सूरह 45: अल-जासिया
[घुटनों के बल बैठना, Kneeling]
यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम आयत 28 में आए एक
हवाले से लिया गया है, जहाँ बताया गया है कि फ़ैसले के दिन
सभी समुदाय के लोग कमर के बल झुकी हुई अवस्था में रहेंगे। इस सूरह में उन लोगों की
दलीलों का भी जवाब दिया गया है जो क़ुरआन की सच्चाई को और दोबारा ज़िंदा उठाए जाने
को संदेह से देखते हैं। प्रकृति में चारों ओर फैली हुई अल्लाह की निशानियों पर भी
ज़ोर डाला गया है, और यह बताया गया है कि किस तरह फ़ैसले के
दिन इन सच्चाइयों पर संदेह करने वालों को दर्दनाक सज़ा होगी। विश्वास न करने वालों
का गुमराही में डूबा हुआ जो घमंड है (आयत 8, 31), उसकी तुलना
अल्लाह की सच्ची महानता से की गई है (आयत 37); सूरह की
शुरुआत और अंत अल्लाह की गहरी समझ-बूझ और उसकी महिमा से की गई है।
विषय:
02: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है
03-13: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
14-15: अल्लाह के दिनों का डर
16-19: इसराईल की संतानों का एक रास्ता है, रसूल (सल्ल) का अलग रास्ता है
20-26: क़यामत में दोबारा उठाया जाना और सबका हिसाब-किताब होना तय है
27-35: कर्मों का हिसाब-किताब
36-37: आख़िर में अल्लाह की तारीफ़
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
इस किताब [क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़ से उतारा जा रहा है, जो बहुत ताक़त व इज़्ज़तवाला, गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है। (2) सचमुच आसमानों और ज़मीन में विश्वास रखनेवालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं: (3)
ख़ुद तुम्हारी रचना में, और सभी जीव-जंतुओं में जिनकी रचना करके अल्लाह ने धरती पर फैला रखा है, इनमें उन लोगों के लिए निशानियां हैं जो पक्का ईमान रखते हैं; (4) रात और दिन के बारी-बारी आने जाने में, और उस बारिश में जिसे अल्लाह आसमान से नीचे बरसाता है, जिससे मरी हुई धरती फिर से ज़िंदा हो उठती है, और (इसी तरह) हवाओं की दिशा बदल देने में भी उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं जो बुद्धि से काम लेते हैं। (5) [ऐ रसूल!] ये अल्लाह की निशानियाँ हैं, जिनके द्वारा हम आपको सच्चाई (दिखा और) सुना रहे हैं। अब अगर वे अल्लाह और उसकी उतारी गयी आयतों को भी मानने से इंकार करते हैं, तो आख़िर ये किस बात पर विश्वास करेंगे? (6)
तबाह हो जाए हर झूठ बोलने वाला गुनहगार आदमी, (7) जिसके सामने जब अल्लाह की उतारी गयी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, तो वह सुन लेता है, मगर तब भी वह घमंड के साथ (अपने इंकार पर) अड़ा रहता है मानो उसने कभी कुछ सुना ही नहीं---- अतः उसको दर्दनाक यातना की “सूचना” दे दें! --- (8) और जब वह हमारी उतारी गयी आयतों में से किसी बात को भी अगर जान लेता है, तो वह उसकी हँसी उड़ाता है! ऐसे लोगों के लिए बेइज़्ज़त कर देनेवाली यातना होगी: (9) जहन्नम उनके पीछे (घात में लगी) है, जो भी (धन) उन्होंने कमाया, न तो वह उनके कुछ काम आएगा और न ही वे (झूठे देवता) काम आएंगे जिन्हें इन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर अपने संरक्षक ठहरा रखे हैं --- एक ज़बरदस्त यातना उनके इंतज़ार में है। (10) यह [क़ुरआन] एक दम सच्चा व सही मार्गदर्शन है; और जिन लोगों ने अपने रब की आयतों को मानने से इंकार किया, उन्हें हिला देनेवाली दर्दनाक यातना होगी। (11)
