सूरह 57: अल-हदीद
[लोहा/ Iron]
यह एक मदनी सूरह है जिसमें ईमानवालों से ज़ोर देकर कहा गया है कि वे अल्लाह की राह में ख़र्च करें और इंसाफ़ से काम लें ---- आयत 25 में लोहे का ज़िक्र आया है, जिसे ताक़त के साथ उतारा गया है, ख़ासकर यह देखने के लिए कि कौन है जो अल्लाह के लिए खड़ा हो सकता है, इसी के नाम पर इस सूरह का नाम पड़ा है। अल्लाह की ताक़त, उसका ज्ञान, उसका नियंत्रण, और उसकी महानता, हर चीज़ पर छाई हुई है, और इसको ज़ोर देकर इसलिए बताया गया है कि मुसलमानों का हौसला बुलंद हो सके, और वे सही कार्रवाई कर सकें। इसके साथ ही मदीना के पाखंडियों का होने वाला अंजाम भी बताया गया है। पिछले पैग़म्बरों का ज़िक्र भी आया है (26-27), ख़ासकर नूह, इबराहीम और ईसा (अलै.) के बारे में बताया है कि उनकी क़ौम के लोगों की उनके द्वारा लाए गए संदेश के प्रति कैसी प्रतिक्रिया रही। सूरह के अंत में किताबवाले लोगों [यहूदी + ईसाई] को दावत दी गई है कि वे अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास करें।
01-06: अल्लाह की बड़ाई
07-11: अल्लाह पर विश्वास करने और उसके रास्ते में ख़र्च करने की अपील
12-15: फ़ैसले का दृश्य: ईमानवालों और पाखंडियों का अंजाम
16-24: ईमान रखने और अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने का इनाम
25-27: अल्लाह के रसूल और उनके मानने वाले
28-29: अंत में ईमानवालों को अपने क़दम जमाए रखने पर ज़ोर
7: सभी माल और दौलत का असली मालिक अल्लाह है। वह इसमें से इंसानों को उनकी ज़रूरतें पूरी करने के लिए देता है, मगर चाहता है कि आदमी इस माल को उसके हुक्म के मुताबिक़ ख़र्च करे। इस हक़ीक़त की तरफ़ भी इशारा किया गया है कि दौलत कभी एक हाथ में नहीं रहती, बल्कि हमेशा एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती रहती है। इसलिए आदमी को चाहिए कि उस दौलत को उसके सही हक़दार को देता रहे।
8: अल्लाह ने आदम (अलै) को पैदा करने से पहले ही सारे इंसानों की रूहों से वचन लिया था, देखें 7: 172. यही वजह है कि हर इंसान के अंदर सच्चाई को पहचानने की सलाहियत मौजूद होती है, अगर वह मार्गदर्शन पर ध्यान से विचार करे।
10: मक्का की जीत से पहले (8 हिजरी) मुसलमानों की संख्या और उनके साधन कम थे, और दुश्मन भी ज़्यादा थे, तो उस ज़माने में जिसने अल्लाह के रास्ते में जान और माल दिया, उनकी क़ुर्बानियाँ भी ज़्यादा थीं, इसलिए उनका दर्जा भी अल्लाह की नज़र में ऊँचा है। मक्का की जीत के बाद मुसलमानों की संख्या और साधनों भी बढ़ोतरी हुई और तब जान और माल की क़ुर्बानियाँ भी कम देनी पड़ीं, इसलिए बाद में ईमान लाने वालों का दर्जा थोड़ा कम होगा, मगर हाँ, जन्नत की नेमतें दोनों ही दर्जे के लोगों को मिलेंगी।
11: इंसान जो कुछ दुनिया में ज़रूरतमन्दों को दान-दक्षिना, सदक़ा-ख़ैरात आदि देता है या अच्छे कामों में ख़र्च करता है, उसको अल्लाह ने क़र्ज़ कहा है, और उसके बदले में अल्लाह उस इंसान को दुनिया और आख़िरत में इस तरह देगा जैसे कि कोई क़र्ज़दार अपना क़र्ज़ वापस करता है। "अच्छावाला क़र्ज़" से मतलब अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए साफ़ मन से बिना दिखावा किए हुए किसी को देना। देखें 2: 245; 5: 12.
