सूरह 59: अल हश्र
[फ़ौजों का जमा होना/The Gathering (of forces)]
यह एक मदनी सूरह है, इसके बड़े हिस्से में यहूदियों के क़बीले बनु नज़ीर के हवाले से बात कही गई है, जिन लोगों ने मुसलमानों के मदीना आते ही मुहम्मद सल्ल. से एक शांति-समझौता किया था जिसके मुताबिक़ वे इन शर्तों पर तैयार हुए थे कि न वे मुसलमानों की तरफ़ से और न उनके विरुद्ध किसी युद्ध में भाग लेंगे। मगर जब उन लोगों ने उहुद की लड़ाई में मुसलमानों की हार देखी, तो वे जाकर मक्कावालों से गठबंधन कर बैठे। उन लोगों ने मुहम्मद सल्ल को मार डालने की भी कोशिश की जब वह उनके इलाक़े में गए हुए थे। मुहम्मद सल्ल ने उन लोगों से मदीना छोड़ देने के लिए कहा और वे मान गए, मगर मदीना के पाखंडियों के सरदार, इब्ने उबई ने उन यहूदियों से वादा किया कि अगर वे मुसलमानों से लड़ें तो वह और उसका दल उनके साथ लड़ेगा (11-13), और अगर उन्हें मदीना से जाना ही पड़ा, तो वे भी अपने लोगों के साथ मदीना छोड़ देंगे। चूंकि बनु-नज़ीर ने कई बार समझौते की शर्तों को तोड़ा था, इसलिए मुसलमानों ने मदीना में (626 ई./4 हिजरी) उनकी घेराबंदी कर दी, इब्ने उबई ने यहूदियों को किया हुआ वादा नहीं निभाया, और अंत में बनु-नज़ीर मदीना छोड़कर जाने के लिए तैयार हो गए, कुछ लोग सीरिया चले गए और कुछ लोग ख़ैबर। इस सूरह में यह बताया गया है कि युद्ध के नतीजे में जो कुछ माल हाथ आ जाता है, वह सब अल्लाह का दिया हुआ होता है, इसलिए उसका बंटवारा भी अल्लाह द्वारा दिए गए निर्देश के अनुसार ही होना चाहिए (आयत 6-10). सूरह के आख़िर में, अल्लाह के हुक्म को मानने और उससे डरकर रहने पर ज़ोर दिया गया है (21-24). सूरह का नाम आयत 2 में ज़िक्र हुए "सैन्य बलों के जमा होने" पर रखा गया है।
विषय:
1: अल्लाह की महानता
2-4: किताबवाले (यहूदियों) को देश-निकाला
5-10: यहूदियों को देश से निकाले जाने के नतीजे में हाथ आ गए माल का बटवारा
11-17: पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग बुज़दिल हैं
18-21: लोगों को अल्लाह से डरने की नसीहत
22-24: अल्लाह की महानता
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की तारीफ़ बयान करती है; और वह बेहद ताक़तवाला, समझ-बूझवाला [wise] है। (1)
वही है जिसने उन किताबवाले [यहूदी] लोगों में से जिन [बनू-नज़ीर के क़बीले के] लोगों ने विश्वास तोड़ा था, उनको उस समय घरों से निकाल बाहर किया, जब पहली बार (मुस्लिम फ़ौज) वहाँ (मदीने में) जमा हुई थी-----[ऐ ईमानवालो!] तुमने कभी सोचा भी न था कि वे (वहाँ से) चले जाएंगे, और वे ख़ुद भी यही समझते थे कि उनके मज़बूत क़िले उन्हें अल्लाह (की पकड़) से बचा लेंगे। मगर अल्लाह (की यातना) ने उन्हें ऐसी जगह से आ लिया जिसके बारे में उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था और फिर उनके दिलों में डर बैठा दिया: (नतीजा यह हुआ कि) उनके घर ख़ुद उनके ही हाथों, और ईमानवालों के हाथों बर्बाद हो गए। अतः तुम सब जो नज़र रखते हो, सबक़ सीखो इस (घटना) से! (2)
अगर अल्लाह ने उनकी क़िस्मत में (पहले ही) देश निकाला न लिख दिया होता, तो उन्हें इस दुनिया में (और भी दर्दनाक) यातना देता। आख़िरत [परलोक] में उनके लिए आग की यातना होगी, (3)
यह इसलिए कि उन्होंने ख़ुद अपने आपको अल्लाह और उसके रसूल के विरोध में खड़ा कर लिया: जिस किसी ने अल्लाह का विरोध करने की ठान ली, तो निश्चय ही अल्लाह सज़ा देने में बहुत सख़्त है। (4)