वह अल्लाह ही है जिसने समुद्र को तुम्हारे लिए काम पर लगा दिया है--- उसके आदेश से उसमें जहाज़ें चलती हैं ताकि तुम उससे अपने लिए रोज़ी तलाश कर सको और उस (अल्लाह) का शुक्र अदा कर सको--- (12) उसने अपनी तरफ़ से तोहफ़े के रूप में, आसमान और ज़मीन में जो कुछ भी है, उन सबको तुम्हारे फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा है। सचमुच उन लोगों के लिए इसमें निशानियाँ हैं जो सोच-विचार करते हैं। (13)
[ऐ रसूल!] जो लोग ईमान रखते हैं उनसे कह दें कि, "वे उन लोगों (द्वारा किए गए बुरे सुलूक) को क्षमा कर दें जो लोग अल्लाह के (इस दुनिया में दंड देनेवाले) दिनों का डर नहीं रखते----जैसे भी कर्म उन लोगों ने किए हैं, वह [अल्लाह] उन लोगों को उसका उचित बदला देगा। (14)
जो कोई भी अच्छा कर्म करता है तो अपने ही फ़ायदे के लिए करता है, और जो कोई बुरा कर्म करता है तो वह अपना ही नुक़सान करता है: तुम सब को अपने रब की ओर ही लौटकर जाना होगा। (15)
हमने इसराईल की सन्तानों को किताब, (नियम-क़ानून की) समझ-बूझ और पैग़म्बरी [Prophethood] प्रदान की थी; और हमने उन्हें अच्छी चीज़ों से रोज़ी दी और उन्हें सारे संसारवालों पर श्रेष्ठता दी थी; (16) हमने इस (धर्म के) मामले में उन्हें साफ़ व स्पष्ट प्रमाण दिए थे। मगर इन (तोरात के आदेशों) को जान लेने के बाद भी, आपसी दुश्मनी और जलन के कारण ही उन लोगों का आपस में मतभेद हो गया: आपका रब क़यामत के दिन उन बातों का फ़ैसला कर देगा, जिनमें वे आपस में मतभेद रखते थे। (17) अब हमने आपको [ऐ रसूल] इस (धर्म के) मामले में साफ़ रास्ते [शरीअत] पर डाल दिया है, अतः आप उसी रास्ते पर चलते जाएं। और उन लोगों की इच्छाओं का पालन न करें जो सच्चाई की जानकारी नहीं रखते--- (18) वे अल्लाह के मुक़ाबले में वैसे भी आपके कुछ काम नहीं आ सकते। हक़ीक़त यह है कि ग़लत काम करने वालों के पास बस एक दूसरे का ही सहारा है; जबकि अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचने वालों का मददगार ख़ुद अल्लाह है। (19) यह [क़ुरआन] लोगों में गहरी समझ-बूझ पैदा करनेवाली, सही रास्ता दिखानेवाली, और पक्का विश्वास रखनेवाले लोगों के लिए (अल्लाह की) रहमत [mercy] है। (20)
क्या वे लोग जो बुरे कर्म करते रहते हैं, वे सचमुच ऐसा समझ बैठे हैं कि हम उनके साथ वैसा ही बर्ताव करेंगे जैसा कि उन लोगों के साथ करेंगे जो (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, और यह कि उन (अच्छे और बुरे कर्म करने वालों) का जीना और मरना एक बराबर हो जाएगा? (अगर उनका यही फ़ैसला है तो) कितना ग़लत है उनका फ़ैसला! (21) अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को एक ख़ास मक़सद के साथ पैदा किया है: ताकि हर एक जान को उसके कर्मों के अनुसार बदला दिया जाए, और देते समय उन पर अन्याय न किया जाए। (22) [ऐ रसूल], आप उसके बारे में विचार करें जिसने अपने अंदर की इच्छाओं को ही अपना ख़ुदा बना लिया है, जिसे अल्लाह ने उसकी हालत जानते हुए भटकता छोड़ दिया, और उसके कानों और दिल को ठप्पा लगाकर बंद कर दिया, और उसकी आँखों पर पर्दा डाल दिया--- अब अल्लाह (की ऐसी मर्ज़ी) के बाद कौन है जो उसे मार्ग पर ला सकता है? तो क्या तुम (लोग) इससे शिक्षा नहीं लोगे? (23)
वे कहते हैं, "जो कुछ हमारी ज़िंदगी है वह तो बस इसी संसार की ज़िंदगी है: (इसी में) हम मरते हैं, जीते हैं, और कोई और नहीं बल्कि हमें तो काल (समय) ही मार डालता है।" हालाँकि इस बात की उनके पास कोई जानकारी नहीं है; वे तो बस अटकलें ही दौड़ाते हैं। (24) और जब उनके सामने हमारी स्पष्ट आयतें पढ़कर सुनायी जाती हैं, तो वे अपने तर्क में केवल यही कहते हैं, "यदि तुम सच्चे हो, तो हमारे बाप-दादाओं को (ज़िंदा करके) ले आओ।" (25) [ऐ रसूल] आप कह दें, "अल्लाह ही तुम्हें जीवन देता है, फिर वहीं तुम्हें मौत देता है, फिर वही तुम सब को क़यामत के दिन इकट्ठा करेगा जिसमें कोई संदेह नहीं, मगर अधिकतर लोग यह बात नहीं समझतेI” (26)
