सूरह 60: अल-मुमतहिना
यह एक मदनी सूरह है जो कि हुदैबिया की संधि और मक्का की जीत के बीच की अवधि में उतरी थी। इसका नाम आयत 10 में वर्णन की गई एक घटना के हवाले से रखा गया है: औरतों से जुड़ी हुई कुछ रीतियों के बारे में निर्देश दिए गए, जैसे जो औरतें मक्का में अपने पतियों को छोड़कर और मुसलमान बनकर मदीना मुसलमानों के पास आ जाएं, या जो बीवियाँ मदीना छोड़कर मक्का चली जाएं, तो वैसे मामले को कैसे निपटाया जाना है (आयत 10-11). मुसलमानों को अल्लाह-रसूल और ईमानवालों के प्रति अपनी पूरी निष्ठा रखने का आदेश दिया गया (आयत 1-3, 7-9, 13) और इबराहीम अलै. की मिसाल दी गई है ताकि उनके उदाहरण को सामने रखकर सीखा जा सके (आयत 4-6). ग़ैर-मुस्लिमों के साथ भी नर्मी और इंसाफ़ के साथ बर्ताव करना चाहिए अगर वे मुसलमानों पर ज़ुल्म नहीं कर रहे हों (8-9).
1- 3: दुश्मनों के साथ सुलूक
4- 6: इबराहीम (अलै.) की मिसाल
7- 9: मेल-मिलाप अभी भी संभव है
10-11: मक्का से आकर पनाह लेने वाली औरतें और छोड़कर जाने वाली बीवियाँ
12: ईमान रखने वाली औरतों के साथ व्यवहार
13: दूसरे दुश्मनों के साथ व्यवहार
1: हुदैबिया की संधि (630 ई) के बाद उसकी शर्तें को मक्का के लोगों ने दो साल के अंदर ही तोड़ दिया था, जिसके चलते मुहम्मद (सल्ल) ने मक्का पर हमला करने की ख़ुफ़िया योजना बनाई थी। मदीना के एक मुहाजिर हातिब बिन अबी बलतआ ने एक ख़ुफ़िया चिट्ठी मक्का के सरदारों के नाम लिखी जिसमें उन्होंने मदीना में चल रही हमले की तैयारियों की ख़बर दी थी, मगर उस चिट्ठी की भनक मुहम्मद (सल्ल) को हो गई और उसे रास्ते में ही पकड़ लिया गया। जब हातिब से पूछताछ हुई तो उन्होंने अपनी सफ़ाई में बताया कि असल में उनके परिवार के लोग और उनकी सम्पत्तियाँ मक्का में हैं, और उनका अब कोई और संबंंधी वहाँ मौजूद नहीं हैं, इसलिए उन्हें लगा कि मक्का वालों को युद्ध की तैयारी की ख़बर दे देने से वे एहसान मानते हुए उनके परिवार को नुक़सान नहीं पहुँचाएंगे।
4: हज़रत इबराहीम (अलै) ने शुरू में अपने बाबा की माफ़ी के लिए अल्लाह से दुआ करने का वादा ज़रूर किया था (14:41; 19:47; 26:86), मगर जैसा कि सूरह तौबा (9: 114) में आया है कि जब उन्हें पता चल गया कि उनके बाप एक अल्लाह पर विश्वास करने वाले नहीं हैं, तो फिर उन्होंने उनके लिए दुआ करना छोड़ दिया।
7: यानी मक्का में बहुत से लोग जो अभी दुश्मन बने हुए हैं, उम्मीद है कि वे आगे चलकर सच्चाई पर विश्वास कर लेंगे और दोस्त बन जाएंगे, सो मक्का की जीत के बाद ऐसा ही हुआ।
8: यहाँ साफ़ तौर से कहा गया है कि जो ग़ैर-मुस्लिम [Non-Muslims] ऐसे हैं जिन्होंने मुसलमानों के साथ न तो युद्ध लड़ा, न उन्हें उनके घरों से निकाल बाहर किया और न कोई तकलीफ़ पहुँचाई, तो उनके साथ तो अच्छे संबंध रखने के लिए अल्लाह मना नहीं करता, बल्कि उनके साथ तो भलाई और इंसाफ़ का सलूक करना ही चाहिए।
10: हुदैबिया की संधि में यह तय हुआ था कि अगर मक्का से कोई आदमी (मर्द) मुसलमान होकर मदीना आएगा तो उसे वापस मक्का भेज देना होगा (मगर औरतों के बारे में कुछ नहीं कहा गया था)। अगर कोई औरत मदीना आती है, तो उसकी जाँच-पड़ताल करने के बाद अगर पाया गया कि सचमुच वह मुसलमान बनकर आयी है, तो उसे वापस मक्का नहीं भेजा जाएगा। चूँकि ऐसी औरतें अपने पति को छोड़कर आती थीं, इसलिए उनका निकाह ख़त्म हो जाता था, अब मुसलमानों को ऐसी औरतों के साथ निकाह करने की इजाज़त दे दी गई इस शर्त के साथ कि वह मेहर की रक़म अदा कर दें। चूँकि अभी मक्का के साथ संधि क़ायम थी, इसलिए यह हुक्म हुआ कि ऐसी औरतों के पुराने पतियों ने जो भी अपनी बीवियों पर ख़र्च किया था, उसको इस तरह से वापस कर दिया जाए कि जो मुसलमान इन औरतों से निकाह करे, वह उसके महर की रक़म उसके पुराने (काफ़िर) पति को अदा कर दे।
इसके साथ यह भी आदेश हो गया कि अब किसी मुसलमान के लिए काफ़िरों से शादी का संबंध रखना वैध नहीं होगा। इस तरह, मुसलमानों ने भी अपनी काफ़िर बीवियों को तलाक़ दे दिया और उन बीवियों ने जाकर (मक्का के) काफ़िर मर्दों से निकाह किया। मुसलमान मर्दों को भी यह अधिकार दिया गया कि वे अपनी काफ़िर बीवियों पर ख़र्च की गई रक़म को अपनी बीवियों के नए पतियों से माँग लें। हालाँकि वे उनके (काफ़िर) पतियों से मेहर की रक़म वसूल नहीं कर पाए।
13: कुछ विद्वानों के मुताबिक़ अल्लाह "यहूदियों" से नाराज़ है, और यह आयत मदीना के कुछ उन ग़रीब मुसलमानों के बारे में है जो थोड़े से धन की लालच में यहूदियों को मुसलमानों की योजनाओं के बारे में बता दिया करते थे। (देखें 58:14)
मदीना के कुछ यहूदी लोग आने वाली दुनिया [परलोक] पर विश्वास नहीं रखते थे, और मदीना के पाखंडियों का हाल भी वैसा ही था। यहूदियों ने जानते-बूझते मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का पैग़म्बर नहीं माना, और पाखंडी लोग जान-बूझकर उन्हें धोखा देते रहे।
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