Wednesday, March 30, 2022

Surah/सूरह 60: Al-Mumtahina/अल-मुमतहिना [जाँच-परख की गयी औरतें/ The Women Tested]

 सूरह 60: अल-मुमतहिना 

[जाँच-परख की गयी औरतें/ The Women Tested]

यह एक मदनी सूरह है जो कि हुदैबिया की संधि और मक्का की जीत के बीच की अवधि में उतरी थी। इसका नाम आयत 10 में वर्णन की गई एक घटना के हवाले से रखा गया है: औरतों से जुड़ी हुई कुछ रीतियों के बारे में निर्देश दिए गए, जैसे जो औरतें मक्का में अपने पतियों को छोड़कर और मुसलमान बनकर मदीना मुसलमानों के पास आ जाएं, या जो बीवियाँ मदीना छोड़कर मक्का चली जाएं, तो वैसे मामले को कैसे निपटाया जाना है (आयत 10-11). मुसलमानों को अल्लाह-रसूल और ईमानवालों के प्रति अपनी पूरी निष्ठा रखने का आदेश दिया गया (आयत 1-3, 7-9, 13) और इबराहीम अलै. की मिसाल दी गई है ताकि उनके उदाहरण को सामने रखकर सीखा जा सके (आयत 4-6). ग़ैर-मुस्लिमों के साथ भी नर्मी और इंसाफ़ के साथ बर्ताव करना चाहिए अगर वे मुसलमानों पर ज़ुल्म नहीं कर रहे हों (8-9).   

विषय:

1- 3:  दुश्मनों के साथ सुलूक 

 4- 6:  इबराहीम (अलै.) की मिसाल 

7- 9:  मेल-मिलाप अभी भी संभव है 

10-11: मक्का से आकर पनाह लेने वाली औरतें और छोड़कर जाने वाली बीवियाँ 

12:     ईमान रखने वाली औरतों के साथ व्यवहार

13:     दूसरे दुश्मनों के साथ व्यवहार 

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ ईमानवालो! मेरे दुश्मनों और अपने दुश्मनों को अपना सहयोगी [Allies] न बना लो, कि उनके साथ दोस्ती का रिश्ता निभाने लग जाओ, जबकि जो सच्चाई तुम्हारे पास (रब की तरफ़ से) आयी है, उसे तो वे मानने से इंकार कर चुके हैं। उन्होंने तुम्हें और (तुम्हारे) रसूल को केवल इसलिए (मक्का से) बाहर निकाल दिया कि तुमने अपने रब, अल्लाह पर विश्वास [ईमान] कर लिया? अगर तुम सचमुच मेरे रास्ते में संघर्ष [जिहाद] के लिए और मेरी ख़ुशी की तलाश में (घर से दूसरी जगह के लिए) निकले हो, तो फिर (अब) तुम चोरी-छिपे उनसे दोस्ती की बातें (क्यों) करते हो?-------(याद रहे) जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ सामने ज़ाहिर करते हो, मैं सब कुछ जानता हूँ-----तुममें से कोई भी अगर ऐसा करता है, तो सचमुच वह सीधे रास्ते से भटक गया है।  (1)

अगर वे तुम पर हावी हो जाएँ, तो (देखना) वे फिर से तुम्हारे दुश्मन बन जाएँगे और तुम्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए अपने हाथ और ज़बान फैलाने लगेंगे; उनकी तो यह दिली ख़्वाहिश है कि तुम (एक अल्लाह में) ईमान [विश्वास] रखना छोड़ दो। (2)

क़यामत के दिन न तो तुम्हारी रिश्तेदारियाँ तुम्हारे कोई काम आएंगी और न तुम्हारी औलाद: वह [अल्लाह] तुम्हें [ईमानवाले और काफ़िरों में) अलग-अलग कर देगा। जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा होता है। (3)

