Tuesday, March 29, 2022

Surah/सूरह 95 : At-Teen/अत तीन [अंजीर, The Fig]

 सूरह 95: अत तीन

 [अंजीर, The Fig] 


यह एक मक्की सूरह है, अल्लाह ने इंसानों को इज़्ज़त दी मगर इंसान ने अपने आपको इतना गिरा लिया कि वह कर्मों के हिसाब-किताब होने से ही इंकार कर बैठा! इस सूरह में सच्चाई पर विश्वास करने [ईमान] और अच्छे भलाई के काम करने के महत्व पर ज़ोर दिया गया है।


विषय: 

 01-08: नाशुक्रे और सच्चाई को मानने से इंकार करने वालों का बदला 


  
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है


अंजीर [Fig] की क़सम और ज़ैतून [Olive] की क़सम, (1)

और सीना के (पहाड़, Mount Sinai) तूर की क़सम,  (2)

और इस अमन वाले शहर [मक्का] की क़सम! (कि अंतिम फ़ैसला हो कर रहेगा!)   (3)

बेशक हमने इंसान को बेहतरीन (अनुपात और संतुलित) साँचे में ढालकर पैदा किया,  (4)

फिर हम उसे नीचे वालों में भी सबसे गिरी हुई हालत [बुढ़ापे] में पहुँचा देते हैं,  (5)

सिवाय  उन लोगों के जो ईमान लाए,  और अच्छे कर्म करते रहे, तो उनके लिए कभी समाप्त  होने वाला इनाम है‌‌।  (6)

फिर उसके बाद, [ऐ इंसान!]किस चीज़ ने तुम्हें अंतिम फ़ैसले [इनाम और सज़ा] को मानने से इंकार करने पर मजबूर कर दिया?  (7)

क्या अल्लाह (जिसने सबको पैदा किया) सब हाकिमों से सबसे बेहतर  (फ़ैसला करने वाला) हाकिम नहीं है (8)




नोट :
                                           
1-5: अंजीर और ज़ैतून के पेड़ ज़्यादातर फिलिस्तीन और सीरिया में पाए जाते हैंजिनका संबंध ईसा अलै. से है, जहाँ उन्हेंं इंजील दी गयी थी। सीना का पहाड़तूर का संबंध मूसा अलै. से है, जहाँ उन्हेंं तौरात दी गयी। (देखें 52:1). अमन वाले शहर यानी "मक्का" (देखें 2:126), जहाँ मुहम्मद (सल्ल.) को क़ुरआन दी गयी। कुछ विद्वानों का कहना है कि यहाँ इन पवित्र जगहों की क़सम खाने का मतलब यह है कि जो उपदेश मुहम्मद साहब दे रहे हैं, जैसे क़यामत का आना, दोबारा उठाया जाना, और कर्मों का फ़ैसला होना आदि, ये सारी शिक्षाएं नई नहीं हैं और पहले के नबियों की भी यही शिक्षाएं रही थीं। 
वैसे इस सूरह का असल संदर्भ आयत 7 में है जहाँ हैरत से कहा गया है कि इंसान अंतिम फ़ैसले को मानने से कैसे इंकार कर सकता है! इसका मतलब यह हुआ कि अंजीर, ज़ैतून और मक्का की क़सम खाकर कहा यह जा रहा है कि अंतिम फ़ैसला होकर रहेगा।
इंसान को बेहतरीन साँचे में बनाने के बाद एक समय ऐसा आता है कि वह नीचेवालों में सबसे निचली अवस्था या 'बुढ़ापे' को पहुँच जाता है जब उसका सारा ज़ोर ख़त्म हो जाता है। यह पूरी प्रक्रिया इंसान को दोबारा उठाए जाने की दलील के रूप में पेश की गई है। 
 
6: ईमान और अच्छे कर्म ही से इंसान कामयाबी पा सकता है, और आने वाले दुनिया में भी अच्छे इनाम की उम्मीद कर सकता है। 
                   

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