Wednesday, March 30, 2022

Surah/सूरह 65: At-Talaq/अत-तलाक़ [तलाक़/ Divorce]

 सूरह 65: अत-तलाक़

 [तलाक़/ Divorce]

यह एक मदनी सूरह है जिसमें तलाक़ के नियम-क़ायदे बताए गए हैं (आयत 1-7). इस सूरह में काफ़ी ज़ोर देकर लोगों से कहा गया है कि वे अल्लाह के नियम-क़ायदों और मार्गदर्शन को मानें। इस बात को मज़बूती से दिमाग़ में बैठाने के लिए पिछली पीढ़ियों के विश्वास न करने वाले लोगों के बुरे अंजाम याद दिलाए गए हैं और साथ में हुक्म मानने वालों के इनाम के बारे में भी बताया गया है। फिर अंत में अल्लाह की ताक़त और उसके बेहिसाब ज्ञान पर ज़ोर दिया गया है (आयत 12).

विषय:
01- 07: तलाक़ से जुड़े हुए नियम-क़ायदे

08-10: चेतावनी पिछली पीढ़ियों को मिलने वाली सज़ा से 

10-11: ईमानवालों का अंजाम

12   : सातों आसमान और सातों ज़मीन 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल!] जब तुममें से कोई भी अपनी बीवियों को तलाक़ देना चाहे, तो ऐसे समय पर दे, जब उनके लिए इद्दत का समय [waiting period] शुरू हो सके, और इस अवधि का हिसाब ध्यान से करो: और अल्लाह का डर रखो, जो तुम्हारा रब है। (इस दौरान) उन (बीवियों) को अपने घरों से न निकालो--- और न उन्हें ख़ुद से निकलना चाहिए----- सिवाय इसके कि वे कोई खुला हुआ अश्लील कर्म [indecency] कर बैठें। ये अल्लाह की तय की हुई सीमाएँ हैं ----जिसने अल्लाह की तय की हुई सीमाएं तोड़ी, तो उसने  स्वयं अपने आप पर ही ज़ुल्म किया ---- क्योंकि तुम नहीं जानते कि शायद इस (तलाक़) के बाद अल्लाह (सुलह की) कोई नयी सूरत पैदा कर दे। (1)  

फिर जब वे (औरतें) अपनी (इद्दत की) निर्धारित अवधि पूरी करने के नज़दीक पहुंच जाएं, तो या तो उन्हें इज़्ज़त के साथ (अपने वैवाहिक जीवन में) वापस ले लो, या (इद्दत पूरी होने के बाद) इज़्ज़त के साथ उनसे अलग हो जाओ। अपने लोगों में से दो न्याय पसंद करने वाले गवाहों को बुला लो और अल्लाह के वास्ते गवाही को पक्का बनाओ। जो कोई अल्लाह पर और अंतिम दिन [क़यामत] पर ईमान रखता है, उसे इस बात पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए: अल्लाह उनके लिए (परेशानी से) निकलने का कोई न कोई रास्ता निकाल देगा, जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, (2)

और उन्हें उस जगह से रोज़ी देगा जिसका उन्हें अंदाज़ा तक न होगा; जो कोई अल्लाह पर भरोसा करता है, तो उसके लिए अल्लाह काफ़ी है। अल्लाह अपना काम पूरा करके रहता है; अल्लाह ने हर चीज़ का एक सही अंदाज़ा तय कर रखा है। (3)  

अगर तुम्हें (इद्दत के बारे में) कोई संदेह हो, (तो जान लो) कि उन औरतों के लिए इद्दत की अवधि तीन महीने है, जिनकी माहवारी आनी बंद हो चुकी है, और उनकी भी इतनी ही है जिनकी अभी तक माहवारी शुरू नहीं हुई; जो औरतें गर्भवती हों, उनके लिए इद्दत की अवधि उस समय तक होगी, जब तक कि वे बच्चा जन न लें: जो कोई अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचता है, अल्लाह उसके काम में आसानी पैदा कर देता है। (4)  

यह अल्लाह का आदेश है जो उसने तुम पर उतार भेजा है। जो कोई अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचता है, अल्लाह उसके गुनाहों को मिटा देगा और उसके इनाम को बढ़ा देगा। (5)
 

अपनी हैसियत के अनुसार, जहाँ तुम स्वयं रहते हो, उन औरतों को भी वहीं रहने की जगह दो जिनको तलाक़ दे रहे हो, और उन्हें इतना परेशान न करो कि उनका जीना दूभर हो जाए। अगर वे गर्भवती हों, तो उनपर तब तक ख़र्च करते रहो जब तक कि वे बच्चा जन न दें; फिर अगर वे तुम्हारे बच्चे को दूध पिलाएँ तो तुम उन्हें उनका पारिश्रामिक [compensation] दो। भले तरीक़े से आपस में सलाह करके (दूध पिलाने की) बात तय कर लो----- अगर तुम एक दूसरे के लिए मुश्किलें पैदा करोगे, तो फिर कोई दूसरी औरत उस [बाप] के लिए (पैसे के बदले) बच्चे को दूध पिला सकती है। (6)

