Wednesday, March 30, 2022

Surah/सूरह 76: Al-Insan/अल-इंसान/ अद-दहर [आदमी/ Man]

 सूरह 76: अल-इंसान/ अद-दहर 

[आदमी/ Man]


यह एक मक्की सूरह है जो बताती है कि आदमी को अच्छा या बुरा रास्ता चुनने की छूट देकर कैसे उसकी परीक्षा ली जाती है (2-3), और शैतानियाँ करने वालों का अंजाम क्या होगा (आयत 4), और अच्छा काम करने वालों का अंजाम क्या होगा (आयत 5-22). पैग़म्बर साहब को कहा गया है कि वह अपनी भक्ति में लगे रहें और धीरज से काम लें (आयत 23-26). 

विषय:

01-03:  इंसानों का पैदा किया जाना

04-22: नेक लोगों का इनाम 

23-26: रसूल को धीरज से काम लेने की सलाह

27-31: एक चेतावनी 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

क्या इंसान पर समयकाल का एक ऐसा वक़्त नहीं गुज़र चुका है कि जब वह कोई उल्लेखनीय चीज़ ही न था? (1)

हमने इंसान को (मर्द व औरत के) मिले-जुले तरल पदार्थ की बूंदों से पैदा किया जिसे हम (बच्चा पैदा होने तक एक चरण से दूसरे चरण तक) पलटते और जाँचते रहते हैं, इसलिए हमने उसे (क्रम से) सुनने वाला (और फिर) देखने वाला बनाया है। (2)

हमने इसे (सही और ग़लत, सच और झूठ में फर्क़ करने की समझ-बूझ के लिए) रास्ता भी दिखा दिया, (अब) चाहे वह (अल्लाह का) आभार मानने वाला हो या आभार न मानने वाला [ungrateful] हो जाए। (3)

हमने विश्वास न रखने वालों के लिए (पैर की) ज़नजीरें और (गर्दन के) तौक़ [iron collars] और (जहन्नम की) दहकती आग तैयार कर रखी है। (4)

निष्ठावान और नेक बंदे (पाकीज़ा शराब के) ऐसे जाम पियेंगे जिसमें काफ़ूर [एक मीठा सुगंधित पौधा] की मिलावट होगी। (5)

(ये जाम वहाँ) के एक बहते हुए सोते [spring] के होंगे जिससे ख़ुदा के ख़ास बंदे पिया करेंगे (और) जहां चाहेंगे (दूसरों को पिलाने के लिए) इसे छोटी नहरों के रूप में बहाकर (भी) ले जाएंगे। (6)

(ये अल्लाह के वे ख़ास बंदे हैं) जो (अपनी) नज़रें [मन्नतें] (मान लेते हैं तो उसे) पूरी करते हैं, और उस दिन से डरते हैं जिसकी सख़्ती बड़ी व्यापक होगी। (7)

और वे (अपना) खाना अल्लाह की मुहब्बत में (स्वयं खाने की चाहत रखने और भूखा  होने के बावजूद) ग़रीबों, अनाथों और क़ैदियों को खिला देते हैं। (8)

(और कहते हैं कि): ”हम तो केवल अल्लाह की खुशी के लिए तुम्हें खिला रहे हैं, न तुमसे बदले में कोई चीज़ हमें चाहिए और न (यह इच्छा है कि) तुम हमारा शुक्र अदा करो।"  (9)

हमें तो अपने रब से उस दिन का डर रहता है जो (चेहरों को) बहुत काला (और) भद्दा कर देने वाला है। (10)

सो अल्लाह उन्हें (अपना डर रखने के कारण) उस दिन की सख़्ती से बचा लेगा और उन्हीं (चेहरों पर) रौनक़ और ताज़गी और (दिलों में) मस्ती व खुशी भर देगा। (11)

और (हमेशा) सब्र व धीरज (से नेक कामों पर डटे रहने) के बदले उन्हें (इनाम के तौर पर रहने को) जन्नत और (पहनने को) रेशमी कपड़े प्रदान करेगा। (12)

वे उसमें तख़्तों पर तकिये लगाए बैठे होंगे, न वहाँ धूप की तेज़ गर्मी पाएंगे और न सर्दी की ठिठुरा देने वाली तेज़ी। (13)

और (जन्नत के पेड़ों के) साये उन पर झुक रहे होंगे और उनके (फलों के) गुच्छे झुककर लटक रहे होंगे। (14)