[ईमानवालो! बनू नज़ीर के यहाँ घेरा डालने के दौरान] जो कुछ भी तुमने (उनके) खजूर के पेड़ों के साथ किया----चाहे उन्हें काट डाला या उन्हें जड़ों पर खड़ा रहने दिया-----यह सब तो अल्लाह की मर्ज़ी से ही हुआ, ताकि जिन लोगों ने उसकी आज्ञा मानने से इंकार किया, उन्हें बेइज़्ज़त कर सके। (5)
जो कुछ भी माल (बनू-नज़ीर के लोगों के वहाँ से चले जाने पर) हाथ आ गया, वह तो अल्लाह ने उनसे लेकर अपने रसूल को दिलवा दिया, उसको पाने के लिए [ऐ ईमानवालो!], न तो तुम्हें अपने घोड़े दौड़ाने पड़े और न अपने ऊँट। अल्लाह जिस किसी पर चाहता है, उस पर अपने रसूलों को अधिकार [Authority] प्रदान कर देता है: अल्लाह को सारी चीज़ों की सामर्थ्य प्राप्त है। (6)
जो कुछ माल बस्तीवालों (के वहाँ से चले जाने) से हाथ आ गया, जिसे अल्लाह ने अपने रसूल को दिलवाया, उस पर अधिकार है अल्लाह का, उसके रसूल का, (ग़रीब) नातेदारों का, अनाथों का, ज़रूरतमंदों का और ग़रीब मुसाफ़िरों का ----- यह इसलिए ताकि वह (माल) केवल उन्हीं लोगों में न घूमता रहे, जो तुम में से अमीर हैं ---- अत: तुम्हारे रसूल जो कुछ तुम्हें दे दें, उसे स्वीकार कर लो, और जिस चीज़ से तुम्हें मना कर दें, उससे रुक जाओ। और अल्लाह से डरते रहो: अल्लाह दंड देने में बहुत कठोर है। (7)
(इस माल के हक़दार) वे ग़रीब मुहाजिर [प्रवासी/emigrant] भी हैं, जो (मक्का से) अपने घरों और अपनी जायदादों से निकाल बाहर किए गए, जो अल्लाह की मेहरबानी और उसकी मंज़ूरी चाहते हैं, वे लोग जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल की मदद की---- यही लोग हैं जो सच्चे हैं। (8) वे लोग [अंसार] (भी हक़दार हैं) जो पहले से ही (मदीना में) पक्के ईमान के साथ, अपने घरों में मज़बूती से जमे हुए थे, वे उन लोगों से मुहब्बत करते हैं जिन्होंने (मक्का से) हिजरत करके वहाँ पनाह ले ली है, और जो कुछ भी उन (मुहाजिरों) को दिया जाता है, वे अपने दिलों में उसे (पाने की) कोई इच्छा नहीं रखते। (बल्कि) वे उन [मुहाजिरों] को अपने मुक़ाबले में वरीयता [Preference] देते हैं, हालाँकि वे ख़ुद ही बहुत ग़रीब हैं: जो लोग अपने मन के लोभ से बचे रहे, वही असल में कामयाब हैं। (9)
और (इस माल में उनका भी हिस्सा है) जो लोग उन [अंसार व मुहाजिर] के बाद आए, वे कहते हैं, "ऐ हमारे रब! हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे और हमारे उन भाइयों के गुनाहों को भी माफ़ कर दे जिन्होंने हमसे पहले (सच्चाई पर) विश्वास कर लिया था, और हमारे दिलों में विश्वास [ईमान] रखनेवालों के प्रति कोई बुरी भावना [malice] न रख। ऐ रब! तू सचमुच बड़ा करुणामय, बेहद दया करनेवाला है।" (10)
[ऐ रसूल!] क्या आपने उन पाखंड करनेवाले [मुनाफ़िक़/Hypocrites] लोगों को नहीं देखा, जो अपने उन किताबवाले साथियों से कहते हैं जो ईमान से ख़ाली हैं, कि "अगर तुम्हें यहाँ से निकाला गया, तो हम भी तुम्हारे साथ निकल जाएँगे----- हम ऐसे आदमी की कभी कोई बात नहीं सुनेंगे, जो तुम्हें नुक़सान पहुँचाना चाहेगा-----और अगर तुम पर हमला होता है, तो हम ज़रूर तुम्हारी मदद को आएंगे?" अल्लाह गवाही देता है कि वे बिल्कुल झूठे हैं: (11) अगर वे बाहर निकाले गए, तो ये (पाखंडी) लोग कभी उनके साथ नहीं