सूरह 63: अल-मुनाफ़िक़ून
[(मदीना के) पाखंडी लोग/ The Hypocrites]
यह एक मदनी सूरह है जिसमें मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] की धोखाधड़ी का पर्दाफ़ाश किया गया है और इनसे ईमानवालों को होशियार रहने के लिए कहा गया है। एक बहुत ही ख़ास मौक़े का ज़िक्र आया है जब लोग ईमानवालों की कुछ आर्थिक मदद करना चाहते थे और पाखंडियों ने उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश की (आयत 7-8), और इसकी भरपाई के लिए अल्लाह ने मुसलमानों को अपना ज़्यादा से ज़्यादा धन ऐसे ज़रूरतमंदों को देने के लिए कहा (आयत 9-11).
विषय:01-08: पाखंडियों का वर्णन
09-11: ईमानवालों को अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने पर ज़ोर
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] जब (मदीना के) पाखंडी लोग [मुनाफ़िक/ Hypocrites] आपके पास आते हैं, तो कहते हैं, "हम इस बात की गवाही देते हैं कि आप अल्लाह के रसूल हैं।" वैसे अल्लाह जानता है कि आप सचमुच उसके रसूल हैं, और अल्लाह (यह भी) गवाही देता है कि ये पाखंडी लोग बिलकुल झूठे हैं----(1)
वे अपनी क़समों को ढाल [Shield] के रूप में उपयोग करते हैं, और इस तरह वे दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं: वे जो कुछ भी करते रहे हैं, वह सचमुच ही शैतानी काम हैं----- (2)
यह इस कारण से है कि पहले तो उन लोगों ने (सच्चाई पर ज़बान से) विश्वास कर लिया था, मगर फिर बाद में (दिल से) उसे मानने से इंकार कर दिया, अतः उनके दिलों को बंद करके उस पर ठप्पा लगा दिया गया है, और अब वे (सच्चाई की बातें) नहीं समझ सकते हैं। (3)
(ऐ रसूल!) जब आप उन्हें देखें, तो उनके बाहरी रूप को पसंद करेंगे; फिर जब वे बातें करें, तो आप उनकी बात सुनते ही रह जाएं। मगर वे किसी सहारे से खड़ी की गयी लकड़ियों की तरह हैं (जो देखने में मज़बूत लगें, मगर बिना जड़ के हों) ---- वे सुनायी देनेवाली हर ज़ोर की आवाज़ को अपने ही विरुद्ध समझते हैं---- और वे (आपके) दुश्मन हैं। अतः उनसे बचकर रहें। अल्लाह की मार हो उन पर! वे कितने शातिर व कुटिल हैं! (4)
जब उनसे कहा जाता है कि, "आओ, ताकि अल्लाह के रसूल तुम्हारे लिए माफ़ी की दुआ कर दें", तो वे तिरस्कार से अपने सिर झटककर फेर लेते हैं, और आप देखते हैं कि वे अकड़ते हुए चल देते हैं। (5)
इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, चाहे (ऐ रसूल) आप उनके लिए माफ़ी की दुआ करें या न करें, अल्लाह उन्हें माफ़ नहीं करेगा: ऐसे विश्वासघातियों को अल्लाह सीधा रास्ता नहीं दिखाता। (6)
ये वही लोग हैं जो (मदीना के अंसार [Helpers] से) कहते हैं, “जो लोग अल्लाह के रसूल के साथ हैं, उन लोगों पर कुछ भी ख़र्च न करो, जब तक कि वे उनका साथ न छोड़ दें", लेकिन आसमानों और ज़मीन के ख़जाने तो अल्लाह ही के हैं, हालांकि पाखंडी लोग इस बात को नहीं समझते हैं। (7)
