सूरह 103: अल-अस्र
[ढलता हुआ दिन, The Declining Day]
यह एक मक्की सूरह है जिसमें इंसानों की मुक्ति का रास्ता दिखाया गया है। यहाँ एक ढलते हुए दिन का नक़्शा खींचा गया है, जब ऐसे लोग जो अपने बचे हुए समय में बहुत कुछ करना चाहते हैं, मगर दिन के किसी एक पहर में, या ज़िंदगी में उन्हें ऐसा लगता है कि काम के लिए अब थोड़ा ही समय बचा है। तो आनेवाली दुनिया में वही लोग कामयाब होंगे जिन्होंने अपनी छोटी सी ज़िंदगी में समय का सही उपयोग करते हुए ज़्यादा से ज़्यादा भलाई का काम किया।
विषय:
01-03: इंसानियत को ग़फ़लत से जगाना
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ढलते हुए दिन की क़सम (1)
बेशक इंंसान (बड़े) घाटे में है (कि वह अपना क़ीमती समय गँवा रहा है), (2)
सिवाय उन लोगों के जो ईमान रखते हैं, अच्छे काम करते हैं, (समाज में) एक दूसरे को सच्चाई की नसीहत करते रहते हैं, और (मुसीबतों में) एक दूसरे को सब्र [धैर्य] के साथ जमे रहने पर ज़ोर देते हैं। (3)
नोट:
1-2: यहाँ अल्लाह ने दिन के तीसरे पहर [अस्र] की क़सम खायी है जब दिन की रौशनी ढलने लगती है, या आमतौर से इसे 'समय' के मतलब में भी बोला जाता है, एक आदमी के लिए दोनों ही चीज़े गुज़रती जा रही हैं। किसी आदमी के लिए जो बचा हुआ समय है, वही उसके लिए आख़िरी मौक़ा है, और जब तक कि वह उसका प्रयोग सच्चाई पर विश्वास करने और अच्छा कर्म करने में नहीं करता, तब तक वह बहुत बड़े घाटे में रहेगा। इसी वजह से क़ुरआन लोगों को ज़ोर देता है कि अल्लाह से अपनी गलतियों की माफ़ी के लिए दौड़ पड़ें (57:21), और अच्छा कर्म करने के लिए जल्दबाज़ी दिखाएं (3:133), इससे पहले कि उन्हें मौत आ जाए और वे पछताते रह जाएं कि काश! उन्होंने और नेक कर्म किए होते! (देखें 63: 10-11).
3: ख़ुद नेक बन जाना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि अपने प्रभाव में आए हुए लोगों को भी सच्ची बात और धीरज से अच्छाई पर जमे रहने पर ज़ोर देना भी ज़रूरी है। “सब्र या धीरज” एक क़ुरआन का term है जिसका मतलब यह है कि जब इंसान के दिल की इच्छाएं उसे किसी सही काम को करने से रोक रही हों या कोई गुनाह करने पर उकसा रही हों, उस समय उन इच्छाओं को कुचला जाए, और जब आपके साथ कोई बुरी चीज़ घट जाए, तो अल्लाह के फ़ैसले पर अंगुली उठाने से बचा जाए।
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