निकलेंगे; अगर उन पर हमला हो, तो ये कभी उनकी मदद के लिए नहीं आएंगे। और अगर कभी ये उनकी मदद के लिए आए भी, तो जल्द ही दुम दबाकर भाग खड़े होंगे----- अंत में उन्हें कोई मदद नहीं मिलने वाली। (12) उनके दिलों में [ऐ ईमानवालो] अल्लाह से ज़्यादा, तुम्हारा डर समाया हुआ है क्योंकि ये ऐसे लोग हैं जिनमें समझदारी बिल्कुल नहीं है। (13) यहाँ तक कि अगर वे एकजुट हों, तब भी वे तुमसे कभी जंग नहीं करेंगे, और अगर कभी लड़ें भी, तो मज़बूत क़िले के अंदर से या ऊँची दीवारों के पीछ से (लड़ेंगे)। उनकी आपस में सख़्त लड़ाई है: तुम सोचते होगे कि वे एकजुट हैं, मगर उनके दिल टुकड़ों में बँटे हुए हैं, और यह इसलिए है कि ये ऐसे लोग हैं जो बुद्धि से काम नहीं लेते। (14) इनकी हालत उन्हीं लोगों [बनू क़ैनूक़ा] जैसी है, जो उनसे ठीक पहले (वहाँ से बाहर निकाले) गए थे, वे अपने कर्मों के वबाल का मज़ा चख चुके हैं, और (आख़िरत में) एक दर्दनाक सज़ा उनके इंतज़ार में है। (15) इन (पाखंडियों) की मिसाल शैतान जैसी है जो आदमी से कहता है, "(सच्चाई पर) ईमान [विश्वास] मत रखो!" मगर फिर, जब आदमी कुफ़्र [विश्वास करने से इंकार] कर देता है, तो शैतान कह देता है, "मैं तुम से अलग होता हूँ; मैं अल्लाह से डरता हूँ, जो सारे संसार का रब है।" (16) उन दोनों को अंत में (जहन्नम की) आग में जाना है, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। शैतानियाँ करनेवालों का यही बदला है। (17)
ऐ ईमानवालो! अल्लाह से डरते रहो, और हर आदमी को यह बात ध्यान से सोचना चाहिए कि उसने कल (क़यामत के दिन] के लिए क्या (पुण्य) आगे भेजा है; अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहो, क्योंकि वह सारी चीज़ें जो तुम करते हो, अल्लाह उन्हें अच्छी तरह जानता है। (18) और (देखो!) उन लोगों की तरह न हो जाना जो अल्लाह को भूल जाते हैं, अत: अल्लाह उन्हें ऐसा कर देता कि वे स्वयं अपनी जानों को भुला बैठते हैं: यही वे लोग हैं जो आज्ञा न माननेवाले, बाग़ी [rebellious] हैं-----(19) (जहन्नम की) आग में रहने वालों और (जन्नत के) बाग़ में रहने वालों के बीच कोई तुलना हो ही नहीं सकती है----- और बाग़ [जन्नत] में रहनेवाले ही कामयाब लोग हैं। (20) अगर हमने इस क़ुरआन को किसी पहाड़ पर उतारा होता, तो [ऐ रसूल] आप देखते कि वह अल्लाह के दबदबे व डर से झुक जाता और टूट-फूट जाता: हम ये मिसालें लोगों के सामने इसलिए पेश करते हैं ताकि वे इस पर सोच-विचार कर सकें। (21)
वही अल्लाह है: उसके सिवा (पूजने के लायक़) कोई ख़ुदा नहीं। वही है जो छिपी हुई चीज़ों को भी जानता है, और सामने दिखाई देनेवाली चीज़ों को भी जानता है, वह सब पर मेहरबान है, बेहद दया करने वाला है। (22) वही अल्लाह है: उसके सिवा (पूजने के लायक़) कोई ख़ुदा नहीं, वह बादशाह [नियंत्रक] है, बेहद पवित्र है, शांति (सुकून) देनेवाला, सुरक्षा देनेवाला, सबकी देखरेख करनेवाला, बेहद ताक़तवाला, गड़बड़ी को ठीक करनेवाला, सचमुच बहुत बड़ाईवाला है; अल्लाह उन चीज़ों से कहीं महान और ऊँचा है जिन्हें वे (अल्लाह का) साझेदार [Partner] ठहराते हैं। (23) वही अल्लाह है: (हर चीज़ का) पैदा करनेवाला, अस्तित्व देनेवाला, रूप देनेवाला। सब अच्छे नाम उसी के हैं। आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ उसकी बड़ाई बयान करती है: वह बेहद ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझवाला है। (24)
