सूरह 96: अल-अलक़
यह एक मक्की सूरह है जिसमें आयत 2 में एक शब्द "अलक़" आया है जिस पर इस सूरह का नाम पड़ा है। क़ुरआन जब पहली बार पढ़कर फ़रिश्ते जिबरील ने मुहम्मद साहब को सुनाया था और उन्हें पढ़ने को कहा था, वह इसी सूरह की पहली पाँच आयतें थीं। इस सूरह का दूसरा हिस्सा थोड़ा बाद में उतरा था जिसमें यह बताया गया है कि आदमी जब आत्म-संतुष्ट या ख़ुदपसंद [self-satisfied] बन जाता है, तो वह सही रास्ते से भटक जाता है (जो कि अबु जहल नाम के आदमी की मिसाल से स्पष्ट है)।
आयत 01-05: पहली वही: पढ़िए !
आयत 06-08: इंसान बुराइयों की हदें तोड़ डालता है
आयत 09-19: एक विरोधी जिसने रसूल को बुरा-भला कहा और धमकी दी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
उसने पैदा किया इंसान को (माँ के पेट में जोंक की तरह) सटे हुए ख़ून के लोथड़े से। (2)
पढ़िए! कि आपका रब सबसे अधिक करम करने वाला [Bountiful] है (3)
जिसने क़लम के सहारे (लिखने पढ़ने का) ज्ञान सिखाया, (4)
जिसने इंसान को वह (कुछ) सिखा दिया जो वह नहीं जानता था। (5)
क्योंकि उसने अपने आपको (दुनिया में) आज़ाद समझ लिया है जो किसी पर निर्भर नहीं है: (7)
[ऐ रसूल], सबको आपके रब के ही पास लौटकर जाना है। (8)
क्या आपने उस आदमी को देखा जो रोकता है, (9)
(हमारे) बंदे को जब वह नमाज़ पढ़ता है? (10)
या वह (लोगों को) बुराइयों से बचने व नेक काम करने को प्रोत्साहित करता हो (तो क्या ऐसे आदमी को रोकना उचित है)? (12)
अब बताइए! अगर वह (रोकनेवाला) सच्चे धर्म को मानने से इंकार करता हो, और उससे मुँह मोड़ता हो? (13)
क्या वह नहीं समझता कि अल्लाह सब कुछ देख रहा है? (14)
ख़बरदार! अगर उसने अपने आपको (रसूल की बेइज़्ज़ती और सच्चे धर्म से दुश्मनी करने से) नहीं रोका, तो हम ज़रूर (उसे नरक में) माथे के बाल पकड़कर घसीटेंगे----- (15)
वह माथे जो झूठे (और) गुनाहगार हैं। (16)
अब वह अपने साथियों को (सहायता के लिए) बुला ले; (17)
हम भी नरक के रक्षकों को बुला लेंगे। (18)
हरगिज़ नहीं! आप [ऐ रसूल] उसकी बात न मानें: सज्दे में सर झुकाते रहें और (हमसे ज़्यादा) क़रीब होते जाएं। (19)
1: मुहम्मद (सल्ल) पर सबसे पहली बार जो अल्लाह का संदेश उतरा जब आप “हिरा” नामक गुफा में थे, वह इसी सूरह की पहली पाँच आयतें हैं। इस घटना से पहले आप कई कई दिन इस गुफा में जाकर सोच-विचार किया करते थे, एक दिन इसी दौरान हज़रत जिबरील, जो अल्लाह के फ़रिश्ते थे, आपके पास आए, और आपको ज़ोर से दबाकर कहा, “पढ़ें!”, आपने जवाब दिया, “मैं तो पढ़ा हुआ नहीं हूँ”, यह संवाद तीन बार उनके बीच हुआ, फिर हज़रत जिबरील ने ये पाँच आयतें पढ़ीं।
5: पढ़ाने या सिखाने का आम तरीक़ा यही है कि क़लम से लिखी हुई चीज़ पढ़वायी जाती है, लेकिन अल्लाह चाहे तो इसके बिना भी किसी को ज्ञान दे सकता है। मुहम्मद साहब जो कि पढ़े-लिखे नहीं थे, फिर भी अल्लाह ने उन्हें ऐसा ज्ञान व समझ-बूझ दी जो किताब से पढ़ने वाले सोच भी नहीं सकते।
6: आयत 6 से 19 तक गुफा में घटी घटना के काफ़ी बाद मॆं उतरी थी। आगे जिस घटना के बारे में इशारा किया गया है, वह यूँ हुआ था कि एक दिन अबु जहल जो कि मुहम्मद साहब का घोर विरोधी था, उसने आपको काबा के परिसर में नमाज़ पढ़ते हुए देखा तो ऐसा करने से मना किया। उसने यह भी कहा कि अगर आपने यहाँ नमाज़ पढ़ी, तो आपकी गर्दन को पाँव से कुचल देगा। इसी मौक़े पर ऊपर की आयतें उतरी थीं।
7: अपनी धन-दौलत और क़ुरैश की सरदारी के कारण वह अपने आपको आज़ाद समझने लगा जो अपनी ज़रूरतों के लिए किसी पर निर्भर न था। उसे लगता था कि कोई उसे किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता। मगर अल्लाह कहता है कि सबको अंत में लौटकर मेरे ही पास आना है।
18: शुरु में जब अबु जहल ने मुहम्मद साहब को नमाज़ के लिए रोका, तो आपने उसे ज़ोर से झिड़क दिया था। इस पर अबु जहल ने यह कहा था कि मक्का में मेरी मजलिस में बहुत बड़ी संख्या में लोग जमा होते हैं, वे सब मेरे साथ हैं। इसके जवाब में कहा गया है कि अगर वह आपको तकलीफ़ पहुँचाने के लिए अपनी मजलिस वालों को बुलाएगा, तो हम भी जहन्नम के फ़रिश्तों को बुला लेंगे।
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