तुम लोगों (की सीख) के लिए इबराहीम और उनके साथियों में एक अच्छा उदाहरण है, जब उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था,  "हम तुम (लोगों) का और जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, उन (सब) का त्याग करते हैं! हम तुम्हें मानने से साफ़ इंकार करते हैं! हमारे और तुम्हारे बीच हमेशा के लिए दुश्मनी और नफ़रत पैदा हो चुकी है, और यह उस समय तक रहेगी जब तक कि तुम एक अल्लाह पर विश्वास न कर लो" -----हाँ, मगर इबराहीम ने अपने बाप से यह ज़रूर कहा था कि "मैं आपके लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ करूँगा, हालाँकि मैं आपको अल्लाह से बचा नहीं सकता"------[ईमानवालों ने दुआएं की], "ऐ रब! हमने तुझ पर ही भरोसा किया; तौबा के लिए हम तेरे ही सामने झुकते हैं; और तेरे ही पास अन्त में लौटकर हमें जाना है। (4)

ऐ हमारे रब! हमें विश्वास न करनेवालों के हाथों होने वाले दुर्व्यवहार का सामना करने (या आज़माइश) से बचा। ऐ रब! हमें माफ़ कर दे, सचमुच तू ही बेहद ताक़तवाला, और समझ-बूझवाला है।" (5)

सचमुच [ऐ ईमानवालो!], तुम्हारे लिए वे अच्छा उदाहरण हैं जिनके रास्ते पर तुम्हें चलना चाहिए, और हर उस आदमी के लिए भी वे अच्छा उदाहरण हैं जो अल्लाह और अंतिम दिन का डर रखता हो। अगर कोई उससे मुँह मोड़ता है, तो (याद रखो) अल्लाह (को किसी की ज़रूरत नहीं, वह) तो आत्मनिर्भर [Self-sufficing], और सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (6)

हो सकता है कि अल्लाह अब भी तुम और तुम्हारे मौजूदा दुश्मनों के बीच (कुछ समय बाद) प्रेम का भाव पैदा कर दे----- अल्लाह बहुत ज़्यादा ताक़तवाला, बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है------ (7)

और अल्लाह तुम्हें इस बात से नहीं रोकता कि तुम किसी के साथ अच्छा व्यवहार करो, और उसके साथ इंसाफ़ करो जिसने तुम से धर्म [Faith] के नाम पर युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया: अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है। (8)

मगर अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों को अपना दोस्त बनाने से रोकता है जिन्होंने धर्म के नाम पर तुम से युद्ध किया, तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया, और तुम्हें निकलवाने में दूसरों की मदद की: तुममें से कोई भी अगर इन्हें अपना सहयोगी बनाता है, तो वह सचमुच ही ज़ालिमों में होगा। (9)

ऐ ईमानवालो! जब तुम्हारे पास (मक्का से) हिजरत [migration] करके ऐसी औरतें (मदीना में) आ जाएं जो यह दावा करती हों कि वे ईमानवाली हैं, तो तुम उन्हें जाँच-परख लिया करो---- यूँ तो अल्लाह उनके ईमान के बारे में अच्छी तरह जानता है---- और अगर तुम्हें उनके ईमान पर यक़ीन हो जाए, तो उन्हें विश्वास न करनेवालों [Disbelievers/ काफ़िरों] के पास वापस मत भेजो: ये औरतें (अब) उनके लिए जायज़ [lawful] बीवियां नहीं रह गयीं, और न ही अब वे काफ़िर [Disbelievers] मर्द, उनके जायज़ [lawful] पति होंगे। जो कुछ उन काफ़िर (पतियों) ने मेहर [bride-gift] के तौर पर (अपनी बीवी पर) ख़र्च किया हो, तुम उनके पतियों को उतना वापस कर दो-------अगर तुम उन (औरतों) से शादी करना चाहते हो, तो इसमें तुम्हारे लिए कोई बुराई की बात नहीं है, अगर तुम एक बार उन्हें मेहर अदा कर दो----और काफ़िर औरतों के साथ अब तुम ख़ुद भी शादी के बंधन को बनाए मत रखो। इनके लिए जो कुछ मेहर [bride-gift] तुमने अदा की थी, उसे काफ़िरों से मांग लो। और उन्हें भी चाहिए कि जो कुछ उन्होंने (अपनी बीवियों पर) ख़र्च किया हो, वह (तुम लोगों से) माँग लें। यह अल्लाह का आदेश है: वह तुम्हारे बीच फ़ैसला करता है, और अल्लाह सब जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (10)