12: शायद यह उस समय की बात है जब सारे लोग "पुल सिरात" से गुज़र रहे होंगे, वहाँ हर इंसान का ईमान रौशनी बनकर उसे रास्ता दिखाएगा।
13: पाखंडी लोग [मुनाफ़िक़] दुनिया में चूँकि अपने आपको मुसलमान ज़ाहिर करते थे, इसलिए आख़िरत में भी पहले वे मुसलमानों के साथ लग जाएंगे, लेकिन जब असली मुसलमान तेज़ी से आगे निकल जाएंगे और उनके साथ उनकी रौशनी भी आगे
बढ़ जाएगी, तब ये लोग अंधेरे में पीछे छूट जाएंगे।
17: यानी जिन मुसलमानों से अब तक कुछ ग़लतियाँ हुई हैं और वे पूरी तरह ईमान के तक़ाज़ों को पूरा नहीं कर पाए, उन्हें मायूस नहीं होना चाहिए; जिस तरह अल्लाह मुर्दा पड़ी ज़मीन को फिर से हरी-भरी कर देता है, उसी तरह, वह गुनाहों से तौबा करने वालों के गुनाह माफ़ करके उन्हें नई ज़िंदगी दे देता है।
19: "सच्चे लोग" [सिद्दीक़] वे होते हैं जो अपनी बात में और अपने काम में सच्चे होते हैं, जिसने ज़िंदगी में कभी झूठ न बोला हो, इसीलिए उनका दर्जा बहुत ऊँचा होता है। ऐसे लोग अपने रब के सामने गवाह [शहीद] होंगे और वे क़यामत के दिन सारे नबियों के गवाह के तौर पर पेश किए जाएंगे [2: 143] ; गवाह होने का एक मतलब यह भी है कि सच्चाई की तरफ़ लोगों को बुलाना और उन्हें इसकी तालीम देते रहना जिस तरह मुहम्मद (सल्ल) ने अपने मानने वालों को यह शिक्षा दी थी।
22: किताब से मतलब वह "लौह ए महफ़ूज़" [Preserved Tablet] है जिसमें अल्लाह ने क़यामत तक होने वाली घटनाओं को पहले से ही लिख रखा है।
23: जिस आदमी को इस बात पर ईमान होता है कि जो कुछ भी होता है वह तक़दीर में लिखे अनुसार ही होता है, वह हर बुरी से बुरी घटना पर भी धीरज से काम लेता है। इसी तरह अगर उसके साथ कोई अच्छी चीज़ हो जाए, तो बजाय इतराने के, उसे अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए और उसे भी तक़दीर का लिखा ही मानना चाहिए।
24: जो लोग तक़दीर पर विश्वास नहीं करते, वह अपने सारे माल को अपनी कोशिशों से हासिल किया हुए समझते हैं और उस पर इतराते हैं, और उसे अल्लाह के रास्ते में ग़रीबों और ज़रूरतमंदों पर ख़र्च करने से कंजूसी करते हैं।
25: चाहे सांसारिक मामला हो या सही या ग़लत के बीच फ़ैसला करना हो, हमेशा हर चीज़ में इंसाफ़ [न्याय] के साथ काम होना चाहिए। नबियों की शिक्षाएं और उनकी लायी हुई किताबों पर अगर सही तरीक़े से अमल हो, तो हर मामले में न्याय हो सकता है। लेकिन साथ में बुराई की ताक़तें हमेशा फ़साद फैलाती रहती हैं और अन्याय होता रहता है, जिसे दूर करने के लिए इंसानों को लोहा दिया गया है जिससे दूसरे फ़ायदे के साथ जंगी सामान भी बनते हैं, ताकि उन शैतानी ताक़तों से लड़कर न्याय बहाल किया जा सके, साथ में यह भी पता चल जाए कि कौन है जो सच्चाई का साथ देने वाला है।
27: हज़रत ईसा (अलै) के जाने के बाद उनके सच्चे शिष्यों और उनकी शिक्षाओं पर चलने वालों पर उस ज़माने के राजाओं ने बहुत ज़ुल्म किए, उससे बचने और अपना दीन बचाने के लिए उन लोगों ने शहरों से दूर अलग-थलग रहना शुरू किया जहाँ ज़िंदगी की सुख-सुविधाएं बहुत कम थीं, वहाँ monasteries स्थापित कर ली गईं, और धीरे-धीरे इसी तरह जीवन बिताने को इबादत समझ लिया गया। बाद में, जब उन पर ज़ुल्म होना बंद हो गया और ज़िंदगी की सुख-सुविधाएं मिलने लगीं, तब भी उन लोगों ने इनसे दूर ही रहकर कठिन जीवन बिताना चाहा, उनकी शादी-ब्याह भी नहीं होती थी, हालाँकि अल्लाह ने उन्हें ऐसा करने का हुक्म नहीं दिया था। हालाँकि ऐसा उन लोगों ने अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए ही किया था, मगर बाद में उनकी monastery system में बहुत सी गड़बड़ियाँ पैदा होने लगीं, चूँकि इस तरह का जीवन जीना प्रकृति के ख़िलाफ़ था, इसलिए छुप-छुपकर वे आपस में यौन संबंध भी बनाने लगे, इस तरह, वे इस तरीक़े को ठीक ढंग से निभा न सके।
28: यहाँ उन किताबवाले यहूदियों और ईसाइयों का ज़िक्र है जिन्होंने मुहम्मद (सल्ल) के रसूल होने पर विश्वास कर लिया था, इसके लिए अल्लाह उन्हें दोहरा सवाब देगा, देखें 28: 54.
29: यहूदी या ईसाई लोग जो कि किताब वाले थे, केवल अपनी जलन और नफ़रत की वजह से मुहम्मद सल्ल पर ईमान नहीं ला पाए, और वे यही सोचते रहे कि आख़िरी नबी इसराइल की संतानों में न होकर इस्माइल की संतानों में कैसे हो गया! हालांकि नबी बनाने का काम पूरी तरह से अल्लाह के हाथ में है।
ईसाइयों में एक ज़माने में एक अजीब तरीका प्रचलित हो गया था, उनके पादरी पैसे
लेकर लोगों को माफ़ी के परवाने जारी कर देते थे, जिसे मरने वाले के साथ ही उनकी क़ब्रों में गाड़ दिया जाता था, और यह मान लिया जाता था कि मरने वाले के गुनाह माफ़ हो जाएंगे। यहाँ यह बताया गया है कि अल्लाह किसके साथ मेहरबानी करेगा, यह पूरी तरह उसके ही हाथ में है।
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