सूरह 97: अल-क़द्र
यह एक मक्की सूरह है जिसमें उस रात की महानता का बयान है जिस रात क़ुरआन पहली बार सन 610 ई. में रमज़ान महीने के आख़िरी हफ़्ते में उतरी थी।
विषय:
01-05: क़द्र [Decree] की रात जब क़ुरआन उतरी
1: एक मतलब तो यह है कि क़द्र की रात में पूरी क़ुरआन लौह-ए-महफ़ूज़ [सुरक्षित स्लेट/Preserved Tablet] से सबसे नीचे वाले आसमान में उतारी गई, फिर (फ़रिश्ता) हज़रत जिबरील इसे थोड़ा-थोड़ा करके 23 साल तक मुहम्मद (सल्ल.) पर उतारते रहे (2:97), दूसरा मतलब यह हो सकता है कि मुहम्मद साहब पर क़ुरआन के उतरने की शुरुआत सबसे पहले इसी रात में हुई। यह रात रमज़ान के महीने की आख़िरी 10 विषम [Odd] रातों यानी 21, 23, 25, 27, या 29वीं तारीख़ में से कोई रात थी।
4: इस रात में फ़रिश्तों के उतरने के दो मक़सद होते हैं। एक यह कि जो लोग इस रात इबादत में लगे रहते हैं, फ़रिश्ते उनके लिए दुआ करते हैं, और दूसरा “हर काम के लिए उतरने” का मक़सद यह है कि अल्लाह इस रात में साल भर के फ़ैसले फ़रिश्तों के हवाले कर देता है, ताकि वे अपने-अपने समय पर उन पर अमल करते रहें (देखें 44:4).
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