Tuesday, March 29, 2022

Surah/सूरह 90: Al-Balad/अल-बलद [मक्का शहर / The City]

  सूरह 90: अल-बलद

[मक्का शहर / The City]

यह एक मक्की सूरह है। इस सूरह में बताया गया है कि आदमी को इसलिए पैदा किया गया है कि वह अपनी मर्ज़ी से अच्छा या बुरा कर्म चुन सके, जिसके आधार पर उसका फ़ैसला होगा इसलिए आदमी को चाहिए कि वह अच्छे कर्म करने की कोशिश में लगा रहे ताकि कामयाब हो सके, कि बुरे कर्मों में फँसकर घमंडी और बेकार हो जाए। 


विषय:

01-11: अच्छाई और बुराई के दो रास्ते

12-17: कठिन रास्तों वाली घाटी का वर्णन 

18-20: दाहिने और बायीं तरफ़वाले 

 
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
मैं इस शहर ٌٌ[मक्का] की क़सम खाता हूँ---  (1)

और आप [ऐ रसूल!] इसी शहर के रहने वाले हैं --- (2)

(और क़सम खाता हूँ) बाप की और उनके बच्चों की,  (3)
कि हमने इंसान को कष्ट में (फंसा रहने वाला) बनाया है।  (4)

क्या वह यह समझता है कि उस पर किसी का बस नहीं चलेगा?  (5)
वह (बड़े गर्व से) कहता है, “मैंने ढेरों माल उड़ा डाला है”,  (6)

क्या वह सोचता है कि उसे (बेकार चीज़ों में ख़र्च करते हुए) कोई नहीं देखता?   (7)

क्या हमने उसे दो आंखें नहीं दीं? (8)
और (उसे) एक ज़बान और दो होंठ (नहीं दिए)? (9)

और हमने उसे (अच्छाई और बुराई के) दोनों रास्ते साफ़-साफ़ दिखा दिए।  (10)

इसके बावजूद, वह तो (अच्छे कर्मों को करने के लिए) खड़ी चढ़ायी वाली घाटी से गुज़रा ही नहीं,  (11)

और आप क्या जानें कि वह खड़ी चढ़ायी वाली घाटी [steep pass] क्या है?  (12)

किसी को ग़ुलामी से आज़ाद करा देना, (13)
या भूखवाले दिनों में (यानी अकाल और ग़रीबी के दौर में) खाना खिला देना,  (14)
 
किसी अनाथ [यतीम] को जो नज़दीकी रिश्तेदार हो,   (15)

या सख़्त ग़रीबी के मारे हुए आदमी को जो धूल में पड़े होते हैं (और बेघर हैं),  (16)
और वह उन लोगों में से एक हो जो ईमान रखता हो, और एक दूसरे को धीरज से क़दम जमाए रखने पर ज़ोर देता हो, और आपस में दया-भाव रखने [compassion] की नसीहत करता हो।  (17)

तो जो लोग ऐसा करते हैं, वे दाहिने तरफ़वाले [अच्छी क़िस्मतवाले और माफ़ किये गये] हैं,  (18)
मगर जिन लोगों ने हमारी आयतों पर विश्वास करने से इंकार किया, वे बायीं तरफ़वाले [बदक़िस्मत और पापी] हैं,  (19)

और आग उनको चारों तरफ़ से घेर लेगी और उन्हें (उसी में) बंद कर दिया जाएगा!  (20)
 
 
 
 
नोट:

1-4: पहले तो मक्का की क़सम खायी गई है। यह वह शहर था जहाँ 'वही' [revelation] उतरती थी, और जिस हस्ती [मुहम्मद सल्ल] पर यह उतरती थी, वह भी यहीं के रहने वाले थे। इस सूरह में जो तस्वीर उभरती है वह है मुश्किल व विपरीत परिस्थिति। मक्का को क़ुरआन में एक बंजर घाटी बताया गया है (14:37). पैग़म्बर साहब को बाद की एक सूरह में बताया गया है कि पहले बहुत सी बस्तियों को तहस-नहस किया जा चुका है जिसके रहने वाले मक्कावासियों से कहीं ज़्यादा मज़बूत थे, उन्हें बराबर याद दिलाया गया है कि पहले की क़ौम के लोगों ने भी अपने रसूल की बातों को ठुकरा दिया था (जैसे, 22: 43-45).

दूसरी क़सम माँ-बाप और उसकी औलाद की है। इस रिश्ते में माँ-बाप और औलाद दोनों को जीवन के शुरू और अंत में काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है जब वे कमज़ोर होते हैं (22:5, 30:54). यहाँ यह भी याद कराया गया है कि माँ जो नौ महीने तक बच्चे को कोख में लिए रहती है, फिर उसे जनने तक काफ़ी तकलीफ़ से गुज़रती है (देखें 46:15). माँ-बाप और औलाद की क़सम खाने में असल में अल्लाह की ताक़त को दर्शाया गया है, और इसके द्वारा घमंडी और नाशुक्रे लोगों को याद दिलाया गया है किस तरह आदमी के साथ कमज़ोरी और परेशानी जुड़ी हुई है। इस तरह, पैग़म्बर साहब को याद दिलाया गया है कि परेशानी आदमी के जीवन का हिस्सा है, जिसे धीरज के साथ झेलना चाहिए, यह नसीहत असल में मक्का के ईमानवालों के लिए थी जिन्हें कठिन परिस्थिति में साहस और धीरज से काम लेने को कहा गया है।  

6: मक्का में सच्चाई पर विश्वास न करने पर अड़े कई ऐसे (काफ़िर) लोग थे जिन्हें अपनी शारीरिक ताक़त पर बड़ा घमंड था। साथ ही वे बेकार चीज़ों पर ख़र्च करते थे और आपस में दिखावे के लिए बड़े घमंड से कहते थे कि उन्होंने ढेरों माल उड़ा डाले हैं। 

11: अच्छे व नेक काम करने के लिए जो अपने मन की इच्छाओं से संघर्ष करना पड़ता हैऔर जो कठिनाई झेलनी पड़ती हैउसे यहाँ पर 'खड़ी चढ़ायी वाली घाटी से गुज़रना' कहा गया है।

18: दायीं तरफ़वाले: देखें 56:8; 27:40, 90-91 ..... बायीं तरफ़वाले : देखें 56:9, 41-56, 92-94 


 

 

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