Tuesday, March 29, 2022

 सूरह 109: अल-काफ़िरून

[काफ़िर लोग, The Disbelievers]


मक्का के कुछ बहुदेववादियों [बुतपरस्तों] ने मुहम्मद सल्ल. को यह सुझाव दिया था कि समझौते के रूप में आप हमारे देवी-देवताओं की एक साल पूजा करें, फिर एक साल हम आपके एक अल्लाह की पूजा करेंगे। इसी के जवाब में यह मक्की सूरह उतरी थी। 

 

विषय: 

01-06: एक अल्लाह की इबादत में कोई समझौता नहीं 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल!आप कह दें, “ऐ सच्चाई से इंकार करनेवाले (काफ़िरो): (1)

मैं उन (बुतों) की इबादत [worship] नहीं करता जिन्हें तुम पूजते  हो,  (2)

और न तुम उस (ख़ुदा) की पूजा करने वाले हो जिसकी मैं इबादत करता हूँ, (3)

और न (हीमैं (आगे कभीउनकी इबादत करने वाला हूँ जिन (बुतों) की तुम पूजा करते हो,  (4)

और न तुम कभी उसकी पूजा करने वाले होजिसकी मैं इबादत करता हूँ:  (5)

 तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म हैऔर मेरे लिए मेरा दीन।"  (6)

 

 

नोट: 

6: यह सूरह उस समय उतरी थी जब मक्का के कुछ सरदारों ने जिनमें वलीद बिन मुग़ीराआस बिन वायल आदि शामिल थेमुहम्मद (सल्ल) के सामने यह सुझाव रखा कि बढ़ते हुए झमेले को सुलझाने के लिए ऐसा हो कि एक साल आप हमारे देवताओं की पूजा करेंतो दूसरे साल हम आपके ख़ुदा की पूजा कर लेंगे। इससे मिलते-जुलते कुछ और भी सुझाव दिए गए थे जिसमें मुख्य रूप से यही बात थी कि आप किसी न किसी तरह उन मक्का के  काफ़िरों के तरीक़े पर इबादत के लिए तैयार हो जाएंतो आपस में सुलह हो सकती है। 

मगर इस सूरह ने दो-टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि “तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और हमारे लिए हमारा दीन है” (देखें 2:139-141; 28:55; 42:15) यानी कुफ़्र और ईमान के बीच ऐसा कोई समझौता नहीं हो सकता। हाँ जो लोग सच्चाई को क़बूल नहीं करतेवे अपने दीन-धर्म पर अमल करें जिसके नतीजे के लिए वे ख़ुद ही ज़िम्मेदार होंगे।  

 








 

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