सूरह 83: अल-मुतफ़्फ़िफ़ीन
[जो लोग नाप-तौल में कमी करते हैं / Those Who Give Short Measure]
यह एक मक्की सूरह है। मक्का में उस ज़माने में ऐसा लगता है कि नाप-तौल में धोखाधड़ी करने का चलन था, जिसकी यहाँ सख़्ती से निंदा की गई है, और क़ुरआन में दूसरी जगहों पर भी इसे बुरा कहा गया है (11:84-88; 7:85). इस सूरह में धोखेबाज़ों और विश्वास न करने वालों के अंजाम की तुलना भलाई करने वालों की ख़ुशियों-भरे अंजाम से की गई है। सूरह के अंत में कहा गया है कि विश्वास न करनेवालों को ईमानवालों का मज़ाक़ उड़ाने का बदला दिया जाएगा।
विषय:
01-17: नाप-तौल में कमी करने वाले और लोगों को घटाकर देने वाले
18-28: अच्छे व नेक लोग
29-36: कौन हैं जो (ईमानवालों पर) हँस रहे हैं?
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
बर्बादी है नाप-तौल में कमी करने वालों के लिए, (1)
यह लोग जब (दूसरे) लोगों से नापकर (कुछ) लेते हैं, तो (उनसे) पूरा-पूरा लेते हैं, (2)
और जब उन्हें (स्वयं) नापकर या तौलकर देते हैं, तो घटाकर देते हैं! (3)
क्या ये लोग इस बात का यक़ीन नहीं रखते कि वह (मरने के बाद दोबारा ज़िंदा करके) उठाए जाएंगे, (4)
एक बड़े भारी (क़यामत के) दिन में, (5)
जिस दिन सब लोग तमाम जहानों के रब के सामने (हिसाब देने के लिए) खड़े होंगे? (6)
हरगिज़ नहीं! दुराचारियों [wicked] के नामों का लेखा-जोखा “सिज्जीन" में है ---- (7)
और आप क्या जानें कि “सिज्जीन” क्या है? ----- (8)
यह (एक साफ़-साफ़) लिखी हुई किताब है जिसमें (जहन्नम में जानेवालों के) नामों की सूची है। (9)
उस दिन (सच्चाई को) झुठलानेवालों के लिए तबाही होगी, (10)
जो लोग फ़ैसले के दिन को मानने से इंकार करते हैं! (11)
उस (दिन) से केवल वही इंकार करता है जो हद से बढ़ा हुआ पापी हो: (12)
उसे जब हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, तो कहता है, “(यह तो) पिछले लोगों की कहानियाँ हैं!” (13)
(ऐसा) बिल्कुल नहीं! (बल्कि) जो कुछ वे किया करते थे, उन (बुरे) कर्मों का ज़ंग [rust] उनके दिलों पर चढ़ गया है (इसलिए ये आयतें उनके दिल पर असर नहीं करतीं)। (14)
बिल्कुल नहीं! उस दिन वे अपने रब (की रहमत से और उसके दर्शन) से रोक दिए जाएंगे, (15)
फिर वे जहन्नम (की आग) में जलेंगे, (16)
और उनसे कहा जाएगा, “यही है वह (जहन्नम की यातना), जिसे तुम झूठ बताते थे।” (17)
बिल्कुल नहीं! जो सचमुच अच्छे लोग हैं, उनके नामों की सूची ‘इल्लीयीन” में है----- (18)
और आप क्या जानें कि “इल्लीयीन” क्या है?----- (19)
यह एक साफ़-साफ़ लिखी हुई किताब है जिसमें उन जन्नतवालों के नाम (और उनके कर्मों का लेखा-जोखा) दर्ज है, (20)
जिसे वे (फरिश्ते, और चुने हुए बंदे) देखते हैं जिन्हें अल्लाह की नज़दीकी हासिल होगी। (21)
जो सचमुच नेक लोग होंगे, वे (नेमतोंवाले जन्नत में) परम आनंद में होंगे, (22)
(आरामदेह) तख़्तों पर बैठे हुए इधर-उधर देख रहे होंगे। (23)
तुम उनके चेहरों पर ख़ुशी की चमक से ही पहचान लोगे। (24)
उन्हें मुहर लगी हुई [sealed] बड़ी लज़ीज़ व शुद्ध शराब [तहूर] पिलायी जाएगी (25)
उसकी मुहर कस्तूरी (जैसी खुशबूदार चीज़) की होगी ----- जो लोग कुछ पाने की कोशिश में लगे रहते हैं, उन्हें चाहिए कि वे इसे पाने की (भरपूर) कोशिश करें ---- (26)
उस (शराब) में ‘तसनीम’ के पानी की मिलावट होगी, (27)
यह (तसनीम) एक ऐसा बड़ा पानी का सोता [Spring] है, जहाँ से केवल वही लोग पिएंगे जिन्हें अल्लाह से नज़दीकी हासिल है। (28)
शैतानी करने वाले लोग (दुनिया में) ईमान रखने वालों का मज़ाक उड़ाया करते थे ---- (29)
जब वे ईमानवालों के पास से गुज़रते, तो आपस में आँखों से इशारेबाज़ी करते थे, (30)
और जब वे अपने लोगों के बीच वापस जाते, तो ईमानवालों के बारे में हँसी-मज़ाक़ करते थे, (31)
और जब वे उन (कमजोर-हाल मोमिनों) को देखते, तो कहते: “ये लोग सही रास्ते से भटक गए हैं,” (यानी यह दुनिया गँवा बैठे हैं और परलोक तो है ही केवल गढ़ी हुई कहानी!) (32)
हालाँकि वे उन (मुसलमानों) के हाल पर निगरानी करने वाले [keeper] बनाकर तो भेजे नहीं गए थे ----- (33)
सो आज (क़यामत के दिन) देखो, ईमानवाले, विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] पर हँस रहे हैं, (34)
सजे हुए तख़्तों पर बैठे हुए (अपनी खुशहाली और काफ़िरों की बदहाली को) देख रहे हैं। (35)
तो क्या विश्वास न करनेवालों [काफिरों] को उन कर्मों का पूरा बदला (नहीं) दे दिया गया जो कुछ वे किया करते थे? (36)
नोट:
7: "सिज्जीन" का शाब्दिक अर्थ क़ैदख़ाना होता है। यह उस जगह का नाम है जहाँ मरने के बाद बुरे लोगों की रूहों को रखा जाता है, वहीं पर उनके कर्मों का लेखा-जोखा भी रखा जाता है।
18: "इल्लीयीन" का शाब्दिक अर्थ ऊपर का कमरा होता है। यह उस जगह का नाम है जहाँ मरने के बाद ईमानवालों की रूहें भेजी जाती हैं, वहीं पर उनके कर्मों के खाते भी रखे जाते हैं।
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