यह एक मक्की सूरह है जिससे रसूल और उनके अनुयायियों के दिल मज़बूत हुए जब यह पता चला कि जिन लोगों ने पहले के ईमानवालों के साथ बहुत ज़ुल्म किया था, उनका कैसा बुरा अंजाम होने वाला है। कहा जाता है कि सन 523-24 ई. में नजरान (यमन और अरब की सरहद पर स्थित)
के ईसाइयों के साथ बुतपरस्तों (या यहूदियों) ने बड़ा ज़ुल्म किया था और उन्हें आग की खायी में फेंक दिया था। उन ज़ालिमों की सज़ा यह होगी कि जहन्नम की आग में जलाए जाएंगे। इस सूरह का नाम अल्लाह की ताक़त को दर्शाता है जो सारे ब्रह्मांड पर छायी हुई है, आसमान के तारों से लेकर शैतानी करने वालों तक जिनका हवाला इस सूरह में आया है। सचमुच इस पूरी सूरह में देखा जाए तो अल्लाह की बेपनाह ताक़त का ज़िक्र है जो हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है।
01-09: खाई खोदनेवाले
10-11: सज़ा और इनाम
12-16: अल्लाह की महानता
17-20: फ़िरऔन और समूद
21-22: यह गौरवशाली क़ुरआन है
और उस [क़यामत के] दिन की क़सम जिसका वादा किया गया है, (2)
क़सम है "गवाह" [अल्लाह] की और (लोगों के) उन (कर्मों) की, जिनके बारे में गवाही दी जाए, (3)
कि बर्बाद हो गए खाई (खोदने) वाले, (4)
(जिन्होंने) ईंधन झोंक-झोंककर आग (से भरी खाइयाँ) बनायी थीं! (5)
जब वे उस (खाई के) किनारों पर बैठे थे, (6)
उस (ज़ुल्म को) देखने के लिए जो कुछ वे ईमानवालों के साथ कर रहे थे (यानी उन्हें आग में फेंक-फेंककर जला रहे थे)। (7)
उन्हें उन (ईमानवालों) से बस एक ही शिकायत थी, और वह था अल्लाह पर उनका विश्वास [ईमान] रखना, वह [अल्लाह], जो बहुत ही ताक़तवाला और सारी तारीफ़ों के योग्य है, (8)
जिसके नियंत्रण [control] में आसमान और ज़मीन की (सारी) बादशाहत है: अल्लाह सारी चीज़ों पर गवाह है। (9)
जिन लोगों ने ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों को यातनाएं दीं, और बाद में (गुनाहों से) तौबा [Repent] नहीं की, तो उनके लिए जहन्नम [नरक] की यातना है, और उनको (वहाँ) आग में जलाया जाएगा। (10)
मगर जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छा कर्म करते हैं, उनके लिए (जन्नत के) बाग़ [Gardens] हैं, जिनके नीचे से नहरें बह रही होंगी: वह बहुत बड़ी कामयाबी है। (11)
[ऐ रसूल], आपके रब की सज़ा सचमुच बड़ी कठोर होती है---- (12)
वही है जो लोगों में पहली बार जान डालता है, और वही उन्हें दोबारा ज़िंदा करेगा ---- (13)
और वह (गुनाहों को) बड़ा माफ़ करनेवाला, (लोगों से) बहुत प्यार करनेवाला है। (14)
(समस्त दुनिया के) सिंहासन का मालिक [Lord of the Throne] है, बड़ी शानवाला है, (15)
वह जो कुछ भी करना चाहता है, उसे कर डालता है। (16)
क्या आपने उन लशकरों [Forces] की कहानियाँ नहीं सुनी हैं, (17)
फ़िरऔन [Pharaoh] और समूद [Thamud] (के लशकरों) की? (18)
इसके बावजूद विश्वास न करने वाले, (सच्चाई से) इंकार करने पर अड़े रहते हैं। (19)
जबकि अल्लाह ने उन सबको अपने घेरे में ले रखा है। (20)
(उनके न मानने से क्या होगा) यह सचमुच बहुत गौरवशाली [Glorious] क़ुरआन है, (21)
जो (अल्लाह के पास) संजोकर रखी हुई स्लेट [Preserved Tablet] पर (लिखी हुई) है। (22)
1-3: पिछले ज़माने में ईमानवालों के एक समूह को केवल एक अल्लाह पर विश्वास करने के चलते जिस तरह के ज़ुल्म का सामना करना पड़ा था, उसको संदर्भ बनाकर यहाँ मक्का के ईमानवालों को तसल्ली दी गई है जो उस समय मक्का में ज़ुल्म का शिकार हो रहे थे। यहाँ आसमान में तारों से भरे बुर्ज की क़सम खायी गई है जो ज़ुल्म करनेवालों के ऊपर मौजूद है और उन्हें अल्लाह की ताक़त से डराया गया है कि आसमान से कभी भी भयानक यातना उनके ऊपर आ सकती है, और "उस दिन की क़सम जिसका वादा किया गया है" से मतलब जिस (क़यामत के) दिन उनका अंतिम फ़ैसला हो जाएगा।
