Tuesday, March 29, 2022

Surah/सूरह 91: Ash-Shams/अश-शम्स [सूरज, The Sun]

 


 सूरह 91: अश-शम्स
  [सूरज, The Sun]


यह एक मक्की सूरह है। इसका मुख्य विषय यह है कि आदमी को राह चुनने की छूट दी गई है, वह चाहे तो अपनी आत्मा को (हर बुराई और गलत इच्छाओं से) बचाते हुए साफ़-सुथरा रखे या अपनी जान को (गुनाहों के दलदल में) धँसा ले। समूद की क़ौम की मिसाल दी गई है कि कैसे ग़लत रास्ता चुनते हुए उनमें बिगाड़ पैदा हुआ, और नतीजे में वे बर्बाद हुए। 
 

विषय:

आयत 01-10: अपने आपको बुराई से बचाए रखना या बुराई में पड़ जाना

आयत 11-15: समूद की कहानी 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है



सुबह की रौशनी में चमकते हुए सूरज की क़सम [1]


और चाँद की क़सम जो उस (सूरज) के पीछे-पीछे चले,  [2]


दिन की क़सम जब वह सूरज को तेज़ चमकता हुआ दिखाए  [3]


और रात की क़सम जब वह छा जाए और सूरज को छिपा ले, [4]


आसमान की क़सम कि कैसे उस (अल्लाह) ने उसे (एक ब्रह्मांड के रूप में) बनाया  [5]


और ज़मीन की क़सम कि कैसे उस (अल्लाह) ने उसे बिछा दिया,  [6]


और इंसानी जान की क़सम कि कैसे उसने उसे (ठीक-ठाक) करके सँवार दिया  [7]


और फिर उस (अल्लाह) ने उसके दिल में वह बात भी डाल दी जो उसके लिए नैतिकता से गिरी हुई है, और वह बात भी जो बुराइयों से बचने की हैं!  [8]


जिसने अपनी आत्मा को (हर बुराई और गलत इच्छाओं से) बचाते हुए साफ़-सुथरा रखा, उसने कामयाबी पा ली  [9]


और जिसने अपनी जान को (गुनाहों के दलदल में) धँसा लिया, वह असफल हो गया।  [10]


"समूद" [Thamud] (की क़ौम) के लोगों ने अपने घमंड और क्रूरता में आकर अपने (रसूल सालेह को) झूठा कहा,  [11]


जब उनमें से सब से दुष्ट आदमी (उनके विरोध में) उठ खड़ा हुआ।  [12]

अल्लाह के रसूल ने उन लोगों से कहा: “(देखो!) अल्लाह की (इस) ऊँटनी को (हाथ न लगाना और इसको) पानी पीने के लिए खुला छोड़ दो,”  [13]


मगर उन लोगों ने उन्हें [रसूल को] झूठा कहा, और उस (ऊँटनी) का पाँव काट (कर मार) डाला। तो उनके रब ने उनके अपराध की वजह से उनको तबाह-बर्बाद कर डाला, और सबको (जड़ से उखाड़ करके) बराबर [level] कर दिया।  [14]

(याद रहे) अल्लाह को उन्हें दंड देने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई (और न तबाही के नतीजों का उसे कोई डर होता है)।  [15]






नोट:

1-8: यहाँ आसमान में होने वाली बहुत सारी परस्पर विरोधी खगोलीय घटनाओं को दिखाया गया है, जिसका मक़सद इस बात पर ज़ोर देना है कि इंसान की आत्मा [नफ़्स] में भी दो परस्पर विरोधी चीज़ें होती हैं: नेकी/अच्छाई और बुराई/बग़ावत। क़सम खाने का असल मक़सद यह बताना है कि इंसान को अच्छे काम करने की भी सलाहियत दी हैऔर बुरे काम करने की भी। अंतिम कामयाबी उसे मिलेगी जिसने अपनी आत्मा को साफ़-सुथरा रखा और वह नाकाम हो गया जिसने अपनी आत्मा को गंदा कर लिया यानी बुराई से बच न पाया।  


9: आत्मा को साफ़-सुथरा रखने का मतलब यह है कि इंसान के दिल में जो भलाई की इच्छाएं पैदा होती हैंवे उन्हें उभारकर उस पर अमल करे और जो बुरी इच्छाएं पैदा होती हैंउन्हें दबाकर रखे। इसकी लगातार कोशिश करने से आत्मा [नफ़्स] की सफ़ाई होती है।


11: समूद के बारे में ज़्यादा विस्तार से देखें 7: 73-79


13: ऊँटनी... और उसके पानी पीने का मामला: इसकी कहानी के लिए देखें 26: 155-156; 54: 27-28. 

 

14: समूद की क़ौम की मांग पर अल्लाह ने एक ऊँटनी पैदा की थीऔर लोगों से कहा था कि कुएंं से पानी एक दिन यह ऊँटनी पिएगी और दूसरे दिन तुम पानी भर लिया करना। लेकिन उस क़ौम के एक पत्थर दिल आदमी ने ऊंटनी को मार डालाउसके बाद उस क़ौम पर बड़ी भारी यातना आई और सब कुछ तबाह-बर्बाद हो गया। देखें सूरह आराफ़ (7: 73).

 










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