और (सेवक लोग) उनके आसपास चांदी के बर्तन और (साफ़-सुथरे) शीशे के गिलास लिए फिरते होंगे। (15)

(और) शीशे भी चांदी की तरह के (बने) होंगे जिन्हें सेवकों ने (हर एक की ख़्वाहिश के अनुसार) ठीक-ठीक अनुपात में भरा होगा। (16)

और उन्हें वहां (पाकीज़ा शराब के) ऐसे जाम पिलाए जायेंगे जिनमें सोंठ/अदरक (जैसी महक) की मिलावट होगी। (17)

(वह शराब जन्नत) में “सलसबील” नाम के एक सोते [spring] से बनी होगी। (18) 

और उनके आसपास ऐसे सदाबहार नौजवान लड़के (सेवा में) घूमते रहेंगे कि जब आप उन्हें देखेंगे तो ऐसा लगेगा मानो वे बिखरे हुए मोती हों। (19)

जब आप (जन्नत पर) नज़र डालेंगे तो वहां (बेशुमार) नेमतें और (हर तरफ़) बड़े साम्राज्य के लक्षण दिखायी देंगे। (20)

उन (के शरीरों) पर महीन रेशम के हरे और गाढ़े ब्रोकेड के कपड़े होंगे, और उन्हें चांदी के कंगन पहनाए जाएंगे और उनका रब उन्हें पवित्र शराब पिलाएगा। (21) 

(उनसे कहा जाएगा): “यह तुम्हारा इनाम है और (संसार में नेक राह पर चलने में की गयी) तुम्हारी मेहनत की सराहना की जाती है।" (22)

(ऐ रसूल), हमने आप पर क़ुरआन थोड़ा-थोड़ा करके उतारा [नाज़िल किया] है। (23) 

सो आप अपने रब के आदेश पाने के लिए धीरज (बनाए) रखें और किसी पापी या सच्चाई से इंकार करने वाले की बात पर कान न धरें।  (24)

और सुबह और शाम अपने रब के नाम का स्मरण किया करें, (25)

और रात की कुछ घड़ियों में (अल्लाह) के सामने सज्दे में सर झुकाया करें और रात के (शेष) लंबे हिस्से में उसकी बड़ाई बयान किया करें। (26)

यह (दुनिया की चाहत रखने वाले) जल्दी से हासिल हो जाने वाली चीज़ [संसार] से प्रेम रखते हैं और एक सख़्त भारी दिन (की याद) को छोड़े बैठे हैं। (27)

(वे नहीं सोचते कि) हम ही ने उन्हें पैदा किया और उनके जोड़-जोड़ को मज़बूत बनाया है और हम जब चाहें उनके बदले में उन्हीं जैसे लोगों को पैदा कर दें। (28)

बेशक यह (क़ुरआन) एक नसीहत है (जो आदमी को सीधे रास्ते पर चलने के लिये याद दिलाती रहती है), सो जो कोई चाहे अपने रब की तरफ़ (पहुंचने का) रास्ता अपनाले। (29)

और तुम खुद कुछ नहीं चाह सकते सिवाय इसके जो अल्लाह चाहे, बेशक अल्लाह ख़ूब जानने वाला, बड़ी समझ-बूझवाला है। (30)

वह जिसे चाहता है अपनी रहमत [दयालुता] के दायरे में ले लेता है, और ज़ालिमों के लिए उसने दर्दनाक अज़ाब [यातना] तैयार कर रखा है। (31)



नोट:

1. यहाँ पैदा होने से पहले के समयकाल के बारे में कहा गया है; जिस तरह से अल्लाह ने इंसानों को पहली बार पैदा किया, उसी तरह वह उन्हें क़यामत के दिन दोबारा पैदा करने की ताक़त रखता है (देखें 19:9, 67).
   

2: मर्द और औरत के मिले-जुले पदार्थ यानी शुक्राणु और अंडाणु के मिश्रण (intermingling of sperm & ovum) से पैदा किया।

 

28: इसका एक मतलब तो यह है कि अगर अल्लाह चाहे तो इन सबको मारकर उनकी जगह दूसरे इंसान पैदा कर दे। दूसरा मतलब यह हो सकता है कि जिस तरह अल्लाह ने उन्हें शुरू में पैदा किया थाउसी तरह वह जब चाहे उनके मरने के बाद भी उन्हें दोबारा पैदा कर देगा।

 


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