वे कहते हैं, "एक बार हम मदीना वापस पहुंच जाएं, तो फिर (वहां) जो ताक़तवर (और इज़्ज़तदार) लोग हैं, वे कमज़ोरों [मुहाजिरों/Emigrants] को निकाल बाहर करेंगे," मगर असल ताक़त तो अल्लाह की है, उसके रसूल की है, और ईमान रखनेवालों की है, हालांकि पाखंडी लोग [मुनाफ़िक़] इस बात को नहीं जानते। (8)
ऐ ईमान रखनेवालो! (देखो), कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी दौलत और तुम्हारी औलाद, तुम्हारा ध्यान अल्लाह की याद (और उसके ज़िक्र) से भटका दे: (याद रहे) जो लोग ऐसा करेंगे, वही हैं जो घाटे में रहेंगे। (9)
जो कुछ हमने तुम्हें दे रखा है, उसमें से ख़र्च कर लो, इससे पहले कि तुममें से किसी की मौत आ जाए और उस समय वह कहने लगे, "ऐ मेरे रब! काश तूने मुझे कुछ थोड़े समय की और मुहलत दी होती, तो मैंने ख़ूब दान-दक्षिणा [ज़कात] दिया होता, और अच्छे व नेक लोगों में शामिल हो जाता!" (10)
मगर अल्लाह, किसी आदमी को उस वक़्त कोई मुहलत नहीं देता, जब उसकी तय की हुई बारी आ जाती है: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (11)
नोट:
2: मदीना में पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] का एक समूह था जिसमें कुछ यहूदी और कुछ स्थानीय अरब लोग थे, जिन्होंने ईमान रखने का ढोंग कर रखा था और वे झूठी क़समें खाया करते थे ताकि उन्हें काफ़िर न समझा जाए।
4: ये पाखंडी लोग देखने में काफ़ी अच्छे थे और उनकी बातें मन को मोहने वाली होती थीं, मगर दिल में नफ़रत और धोखा भरा हुआ था। ये लोग जब मुहम्मद (सल्ल) की मजलिसों में बैठते, तो बड़े बुरे दिल से बैठ तो जाते, मगर उनका ध्यान कहीं और ही होता, इसीलिए उनकी मिसाल बिना जड़ की बेजान लकड़ियों से की गई है जिनमें कोई मज़बूती नहीं होती।
6: जब तक ये लोग अपने पाखंड को हमेशा के लिए छोड़कर पक्के ईमानवाले नहीं हो जाते, तब तक उन्हें अल्लाह माफ़ नहीं करेगा।
7: पाखंडियों का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबी एक अभियान में मुहम्मद (सल्ल) और उनके साथियों के साथ गया था, जब लड़ाई ख़त्म हो गई, तो वहाँ पानी के मामले को लेकर आपस में मदीना के अंसारियों [Helpers] और (मक्का से आए हुए) मुहाजिरों [Migrants] के बीच हाथा-पाई हो गई, मुहम्मद (सल्ल) के समझाने-बुझाने से मामला ठंढा हो गया। मगर उसके बाद अब्दुल्लाह बिन उबी ने आपस में फूट डालने के लिए यह कहकर आग लगायी कि अंसारियों ने मुहाजिरों को मदीने में पनाह देकर बहुत सिर चढा रखा है, यहाँ तक कि अब मुहाजिर यहाँ के मूल निवासियों पर हाथ उठाने लगे हैं! उसने अपने साथियों से यह भी कहा कि "अल्लाह के रसूल के साथ जो उनके साथी हैं, उन पर अपना माल ख़र्च करना बंद कर दो, वे अपने आप मुहम्मद साहब का साथ छोड़कर कहीं और चले जाएंगे, और जब हम मदीना वापस पहुँचेंगे, तो वहाँ जो ताक़त और इज़्ज़तवाले [अंसारी] हैं, वे कमज़ोरों [मुहाजिरों] को निकाल बाहर करेंगे।"
10: एक हदीस में है कि आदमी का असल धन वही है जो वह दान कर दे, जो धन वह छोड़ जाए वह तो उसके वारिसों का है। (सही बुख़ारी: 6442)
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