी ने क़ुरआन सुनकर उसपर विश्वास कर लिया था, उसके एक दोस्त ने पूछा कि तुम अपने बाप-दादा का दीन क्यों छोड़ रहे हो? उसने कहा कि वह आख़िरत [परलोक] की यातना से डरता है, इस पर उसके दोस्त ने कहा कि अगर वह मुझे कुछ पैसे दे तो मैं यह ज़िम्मेदारी लेता हूँ कि अगर आख़िरत में तुम्हें यातना हुई तो वह गुनाह अपने सर ले लेगा। इस आयत में बताया गया है कि यह बेकार की बातें हैं, कोई आदमी किसी दूसरे के गुनाहों का बोझ नहीं उठायेगा।
37: देखें सूरह बक़रा (2: 123).
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