05-12: सज़ा और इनाम
13-22: अल्लाह का ज्ञान और उसकी ताक़त
23-30: घोषणाओं का सिलसिला
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, और बहुत दयावान है
बड़ी ऊँची शान है उसकी जिसके हाथ में (सारी दुनिया की) बादशाही है; और वह सब कुछ कर सकता है; (1)
जिसने मौत और ज़िंदगी (इसलिए) बनायी, ताकि वह तुम (लोगों) को परीक्षा में डालकर देखे कि तुम में से कौन सबसे अच्छा कर्म करता है ---- वह ज़बरदस्त ताक़तवाला, और बड़ा माफ़ करनेवाला है; (2)
जिसने तल्ले ऊपर सात आसमानों [heavenly spheres] को पैदा किया। तुम रहम करनेवाले रब [रहमान] की रचना में कोई गड़बड़ी या कमी नहीं पाओगे। फिर से देखो! क्या तुम्हें (इसकी बनावट में) कोई गड़बड़ी दिखायी देती है? (3)
एक बार फिर से देखो! और बार-बार देखो! (हर बार) नतीजा यही होगा कि तुम्हारी निगाह थक-हारकर तुम्हारी ओर लौट आएगी। (4)
हमने सबसे नज़दीक वाले (निचले) आसमान को (ग्रहों, तारों आदि जैसे) रौशन दीपों से सजा रखा है और उन्हें (मिसाइल के रूप में) शैतानों को मार भगाने का साधन बनाया है, और हमने इन (शैतानों) के लिए (जहन्नम में) दहकती आग की यातना भी तैयार कर रखी है। (5)
जिन लोगों ने अपने रब (के हुक्म) को मानने से इंकार किया, उनके लिए जहन्नम की यातना तैयार है: वह [जहन्नम] बहुत ही बुरा ठिकाना है। (6)
जब वे उस (आग) में झोंके जाएंगे तो उसके दहाड़ने की आवाज़ सुनेंगे, वह (ऐसी) भड़क रही होगी, (7)
जैसे वह बेहद गुस्से से फट पड़ेगी। जब भी (काफ़िरों का) कोई समूह उसमें डाला जाएगा तो उसके दारोग़ा उनसे पूछेंगे, “क्या तुम्हारे पास कोई चेतावनी देने वाला नहीं आया था?" (8)
वे जवाब देंगे, 'हाँ! हमारे पास अल्लाह का डर सुनाने वाला तो ज़रूर आया था, मगर हमने उस पर विश्वास नहीं किया। हमने कहा, 'अल्लाह ने तो ऊपर से कुछ भी नहीं उतारा [reveal]: तुम तो बहुत ज़्यादा भटके हुए हो”।' (9)
वे कहेंगे, “काश हमने (सच्चाई को) सुना होता, और समझ से काम लिया होता, तो हम (आज) भड़कती आग के वासियों में (शामिल) न होते,” और (10)
वे अपने गुनाहों को ख़ुद स्वीकार कर लेंगे। सो धिक्कार है (जहन्नम की) भड़कती आग में रहने वालों पर! (11)
मगर जो लोग अपने रब से डरते हैं हालाँकि उसे देख नहीं सकते, उनके लिए तो (गुनाहों की) माफ़ी और बड़ा भारी इनाम है। (12)
चाहे तुम लोग अपनी बात छिपाकर करो या सबके सामने करो, (अल्लाह सब जानता है, क्योंकि) वह दिलों के अंदर की (छुपी) बातों की (भी) पूरी जानकारी रखता है। (13)
भला अपनी पैदा की हुई चीज़ को वही नहीं जानेगा, जबकि वह छोटी से छोटी चीज़ पर नज़र रखने वाला, और (हर चीज़ की) ख़बर रखने वाला है? (14)
वही तो है जिसने तुम्हारे लिए धरती को रहने लायक़ बना दिया ---- सो तुम उसके इलाक़ों में चलो फिरो; उसकी (दी गयी) रोज़ी में से खाओ ----- और (मरने के बाद) उसी के पास तुम्हें दोबारा ज़िंदा होकर जाना है। (15)
क्या तुम्हें यक़ीन है कि वह [रब] जो आसमान में (बैठा) है, वह कभी धरती को इस तरह बहुत ज़ोर से नहीं हिलाएगा कि तुम्हें ज़मीन (अपने अंदर) निगल जाए? (16)
क्या तुम्हें यक़ीन है कि वह [रब] जो आसमान में (बैठा) है, वह कभी तुम पर पत्थर बरसाने वाला बवंडर नहीं भेजेगा?