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह के नियंत्रण व क़ाबू में है। जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, उस दिन असत्य पर जमे रहनेवाले भारी घाटा उठाएंगे। (27) और (उस दिन) तुम हर एक गिरोह को देखोगे कि वह घुटनों के बल झुका हुआ है। हर गिरोह को अपने कर्मों का हिसाब देने के लिए बुलाया जाएगा: "आज तुम्हें उन कर्मों का बदला दिया जाएगा, जो तुम किया करते थे। (28) "यह हमारा (तैयार किया हुआ कर्मों का) बही-खाता है, जो तुम्हारे बारे में सच-सच बता रहा है: तुम जो कुछ भी करते थे, हम वह सब कुछ लिखवाते रहे हैं।" (29) अतः जो लोग (अल्लाह में) विश्वास रखते थे और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उन्हें तो उनका रब (दया दिखाते हुए) अपनी रहमत [mercy] में दाख़िल कर लेगा ----- यही सबसे स्पष्ट कामयाबी है --- (30) रहे वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया व कुफ़्र पर अड़े रहे (उनसे पूछा जाएगा), “तुम्हारे सामने जब हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती थीं, तो क्या उस वक़्त तुम घमंड में चूर और कुकर्मों में डूबे हुए न थे? (31) और जब तुम से कहा जाता था, “अल्लाह का वादा सच्चा है: उस (क़यामत की) घड़ी में कोई संदेह नहीं है,” तो तुम जवाब में ऐसा नहीं कहते थे कि, "हम नहीं जानते कि वह घड़ी क्या है? हमारे विचार में तो बस यह अटकल लगाने जैसा लगता है, सो हम इसे सच नहीं मानते?“ (32)
(एक दिन आएगा कि) जो कुछ कुकर्म वे करते रहे थे, उसकी बुराइयाँ खुलकर उनके सामने आ जाएंगी, और जिस (दंड) की वे हँसी उड़ाया करते थे, वही उन्हें घेर लेगा। (33) और उनसे कह दिया जाएगा कि "आज हम तुम्हें ठीक वैसे ही भुला देंगे जैसे कि (दुनिया में) तुम इस बात को भुलाए बैठे थे कि तुम्हें इस दिन का सामना करना पड़ेगा। तुम्हारा ठिकाना अब (जहन्नम की) आग है और अब कोई तुम्हारी मदद करने वाला नहीं है, (34) यह सब इसलिए कि तुमने अल्लाह की आयतों [संदेशों] की हँसी उड़ाई थी और सांसारिक जीवन ने तुम्हें धोखे में डाल रखा था।" अतः उस दिन न तो ऐसे लोगों को उस (आग) से बाहर निकाला जाएगा और न उन्हें अपनी ग़लती सुधारने का कोई मौक़ा ही दिया जाएगा। (35)
अतः सारी तारीफ़ें अल्लाह के ही लिए हैं जो ज़मीन और आसमानों का मालिक है और सारे जहानवालों का पालनेवाला है। (36) आसमानों और ज़मीन में असली महानता उसी की है: वह बहुत ताक़तवाला और (अपनी हर बात में) समझ-बूझ रखनेवाला है। (37)
नोट:14: यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि मक्का के लोगों द्वारा किए जा रहे बुरे सलूक और हर तरह की तकलीफ़ें पहुँचाने के बावजूद मुसलमानों को धीरज से काम लेने और उन्हें क्षमा कर देने के लिए कहा जा रहा है। अभी तक उन्हें जवाब में हाथ उठाने से मना किया गया था।
35: अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगने और तौबा करने का दरवाज़ा इंसान के लिए सारी ज़िंदगी खुला रहता है, लेकिन मरने के बाद और परलोक [आख़िरत] पहुँचने के बाद यह दरवाज़ा बंद हो जाता है, और वहाँ माफ़ी माँगने का कोई फ़ायदा नहीं।
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