"क़सम है गवाह की और उनकी जिनकी गवाही दी जाए", यहाँ गवाह तो अल्लाह ही जान पड़ता है (देखें आयत 9), या मक्का के अत्याचारी ख़ुद भी गवाह हो सकते हैं (4:87) या उनके अपने हाथ, पाँव और ज़बान भी गवाह हो सकते हैं (24:24; इसे भी देखें 41: 20-21). एक और मतलब हो सकता है कि गवाह (मुहम्मद सल्ल) हैं, जो अल्लाह के सामने ईमानवालों के ईमान की गवाही देंगे।
'जिनके बारे में गवाही दी जाए' उनकी क़सम भी खायी गई है, यानी वे ईमानवाले जिन पर अत्याचार किया गया, और जिसे अत्याचारियों ने देखा, और इस पर अल्लाह भी गवाह है।
4: "खाई खोदनेवाले" के बारे में पिछ्ले ज़माने की कई कहानियाँ बतायी जाती हैंं। कुछ लोग इसे यमन के एक यहूदी राजा ज़ुल नुवास के काल की बताते हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने नजरान के ईसाइयों को क़त्ल करवाया था। इन आयतों में एक घटना की तरफ इशारा है जो हदीस सही मुस्लिम में लिखी हुई एक घटना हो सकती है। पहले किसी जमाने में एक बादशाह था जो एक जादूगर से काम लिया करता था। जब वह जादूगर बूढ़ा हो गया तो उसने एक नैजवान लड़के को जादू सिखाना शुरु किया। लड़का जादूगर के पास जाने लगा, रास्ते में एक ईसाई भिक्षु की कुटिया पड़ती थी जहाँ वह आते-जाते बैठ जाता था। एक दिन वह जा रहा था तो रास्ते में एक बड़ा जानवर नजर आया जिसने लोगों का रास्ता रोक रखा था। लड़के ने एक पत्थर उठाया और अल्लाह से दुआ की, फिर उसके पत्थर मारते ही जानवर मर गया और लोगों का रास्ता खुल गया। लोगों को लगा कि उस लड़के में कोई खास ज्ञान है। एक अंधे आदमी के लिए उसने दुआ की और उसकी आंखों की रोशनी वापस आ गई। इन घटनाओं की जब बादशाह को खबर हुई तो उसने अंधे आदमी को, उस लड़के को और उस ईसाई भिक्षु को गिरफ्तार करवा लिया। और इन सबको कहने लगा कि तुम मुझे पूजने के बजाय अगर एक खुदा पर विश्वास करना नहीं छोड़ोगे, तो तुम्हें सजा दी जाएगी। जब वे तीनों नहीं माने, तो उसने अंधे आदमी और भिक्षु को मरवा डाला और लड़के के बारे में हुक्म दिया कि उसे किसी ऊंचे पहाड़ पर ले जाकर नीचे फेंक दिया जाए, लड़का बच गया, फिर उसे पानी में डुबा देने की कोशिश की गई मगर वह फिर भी बच गया। जब बादशाह परेशान हो गया तो उस लड़के ने कहा कि अगर मुझे सचमुच मारना चाहते हो, तो ऐसा करो कि सब लोगों को एक मैदान में जमा करके मुझे सूली पर चढ़ा दो और अपने तरकश से तीर निकालकर कमान में चढ़ाओ और कहो: "उस अल्लाह के नाम पर जो इस लड़के का पालनहार है, फिर तीर से मेरा निशाना लगाओ।" ऐसा ही किया गया और वह लड़का शहीद हो गया। लोगों ने जब यह घटना देखी, तो बहुत से लोग एक खुदा पर ईमान ले आए। इस मौके पर बादशाह ने उनको सजा देने के लिए सड़कों के किनारों पर खाइयाँ खुदवाकर उनमें आग भड़काई, और हुकुम दिया कि जो कोई मुझे ख़ुदा माने उसे छोड़ दो और जो कोई एक खुदा को मानने पर अड़ा रहे, उसे आग से भरी खाइयों में डाल दिया जाए। विश्वास रखने वालों की बड़ी संख्या को जिंदा जला दिया गया। यह घटना 523 ई. की मानी जाती है। कुछ लोग मानते हैं कि इस घटना में मरनेवाले लोग ईसाई नहीं, बल्कि मजूसी [Magians] थे। बहरहाल, वे जिस दीन के भी मानने वाले थे, यह आयत उन ईमान रखनेवालों पर हुए अत्याचार की निंदा करती है।
22: संजोकर रखी गई स्लेट/पट्टिका या "लौह ए महफ़ूज़" जिसे आम तौर से माना जाता है कि अल्लाह के पास रखी हुई 'मूल किताब' है (देखें 13:39; 43:4) या 'सुरक्षित किताब (56:78), जिससे न केवल क़ुरआन बल्कि सारी आसमानी किताबें यानी तौरात, इंजील, ज़बूर आदि निकली हैं।
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