तुम्हें पता चल जाएगा कि मेरी चेतावनी का मतलब क्या होता है। (17)
इनसे पहले भी जो लोग गुज़र चुके, उन लोगों ने भी (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया था ----- सो (देख लो कि) मेरी दी गयी यातना कितनी बुरी थी! (18)
क्या उन्होंने अपने ऊपर पक्षियों को पर फैलाए हुए और (कभी) पर समेटे हुए उड़ते नहीं देखा? उन्हें रहम करने वाले रब [रहमान] के (बनाए क़ानून के) सिवा कौन (हवा में गिरने से) रोके रहता है: वह हर चीज़ पर पूरी नज़र रखता है। (19)
अगर मेहरबानी करने वाला रब [रहमान] तुम्हारी मदद नहीं करता, तो भला कौन सी ऐसी सेना है जो (मुसीबत में) तुम्हारी मदद कर सकती है? विश्वास न करने वाले [काफ़िर] लोग सचमुच निरे धोखे में पड़े हुए हैं। (20)
अगर वह [अल्लाह] रोज़ी देने से हाथ रोक ले, तो भला कोई है जो तुम्हें रोज़ी दे सके? इसके बावजूद वे लोग अपनी बदतमीज़ी और (सच्चाई से) दूर रहने की आदत पर अड़े हुए हैं। (21)
सही रास्ते की समझ किसे ज़्यादा मिली है: उस आदमी को जो औंधे मुंह गिर पड़ा हो, या उस आदमी को जो खड़ा हुआ सीधी राह पर चला जा रहा हो? (22)
[ऐ रसूल], आप कह दें, “वही (अल्लाह) है जिसने तुम्हें पैदा किया, और तुम्हें सुनने, देखने और सोचने-समझने की ताक़त दी ---- (मगर) तुम लोग (इन नेमतों का) कम ही शुक्र अदा करते हो!” (23)
कह दें, “वही (अल्लाह) है जिसने तुम्हें जमीन पर चारों तरफ़ फैला दिया, और (क़यामत के दिन) उसी के पास तुम सबको जमा किया जाएगा।” (24)
वे [बहुदेववादी] कहते हैं, “जो कुछ तुम कहते हो, अगर वह सच है तो बताओ कि यह (क़यामत आने का) वादा कब पूरा होगा?" (25)
आप कह दें, “इसके (आने के समय की) सही जानकारी तो केवल अल्लाह को है: मेरी ज़िम्मेदारी तो बस साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से चेतावनी [warning] देना है।” (26)
फिर जब वे (क़यामत) को पास आता देख लेंगे, तो विश्वास न करने वालों के चेहरे काले पड़ जाएंगे, और (उनसे) कहा जाएगा, “यही है वह चीज़ जिसे (जल्द लाने की) तुम माँग किया करते थे।" (27)
आप कह दें, “ज़रा सोचो, कि चाहे अल्लाह मुझे और मेरे मानने वालों को बर्बाद कर दे (जैसा कि तुम इच्छा करते हो), या हम पर दया कर दे ---- तो (दोनों हालतों में) विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को दर्दनाक यातना से कौन बचाएगा?” (28)
कह दें, "वह रहम [दया] करने वाला रब [रहमान] है; हम उस पर ईमान [विश्वास] रखते हैं; हम उसी पर अपना भरोसा रखते हैं। तुम्हें जल्द ही पता लग जाएगा कि कौन है जो साफ़ ग़लत रास्ते पर चल रहा है।” (29)
आप कहें: “ज़रा सोचो, अगर (किसी दिन) तुम्हारे (पीने का) सारा पानी ज़मीन में बहुत नीचे को उतरकर सूख जाए, तो कौन है जो तुम्हें (ज़मीन पर) बहता हुआ (साफ़) पानी ला दे?” (30)
नोट:
3. देखें 50:6
5: चिराग़ों से मतलब तारे और दूसरे खगोलीय पिंड हैंं जो रात के समय सजावट का भी ज़रिया बनते हैं और उनसे शैतानों को मारने का काम भी लिया जाता है। शैतानों को मारने की चर्चा 15: 18; 37: 9-10; 72: 8-9 में भी है।
7. गुनाहगारों को अपने अंदर समा लेनी की हवस को 'आग का दहाड़ना' कहा गया है जो कि एक डरा देने वाला वर्णन है। (इसे भी देखें 11: 106; 25: 12)
15: अर्थात ज़मीन की सारी चीजें अल्लाह ने तुम्हारे वश में कर दी हैं, लेकिन इनको उपयोग करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि हमेशा यहाँ नहीं रहना है, बल्कि एक दिन यहाँ से अल्लाह के पास जाना है जहाँ हमें इन नेमतों का हिसाब-किताब देना होगा। अतः यहाँ की हर चीज़ को अल्लाह के हुक्म के अनुसार ही उपयोग करना चाहिए।
16: आख़िरत की यातना तो अपनी जगह है, लेकिन बुरे कर्मों के नतीजे में इस दुनिया में भी यातना आ सकती है, जैसे कि इंसान को क़ारून की तरह ज़मीन में धँसा दिया जा सकता है।
22: "जो मुँह के बल औंधा गिर पड़ा हो" का अनुवाद यह भी हो सकता है कि "वह जो मुँह के बल औंधा चल रहा हो" यानी जानवरों की तरह।
24: अल्लाह ने इंसानों को ज़मीन पर चारों तरफ़ फैला दिया जिस तरह बीज बोनेवाला बीज को चारों तरफ़ फैला देता है।
26: क़यामत आने के समय की जानकारी सिर्फ़ अल्लाह के पास है, (देखें 7: 187; 33: 63; 41: 47; 43: 85; और 46: 23).
28: बहुत से काफ़िर यह कहा करते थे कि जब मुहम्मद साहब दुनिया से चले जाएंगे तो उनके साथ उनका धर्म भी ख़त्म हो जाएगा, सो वे आपकी मृत्यु का इंतज़ार कर रहे थे। [52:30] ,
यहाँ पर यह कहा जा रहा है कि चाहे अल्लाह आप और आपके साथियों को मार डाले या उन पर दया करते हुए उन्हें जीत दिला दे, लेकिन इससे काफ़िरों के अंजाम पर तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, दोनों हालतों में उन्हें यातना ज़रूर झेलनी पड़ेगी।
30: जब यह बात तय है कि पानी समेत हर चीज़ अल्लाह ही के क़ब्ज़े में है तो आख़िर फिर उसके सिवा कौन है जो उपासना के लायक़ है, और कौन सी वजह है जिसके आधार पर उसके इस क़ुदरत का इंंकार किया जाए कि वह इंंसानों को ज़िंदा करके इनाम या सज़ा देगा।
No comments:
Post a Comment