अगर तुम्हारी बीवियों में से कोई तुम्हें छोड़कर काफ़िरों [Disbelievers] के पास चली गयी हो (और उनसे मेहर की रक़म वापस मिलने की उम्मीद न हो), और फिर अगर तुम्हारे समुदाय के लोगों को (काफ़िरों से) जंग के बाद कुछ माल हाथ आ गया हो, तो उस (माल में) से उन (पतियों) को उतनी रक़म दे दो जितनी उन्होंने अपनी (छोड़कर गयी) बीवियों पर मेहर के तौर पर ख़र्च किया होगा। और (देखो!) अल्लाह का डर रखो, जिस पर तुम ईमान रखते हो। (11)

ऐ रसूल! जब ईमान रखनेवाली औरतें आपके पास आकर इस बात की क़सम खाएं कि वे अल्लाह के साथ किसी चीज़ को (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] नहीं ठहराएँगी, न चोरी करेंगी, न किसी ग़ैर-मर्द के साथ मुँह काला [adultery] करेंगी, न अपने बच्चों की हत्या करेंगी, और न अपने हाथ और पैरों के बीच झूठी बातें गढ़ेंगी, (अर्थात, इस बात में झूठ नहीं कहेंगी कि उनके बच्चों का बाप कौन है), और न किसी सही चीज़ में आपके हुक्म को मानने से इंकार करेंगी, तो फिर आपको उनके द्वारा ली गयी निष्ठा की क़सम [बै'त] को स्वीकार कर लेना चाहिए, और उनके लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ करनी चाहिए: सचमुच अल्लाह बेहद माफ़ करनेवाला, बहुत दयावान है।  (12)

ऐ ईमानवालो! तुम ऐसे लोगों को अपना सहयोगी [Allies] न बनाओ, जिनसे अल्लाह नाराज़ है: वे आने वाली ज़िंदगी [आख़िरत/ Hereafter] से कोई आशा नहीं रखते, यहाँ तक कि विश्वास न करने वाले [काफ़िरों] को उन लोगों (के दोबारा उठाए जाने) की भी कोई उम्मीद नहीं है, जो अपनी क़ब्रों में दफ़न हैं। (13)



नोट:

1: हुदैबिया की संधि (630 ई) के बाद उसकी शर्तें को मक्का के लोगों ने दो साल के अंदर ही तोड़ दिया था, जिसके चलते मुहम्मद (सल्ल) ने मक्का पर हमला करने की ख़ुफ़िया योजना बनाई थी। मदीना के एक मुहाजिर हातिब बिन अबी बलतआ ने एक ख़ुफ़िया चिट्ठी मक्का के सरदारों के नाम लिखी जिसमें उन्होंने मदीना में चल रही हमले की तैयारियों की ख़बर दी थी, मगर उस चिट्ठी की भनक मुहम्मद (सल्ल) को हो गई और उसे रास्ते में ही पकड़ लिया गया। जब हातिब से पूछताछ हुई तो उन्होंने अपनी सफ़ाई में बताया कि असल में उनके परिवार के लोग और उनकी सम्पत्तियाँ मक्का में हैं, और उनका अब कोई और संबंंधी वहाँ मौजूद नहीं हैं, इसलिए उन्हें लगा कि मक्का वालों को युद्ध की तैयारी की ख़बर दे देने से वे एहसान मानते हुए उनके परिवार को नुक़सान नहीं पहुँचाएंगे। 


