सूरह 110: अन-नस्र
[मदद, Help]
यह एक मदनी सूरह है जो मुहम्मद सल्ल. की मौत से पहले की आख़िरी सूरतों में से एक है। इसमें यह हुक्म दिया गया है कि जब आपका मिशन पूरा हो जाए और आप देख लें कि लोग बड़ी संख्या में अल्लाह के संदेश को मानते हुए इस्लाम अपना रहे हैं, तब वह अपने रब से मिलने के लिए तैयार हो जाएं।
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
(ऐ रसूल), जब अल्लाह की मदद आ पहुँचे और वह (मक्का की जीत के लिए) आपका रास्ता खोल दे, (1)
और आप (जब) लोगों को देख लें (कि) वे अल्लाह के दीन [धर्म] में गिरोह के गिरोह शामिल हो रहे हैं, (2)
तो आप (शुक्र अदा करते हुए) अपने रब की बड़ाई के साथ उसका ख़ूब गुणगान करें और उसी से माफ़ी माँगें: सचमुच वह हमेशा (अपने बंदों की) तौबा [repentance] क़बूल करने के लिए तैयार रहता है। (3)
नोट:
1: यहाँ रसूल के सामने मक्का के समर्पण की बात कही गई है, कई विद्वानों ने 'फ़तह' का मतलब जीत समझा है, मगर वहाँ कोई लड़ाई नहीं हुई थी। 'फ़तह' का मतलब 'खुल जाना' या 'फ़ैसला' भी होता है, देखें सूरह 48.
इसमें एक तरफ़ ख़ुशख़बरी दी गयी है कि मक्का की जीत के बाद अरब के लोग बड़े पैमाने पर इस्लाम को अपना लेंगे, और दूसरी तरफ़ इस्लाम का संदेश दूर-दूर तक फैल जाने से मुहम्मद (सल्ल) के दुनिया में आने का मक़सद पूरा हो जाएगा, इसीलिए कुछ लोगों ने इससे यह भी मतलब निकाला था कि यहाँ आपको दुनिया से जाने की तैयारी के लिए हुक्म दिया गया है कि अल्लाह की ज़्यादा से ज़्यादा बड़ाई बयान करें और गुनाहों की माफ़ी माँगते रहें।
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