और अमीर आदमी को अपनी हैसियत के मुताबिक़ (ऐसी औरतों को) ख़र्चा-पानी देना चाहिए। मगर जिसकी रोज़ी ज़रा कम हो, तो जो कुछ अल्लाह ने उसे दे रखा है, उसी में से वह ख़र्च करे: अल्लाह ने किसी को जितना (माल) दिया है, उससे बढ़कर वह किसी आदमी पर (ज़िम्मेदारी का) बोझ नहीं डालता----- (पैसे की) तंगी के बाद अल्लाह आसानी पैदा कर देगा। (7)
 

कितनी ही बस्तियाँ हैं जिन्होंने अपने रब और उसके रसूलों के आदेश का बड़ी ढिटाई से विरोध किया, तो हमने उनका पूरी कड़ाई से हिसाब लिया: और उन्हें बड़ी सख़्त सज़ा दी! (8)  

ताकि उन्हें उनके कुकर्मों के बुरे नतीजे का मज़ा चखा सकें---- उनके (बुरे) कर्मों का अंजाम उनकी बर्बादी थी। (9)  

अल्लाह ने उनके लिए (आख़िरत/परलोक में) कठोर यातना तैयार कर रखी है।
 
अतः तुम जो समझ-बूझ रखते हो, तुम जो ईमान रखते हो, अल्लाह से डरते रहो। उसने तुम्हारे पास नसीहत देनेवाली क़ुरआन भेजी है, (10)

और (साथ में) भेजा है एक रसूल ----- जो तुम्हें अल्लाह की आयतें पढ़कर सुनाते हैं, ये (आयतें) चीज़ों को साफ़ व स्पष्ट कर देती है---- ताकि वे जो ईमान रखते हैं और नेक व अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें अँधेरों से निकालकर रौशनी की तरफ़ ले जाए। जो कोई अल्लाह पर विश्वास रखे, और अच्छा कर्म करे, उसे वह ऐसे (जन्नत के) बाग़़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहां ऐसे लोग हमेशा के लिए रहेंगे --- अल्लाह ने उनके लिए बहुत अच्छी रोज़ी रखी है। (11)


वह अल्लाह है जिसने सात आसमानों को पैदा किया, और उन्हीं के जैसी (सात) ज़मीन भी। उसका आदेश [आयतें] उनके बीच उतरता रहता है। अतः तुम्हें जान लेना चाहिए कि हर चीज़ पूरी तरह से अल्लाह के क़ाबू में है, और यह कि उसने हर चीज़ को अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। (12)




नोट:

1: जब मियाँ-बीवी में तलाक़ हो जाए, तो औरत को दूसरी शादी करने से पहले जितनी अवधि तक इंतज़ार करना होता है, उसे "इद्दत" [Waiting period] कहते हैं।  तलाक़ अगर देना ही है, तो ऐसे समय देना चाहिए जब 'इद्दत' का समय शुरू हो सके, मतलब यह है कि जब औरत माहवारी ख़त्म करने के बाद साफ़-सुथरी हो गई हो, और उसके साथ पति ने सेक्स न किया हो, तब से इद्दत की अवधि शुरू होगी और यह अवधि तीन माहवारी [menstrual cycle] तक चलती है [2: 228].  इद्दत की अवधि पूरी होने तक अगर पति ने एक या दो बार ही तलाक़ दिया हो, तो वह अपनी बीवी को फिर से अपना सकता है। इद्दत पूरी हो जाने के बाद अगर तीसरा तलाक़ भी दे दिया, तो फिर तलाक़ पक्का हो जाएगा।  

2: अगर पति ने तलाक़ के बाद बीवी को दोबारा अपनाने का फ़ैसला किया है, तो अच्छा तरीक़ा यह है कि यह फ़ैसला दो गवाहों के सामने किया जाए। अगर इस बात को साबित करने की ज़रूरत पड़ जाए कि पति ने अपनी बीवी को दोबारा अपनाया है या नहीं, तो फिर उन गवाहों को इस बात की ठीक-ठीक गवाही देनी चाहिए। 

4: आम हालत में तो इद्दत की अवधि तीन माहवारी तक है। मगर यह अवधि उन औरतों के लिए तीन महीने होगी जिन्हें माहवारी आनी अब बंद हो गई हो, या उन लड़कियों के लिए भी इतनी ही होगी जिनकी माहवारी अभी शुरू नहीं हुई है। 

6: बच्चे को दूध पिलवाने की ज़िम्मेदारी बाप की मानी जाती है, बच्चे को दूध पिलाने का ज़्यादा हक़ माँ का है, इसलिए अगर ज़रूरत पड़े, तो बाप को उसके लिए पैसा देना होगा, वह चाहे तलाक़शुदा बीवी को दे या किसी दूध पिलानेवाली को।  


No comments:

Post a Comment

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...