4: हज़रत इबराहीम (अलै) ने शुरू में अपने बाबा की माफ़ी के लिए अल्लाह से दुआ करने का वादा ज़रूर किया था (14:41; 19:47; 26:86), मगर जैसा कि सूरह तौबा (9: 114) में आया है कि जब उन्हें पता चल गया कि उनके बाप एक अल्लाह पर विश्वास करने वाले नहीं हैं, तो फिर उन्होंने उनके लिए दुआ करना छोड़ दिया। 


7: यानी मक्का में बहुत से लोग जो अभी दुश्मन बने हुए हैं, उम्मीद है कि वे आगे चलकर सच्चाई पर विश्वास कर लेंगे और दोस्त बन जाएंगे, सो मक्का की जीत के बाद ऐसा ही हुआ। 


8: यहाँ साफ़ तौर से कहा गया है कि जो ग़ैर-मुस्लिम [Non-Muslims] ऐसे हैं जिन्होंने मुसलमानों के साथ न तो युद्ध लड़ा, न उन्हें उनके घरों से निकाल बाहर किया और न कोई तकलीफ़ पहुँचाई, तो उनके साथ तो अच्छे संबंध रखने के लिए अल्लाह मना नहीं करता, बल्कि उनके साथ तो भलाई और इंसाफ़ का सलूक करना ही चाहिए।


10: हुदैबिया की संधि में यह तय हुआ था कि अगर मक्का से कोई आदमी (मर्द) मुसलमान होकर मदीना आएगा तो उसे वापस मक्का भेज देना होगा (मगर औरतों के बारे में कुछ नहीं कहा गया था)। अगर कोई औरत मदीना आती है, तो उसकी जाँच-पड़ताल करने के बाद अगर पाया गया कि सचमुच वह मुसलमान बनकर आयी है, तो उसे वापस मक्का नहीं भेजा जाएगा। चूँकि ऐसी औरतें अपने पति को छोड़कर आती थीं, इसलिए उनका निकाह ख़त्म हो जाता था, अब मुसलमानों को ऐसी औरतों के साथ निकाह करने की इजाज़त दे दी गई इस शर्त के साथ कि वह मेहर की रक़म अदा कर दें। चूँकि अभी मक्का के साथ संधि क़ायम थी, इसलिए यह हुक्म हुआ कि ऐसी औरतों के पुराने पतियों ने जो भी अपनी बीवियों पर ख़र्च किया था, उसको इस तरह से वापस कर दिया जाए कि जो मुसलमान इन औरतों से निकाह करे, वह उसके महर की रक़म उसके पुराने (काफ़िर) पति को अदा कर दे। 

 इसके साथ यह भी आदेश हो गया कि अब किसी मुसलमान के लिए काफ़िरों से शादी का संबंध रखना वैध नहीं होगा। इस तरह, मुसलमानों ने भी अपनी काफ़िर बीवियों को तलाक़ दे दिया और उन बीवियों ने जाकर (मक्का के) काफ़िर मर्दों से निकाह किया। मुसलमान मर्दों को भी यह अधिकार दिया गया कि वे अपनी काफ़िर बीवियों पर ख़र्च की गई रक़म को अपनी बीवियों के नए पतियों से माँग लें। हालाँकि वे उनके (काफ़िर) पतियों से मेहर की रक़म वसूल नहीं कर पाए। 


13: कुछ विद्वानों के मुताबिक़ अल्लाह "यहूदियों" से नाराज़ है, और यह आयत मदीना के कुछ उन ग़रीब मुसलमानों के बारे में है जो थोड़े से धन की लालच में यहूदियों को मुसलमानों की योजनाओं के बारे में बता दिया करते थे। (देखें 58:14)

मदीना के कुछ यहूदी लोग आने वाली दुनिया [परलोक] पर विश्वास नहीं रखते थे, और मदीना के पाखंडियों का हाल भी वैसा ही था। यहूदियों ने जानते-बूझते मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का पैग़म्बर नहीं माना, और पाखंडी लोग जान-बूझकर उन्हें धोखा देते रहे। 


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