सूरह 61: अस-सफ़
यह एक मदनी सूरह है
जिसमें ईमानवालों का हौसला बढ़ाते हुए अल्लाह के रास्ते में संघर्ष करने और एक-जुट
रहने की बात कही गई है (आयत 4 में आए ज़िक्र पर
इसका नाम पड़ा है). यह उन लोगों की निंदा करती है जो अपने किए हुए वादे से मुकर गए
(आयत 3), और जो ईमान के विरोध में बहस किया करते थे (आयत 7-8).
मूसा और ईसा अलै. को रसूलों में मिसाल के तौर पर पेश किया गया है
जिनकी क़ौमें बंट गई थीं: उनमें आदेश न मानने वाले बाग़ी लोगों को भटकता छोड़ दिया
गया और जो आज्ञाकारी लोग थे उन्हें कामयाबी दी गई (आयत 5-6, 14). जो लोग अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करते हैं, उनको मिलने वाले इनाम के बारे में थोड़ा विस्तार से बताया गया है (आयत 11-13).
विषय:
1: अल्लाह की महानता
02- 04: जो कहो, वह करो
05-09: इसराईल की संतानों की तरफ़ से विरोध
10-13: ईमानवालों का अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करना
14: ईमान रखने वालों को अल्लाह (के दीन) का मददगार होना
1: आसमान और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है, भले ही हम इंसान इसे समझ नहीं पाते। देखें 24:36; 59:24; 17:44.
2: बताया जाता है कि कुछ मुसलमानों ने मदीना में यह इच्छा जतायी थी कि "अगर उन्हें मालूम हो जाए कि अल्लाह को सबसे ज़्यादा पसंद क्या काम है, तो वे वही काम करेंगे!" उस समय जंग का माहौल था, अल्लाह का आदेश आया कि "उसकी राह में जो मज़बूत क़तारों में खड़े होकर लड़ते हैं, अल्लाह उन्हें बहुत पसंद करता है" (आयत 4), मगर जब उहुद की जंग (625 ई) में लड़ने की बारी आयी, तो इसमें से कुछ लोग भाग खड़े हुए, देखें 3:121; 3:155. इसीलिए, यहाँ उन्हें ऐसी बात कहने से मना गया है जो वे करते नहीं हैं।
5: मूसा (अलै) की क़ौम ने उन्हें बहुत दुख़ दिए (33:69)। कभी लोगों ने कहा कि हमें सामने-सामने अल्लाह को दिखा दो (4:153), कभी बछड़े की पूजा करने लगे (2: 92-93), कभी आसमान से उतरने वाले "मन व सलवा" खाने से मना कर दिया (2:61), और तो और जब इसराईल में दाख़िल होने के लिए लड़ने को कहा गया तो उससे भी इंकार कर दिया (5:24).
6: अल्लाह के पैग़म्बरों का तरीक़ा रहा है कि उन्होंने अपने से पहले की उतरी किताबों की सच्चाई की पुष्टि की है और आने वाले पैग़म्बरों के बारे में ख़बर दी है। सो ईसा (अलै) ने भी तौरात की सच्चाई की पुष्टि की और 'अहमद' नाम के आने वाले पैग़म्बर [Paraclete] की ख़बर बाइबल में दी (देखें John 14:16; 26; 15:26; 16:7)। "अहमद" और मुहम्मद नाम का मतलब "तारीफ़ के लायक़" होता है, और आपके कई नामों में से अहमद नाम भी मशहूर है, और इसकी पहचान विद्वानों ने शुरू से ही मुहम्मद (सल्ल) से की है।
...... ईसा (अलै) ने स्पष्ट निशानियाँ दिखायी थीं, जैसे मिट्टी की चिड़िया में साँस फूँककर उड़ा देना, अंधे और कोढ़ी आदमी को ठीक कर देना, मुर्दे को ज़िंदा कर देना [5:110], मगर फिर भी इसराइली लोगों ने इसे जादूगरी माना और ठुकरा दिया।
7: जब कोई पैग़म्बर लोगों को अल्लाह के सामने झुक जाने के लिए बुलाए, और लोग उसकी बात न सुनें और उसे पैग़म्बर मानने से इंकार कर दें, तो यह एक तरह से अल्लाह के बारे में झूठ गढ़ने जैसा है।
8: लोग चाहते हैं कि अल्लाह की रौशनी [क़ुरआन] को कभी जादूगरी, या शायरी या तांत्रिक की बातें कहकर बुझा दें। यह बात 9:32 में भी कही गई है।
10: व्यापार में जैसे कोई सामान देकर उसकी क़ीमत वसूल की जाती है, उसी तरह एक मुसलमान अपनी जान और माल अल्लाह के हवाले करता है, तो अल्लाह इसके बदले में जन्नत और यातना से उसे रिहाई दे देता है। देखें सूरह तौबा (9:111)
13: जल्दी ही मिलने वाली जीत से मतलब मक्का की जीत (जनवरी, 630 ई) है, या मुहम्मद (सल्ल) की मृत्यु के कुछ साल बाद मिलने वाली बाइज़ेंटाइन और फ़ारस पर जीत।
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