नोट:
2: मदीना में यहूदियों की बड़ी आबादी थी, उनके एक क़बीले बनु नज़ीर के साथ मुहम्मद (सल्ल) ने एक संधि कर ली थी कि मदीना में हमला होने की सूरत में एक-साथ मिलकर उसकी रक्षा करेंगे या कम से कम विरोधियों के साथ मिलकर नहीं लड़ेंगे। इसके बावजूद, मक्का के हाथों उहुद की जंग में हार के बाद भी यहूदियों ने मक्का के लोगों के साथ मिलकर मदीना के मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें करनी शुरू की, और उनसे यह वादा कर लिया कि अगर वे लोग मदीना पर हमला करें तो वे उनका साथ देंगे। इसके अलावा, मुहम्मद (सल्ल) बनु नज़ीर क़बीले के पास संधि की कुछ शर्तों पर अमल कराने के लिए बातचीत करने गए, तो उन लोगों ने उन्हें मार देने की साज़िश रची, जिसका उन्हें पता चल गया और वह वहाँ से बच निकले। इस घटना के बाद आपने बनु नज़ीर क़बीले के साथ संधि समाप्त करने का संदेश भेज दिया और उन्हें कुछ समय दे दिया जिसके अंदर उन्हें मदीना छोड़कर चले जाने का हुक्म दिया गया, अन्यथा मुसलमान उन पर हमला करने के लिए आज़ाद होंगे। इधर कुछ पाखंडियों [मुनाफिक़] ने जाकर बनु नज़ीर को यक़ीन दिलाया कि आप लोग डटे रहें, अगर मुसलमानों ने हमला किया, तो वे आप लोगों का साथ देंगे। बनु नज़ीर की तरफ़ से बार-बार संधि की शर्तों को तोड़ने के कारण मुसलमानों ने बनु नज़ीर के क़िले की (21 दिन की) घेराबंदी कर दी (4 हिजरी/626 ई.)। जब बनु नज़ीर ने कहीं से कोई मदद आती नहीं देखी तो हथियार डाल दिए, उनसे कहा गया कि हथियार छोड़कर वे अपनी सारी दौलत अपने साथ ले जा सकते हैं। अत: वे लोग अपने घरों के दरवाज़े तक उखाड़कर वहाँ से ले गए, और जाकर सीरिया और ख़ैबर में बस गए।
6: बनु नज़ीर के मदीने से चले जाने के बाद उनकी ज़मीनें, खजूरों के बाग़ और मकान आदि जो हाथ आ गए, वह असल में बिना युद्ध लड़े ही हासिल हो गए थे।
12: जब बनु नज़ीर के क़िले की घेराबंदी की गई तो कोई पाखंडी [मुनाफिक़] उनकी मदद को नहीं आया।
15: इससे पहले एक और यहूदी क़बीला "बनु क़ैनूक़ा" था, उसने भी मुसलमानों के साथ शांति समझौता किया था, मगर फिर बद्र की लड़ाई के बाद ख़ुद ही लड़ाई मोल ले ली, और हार जाने के बाद देश से निकाले गए।
16: शैतान की यह आदत है कि शुरू में वह आदमी को गुनाह पर उकसाता है,
जब उसके नतीजे में बात मानने वाले आदमी को कोई तकलीफ़ उठानी पड़्ती है, तो फिर वह उनसे अलग हो जाता है। आख़िरत में तो वह काफ़िरों की ज़िम्मेदारी लेने से साफ मुकर
जाएगा, जैसा कि सूरह इबराहीम (14: 22) में आया है। इसी तरह, पाखंडी लोग शुरू में यहूदियों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ उकसाते रहे, मगर जब समय आया, तो साफ़ मुकर गए।
19: अल्लाह को भूल बैठने के नतीजे में वह ऐसे हो जाते हैं कि वह इस बात की कोई परवाह नहीं करते कि ख़ुद उनकी जानों के लिए कौन सी बात फ़ायदे की है और कौन सी बात नुक़सान की। वह इस तरह अपने आपको भूलकर वही काम करने लगते हैं जो उन्हें तबाही की तरफ़ ले जाने वाले हैं।
24: इस आयत में अल्लाह के बहुत से नाम बताए गए हैं। यहाँ उनका अनुवाद दिया गया है। मुहम्मद (सल्ल) ने अल्लाह के निन्यानवे नाम बताए हैं जिन्हें 'असमा ए हुसना' [ख़ूबसूरत नाम] बताया गया है।
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